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संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो भारतीय संविधान के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालता है, जिसमें इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, निर्माण प्रक्रिया, प्रमुख विशेषताएं, स्रोत और महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। यह संविधान सभा की भूमिका, नागरिकों के मौलिक अधिकारों, राज्य के नीति निर्देशक तत्वों और संविधान में संशोधन की प्रक्रियाओं पर भी चर्चा करता है। इसके अतिरिक्त, वीडियो भारत की संघीय व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंधों और आपातकालीन प्रावधानों की व्याख्या करता है।

मुख्य बातें:

  • भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास
  • संविधान सभा का गठन और संविधान निर्माण प्रक्रिया
  • संविधान की प्रमुख विशेषताएं और विभिन्न देशों से लिए गए स्रोत
  • नागरिकों के मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निर्देशक तत्व और मौलिक कर्तव्य
  • संघीय व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंध और आपातकालीन प्रावधान

परिचय

इस वीडियो में भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास, निर्माण, विशेषताओं और प्रमुख प्रावधानों को शामिल किया जाएगा। इसमें संविधान सभा की भूमिका, नागरिकों के मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निर्देशक तत्व, संघीय व्यवस्था और केंद्र-राज्य संबंधों पर चर्चा की जाएगी।

भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन और प्लासी और बक्सर की लड़ाईयों के बाद, ब्रिटिश सरकार ने भारत में शासन करने के लिए 1773 में रेगुलेटिंग एक्ट पारित किया। इस एक्ट के माध्यम से भारत में लिखित कानून की प्रक्रिया शुरू हुई। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद, ब्रिटिश सरकार ने भारत पर सीधा नियंत्रण स्थापित किया और 1909, 1919 और 1935 के कानूनों के माध्यम से शासन चलाया। अंततः, भारत को स्वतंत्रता मिली और संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई।

भारतीय संविधान का निर्माण

1934 में एम.एन. राय ने पहली बार संविधान सभा की मांग की, जिसे 1935 में कांग्रेस ने औपचारिक रूप से उठाया। 1946 में कैबिनेट मिशन के द्वारा संविधान सभा का गठन हुआ। संविधान सभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए थे, और प्रत्येक 10 लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि चुना गया था। संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे, जिनमें से 324 अंतिम रूप से संविधान निर्माण में शामिल हुए। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ।

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह विभिन्न देशों से लिए गए प्रावधानों का मिश्रण है और इसमें संशोधन की प्रक्रिया न तो बहुत कठोर है और न ही बहुत लचीली। यह एकात्मक और संघात्मक तत्वों का मिश्रण है और इसमें संसदीय शासन प्रणाली, एकीकृत न्यायपालिका, मौलिक अधिकार, नीति निर्देशक तत्व और नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन है।

भारतीय संविधान की अनुसूचियां

भारतीय संविधान में 12 अनुसूचियां हैं। पहली अनुसूची में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के बारे में जानकारी है। दूसरी अनुसूची में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल और पीठासीन अधिकारियों के वेतन का वर्णन है। तीसरी अनुसूची में शपथ का प्रारूप है। चौथी अनुसूची में राज्यसभा में सीटों का आवंटन है। पांचवीं अनुसूची में अनुसूचित जाति और जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन है। छठी अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन है। सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन है। आठवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त भाषाएं हैं। नौवीं अनुसूची में भूमि सुधार कानून हैं। दसवीं अनुसूची में दल-बदल कानून हैं। ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतें हैं और बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाएं हैं।

भारतीय संविधान के स्त्रोत

भारतीय संविधान के कई प्रावधान विभिन्न देशों के संविधानों से लिए गए हैं। भारत शासन अधिनियम 1935 से संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका, आपातकालीन उपबंध और राज्यपाल का कार्यालय लिया गया है। ब्रिटेन से संसदीय शासन प्रणाली, विधि का शासन और एकल नागरिकता ली गई है। कनाडा से संघीय व्यवस्था में केंद्र की शक्ति, अवशिष्ट शक्तियां और राज्यपाल की नियुक्ति ली गई है। आयरलैंड से राज्य के नीति निर्देशक तत्व और राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया ली गई है। ऑस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची, व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता ली गई है। फ्रांस से गणतंत्र और स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श लिए गए हैं।

उद्देशिका

उद्देशिका संविधान का भाग है और इसमें संशोधन किया जा सकता है। 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से इसमें 'समाजवाद', 'पंथ निरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द जोड़े गए थे। उद्देशिका संविधान के अधिकारों का स्त्रोत है और यह भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है।

भारत का संघ और राज्य क्षेत्र

अनुच्छेद 1 कहता है कि भारत राज्यों का एक संघ है, और राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 2 संसद को नए राज्यों के पुनर्गठन की शक्ति देता है। अनुच्छेद 3 राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में प्रक्रिया का वर्णन करता है, और अनुच्छेद 4 कहता है कि राज्यों के पुनर्गठन के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है।

नागरिकता

संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता का वर्णन है। भारत में एकल नागरिकता है, और नागरिकता के संबंध में कानून बनाने की शक्ति केवल संसद को है। नागरिकता जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीकरण और क्षेत्र के समावेशन के आधार पर प्राप्त की जा सकती है।

मूल अधिकार

संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकारों का वर्णन है। मूल संविधान में सात मूल अधिकार थे, लेकिन अब केवल छह हैं। संपत्ति का अधिकार अब मूल अधिकार नहीं है। मूल अधिकार अमेरिका के संविधान से लिए गए हैं और ये व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।

राज्य के नीति निर्देशक तत्व

संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक राज्य के नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन है। ये आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं और ये सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करते हैं। ये सरकार के लिए नैतिक निर्देश हैं, और इन्हें कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।

मूल कर्तव्य

मूल कर्तव्य सोवियत संघ के संविधान से लिए गए हैं। सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन के तहत भाग 4ए में अनुच्छेद 51ए में जोड़े गए। ये भी गैर-बाध्यकारी हैं।

संविधान संशोधन

अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया का वर्णन करता है। संविधान में संशोधन साधारण बहुमत, विशेष बहुमत या विशेष बहुमत और आधे राज्यों की अनुमति से किया जा सकता है।

आपातकालीन उपबंध

संविधान के भाग 18 में अनुच्छेद 352 से 360 तक आपातकालीन उपबंधों का वर्णन है। अनुच्छेद 352 राष्ट्रीय आपातकाल, अनुच्छेद 356 राज्य में संवैधानिक आपातकाल और अनुच्छेद 360 वित्तीय आपातकाल से संबंधित हैं।

संसदीय और अध्या सात्मक प्रणाली

संसदीय प्रणाली में, सरकार चुने हुए लोगों में से बनाई जाती है, जबकि अध्या सात्मक प्रणाली में, कानून बनाने वाले और कानून लागू करने वाले अलग-अलग होते हैं। भारत में संसदीय प्रणाली अपनाई गई है, क्योंकि यह उत्तरदाई सरकार को प्राथमिकता देती है और यह प्रणाली भारत में पहले से ही प्रचलित थी।

संघीय व्यवस्था

संघीय व्यवस्था में, देश में दो सरकारें होती हैं: एक केंद्र सरकार और एक राज्य सरकार। भारत में, केंद्र को अधिक शक्ति दी गई है, क्योंकि देश में विविधता बहुत अधिक है और इसे एकजुट रखने के लिए एक शक्तिशाली केंद्र की आवश्यकता है।

केंद्र और राज्य संबंध

संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है। केंद्र और राज्य के बीच विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंध हैं।

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Transcript

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0:00 तो आइए शुरुआत करते हैं पहले तो मैं आप लोगों को बता दूं कि इन पाच घंटे में क्या-क्या कवर करने वाले हैं या इस पूरे पा घंटे की कक्षा में क्या-क्या कवर होगा सबसे पहले तो हम जानेंगे भारतीय संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भारतीय संविधान का निर्माण संविधान सभा और उसकी कार्य प्रणाली भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषता भारतीय संविधान के स्त्रोत उद्देश्य का प्रिंबल भारत का संघ भारत संघ और राज्य क्षेत्र भारत के राज्य क्षेत्र भारत संघ और राज्य क्षेत्र

