0:00 साल 2011 में इंडिया की रिटेल किंग थी किशोर बियानी की बिग बा जिसके पूरे इंडिया में 250 स्टोर्स थे और दूसरी तरफ एक छोटी सी कंपनी थी। सिर्फ 10 स्टोर्स वो भी मुंबई के आसपास। लोगों को लगा यह बिग बा के सामने तो टिक भी नहीं पाएगी। लेकिन आज पिक्चर पूरी तरह उलट चुकी है। बिग बा एंपायर टूट गया। 250 स्टोर्स आज इनसॉल्वेंसी में आ गए और वो 10 स्टोर वाली कंपनी आज उसके पूरे इंडिया में 500 से ज्यादा स्टोर्स हैं। और सबसे इंटरेस्टिंग बात जिस आदमी ने यह एंपायर बनाया शायद आप उसका नाम भी नहीं जानते होंगे क्योंकि ना वो कोई इंटरव्यू देते हैं ना कोई स्पॉटलाइट में रहते हैं। बस सफेद कुर्ता पाजामा पहनते हैं और नाम है राधाकिशन
0:46 दमानी जी। अब सवाल यह नहीं है कि डीमार्ट सक्सेसफुल कैसे हुआ? सवाल असली है 250 स्टोर वाला हार गया और 10 स्टोर वाला 500 स्टोर तक कैसे पहुंच गया? दमानी ने रिटेल में ऐसा क्या समझ लिया जो बिग बा नहीं समझ पाया? और जो जवाब है ना वो सिर्फ डीमार्ट की कहानी नहीं आपके बिजनेस में भी सीधा अप्लाई होता है। लेकिन रुक जाइए। कभी dमar बिग बा के सामने छोटा प्लेयर था। आज dमar के सामने भी एक नया प्लेयर है। और अब सवाल और बड़ा है जिस तरह dमar ने बिग बाz को पीछे छोड़ा क्या कोई और dमar के साथ भी वही करने वाला है? लेकिन पहले समझते हैं दमानी जी ने बिग बा को कैसे हराया? तभी समझ आएगा कि dमar का अगला चैप्टर जीत है या हिस्ट्री रिपीट है। चलिए शुरू करते
1:34 हैं। हेलो दोस्तों, मैं हूं आपका दीपक। आप देख रहे हैं डिस्टॉल। तो साल 1955 में राजस्थान के बीकानेर के एक माहेश्वरी परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया राधाकिशन दमानी। बाद में फैमिली मुंबई शिफ्ट हो गई। एक कमरे में पूरा परिवार और पिता दलाल स्टीज पर स्टॉक ब्रोकर थे। राधाकिशन जी ने पहले बीकॉम जॉइ किया लेकिन पहले साल में ही छोड़ दिया। फिर शुरू किया बॉल बेयरिंग का छोटा सा बिजनेस। जिंदगी उनकी सीधी चल रही थी। लेकिन फिर उनके पिता गुजर गए। बॉल बेरिंग का धंधा बंद हो गया और दमानी जी आ गए दलाल स्ट्रीट पे उसी जगह पे जहां कभी उनके पिता काम करते थे। अब ना उनके पास डिग्री कंप्लीट थी ना कोई बड़ा बिजनेस का एंपायर था ना ही कोई बैकअप का प्लान था। बस घर की
2:22 जिम्मेदारी और मार्केट सामने था और मार्केट में भी दमानी जी भीड़ जैसे नहीं थे। कपड़े तक रोज वो वाइट पहनते। वाइट शर्ट वाइट ट्राउज़। इसीलिए दलाल स्ट्रीट ने उन्हें नाम दिया मिस्टर वाइट एंड वाइट। लेकिन अब इस वाइट कपड़े वाले आदमी की असली कहानी शुरू होने वाली थी। साल 1991 मार्केट में एंट्री हुई एक ऐसे आदमी की जिसके नाम पर स्टॉक मार्केट रोज रॉकेट बन जाता था। नाम था हर्षद मेहता और उसके सामने दमानी जी ने जो बेट लगाई अगर स्टॉक मार्केट से सात दिन और उनके अगेंस्ट चलता तो डीमार्ट की कहानी शायद शुरू ही नहीं होती। पूरे दलाल स्ट्रीट पे सिर्फ एक नाम का तूफान था हर्षद मेहता। क्योंकि एसीसी हो या अपोलो टायर हर्षद जिस स्टॉक में