0:46 नागरिकता मूल अधिकार राज्य के नीति निर्देशक तत्व संविधान संशोधन आपातकालीन उपबंध संसदीय और अध्या सात्मक प्रणाली भारत की संघीय व्यवस्था केंद्र और राज्य संबंध संघ और राज्य की कार्यपालिका संघ और राज्य की विधायिका न्यायपालिका स्थानीय निकाय प्रमुख संवैधानिक और गैर संवैधानिक आयोग और संविधान के अन्य प्रमुख प्रावधान और अंत में मिसलेनियस क्योंकि आज का कंटेंट बहुत खूबसूरत बनाया गया है परट वह स्क्रीन पर बाइलिंगुअल संभव नहीं था

1:34 इसलिए आज की कक्षा का पीडीएफ बाइलिंगुअल मिलेगा क्लास के खत्म होते ही बस आपको सुनने का काम करना है और चीजों को रिवाइज करना है हमारे साथ दोहराना है यह पूरी तरह से मटेरियल अभी हिंदी में है पर आपको कंप्लीट बालिंग वल इसमें सारी चीज उपलब्ध कराई जाएगी तो आप लोग केवल पढ़ने पर फोकस रखेंगे और फिर से मेरी रिक्वेस्ट है बीच-बीच में क्लास का लिंक शेयर करते चलेंगे ताकि जितने ज्यादा विद्यार्थियों तक आज की आवाज पहुंचा सकते हैं मेरे लिए आपकी गुरु दक्षिणा वही है एक विद्यार्थी अगर 50 विद्यार्थियों तक लिंगक पहुंचा देता है तो

2:20 यह मान लिया जाएगा कि उस विद्यार्थी ने हमें उस इस कक्षा की फीस लौटा दी है एक पूरी तरह से उसने गुरु ना चुका दी है उसका हम पर या हमारा उस पर किसी भी प्रकार का कर्ज बाकी नहीं रहा है तो शुभारंभ करते हैं आज की कक्षा का अब सबसे पहले कहानी के रूप में समझते हैं हमारे देश में काफी लंबे समय तक राजाओं नवाबों सम्राटों के शासन रहे लेकिन जब ईस्ट इंडिया कंपनी या यूरोपियन कंपनी भारत में व्यापार करने के लिए आई तो व्यापार करने के साथ-साथ वह यहां के छोटे-छोटे राजाओं से जीत भी हासिल

3:09 करने लगी इसी कड़ी में ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा प्लासी की लड़ाई में 1757 में युद्ध लड़ा जाता है और बंगाल का पूरा का पूरा क्षेत्र अप्रत्यक्ष रूप से अपने कब्जे में कर लिया जाता है बंगाल का नवाब जो सुजाव दोला था उसकी हार होती है प्लासी की लड़ाई में और अंग्रेजों की जीत होती है ईस्ट इंडिया कंपनी जीतती है पुनः 1764 में ईस्ट इंडिया कंपनी एक संयुक्त सेना के साथ बक्सर की लड़ाई में विजय होती है और उसे इस पूरे क्षेत्र में टैक्स वसूलने का दीवानी का

3:58 अधिकार प्राप्त होता है इस दीवानी के अधिकार के प्राप्त होने के साथ ही 1765 में इलाहाबाद की संधि के माध्यम से इस क्षेत्र पर उनके अधिपत्य को एक तरीके से मुगल सम्राट स्वीकार कर लेता है इसी दौरान इन्हें पैसों की जरूरत पड़ती है ईस्ट इंडिया कंपनी को क्योंकि यह निरंतर युद्ध में लिप्त थी तो खर्चा बहुत ज्यादा हो गया था इस यु युद्ध में हुए खर्चे के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटेन की पार्लियामेंट के पास लोन की अर्जी लेने जाती है ब्रिटेन की पार्लियामेंट इन्हें लोन देने के लिए हामी भरती है लेकिन इस

4:45 ईस्ट इंडिया कंपनी से कहती हैं कि तुम व्यापार का काम करते चलो और यहां पर जो दीवानी का अधिकार मिला है हम जैसे कहेंगे वैसे तुम्हें यहां पर शासन करना होगा इसी कड़ी में 1773 में ब्रिटेन का पार्लियामेंट ईस्ट इंडिया कंपनी को निर्देशित करते हुए एक रेगुलेटिंग एक्ट पारित करता है और भारत जैसी भूमि पर एक लिखित कानून की प्रक्रिया का शुभारंभ होता है 1773 का यह रेगुलेटिंग एक्ट ऐसे कई कानूनों के निरंतर पास होने के साथ भारत की जमीन भारत के बुद्धिजीवी भारत के राज राजनीतिज्ञ इस पूरी प्रक्रिया से शासन

5:33 कैसे चलाया जाता है राजाओं के अलावा इस प्रक्रिया से अवगत होते हैं और एक लोकतंत्र के निर्माण और एक राष्ट्र के निर्माण की कल्पना प्रारंभ होती है 1757 के इस घटनाक्रम के 100 वर्ष के बाद 1857 में भारत का स्वतंत्रता संग्राम पहला लड़ा जाता है इंडिया कंपनी से कहती है कि तुम अब केवल व्यापार देखो इस पूरे भारत पर अब हम ध्यान देंगे बाकी भारत का हिस्से में राजा नवाब अभी भी छोटी-छोटी रियासतों के साथ विद्यमान होते हैं क्योंकि उस समय पाकिस्तान वाला क्षेत्र बांग्लादेश वाला

6:18 क्षेत्र भी भारत का भूभाग ही था लाम उपनिवेश कर लेती है यहां से डायरेक्टली ब्रिटिश पार्लियामेंट अब भारत की सत्ता को संभालती है इस कड़ी में कई सारे कानून आते हैं जिसमें 1919 1909 1919 और 1935 के तीन बड़े कानून महत्त्वपूर्ण होते हैं धीमे-धीमे इस ब्रिटेन पर दबाव बनता है भारत के राजनीतिक दलों के द्वारा विश्व की राजनीतिक घटनाक्रम के के द्वारा और उन्हें भारत को एक तरीके से ना केवल

7:04 छोड़ना पड़ता है बल्कि भारत के राजनीतिज्ञ लोगों से वह भारत में शासन व्यवस्था के लिए संविधान निर्माण करने के लिए आमंत्रित करते हैं और हमारे देश के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ लोग भारत कैसा चलेगा भारत किस तरीके से आने वाले समय में हमारे देश में भारत के लोग शासन चलाएंगे उसका एक लिखित रूप निर्मित करते हैं जिसके हम जिसे हम कहते हैं भारत का संविधान तो भारत का संविधान कुछ और नहीं है बल्कि एक किताब है जिसमें भारत किस तरीके से पूरा आने वाले समय में नागरिकों के लिए कार्य करेगा या भारत की शासन क्या काम करेगी उसका वर्णन

7:50 है इसमें नागरिकों को क्या अधिकार रहेंगे उसका वर्णन है इसमें सरकार के क्या दायित्व रहेंगे उसका वर्णन है इसमें सरकार कैसे बनेगी इस बात का वर्णन है इस देश में कानून कैसे बनेंगे इस बात का वर्णन है इस संविधान में हर बात को स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि हमारे देश में किसी भी प्रकार की प्रक्रिया कैसे चलेगी तो कहानी की शुरुआत करते हैं पहले टॉपिक से भारत के संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट क्या कह रहा था और उसी के कड़ी में आने वाले कानूनों ने क्या-क्या चीजें यहां पर शामिल करना प्रारंभ की फिर हम इसमें आगे बढ़ेंगे जब

8:38 हमारे देश के ही राजनीतिज्ञ विशेषज्ञ लोग मिलकर एक सभा बनाते हैं जिनका काम संविधान का निर्माण करना होता है जिसे हम असेंबली कॉन्स्टिट्यूशन असेंबली संविधान सभा के नाम से जानेंगे देखेंगे कि वह किस प्रकार से संविधान का निर्माण अलग-अलग देशों के संविधान का अध्ययन करके करते हैं उसके बाद हम देखेंगे भारत में नागरिक कौन होगा भारत में मूल अधिकार नागरिकों को कौन से रहेंगे और सरकार के दायित्व को संविधान में कैसे समझाने की कोशिश की गई है तो सबसे पहले शुरुआत करने की कोशिश कर रहे हम लोग ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से हिस्टोरिकल बैकग्राउंड

9:24 से हिस्टोरिकल बैकग्राउंड से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 1600 ईसवी में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना ब्रिटेन में हुई थी ब्रिटेन में और वहां की महारानी ने उस जमाने में इसी कंपनी को अधिकार दिया था कि ब्रिटेन से कोई और कंपनी भारत में व्यापार करने नहीं आएगी 15 वर्षों का अधिकार है तुम्हारे पास भारत में व्यापार करने के लिए और 15 वर्षों तक आप अकेले ही व्यापार करोगे लेकिन दो से तीन वर्ष में ही महारानी की मृत्यु होती है और उनके अगले उत्तराधिकारी जॉर्ज पंचम बनते हैं और इस कंपनी को अनंत काल के लिए अनंत की जगह कहूं मैं अनिश्चित काल के लिए आदेश दे

10:11 देते हैं कि आप इस क्षेत्र में व्यापार करना चालू रखिए जब तक कि हम आपको नहीं रोकते महारानी एलिजाबेथ प्रथम 15 वर्षीय व्यापारिक अनुमति देती हैं इसी क्रम में 1757 1764 में वह प्लासी की लड़ाई और बक्सर की लड़ाई जीतते हैं बंगाल बिहार और उड़ीसा की दीवानी के अधिकार मुख्य रूप से कहे तो बंगाल के दीवानी के अधिकार बिहार और उड़ीसा में कर मुक्त व्यापार करने के अधिकार उन्हें मिलते हैं तो 1765 में उन्हें मेनली बंगाल के दीवानी का अधिकार मिलता है पर बंगाल का मतलब उस समय बिहार और उड़ीसा तीनों लिया जाता था इसलिए बंगाल बिहार उड़ीसा भी कोई गलत नहीं रहेगा 1773

10:58 का रेगुलेटिंग एक्ट पारित होता है 1833 में कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार ब्रिटेन की पार्लियामेंट खत्म करती है और 1833 में भारत के लिए ब्रिटेन की सारी कंपनियों को आमंत्रित करती हैं और कहती है कि आओ और अब भारत में व्यापार कर लो बिजनेस कर लो और मुनाफा कमाओ मतलब इस दौड़ में ब्रिटेन से अब बड़ी संख्या में व्यापारिक कंपनियां भारत में व्यापार करने के लिए आएगी 18581 5 में भारत में भारतीय अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनती है य एक अखिल

11:45 स्तर का राजनीतिक संगठन होता है जो भारत के नागरिकों को अवेयर करता है अपने अधिकारों के बारे में अपने देश की आजादी के लिए और स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक निरंतर आंदोलन जारी रखता है 1934 में एम एन राय जैसे संपादक पहली बार मांग रखते हैं कि संविधान सभा बननी चाहिए और भारत के लोगों ने भारत की जमीन पर कैसा शासन होगा इसके लिए एक संविधान तैयार करना चाहिए 1946 में संविधान सभा बनती हैं और 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू होता है तो सबसे पहली शुरुआत 1773 के रेगुलेटिंग

12:33 एक्ट से करेंगे क्योंकि यह हमारे भारत की भूमि पर बनने वाला एक तरीके से लागू होने वाला भारत की भूमि पर नहीं बना लेकिन भारत पर लागू होने वाला पहला लिखित कानून था और इस कानून का निर्माण ब्रिटेन की पार्लियामेंट ने किया था ताकि वह इस कंपनी को यहां शासन व्यवस्था में निर्देशित कर सके कि कैसे यहां शस करना है 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से शुरुआत करेंगे पहला पढ़ेंगे 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट इसका नाम रेगुलेटिंग इसलिए रखा है क्योंकि यह ईस्ट इंडिया कंपनी को रेगुलेट करने के उद्देश्य से बनाया गया था 1784 का पिट्स इंडिया एक्ट प्रधानमंत्री पिट्स थे इसलिए उनके

13:21 नाम पर कुछ सुधार करते हुए 1813 का चार्टर एक्ट 20 वर्षों की अनुमति दी गई थी थी ईस्ट इंडिया कंपनी को 1833 का चार्टर एक्ट जहां पर पुनः 20 वर्ष की अनुमति दी गई थी और इस समय तक डायरेक्टली ब्रिटिश पार्लियामेंट भारत को कंट्रोल नहीं कर रहा है बल्कि ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से

14:08 भारत पर शासन चलाया जा रहा है इसलिए इस कालखंड को हम कंपनी का शासन कहेंगे लेकिन 18581 क्राउन का शासन हम कहेंगे कि डायरेक्टली ब्रिटेन की पार्लियामेंट का शासन क्योंकि अब कोई ईस्ट इंडिया कंपनी बीच में नहीं है डायरेक्टली यह सरकार अपने प्रतिनिधियों को भेजकर भारत पर वाइस राय के माध्यम से पूरी शासन व्यवस्था चलाएगी इसी शासन व्यवस्था को हमारे राजनीतिज्ञ सीखेंगे और समझेंगे कि किस तरीके से देश में शासन चलाया जाता है इसमें सबसे पहला कानून होगा 18581

14:59 61 भारत परिषद अधिनियम 18920 जिसे मार्ले मिंटो सुधार भी कहा जाएगा भारत शासन अधिनियम 1919 जिसे मोंटू चेम्सफोर्ड कानून भी कहा जाएगा और भारत शासन अधिनियम 1935 और अंतिम होगा भारत शासन अधिनियम 1947 जिसमें लिखा रहेगा कि अब यहां से भारत पर ब्रिटेन का किसी भी प्रकार का कोई कानून लागू नहीं होगा और ब्रिटन पार्लियामेंट भारत के किसी भी मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी भारत अपने क्षेत्र में संप्रभु होगा तो पहले कंपनी का शासन देखते हैं और

15:47 कंपनी के शासन में 1773 का एक्ट पढ़ने की शुरुआत करते हैं 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट यह भारत के लिए बनाया गया पहला कानून था इस कानून का उद्देश्य था भारत में बंगाल में जो दीवानी के अधिकार कंपनी को मिल गए थे उस दीवानी के अधिकार को कैसे कंपनी लागू करवाएगी क्योंकि व्यापारिक कंपनी को शासन करने का अनुभव नहीं था तो ब्रिटेन की पार्लियामेंट उसे बताएगी कि शासन कैसे करना है इस अधिनियम में लिखा गया था कि कोलकात्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की जाएगी इसी अधिनियम के माध्यम से हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था का निर्माण हुआ हमें पता चला कि

16:33 राजा के अतिरिक्त भी कोई व्यक्ति चुना जाता है चयनित किया जाता है केवल न्याय करने के लिए इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया कि भारत का जो भी शासन होगा वह बंगाल से चलाया जाएगा बंगाल का जो भी सबसे अ बड़ा अधिकारी होगा उसे बंगाल का गवर्नर जनरल कहेंगे इसी गवर्नर जनरल के अंडर में बंबई और मद्रास के गवर्नर को खा गया हमें पता चला कि एक व्यक्ति जैसे राजाओं के अंतर्गत सूबेदार हुआ करते थे वैसे ही बंगाल के गवर्नर जनरल के अंतर्गत बॉम्बे का गवर्नर और मद्रास का गवर्नर उस जमाने का बॉम्बे और मद्रास का गवर्नर होता था तो 1773 में क्या बिंदु हमें याद होने चाहिए

17:20 पहला गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल की स्थापना उनकी मदद के लिए चार मेंबर रखे गए कि आप इनकी मदद से निर्णय लीजिए जैसे आज राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद मिलकर राष्ट्रपति को सलाह देते हैं वैसे ही चार लोगों का यह संगठन गवर्नर जनरल को सलाह देता था कोलकात्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना और कंपनी के कर्मचारियों के लिए निजी व्यापार पर प्रतिबंध वास्तविक रूप में कंपनी के कर्मचारी कंपनी के लिए काम कम करते थे और अपना ही निजी व्यापार करते थे इसका परिणाम कंपनी कर्जे में जा रही थी इसलिए इस कानून के माध्यम से कंपनी को कंपनी के कर्मचारियों को स्पष्ट कर दिया गया कि आप

18:07 केवल अब कंपनी के लिए काम करेंगे अपना निजी व्यापार नहीं कर सकते तो यह पहला कानून है जिसके तहत सारी बातचीत हुई 1774 में कंपनी सुप्रीम कोर्ट की स्थापना कलकाता में की गई 1784 का पिट्स इंडिया एक अब क्योंकि ब्रिटेन से कानून बन रहे हैं भारत में लागू किए जा रहे हैं ब्रिटेन की पार्लियामेंट को नहीं अनुभव है कि भारत के लोग कैसे हैं भारत में किस तरीके से कानून लागू किए जा सकते हैं और भारत के लिए कौन सा कानून बेहतर होगा इसलिए लगातार सुधार करते जाएंगे जैसे-जैसे अनुभव आएगा जैसे-जैसे वह सीखते जाएंगे वह कानून में