3:08 पैसे लगाता उसका प्राइस रॉकेट बन जाता था और दमानी जी उसका एग्जैक्टली उल्टा कर रहे थे। शॉर्ट सेलिंग मतलब उनकी बिड थी यह प्राइसेस टिकने वाले नहीं है। यह नीचे आएंगे। लेकिन शॉर्ट सेलिंग में दिक्कत यही है। स्टॉक खरीदो तो मैक्सिमम वही पैसा डूबेगा जो लगाया है। लेकिन शॉर्ट करो तो और स्टॉक ऊपर ही जाता रहे तो लॉस की कोई सीलिंग नहीं होती। अब हर्षत वहीं नहीं रुका। मार्केट चढ़ता गया और दमानी जी का भी लॉस बढ़ता गया। और एक वक्त आया जब सिचुएशन हाथ से निकलने लगी। बाद में दमानी जी ने अपने कुछ करीबी लोगों से एक लाइन कही थी जो दलाल स्ट्रीट में आज भी कहानियों की तरह गूंजती है। हर्षद 7 दिन और अगर टिक जाता तो मुझे कटोरा लेकर सड़क
3:54 पर आना पड़ता। यह स्टेटमेंट था राधाकिशन दमानी जी का। और फिर 23 अप्रैल 1992 आया। सुचेता दलाल की रिपोर्ट आई और हर्षद मेहता का स्कैम एक्सपोज्ड हो गया। मार्केट पलटा, स्टॉक्स गिरे और जो शॉर्ट पोजीशन दमानी को बर्बादी के करीब ले गई थी, वही उनके फेवर में पलट गई। दमानी जी ने इस एक्सपीरियंस से भी लेसन लिया। लेकिन इसे कभी पब्लिक पे एक्सप्लेन नहीं किया। लेकिन मेरी नजर में 7 दिन दूर खड़ा आदमी एक चीज जरूर समझ गया होगा। पैसा कमाना इंपॉर्टेंट है लेकिन रिस्क पे कंट्रोल करना उससे भी ज्यादा इंपॉर्टेंट है। अब इंटरेस्टिंग बात सुनिए। उस दलाल स्टेट पे एक यंग इन्वेस्टर भी था जो दमानी जी को दूर से ऑब्जर्व कर रहा था। आगे चलके ये दुनिया उसे बोलने लगी बिग बुल। नाम था राकेश झुनझुनवाला जी। राकेश
4:42 झुंझुनवाला और दमानी दोनों की मुलाकात साल 1978 में हुई थी। यह एक फॉर्मल इंट्रोडक्शन नहीं था। यह बस एक मुलाकात थी जो कि जिंदगी भर की दोस्ती बन गई। और झुंझुनवाला से जब किसी ने पूछा आपके गुरु कौन है? तो उन्होंने हमेशा एक नाम लिया राधाकिशन दमानी। उन्होंने कहा कि उन्होंने ट्रेडिंग उन्हीं से सीखी है और यही इस कहानी की पहली अजीब बात है। दमानी जी का सिक्का मार्केट में बोल रहा था। लेकिन उन्होंने पहला एक्सपेरिमेंट अपने बिजनेस का यहीं किया और वो सीधा फेल हो गए। स्टॉक में धूम मचाने के बाद दमानी जी ने एक और गेम ट्राई किया। रिटेल का गेम। साल 1997 में मुंबई के नेरुल में इन्होंने अपना बाजार का फ्रेंचाइजी लिया। लेकिन कुछ ही टाइम में एक प्रॉब्लम सामने आकर खड़ी हो
5:28 गई। दुकान दमानी की, पैसा दमानी का, मेहनत दमानी की। लेकिन दुकान में बिकेगा क्या? यह दमानी डिसाइड ही नहीं करते थे। सामान का बड़ा हिस्सा अपना बाजार डिसाइड करता था। जिससे सप्लाई लेट, चॉइस लिमिटेड और सबसे बड़ी प्रॉब्लम कंट्रोल किसी और के हाथ में था। सिर्फ 2 साल में ही दमानी इस मार्केट को समझ गए और छोड़ के बाहर आ गए। लेकिन यह फेलियर नुकसान नहीं था। एक ब्लूप्रिंट था जो वो अपने माइंड में बना रहे थे। राधाकिशन दमानी समझ गए थे कि अगर पैसा मेरा है, रिस्क मेरा है तो इंपॉर्टेंट डिसीजन पे कंट्रोल भी मेरा होना चाहिए। और भाई सिर्फ ये डीमार्ट की बात नहीं है। आपके बिजनेस में भी देखिए सप्लायर, लैंड लॉर्ड, Amazon, Flipkart या कोई बड़ा क्लाइंट आपके धंधे में सबसे बड़ा