18:53 बदलाव भी करते चलेंगे इसी कड़ी में 1784 का से इंडिया एक्ट आता है क्या-क्या नई बातें इसमें जोड़ी जाएगी कंपनी के व्यापारिक और राजनीतिक कार्यों को सेपरेट किया गया कंपनी को हिदायत दी गई कि व्यापार करने वाला एक डिपार्टमेंट बना दो जो केवल व्यापार पर कार्य करेगा और एक राजनीतिक पॉलिटिकल वर्क करने वाला दूसरा डिपार्टमेंट बना दो बोर्ड ऑफ कंट्रोल जो कि पूरी तरह से राजनीतिक मामलों पर कंट्रोल करेगा और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर जो कि व्यापारिक गतिविधियों पर नियंत्रण करेगा इसका मतलब इस कानून के माध्यम से कंपनी के दो यूनिट बनाए गए एक का नाम बोर्ड ऑफ कंट्रोल रहा और एक का नाम है

19:41 बोर्ड कोर्ट ऑफ डायरेक्टर जो बोर्ड ऑफ कंट्रोल है उसको कहा गया कि आप राजनीतिक शक्ति जो कि कंपनी ने बंगाल में प्राप्त की है उस पर ध्यान दीजिए क्योंकि अब वो पूरी तरह से बंगाल पर अपने अनुसार शासन करने लगे थे अब बंगल में कोई नवाब नहीं था दीवानी फौजदारी सारे अधिकार अब कंपनी के पास थे तो सारी राजनीतिक शक्ति का जो उपयोग कंपनी कर रही थी वह बोर्ड ऑफ कंट्रोल के माध्यम से करेगी और कोर्ट ऑफ डायरेक्टर के माध्यम से व्यापारिक गतिविधियां होगी पहली बार कंपनी के अधीन क्षेत्र को ब्रिटिश अधिपत्य क्षेत्र कहा गया इस कानून में पहली बार लिखा गया कि यह जो भारतीय भूभाग है जिसे ईस्ट इंडिया

20:29 कंपनी ने जीता है वोह वास्तविक रूप में ब्रिटिश अधिपत्य क्षेत्र है ब्रिटिश सरकार के द्वारा जीता गया क्षेत्र है मतलब कंपनी को इशारा कर दिया गया कि यह जमीन यह चीजें हमारी है हमारी मतलब ब्रिटेन के पार्लियामेंट की है आप केवल यहां पर हमारे माध्यम से यहां शासन चला रहे हो तो 1784 का एक्ट कहता है कामों का विभाजन फिर 1813 का चार्टर एक्ट आता है यहां पर एक छोटी सी घटना मैं बता दूं कि 1800 के दौर में 1810 तक में ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति हो गई थी इस औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन में बहुत बड़ी

21:14 मात्रा में उत्पादन हुआ था कई कंपनियों ने सरप्लस प्रोडक्शन किया था ये सभी कंपनियां ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाल रही थी कि हमें अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए मार्केट चाहिए और सभी में से अधिकतर कंपनियों ने भारत को अपना मार्केट बनाने के लिए रिक्वेस्ट की थी इसलिए 1813 के कानून में पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी की मोनोपोली रद्द की जाती है जो कि 1600 में महारानी एलिजाबेथ ने 15 वर्ष के लिए दी थी फिर उनके उत्तराधिकारी जॉर्ज पंचम ने अनिश्चित काल के लिए दी थी 1813 के कानून में केवल चाय और चाइना के साथ व्यापार को छोड़कर मतलब चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर

22:00 पूरे भारत में सभी कंपनियों को आमंत्रित कर लिया ब्रिटेन की कि आइए भारत में व्यापार करिए इसी दौरान ईसाई मिशनरियों को भी भारत में इनवाइट किया जाएगा ताकि भारतीय समाज को थोड़ा पिछड़ा साबित किया जाए जो कि उस समय भारतीय समाज में कई कुरीतियां भी थी साथ ही साथ भारतीय समाज का पाश्चात्य करण करने का पूरा प्रयास करेंगे अंग्रेजी शिक्षा का यहां प्रवेश प्रारंभ होगा और 1813 के इस कानून में चाय और चीन के साथ व्यापार को छोड़कर कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त किया ब्रिटिश कंपनी प्रत्येक वर्ष साहित्य और विज्ञान के प्रसार के लिए ₹ लाख खर्च

22:46 करेगी बोला जरूर गया लेकिन खर्च कभी हुआ नहीं क्योंकि यहां झगड़ा हो गया था कि कौन सी शिक्षा अंग्रेजी शिक्षा कि भारत की पुरानी शिक्षा तो यहां विवाद होने के कारण यह पैसा बाद में खर्च नहीं हुआ अगला कानून आता है 1833 का चार्टर एक्ट इस कानून में शुद्ध रूप से शुद्ध रूप से महोदय पूरा स्पष्ट कर दिया जाता है कि अब ईस्ट इंडिया कंपनी चाइना के साथ और चाय के साथ जो मोनोपोली की बातचीत थी वह भी समाप्त होती है मतलब 1833 इसके कानून में मोनोपोली ईस्ट इंडिया कंपनी की शुद्ध रूप

23:32 से समाप्त हो जाती है इसी कानून में पहली बार बंगाल के गवर्नर जनरल को बंगाल का गवर्नर जनरल ना कहकर पूरे भारत का गवर्नर जनरल कहा है तो इस कानून का अपना एक अलग महत्व है जो स्पष्ट कर रहा है कि अब यह पूरा भारत ही ब्रिटिश के अधीन है व ऐसा मान चुके हैं गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल को भारत का गवर्नर जनरल कहेंगे विलियम बेंटिक भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बनेंगे और कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाएगा बंगाल का पहला गवर्नर जनरल वॉरेन हेस्टिंग बनते हैं और भारत का पहला गवर्नर जनरल बेंटिक बनाया जाता है हम कह सकते हैं कि

24:19 इस कानून के माध्यम से भारत का गवर्नर जनरल अब बन चुका है एक व्यक्ति फिर इसमें ब्रिटिश पार्लियामेंट अप्रत्यक्ष रूप से बता रही हैं कि अब ईस्ट इंडिया कंपनी तुम्हें हम कभी भी बीच में से हटाएंगे जब हमारा मन करेगा और उन्हें वह मौका 4 वर्ष के 1857 की क्रांति के बाद ही मिलता है याद रखने में कोई कठिनाई नहीं आनी चाहिए 20-20 वर्षों के गैप पर 18533 3 1813 तो 18533 में पहली बार गवर्नर जनरल काउंसिल के विधाई और प्रशासनिक कार्य का पृथक्करण विधाई मतलब कानून बनाने का काम प्रशासनिक मतलब सरकार चलाने का काम गवर्नर जनरल के

25:05 लिए एक नई विधान परिषद मतलब अब चार लोग नहीं एक पूरी तरह से काउंसिल बनाया जाएगा जो गवर्नर जनरल की मदद करेगा सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली भर्ती की प्रतियोगिता का प्रारंभ आईएस के लिए या बड़े पदों के लिए कॉम्पिटेटिव एग्जाम की बात लेकिन उस समय कंपटीशन जो एग्जाम होगी वह लंदन में आयो आयोजित की जाएगी पहली बार केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व भी मतलब अलग-अलग क्षेत्र से लोगों को बुलाकर केंद्रीय परिषद जो गवर्नर जनरल की बनेगी उसमें यहां के एक एक व्यक्ति को भी भेजा जाएगा 18533 7 की क्रांति होती है और 1857 की इस

25:53 क्रांति में बड़ी संख्या में ब्रिटिश सेना को बुलाया जाता है अब भारत के डायरेक्टली शासन को ताज या ब्रिटिश क्राउन अपने हाथ में लेता है अभ इष्ट इंडिया कंपनी नहीं रहेगा इसलिए अब भारत के लिए दो पद सृजित किए जाएंगे भारत में एक पद बनाया जाएगा वाइस राय अब वाइस राय ब्रिटेन से आने वाले आदेशों के तहत भारत में पूरा शासन चलाएंगे और ब्रिटेन में एक भारत के सचिव नाम से पद बनाया गया भारत का सचिव मतलब एक तरीके का मंत्री था यह जैसे आज डिफेंस मंत्री होते हैं फॉरेन मिनिस्टर होते हैं साथ ही फाइनेंस

26:38 मिनिस्टर होते हैं वैसे ही ब्रिटेन की पार्लियामेंट का एक मंत्री था जिसे भारत का सचिव कहते थे और यह भारत के लिए निर्णय लेता था इसकी सैलरी भी भारत ही पे करता था भले ही वह ब्रिटेन के पार्लियामेंट का व्यक्ति था तो दो लोग अब महत्त्वपूर्ण होंगे एक भारत का सचिव और दूसरा भारत का वाइस राय सचिव ब्रिटेन में बैठकर आदेश देगा और वाइस राय भारत में आदेश देने वाला सबसे बड़ा अधिकारी सबसे बड़ा प्रशासनिक इकाई माना जाएगा फिर

27:28 उतने हिस्से में ब्रिटिश सरकार खुश है हम किसी और राजा पर अब हमला नहीं करेंगे राजा का सम्मान वैसा ही किया जाएगा जैसे वह महारानी का करते हैं अपने ब्रिटेन में इस प्रकार से भारत में दो हिस्से बन जाएंगे एक ब्रिटिश प्रांत कहलाएगा जिसमें भारत का लगभग आधा हिस्सा रहेगा और आधे भूभाग पर राजा नवाब महाराजाओं के देशी रियासतें रहेगी तो भारत में देसी रियासत और ब्रिटिश प्रांत दो चीजों की निर्माण हो जाएंगे गवर्नर जनरल का अब नया नाम होगा भारत का वाइस राय लॉर्ड केनिंग भारत के पहले वाइस राय वॉरेन हेस्टिंग बंगाल के गवर्नर जनरल

28:14 भारत के गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक भारत का वाइस राय लॉर्ड कनिंग बोर्ड ऑफ कंट्रोल और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर खत्म हो जाता है एक नए पद का भारत का सचिव सृजन लेकिन वो ब्रिटिश कैब कैबिनेट का व्यक्ति रहेगा भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यों की परिषद ब्रिटेन में बनाई जाती है फिर 18611 का भारत परिषद अधिनियम आता है 1800 के 57 की क्रांति से अंग्रेजों को एक बात तो समझ में आ गई थी कि इस देश में शासन चलाना इतना सरल नहीं है इस देश के लोग क्या मानते हैं इस देश के लोगों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है नियमित किया जा सकता है इस बात को यह समझ गए और इसलिए उन्होंने कहा कि यदि हम भारतीयों की मदद

29:01 ले जो यहां के राजा हैं यहां के नवाब हैं उनको अपनी काउंसिल में जगह दे और उनसे पूछे कि इस क्षेत्र में हम यह कानून लाना चाहते हैं क्या यह कानून सही रहेगा इस तरीके से 18611 के भारत परिषद अधिनियम में यह भारतीय लोगों को प्रतिनिधित्व देंगे विधि निर्माण में भारतीयों को सम्मिलित करने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है वाइस राय द्वारा 18622 में तीन भारतीयों को बुलाया जाता है बनारस के राजा पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव को मतलब यहां से विकेंद्रीकरण की शुरुआत भी होती है यहां से बंबई प्रांत को मद्रास प्रांत को अधिकार दिए जाते हैं कि

29:46 आप छोटे-छोटे निर्णय लेना शुरू कर दीजिएगा वाइस राय को अपनी काउंसिल की सिफारिश के बिना अध्यादेश जारी करने की अनुमति दे दी जाती है वाइस राय को एक शक् दी जाती है कि यदि आपको लगता है कोई इमरजेंसी है तो तत्काल में बिना किसी सलाह मशवरे के वाइस राय किसी भी आदेश को पूरे देश में कानून के रूप में लागू करा सकता है इसी को कहा जाता है अध्यादेश अध्यक्ष का आदेश 18611 से हमें यह मिलता है राय में काउंसिल बनी थी उसमें जिन लोगों को जो जो काम दिए गए थे बाकी बचे हुए लोग

30:34 उनके काम पर सवाल खड़ा कर सकते थे मतलब अब एक तरीके से मंत्री परिषद होगा जिसको कार्य सौपा गया है और बाकी लोग संसद हो जाएगी जो सवाल जवाब करेंगे यह पहली बार के द्वारा यहां पर सदस्य भेजे जाएंगे बंबई प्रांत के द्वारा मद्रास प्रांत के द्वारा फिर 1909 का यहां शायद एक महत्त्वपूर्ण कानून छूट गया है 1909 का मार्ले मिंटो सुधार आता है मार्ले मिंटो इसलिए सुधार कहते हैं क्योंकि मार्ले सचिव थे और मिंटो उस समय वायसराय थे इस कानून

31:23 में पहली बार ब्रिटिश सरकार सांप्रदायिक निर्वाचन की अनुमति देती हैं सांप्रदायिक निर्वाचन का मतलब हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग एक तरीके से चुनाव लड़े जाएंगे हिंदू प्र क्षेत्र में और मुस्लिम क्षेत्र में जो जगह मुस्लिमों के लिए आरक्षित होगी वहां पर कैंडिडेट भी मुस्लिम होगा और उन्हें वोट डालने वाला व्यक्ति भी मुस्लिम रहेगा यहां कुछ लोगों को वोट डालने का अधिकार दिया जाता है पर बहुत ही सीमित लोगों को 1909 के इस कानून का मेन मकसद था भारत में फूट डालो राज करो की नीति का प्रारंभ करना उसी का 1907 में ही मुस्लिम लीग 1906 में बनी थी उसकी बस इतनी सी मांग

32:09 को दो-तीन वर्ष में ही मान लिया गया जबकि कांग्रेस 1885 से बनी लेकिन उसकी मांगों को जल्दी स्वीकार नहीं करती थी और इसी तरीके से भारत में लगातार हिंदू मुस्लिम के बीच में मतभेद को प्रारंभ किया जाएगा अगर हम बात करें तो 1900 न का मार्ले मिंटो सुधार आपको याद रखना है दो बातों के लिए यहां पर सांप्रदायिक निर्वाचन शुरू हुआ था हिंदू और मुस्लिमों के लिए और दूसरा पहली बार भारतीयों को मंत्री परिषद में जगह दी गई थी इसके पहले 18611 में मंत्री परिषद में जगह नहीं दी गई थी काउंसिल में एक तरीके से जो सलाह कारी सभा थी उसमें जगह दी गई थी लेकिन पहली बार

32:56 मंत्री बनाया गए थे भारतीय लोग 1919 का भारत शासन अधिनियम मोंटू चेम्सफोर्ड सुधारों के नाम से जाना जाता है इस कानून में तो सांप्रदायिक निर्वाचन को और भी बढ़ा दिया जाता है और सांप्रदायिक निर्वाचन जो अभी तक हिंदू मुस्लिम तक सीमित था उसे सिख अंग्रेज और ईसा सिख ईसाई यहां या फिर एंग्लो इंडियन इन तक विस्तारित कर दिया जाता है मतलब सांप्रदायिक निर्वाचन और भी बढ़ जाता है लेकिन इस कानून की जो सबसे बड़ी विशेषता थी कि राज्यों में अब सरकार वैसी ही बनेगी जैसे वाइस राय थे तो राज्यों में गवर्नर होता है और उस गवर्नर के नीचे एक मंत्री

33:44 परिषद बनाई जाती है इस मंत्री परिषद को लोग चुनते हैं डायरेक्टली पर वोट डालने का अधिकार सबको नहीं होता है जो टैक्स पे कर रहे होंगे जिनका एजुकेशन होगा उन लोगों को वोट डालने का अधिकार दिया जाता है तो पहली बार पार्शियली आंशिक उत्तरदाई वाली सरकार बनती है और राज्य के विषयों को दो भागों में बांटा जाता है एक आरक्षित विषय होते हैं जिस पर केवल राज्य का गवर्नर निर्णय लेगा और दूसरे बचे हुए विषय पर मंत्रीपरिषद की सलाह से गवर्नर निर्णय लेगा आरक्षित विषय और इस तरीके के मंत्री परिषद को कुछ विषय का बंटवारा राज्यों में

34:30 द्वैध शासन के नाम से जाना जाता है यह द्वैध शासन 1919 के कानून में आता है राज्यों में और 1935 के कानून में समाप्त कर दिया जाता है क्योंकि राज्यों में शासन करना इस प्रक्रिया के कारण कठिन हो जाता है लेकिन 1935 में केंद्र में द्वैध शासन प्रारंभ कर दिया जाता है 1919 का अधिनियम आपको तीन-चार बातों के लिए बिल्कुल रटा होना चाहिए सबसे पहला शिक्षा संपत्ति और कर के आधार पर वोट देने का अधिकार दिया गया सिखो भारतीय ईसाइयों आंग्ल भारतीयों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन की व्यवस्था की गई प्रत्यक्ष निर्वाचन के द्वारा आंशिक उत्तरदाई सरकार जब प्रत्यक्ष निर्वाचन