6:16 कंट्रोल किसका है? दमानी जी ने डिसाइड किया अब सप्लाई पे मेरा कंट्रोल होगा। एसॉर्टमेंट पे मेरा कंट्रोल होगा और लोकेशन की इकोनॉमिक्स पे मेरा कंट्रोल होगा। और इसके बाद उन्होंने अशोक माहेश्वरी का साथ लिया। और साल 2002 में मुंबई के पवई में पहला स्टोर खोला गया। नाम रखा गया dमar। और अब आते हैं उन चार रूल्स पर जिनका जवाब उस सवाल में छुपा है जो हमने शुरुआत में पूछा था। DMart आखिर जीता कैसे और बिग बा क्यों हार गया? DMart का सक्सेस असल में कोई एक्सीडेंट नहीं था। ये चार रूल्स फिक्स थे जो पहले दिन से फॉलो किए गए। आते हैं पहले रूल पे। बिग बा फार्मूला था प्राइम लोकेशनेशंस। बड़े मॉल्स शहर के बीच में और हर महीने भारी
7:02 किराया वह देते थे। दमानी जी ने उसका उल्टा किया। प्राइम लोकेशनेशंस के पीछे वो नहीं भागे। थोड़ा आउटस्कर्ट्स में चले गए। जहां जमीन सस्ती थी और जहां पॉसिबल था किराया देने के बजाय प्रॉपर्टी खुद कंट्रोल कर सके। अब रिटेल का एक सिंपल हिसाब समझ लीजिए। कस्टमर आए ना आए सेल हो ना हो किराया हर महीने आपको देना पड़ता है। और दमानी जी यह रिकरिंग खर्चा पसंद नहीं करते थे। लेकिन सवाल है जमीन खरीदोगे, नया स्टोर खोलोगे तो इतना पैसा आएगा कहां से? यही आता है दमानी जी का अस्ति सीक्रेट प्लान। राधाकिशन दमानी ने सिंपल बिजनेस किया। उन्होंने पहला स्टोर अपना प्रॉफिटेबल बनाया और फिर उस प्रॉफिट को घर नहीं ले गए। वापस उसी बिजनेस में डाल दिया। फिर
7:47 उसी प्रॉफिट से दूसरा स्टोर खुला। फिर पहले दो स्टोर मिलके तीसरे को फंड करते और तीन स्टोर्स मिलके चौथे को फंड करते। और धीरे-धीरे मशीन खुद को फंड करने लगी। इसीलिए शुरुआत इनकी स्लो दिखी। पहले कुछ सालों में सिर्फ थोड़े स्टोर्स थे और आज 500 से ज्यादा स्टोर्स हैं। डिमांड असल में स्लो नहीं था। डिमांड कंपाउंड हो रहा था और कंपाउंडिंग की सबसे बड़ी ताकत है। शुरुआत में वो मजाक लगती है। बाद में कंपटीशन पकड़ ही नहीं पाता उसे। बिजनेस के लिए एक लाइन याद रखिए। मुनाफा जेब में डालेंगे तो इनकम बनेगा और मुनाफा वापस धंधे में डालेंगे तो एंपायर बनेगा। रूल नंबर टू आता है। अब रिटेल में असल में एक सबसे बड़ी कॉमन प्रॉब्लम है। माल आज लीजिए तो वेंडर को पैसे बाद में दीजिए। सप्लायर