35:16 होता है तो उत्तरदाई सरकार बनती है प्रांतीय विधानमंडल में दोहरा शासन आरक्षित विषय जहां गवर्नर ही बात करेंगे हस्तांतरित विषय जहां गवर्नर चुने हुए मंत्रीपरिषद की सलाह से काम करेगा लोक सेवा आयोग जो यूपीएससी का गठन है वह इसी कानून के माध्यम से हुआ है और इस कानून में पहली बार राज्यों के बजट को केंद्र से अलग किया गया था 1919 के कानून में पहली बार बजट को अलग किया जाता है सबसे बड़ा कानून पूरे ब्रिटिश शासनकाल में पूरे 1773 से 1947 के

36:01 कानूनों में सबसे बड़ा कानून 1935 का कानून आता है 1935 के कानून का अध्ययन करने से पता चलता है कि ये अंग्रेज सोच रहे थे कि भारत पर अभी और 50 साल शासन करेंगे क्योंकि कोई भी शासन करता इतना बड़ा कानूनी दस्तावेज तभी बना रहा होगा जब उस गरीब को लग रहा होगा कि भारत को अभी हम आजाद करने वाले नहीं है लेकिन होनी को कोई टाल नहीं सकता वैश्विक परिस्थितियां बदल रही थी विश्व में द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ होता है और बहुत ही कम समय में वैश्विक दबाव भारत के आंतरिक राजनीतिक दबाव के फल स्वरूप अंग्रेजों को जल्द ही बोरिया बिस्तर समेटना पड़ता

36:46 है 1935 का यह कानून आपको इसलिए भी याद रखना चाहिए क्योंकि इस कानून में पहली बार भारत को संघ कहा गया अखिल भारत तीय संघ नाम दिया गया संघ किसका ब्रिटिश प्रांत और देशी रियासतों का संघ में भले ही ब्रिटिश प्रांत को शामिल कर दिया गया गारंटीड लेकिन जो देशी रियासतें थी उनको आजादी दी गई कि माने या ना माने लेकिन फिर भी पहली बार भारत को संघ कहा संघ मतलब कई छोटे-छोटे चीजों से छोटी-छोटी रियासतों से मिलकर बना गया बनाया गया एक संगठन एक यूनियन है भारत पहली बार केंद्र और राज्य के बीच में शक्तियों का विभाजन किया गया

37:32 पहली बार राज्य में पूरी उत्तरदाई सरकार बनती है भाई राज्य में पूरी तरह से अब गवर्नर केवल मंत्रीपरिषद की सलाह से काम करेगा एक पूर्ण उत्तरदाई सरकार का निर्माण होता है राज्य में द्वेद शासन जो 1919 में आया था उसे समाप्त किया जाता है केंद्र में द्वैध शासन पूरी तरह से लागू किया जाता है कि वाइस राय पूरी तरह से अब निर्णय नहीं लेंगे कुछ निर्णय यहां की केंद्रीय मंत्रि परिषद लेगी दिल्ली की सरकार लेगी और कुछ निर्णय वाइस राय लेंगे अवशिष्ट शक्तियां वाइस राय के पास रखी जाती है इस कानून में काफी कुछ लिखा गया है सबसे बड़ा कानून माना जाता है ये ब्रिटिश शासन

38:18 का अखिल भारतीय संघ की स्थापना लिखित रूप से महोदय लिखित रूप से केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन है प्रांतों में द्वेद शासन जो डायर की थी उसकी समाप्ति होती है प्रांतों में उत्तरदाई सरकार की स्थापना प्रांतों में द्विसदनीय विधायिका का प्रावधान किया जाता है और इसी कानून से आरबीआई की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त होता है फिर आता है भारत शासन अधिनियम उम्मीदें तो इन अंग्रेजों को बहुत लंबी थी लेकिन जिस तरीके का घटनाक्रम विश्व में और भारत में आंतरिक रूप से हो रहा था उस दबाव में आकर उन्हें तत्काल ही भारत की आजादी का फरमान जारी करना पड़ता है 1947 के

39:04 कानून में वह स्पष्ट रूप से लिख देते हैं कि भारत अब दो देशों दो राष्ट्रों का निर्माण होगा यहां पर भारत और पाकिस्तान देशी रियासतों को पूरी आजादी है कि वह भारत में शामिल हो या पाकिस्तान में या अपना एक नया राष्ट्र बना दे यहां ब्रिटेन का कोई हस्तक्षेप अब नहीं होगा यह पूरी तरह से लिख देते हैं वाइस राय केंद्र का जबकि राज्यों के गवर्नर को राज्य का संवैधानिक प्रमुख घोषित किया है संवैधानिक प्रमुख महोदय मंत्रीपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार काम करेगा कोई ब्रिटेन के आदेश के अनुसार नहीं भारत पर ब्रिटिश संप्रभुता की समाप्ति होती है अब हम भारत

39:51 के भूभाग के निर्णय कर्ता नहीं रहे भारत की जनता भारत को चलाने वाले लोग यहां के प्रत्येक निर्णय के लिए जिम्मेदार माने जाएंगे भारत और पाकिस्तान नामक दो संप्रभु राज्यों के गठन का इसमें प्रावधान किया गया तो इस तरीके से 1773 से 1947 का यह कानून बनता है और इसका 1947 तक अलग-अलग कानून बनते हैं हमारे भारत के राजनीतिज्ञ दल और अलग-अलग बुद्धिजीवी इस पूरी प्रक्रिया से शिक्षित होते हैं और समझते हैं कि देश में शासन व्यवस्था कैसे चलाई जा सकती है अब हमें समझना है कि फिर अब हमने आजादी के बाद हमारे देश को कैसा सोचा

40:39 था बनाने का और हमने क्या-क्या टारगेट रखे थे और उन्हीं टारगेट को हमने एक लिखित किताब के रूप में कन्वर्ट किया था जिसे भारत के संविधान के नाम से हम जानते हैं तो हम कह सकते हैं कि पहला निट खत्म होता है अब हम दूसरे यूनिट की ओर आगे बढ़ रहे हैं संविधान का निर्माण कमेंट्स भी करते चलिए अग कि आप लोगों के दिमाग में चीजें चल रही है या नहीं और बिल्कुल शांत होकर मजे के साथ पढ़िए यकीन के साथ बता रहा हूं अगर आप दुनिया में किसी भी किसी भी किताब से पढ़ोगे तो इस तरीके से किसी भी जगह पर शायद ही पृथ्वी पर कोई वीडियो

41:25 आपको अवेलेबल हो जाए जो इस तरीके से भारत के पॉलिटी को समझाने की औकात रखता हो शब्द कठोर हैं लेकिन सच्चे हो तो एक लाइक और कमेंट्स तो बनता है आइए शुभारंभ करते हैं संविधान के निर्माण का दूसरा पड़ाव भारतीय राज व्यवस्था में संविधान का निर्माण हमारे देश को जैसे ही स्वतंत्रता मिलती है तो स्वतंत्रता तो 47 में मिलती है लेकिन संविधान के निर्माण मान का काम एक साल पहले शुरू हो जाता है क्योंकि इतने बड़े भूभाग में शासन चलाने के लिए क्या नियम होंगे सरकार कैसे बनेगी नागरिकों को क्या अधिकार रहेंगे क्या अभी तक अंग्रेजों

42:10 ने जिस तरीके से शोषण करते हुए शासन चलाया था क्या उसी प्रकार का कानून यहां पर रहेगा हमारा संविधान हमारे बुद्धिजीवी लोग समझते हैं कि नहीं जिस कठिनाइयों से हमारे लोगों ने अपनी जिंदगी गुजारी है आने वाली पीढ़ी को उस कठिनाई का सामना ना करना पड़े इसलिए संविधान में उन सभी गुणों को शामिल करती हैं जिससे भारत के प्रत्येक नागरिक का सर्वांगी विकास किया जा सके तो संविधान की मांग से शुरुआत करते हैं कि पहली बार 1934 में 1934 में वामपंथी आंदोलन के नेता एम एन राय के द्वारा संविधान सभा की मांग उठाई जाती है 1935 में कांग्रेस द्वारा पहली बार औपचारिक रूप से संविधान की मांग