8:35 को पेमेंट अक्सर 30 से 60 दिन तक उसका अटक जाता है। लेकिन दमानी जी ने इसका उल्टा गेम खेला। डीमार्ट सप्लायर्स को इंडस्ट्री के मुकाबले सिर्फ 7 से 10 दिन में पेमेंट करने लगा। अब खुद वेंडर बन के सोचिए। दो दुकानदार हैं। एक बोलता है पैसा 1 महीने बाद मिलेगा। दूसरा बोलता है भाई तेरा पैसा 10 दिन में क्लियर हो जाएगा। अब बताइए बेस्ट रेट आप किसे देंगे? जल्दी पैसा देने वाले को यही डीमार्ट का दोस्तों असली गेम है। वेंडर ने बेटर रेट दिए। DMart ने उसका फायदा कस्टमर को डिस्काउंट के रूप में दिया और कस्टमर वापस आया जिससे सेल्स बढ़ी। मतलब एक बार साइकिल चली तो सब जीते। वेंडर, कस्टमर और dमar अब बिजनेस समझिए। वेंडर का पैसा रोक के कैश बचता है और
9:21 वेंडर का भरोसा जीत के मार्जिन बनता है। यही आता है रूल नंबर थ्री। डीमार्ट का फोकस सिंपल था। ग्रोसरीज और एफएमसीजी। और वो सामान जो घर में बार-बार खत्म होता है। जैसे आटा, तेल, साबुन, डिटर्जेंट। क्यों? क्योंकि रिटेल में जो माल शेलफ पड़ा रहता है ना वो माल नहीं है। वह आपका फंसा हुआ पैसा है। मान लीजिए आपने ₹100 का माल खरीदा। वो एक महीने में बिक गया। अब ₹100 वापस आप फिर दोबारा माल खरीदने में करेंगे। फिर दोबारा सेल होगी। फिर तीसरी बार होगी। अब दूसरी दुकान देखिए। वहां ₹100 का माल 3-4 महीने तक शेलफ पड़ा है। पैसे सेम है लेकिन एक जगह पैसा बार-बार घूम रहा है। दूसरी जगह शेल्फ पे पैसा सो रहा है।
10:06 यही डीमार्ट का गेम है। कम फैंसी प्रोडक्ट रखो। ज्यादा फास्ट मूविंग प्रोडक्ट रखो। माल जल्दी निकले शेयर्स से। पैसा जल्दी वापस आए और वही पैसा फिर से माल खरीदने में लग गया। रिटेल में सिर्फ यह मैटर नहीं करता कि एक प्रोडक्ट पे कितना कमा रहे हैं। असली गेम है कि एक पैसा साल भर में कितनी बार घूम रहा है। यही आता है चौथा रूल। बहुत सारी कंपनीज असल में क्या करती हैं? थोड़ा मुंबई में एक्सपेंड किया, थोड़ा दिल्ली में किया, थोड़ा बेंगलुरु में स्टोर्स खोल लिए। लेकिन दमानी जी ने इसका भी उल्टा किया। उन्होंने कहा पहले एक एरिया पकड़ो, फिर वहीं आसपास में स्टोर्स खोलो, वेयर हाउस बनाओ, सप्लाई चेन बनाओ, स्टाफ और मैनेजमेंट सभी एक क्लस्टर में बनाओ। क्योंकि अगर 10 स्टोर एक ही रीजन
10:52 में हैं तो एक वेयर हाउस सबको माल पहुंचा सकता है। एक मैनेजमेंट टीम सबको हैंडल कर सकती है। इससे ट्रांसपोर्ट और कॉम्प्लेक्सिटी दोनों कम हो जाती है। अब जब एक मार्केट का सिस्टम प्रॉपर्ली सेट हो गया तब दूसरा मार्केट पकड़ा। फिर तीसरा मार्केट पकड़ा। मतलब दमानी जी का गोल है मैप में जल्दी-जल्दी डॉट्स नहीं लगाना है। एक-एक करके मार्केट पे पकड़ पाना है। अब इसका सबसे इंटरेस्टिंग प्रूफ देखिए। dमar के पास एक्सपेंशन करने की कोई लिमिट नहीं है। वो चाहे तो आज दिल्ली, यूपी और पंजाब पूरे नॉर्थ इंडिया में बहुत एग्रेसिवली एक्सपेंशन कर सकते हैं। लेकिन कंपनी ने पहले महाराष्ट्र, गुजरात और साउथ इंडिया के मार्केट्स में अपनी गहरी पकड़ बनाई। और अब जब पुराने क्लस्टर स्ट्रांग हो चुके हैं तो dमar नॉर्थ इंडिया में भी अपनी