42:59 उठाई जाती है और 1940 के अगस्त प्रस्ताव के माध्यम से ब्रिटिश सरकार उस मांग को स्वीकार करती है मतलब 1934 में पहली बार विचार जन्म लेता है कि हम लोग हमारे देश का कानून बनाएंगे ब्रिटेन की पार्लियामेंट कानून बनाकर यहां नहीं भेजेगी उसे पहली बार 1935 में कांग्रेस ब्रिटेन की सरकार के सामने रखती है ब्रिटेन की सरकार इस मांग को 5 साल के बाद अगस्त प्रस्ताव के रूप में 1940 में स्वीकार करती है लेकिन संविधान सभा का गठन 1940 में नहीं होता बल्कि 1942 में कैबिनेट मिशन के द्वारा दो संविधान सभा मुस्लिम लीग की मांग को

43:44 अस्वीकार करने के बाद मामला खींचता चला जाता है और कैबिनेट मिशन जो 1946 में आता है वह फाइनली भारत को आदेश या भारत के जीवी और राजनीतिक दलों से विनती करता है कि आप अपने देश के कानून बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ करिए अर्थात संविधान निर्माण प्रारंभ कर दीजिए तो कैबिनेट मिशन तीन लोग भेजे जाते हैं लॉर्ड पैथिक लॉरेंस सर स्टेफोर्ड क्रिप्स अलेक्जेंडर भारत में संवैधानिक सुधारों की रूपरेखा और केंद्र में एक टेंपररी सरकार की स्थापना के लिए यह काम करते हैं कैबिनेट मिशन की आधार पर संविधान सभा का गठन किया जाता है पर हमारे देश में

44:31 जिन लोगों ने संविधान का निर्माण किया वे लोग जनता के द्वारा चुने नहीं गए थे बल्कि उन लोगों को राज्य के चुने हुए लोगों ने अप्रत्यक्ष रूप से मतलब जनता ने चुना प्रत्यक्ष रूप से राज्य के चुने हुए लोगों ने उन्हें चुनकर भेजा था हर व्यक्ति को जनसंख्या के आधार पर संविधान सभा में भेजा गया था मतलब संविधान का निर्माण करने वाले लोग डायरेक्टली जनता के द्वारा चुने हुए नहीं थे संविधान सभा के सदस्यों की संख्या का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर हुआ था हर 10 लाख व्यक्ति पर एक प्रतिनिधि संविधान सभा में भेजा जाना था देशी रियासत भी इसी आधार पर अपने सदस्यों को भेज रही थी पर देशी रियासतों ने चुनाव नहीं किया

45:19 था राजा ने अपने जिस भी व्यक्ति को भेजना था उससे कहा कि जाओ तुम हमारे राज्य की तरफ से प्रतिनिधित्व करोगे संविधान सभा का पहला गठन योजना के आधार पर दिसंबर 1946 में प्रांतीय विधायिका हों से चुनाव करके 1946 में प्रांतीय विधायिका हों का चुनाव हो गया राज्यों में सरकार बन गई कांग्रेस को लगभग 70 पर सीटें प्रांत की विधायिका हों में मिली उन्हीं से फिर यहां केंद्रीय विधायिका में संविधान सभा में जो सदस्य भेजे जाने थे वह यही से भेजे गए कमजोर स्थिति देखकर मुस्लिम लीग का संविधान सभा के बहिष्कार का निर्णय अचानक मुस्लिम लीग

46:04 को लगा कि अभी तक हमें लग रहा था कि हम भी अपने बहुत बड़े संख्या में प्रतिनिधि भेजेंगे लेकिन 70 पर सीटों पर कांग्रेस की विजय को देखते हुए मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन सीधा एक्शन लेने का निर्णय लिया संविधान सभा प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित नहीं थी पॉइंट टू बी नोटे मी लॉड प्रांतीय विधायिका द्वारा संविधान सभा के सदस्यों का चयन संविधान सभा में कुल 389 मेंबर थे 1947 के अधिनियम के अनुसार मुस्लिम लीग के सदस्य संविधान सभा से बाहर हो गए क्योंकि 1947 में फाइनली ब्रिटेन को भारत का भूभाग दो भागों में बांटना पड़ा एक भारत और दूसरा पाकिस्तान तो संविधान सभा के बहुत सारे

46:51 मेंबर चले गए जो खास करके मुस्लिम लीग के थे फाइनली अ तिम रूप से संविधान सभा में अब 324 लोग बच गए 324 लोगों में 235 मेंबर ब्रिटिश प्रांत मतलब जो डायरेक्टली ब्रिटिश सरकार के अधीन का भूमि थी भारत में वहां से भेजे गए क्योंकि अब ब्रिटिश को तो छोड़ना है तो अब यह पूरी तरह से यहां पर कांग्रेस का शासन था और 89 मेंबर भेजे गए थे देशी रियासतों से 235 और 89 मेंबरों को जोड़कर यह बन गया था 324 सदस्यों का आंकड़ा हैदराबाद एक ऐसी रियासत थी जिसके प्रतिनिधि संविधान सभा में

47:39 सम्मिलित नहीं थे हैदराबाद 1988 में भारत में शामिल हुआ आजादी के समय हैदराबाद अपने आप को एक अलग देश बनाने के लिए बहुत ज्यादा ही आतुर था अंतिम रूप में 1948 में हैदराबाद भारत में शामिल होता है इस समय गोवा भी भारत के डायरेक्ट कंट्रोल में नहीं था पुर्तगालियों के पास था वह 1961 में भारत के अंतर्गत आएगा और अंतिम रूप में 1974 में सिक्किम जैसा राज जो सिक्किम का राजशाही क्षेत्र था वह भारत में एक राज्य के रूप में शामिल होता है तो 1948 में हैदराबाद शामिल होता है तो हैदराबाद उस

48:25 संविधान सभा में सम्मिलित नहीं था भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 द्वारा संविधान सभा की स्थिति में दो बड़े परिवर्तन किए गए संविधान सभा को पूरी तरह संप्रभु बनाया गया कुछ गंदे पूरी तरह से अपनी सूझबूझ और अपने अधिकार के अंतर्गत किया गया था उन पर किसी प्रकार का कोई दबाव नहीं था संविधान सभा भारत की केंद्रीय विधायिका भी बन गई थी वही संविधान सभा जो देश के संविधान का निर्माण

49:11 कर रही थी वही संसद में बैठे हुए लोग भी मान लिए गए थे मतलब देश की पहली संसद ने ही देश के संविधान का निर्माण किया था तो 1947 में जब हमने संविधान सभा ने काम शुरू किया तो तो वही केंद्रीय सरकार भी बन गई थी संविधान सभा की कार्य प्रणाली में सबसे पहले अस्थाई अध्यक्ष चुने जाते हैं सच्चिदानंद सिन्हा इस संविधान सभा में कई सारे लोग 324 लोग बैठे हैं इन 324 लोगों का एक चेयरमैन होगा अस्थाई चेयरमैन सच्चिदानंद सिन्हा बनते हैं फिर सभा चुनती है एक व्यक्ति को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जो कि संविधान सभा के परमानेंट चेयरमैन बनते हैं जैसे आज लोकसभा का स्पीकर होता

49:58 है समझ जाइएगा कि वैसे ही डॉक राजेंद्र प्रसाद स्पीकर बन जाते हैं डॉक्टर एच सी मुखर्जी वीटी कृष्म आचारी सभा के दो उपाध्यक्ष थे दोनों महोदय के नाम याद रखिएगा सभी जो बहुत ही सम्माननीय लोग है ये संविधान सभा की कार्य प्रणाली का मूलतः उद्देश प्रस्ताव पर आधारित थी 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव जारी करते हैं उद्देश्य प्रस्ताव क्या होता है तो एक तरीके से संविधान सभा को सूचित किया जाता है कि महोदय इस संविधान सभा का क्या काम है यह संविधान सभा किस उद्देश्यों को लेकर यहां बैठी है

50:44 और इस संविधान सभा का क्या दायित्व है यह उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर 1946 को पढ़ा जाता है 22 जनवरी 1947 को इस उद्देश्य प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है मतलब 22 जनवरी से अब संविधान निर्माण का काम शुरू हो जाता है उद्देश्य प्रस्तावने ही आगे चलकर हमारे देश के संविधान में उद्देश्य का प्रिंबल का जगह ग्रहण किया संविधान सभा में कई समितियां बनाई जाती है क्योंकि संविधान का निर्माण कोई साधारण सी पॉलिटी की किताब लिखनी नहीं है बल्कि देश के पूरे कार्यक्रम को या भावी भारत के निर्माण को हमें तय करने के लिए बहुत बेहतरीन कानूनों का निर्माण करना है इसलिए अलग-अलग समूह