11:38 स्पीड बढ़ा रही है। लेकिन एक चीज और थी कस्टमर स्टोर तक कैसे आएगा? क्या वो बिग सेलिब्रिटी यूज़ करते या टीवी ऐड यूज़ करते? या हर वीकेंड मेगा सेल देते। dमar ने इसमें भी अलग गेम खेला। वो सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट पर डिपेंड नहीं रहे। फ्लैशी सेल का ड्रामा नहीं किया ना कोई प्रॉमिस किया। बस एक सिंपल बात बोली। आज भी सस्ता, कल भी सस्ता, हर दिन सस्ता। इसी स्ट्रेटजी को कहते हैं ईडीएलपी मतलब एवरीडे लो प्राइस। और अब dमar के चारों रूल एक साथ देखिए। प्रॉपर्टी की इकोनॉमिक्स पर कंट्रोल है। वेंडर को जल्दी पेमेंट देते हैं। फास्ट मूविंग माल रखते हैं और एक-एक मार्केट में गहरी पकड़ बनाते हैं। अलग-अलग देखिए तो छोटी-छोटी चीजें लगती हैं ये। लेकिन जब चारों को जोड़ दीजिए तो एक मशीन
12:25 बनती है जो कॉस्ट को नीचे रखती है और कस्टमर को हर दिन प्राइस देती है। लेकिन यहां एक सवाल है इतना कुछ दमानी जी ने किस कस्टमर के लिए डिजाइन किया था? वो कौन था जो फैंसी मॉल छोड़ के dमar तक जाने को रेडी था। क्योंकि जिस दिन आप dमar का कस्टमर समझ गए उसी दिन आप समझ जाओगे कि बिग बा के सामने डीमार्ट जीता क्यों। अब 1 मिनट के लिए स्टोर, मार्जिन, इन्वेंटरी सब नंबर भूल जाइए। एक मिडिल क्लास घर को इमेजिन करिएगा। महीने का राशन लेना है जिसमें आटा, चावल, तेल, साबुन, डिटर्जेंट, शैंपू ऐसी करीब 2030 चीजें हैं। इस घर के लिए एक पैकेट पे ₹100 बचाना जरूरी नहीं है। असली गेम है ₹5 यहां बचे, ₹10 वहां
13:10 बचे, ₹8 किसी और चीज पर बचे। और जब पूरी ट्रॉली बिल काउंटर पर पहुंचे तो टोटल ₹300 से ₹500 का फायदा हो जाए। बस डीमार्ट ने इसी फीलिंग को पकड़ लिया। कस्टमर एक प्रोडक्ट लेने नहीं आता वहां। वो महीने का बजट वहां बचाने आता है और महीने के एंड में उसे शेलफ कितनी सुंदर थी, एसी कितना ठंडा था या स्टोर कितना फैंसी था, यह सब नंबर याद नहीं रहता। उसको एक नंबर याद रहता है। पिछली जगह से बिल कितना कम आया था यहां। दमानी जी ने हर इंडियन के लिए स्टोर डिजाइन नहीं किया था। उन्होंने स्पेसिफिक कस्टमर टारगेट किया। वैल्यू फर्स्ट हाउसहोल्ड जो थोड़ा दूर जा सकते हैं। थोड़े लाइन को टोलरेट कर सकते हैं। लेकिन बदले में पूरे महीने का बिल कम चाहते हैं। और यही वजह थी जब ई-कॉमर्स आया
13:58 और लोग बोले अब फिजिकल रिटेल का काम खत्म। dमar का कोर प्रपोजिशन पे इस समय भी कोई असर नहीं हुआ। एक टूथपेस्ट घर मंगवाना और पूरे महीने की ट्रॉली भरना दो अलग बाइंग बिहेवियर्स हैं। दोस्तों अब वापस हम उस सवाल पे आते हैं जहां से हमने कहानी शुरू किया था। dमar के पास कोई मैजिक प्रोडक्ट नहीं था। बिग बा के पास भी कस्टमर की कमी नहीं थी। फिर भी एक कंपनी बढ़ती गई और दूसरी 250 स्टोर के एंपायर से लगातार गिरती चली गई। तो गलती असल में कस्टमर की नहीं थी। गलती बिजनेस के अंदर थी। अब देखते हैं बिग बा क्यों हारा। लगभग एक ही वक्त पे दो रिटेल स्टोर शुरू हुई थी 2002 में। किशोर बियानी का बिग बा और राधाकिशन दमानी का डीमार्ट। अब 2010 तक बिग बा के
14:44 250 स्टोर्स हो गए और dमar के सिर्फ 10 स्टोर्स थे। dमar को एक छोटा प्लेयर माना जा रहा था। लेकिन अब असली जवाब सुनिए। बिग बा की प्रॉब्लम असल में कस्टमर की कमी नहीं थी। उनकी असली प्रॉब्लम थी कि उनकी ग्रोथ का खर्चा अर्निंग से ज्यादा बढ़ रहा था। नया स्टोर खोलना है तो कर्जा लेते थे वो। प्राइम लोकेशन चाहिए उनको। हर महीने भारी किराया देते थे। शेलफ पे माल नहीं बिक रहा। पैसा वहां भी फंसा रहता था। वेंडर को लेट पेमेंट करते थे और अगली बार जिससे बेटर रेट मिलना उनको मुश्किल होता था। मतलब इनका हर नया स्टोर दूसरे स्टोर को फंड नहीं कर रहा था बल्कि हर स्टोर एक नया बोझ जोड़ रहा था। और dमar को देखिए दमानी जीव ग्रोथ को रेवेन्यू से नहीं इकोनॉमिक से नाप रहे थे। पहले स्टोर को
15:29 स्ट्रांग करो। उसका पैसा अगले स्टोर में लगाओ। फिर यही चीज रिपीट करो। बस यही फर्क था दोस्तों। एक बिजनेस तेज दिख रहा था। दूसरा चुपचाप कंपाउंड कर रहा था। फिर प्रेशर और बढ़ता गया। बिग बांपायर टूट गया। फ्यूचर रिटेल इनसॉल्वेंसी में चला गया और कई प्राइम लोकेशन Reliance के कंट्रोल में चले गए। और dमar में ही 500 से ज्यादा आज उसके स्टोर्स हो चुके हैं। फाइनेंसियल ईयर 25 में 59358 करोड़ का रेवेन्यू किया जिसमें 2700 करोड़ का प्रॉफिट है। लेकिन दुनिया को दमानी जी की पावर एक दिन में दिख गई। जब dमar पूरे इंडिया की हेडलाइन बन गया था। 8 मार्च 2017 को aven्यू summar का आईपीओ आया जिसका इशू प्राइस सिर्फ ₹299 था और 21
16:15 मार्च को लिस्टिंग के दिन जब मार्केट खुला शेयर सीधा ₹604 के आसपास पहुंच गया। मतलब पहले ही दिन पैसा डबल हो गया। आईपीओ 100 गुना से ज्यादा सब्सक्राइब हुआ और अचानक जो आदमी सालों से चुपचाप स्टोर्स खोल रहा था पूरे इंडिया की हेडलाइन बन गया। राधाकिशन दमानी इंडिया के सबसे अमीर बिजनेसमैन की लिस्ट में भी उसी समय पहुंच गए। मीडिया उनका इंतजार कर रही थी कि दमानी जी क्या बोलेंगे? अपने सक्सेस का सीक्रेट बताएंगे या कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। लेकिन दोस्तों ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। ना कोई इंटरव्यू हुआ ना कोई सेलिब्रेशन हुआ। सिर्फ वही वाइट ट्राउज़ वाला आदमी और चुपचाप खामोशी से अपना काम करता रहा। लेकिन कहानी दोस्तों यहीं खत्म नहीं हुई। dमar की जीत तो हुई लेकिन 2026 में गेम फिर बदल चुका है और अब बिग बा
17:01 सामने नहीं है। कोई बड़ा मॉल भी नहीं है ना कोई ट्रेडिशनल स्टोर है। इस बार दुश्मन कस्टमर की असल में एक नई आदत है। और सवाल है जिस स्ट्रेटजी ने बिग बा को हरा दिया क्या वही स्ट्रेटजी अब dमar की भी वीकनेस बनने वाली है? आज blink zpप्टtो और sविg instाamar यह 10 मिनट में ग्रोसरी डिलीवर करते हैं घर पे। ना कोई आपको लाइन लगानी है, ना कोई पार्किंग देना है, ना कोई संडे का आधा किराया खराब करना है। और एक डाटा और सुनिए। इंडिया का क्विक कॉमर्स लगभग 40% की रफ्तार से हर साल बढ़ रहा है। लेकिन ध्यान से समझिए। यह दुश्मन बिग बा से अलग है। असल में बिग बा एक कंपनी थी। क्योंकि कॉमर्स एक कंपनी नहीं है। एक आदत है लोगों की और यही dमar के लिए भी बड़ा
17:46 डेंजर है। dमar का कस्टमर कहता है थोड़ा दूर चले जाएंगे लेकिन महीने का बिल कम होना चाहिए। अब क्विक कॉमर्स क्या कहता है? दूर जाने की जरूरत ही क्या है? मतलब dमar ने कस्टमर का पैसा बचाया और क्विक कॉमर्स कस्टमर्स का टाइम बचा रही है और यह प्रेशर भी साफ दिख रहा है। dमar के पुराने स्टोर्स की ग्रोथ भी स्लो हुई है। लेकिन नॉन मेट्रो मार्केट्स अभी भी इनका कंपेरेटिवली बेटर परफॉर्म कर रहा है। और दूसरी तरफ फाइनेंसियल ईयर 26 में dमar ने रिकॉर्ड 50 ही नए स्टोर्स खोले और 500 स्टोर टच कर दिए। मतलब dमar भाग नहीं रहा है लेकिन दुश्मन भी उनका रुक नहीं रहा है और आरनी देखिए कभी छोटा dमar बिग बा की आदत बदल रहा था और आज क्विक कॉमर्स dमar के कस्टमर की आदत बदलने की कोशिश कर रहा
18:33 है तो क्या हिस्ट्री रिपीट होगी या दमानी जी एक बार फिर से गेम समझ लेंगे अब असली सवाल बस एक है प्राइस जीतेगा या कन्वीनियंस जीतेगा और दमानी जी की पूरी कहानी में आपके लिए एक बड़ा बिजनेस लेसन है। दमानी जी ने पैसा स्टॉक मार्केट से कमाया लेकिन dमar उन्होंने पैसा उड़ा के नहीं बनाया पैसा बचा के बनाया हर बचा हुआ रुपया वापस धंधे में लगाया हर स्टोर अगले स्टोर का रास्ता बना बिग बा के सामने पेशेंस जीत गया अब सवाल है कि क्या 10 मिनट डिलीवरी के आगे यही पेशेंस जीत पाएगा और एक आखिरी बात यह सिर्फ दमानी जी की कहानी नहीं है। यह हर उस आदमी की कहानी है जिसका धंधा चल तो रहा है लेकिन जिसका कंट्रोल किसी और के हाथ में है। सवाल यह नहीं है कि आप कितना कमा रहे हैं। सवाल यह
19:21 है आपके धंधे का कंट्रोल किसके हाथ में है? अब आप कमेंट करके बताइए क्या dमar का स्लो और स्टडी मॉडल क्विक कॉमर्स को भी हरा देगा या फिर ब्लिंकट और zप्टो मिलके dमar को बिग बा बना देंगे और यह वीडियो उस दोस्त को भेजिए जिसका धंधा चल तो रहा है लेकिन आज तक किसी और की वो शर्तें मान रहा है। उसे सिर्फ इतना कहिए डीमार्ट ने 10 स्टोर से 250 स्टोर तक का रास्ता पूरा किया। बिना किसी ऐड और बिना किसी सब्सक्रिप्शन के। दोस्तों, अगर आपको dमar की पूरी केस स्टडी पसंद आई है, तो आप चैनल को जरूर सब्सक्राइब करिएगा और साथ में हमने पूरे रेफरेंस मटेरियल डिस्क्रिप्शन में डाल दिए हैं। अगर आपको और ज्यादा पढ़ना और समझना है तो आप जाकर वह भी एक्सेस कर सकते हैं। मिलते हैं ऐसे ही अगले किसी पावरफुल केस स्टडी में। तब तक जय हिंद।