51:31 बनाए जाते हैं हर समूह में एक अध्यक्ष होता है इसलिए इन समूह को हम समितियों के नाम से जानेंगे ऐसे तरीके से संविधान के निर्माण में कई समितियों का निर्माण किया जाता है पहली समिति होती है संघ शक्ति समिति संघ शक्ति का मतलब है कि केंद्र में जो सरकार बनेगी उसकी क्या-क्या ताकत रहेगी वह क्या-क्या काम करेगी उसके दाय क्या रहेंगे उसकी जिम्मेदारियां क्या रहेगी इसके अध्यक्ष बनते हैं जवाहरलाल नेहरू प्रांतीय संविधान समिति सरदार वल्लभ भाई पटेल की राज्यों को क्या अधिकार दिए जाएंगे प्रारूप समिति हमारे पूरे संविधान का कैसा प्रारूप रहेगा डॉक्टर बी आर अंबेडकर जी राज्यों के लिए समिति जवाहरलाल नेहरू जी

52:18 संचालन समिति डॉक्ट राजेंद्र प्रसाद मूल अधिकार अल्पसंख्यक और आदिवासियों के अधिकारों पर भी सरदार वल्लभ भाई पटेल की समिति बनती है ऐसा इसलिए क्योंकि भारत की आजादी में भारत के प्रत्येक वर्ग ने भारत के प्रत्येक समूह ने भूमिका निभाई थी हर व्यक्ति की अपनी-अपनी इच्छाएं थी हर व्यक्ति की अपनी-अपनी आकांक्षाएं थी कि हमारा देश अब कैसा होगा हमारे देश में हमारी कितनी बात रखी जाएगी हमारा देश हमारे विकास पर कितना काम करेगा इसलिए हर वर्ग हर समूह के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग समिति का गठन किया गया था आइए जरा कुछ इंटरेस्टिंग फैक्ट के बारे में जानते हैं भारत का संविधान इतनी आसानी से नहीं

53:05 बनाता महोदय बहुत ही मेहनत की गई थी और जिसे कई गंदे लोग कह देते हैं कॉपी पेस्ट वाला उन लोगों के लिए आंकड़े अपने आप में बहुत बड़ी बात रखते हैं क्योंकि संविधान निर्माण करने वाले बुद्धिजीवी वर्ग ने केवल भारत को इस नजरिए से नहीं देखा कि आज भारत के लिए क्या करना है बल्कि इस नजरिए से भी देखा कि हमें भावी भारत कैसा बनाना है भारतीय संविधान के निर्माण में 60 देशों के संविधान का अध्ययन किया गया ना केवल उनके संवैधानिक प्रावधानों का अध्ययन किया गया बल्कि उन देशों की परिस्थितियां और भारतीय परिस्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया गया संविधान के निर्माण में दो वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा संविधान के

53:52 निर्माण में 64 लाख रपए खर्च किए गए डॉकटर भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में 4 नवंबर 1948 को संविधान का अंतिम प्रारूप पेश किया इस बार संविधान पहली बार पढ़ा गया था सभा में इस पर पांच दिनों तक चर्चाएं हुई कि हमने जो बातें शामिल की हैं क्या वह भारतीय भूभाग में सही तरीके से लागू होगी अथवा नहीं संविधान पर दूसरी बार 15 नवंबर 1948 से विचार होना शुरू हुआ इस समय संविधान पर खंडवा विचार किया गया यह कार्य 177 अक्टूबर 1948 49 तक चला लगभग एक साल के आसपास इस अवधि में कम से कम

54:38 7653 संशोधन प्रस्ताव आए इस पर मतलब 7653 बार बदला भी गया संविधान सभा में चर्चाएं हुई संविधान पर तीसरी बार 14 नवंबर 1949 में विचार होना शुरू हुआ इसमें संविधान के प्रारूप प्रस्ताव को 26 नवंबर 1949 को पारित कर लिया गया और इस पर अध्यक्ष और सदस्यों के हस्ताक्षर किए गए सभा में कुल 299 लोगों में से उस दिन 284 लोग ही उपस्थित थे जिनके हस्ताक्षर आज भी ओरिजनल संविधान पर विद्यमान है तो यह वह सारे फैक्ट हैं जो हमें बताते हैं कि देश ने इतनी सरलता से किताब नहीं लिखी है बल्कि उस किताब को लिखने में भी

55:26 एक एक लंबी मेहनत करनी पड़ी है सभी प्रकार के गुणों को शामिल कराया गया है 26 नवंबर 1949 को अपनाए गए संविधान में प्रस्तावना थी 395 अनुच्छेद थे और आठ अनुसूचियां थी यह मूल संविधान में था मूल संविधान में था आज चीजें बदल गई हैं अब हम जानते हैं कि आज की चीजें जो भी हैं आप लोग कमेंट्स करते चलिए कि कितने आर्टिकल हैं और कितनी अनुसूचियां अब बन चुकी है ये मूल संविधान की चर्चाएं थी 26 जनवरी 1950 को ही संविधान क्यों लागू किया गया जबकि संविधान लगभग दो महीने पहले तैयार हो चुका था तो उसके पीछे का रीजन था 1931 में लाहौर में

56:15 रावी नदी के किनारे पर हुआ कांग्रेस का अधिवेशन जिसमें 26 जनवरी 1931 को कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाया था और वादा किया था कि हम अपने देश को अब पूरी तरह से आजाद बनाएंगे और अपने देश में अपना कानून लागू करवाएंगे दिसंबर 1930 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित और 26 जनवरी 1931 को पूर्ण स्वाधीनता दिवस मनाने का निर्णय इसी दिन पूर्ण स्वाधीनता राष्ट्रवादी आंदोलन केंद्रीय लक्ष्य बन गया था मतलब अभी तक कांग्रेस भारत की आजादी की मांग नहीं रखती थी अभी तक कांग्रेस के

57:00 लक्ष्य में भारत को पूरी तरह से आजादी का लक्ष्य नहीं था लेकिन 26 जनवरी 1931 के इस अधिवेशन के बाद कांग्रेस का लक्ष्य बन गया पूरी तरह से भारत की स्वतंत्रता भारत की आजादी अब आते हैं तीसरे अध्याय पर संविधान की क्या विशेषता है महोदय हमारे संविधान की कई अलौकिक विशेषताएं हैं विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है और इसलिए लंबा है क्योंकि हमने लिखित रूप में केंद्र और राज्य की शक्तियों का वर्णन किया है इसलिए लंबा है क्योंकि हमने स्पष्ट रूप से हर सरकार के

57:46 क्या दायित्व रहेंगे नागरिकों को क्या अधिकार रहेंगे नीति निर्देशक तत्त्वों में सरकार को क्या सलाह दी गई है इन सभी का स्पष्ट वर्णन है हमारे देश का संविधान ना तो बहुत ही कठोर है ना ही सॉफ्ट है कठोरता का मतलब है कि संविधान को बदला जा सकता है और बदलने के लिए कुछ शर्तों का पालन करना पड़ता है और यह इतना भी सरल नहीं है कि कोई ऐरा गहरा संविधान को बदल डाले इसलिए हमारे देश का संविधान ना तो बहुत ही कठोर है और ना ही बहुत ही सॉफ्ट है हमारे देश के संविधान ने अपने नागरिकों के विकास के लिए उन्हें मूल अधिकार प्रदान किए हैं तो संविधान की सबसे बड़ी विशेषता विश्व का

58:31 सबसे लंबा संविधान है लिखित संविधान है विभिन्न देशों से गृहित किया गया है संशोधन ना तो बहुत कठोर है ना लचीला है एकात्मक और संघात्मक तत्वों का मिश्रण है ऐसे देखा जाए तो हमारे देश का संविधान एक संघात्मक संविधान है एक संयुक्त परिवार का संविधान है जहां परिवार के दो लोग हैं केंद्र सरकार और राज्य सरकार लिखा गया है कि केंद्र क्या करेगी राज्य क्या करेगी लेकिन आपातकालीन परिस्थिति में पूरी तरह से केंद्र के कब्जे में देश आ जाएगा संसदीय शासन प्रणाली का संविधान है जहां चुने हुए लोगों में जिस दल को बहुमत

59:17 प्राप्त होगा उसी दल के कुछ लोग सरकार बनाएंगे जब चुने हुए लोगों में से ही सरकार बनाई जाती है तो उसको संसदीय व्यवस्था कहते हैं संसदीय व्यवस्था की विशेषता होती है दोहरी सदस्यता एक व्यक्ति कानून बनाने का भी काम करता है और उन्हीं में से वही व्यक्ति कानून लागू करने का भी काम कर सकता है दोहरी सदस्यता का मतलब यह है कि वह निर्माण करता भी है और वह लागू करने वाला व्यक्ति भी है यदि किसी भी सिस्टम में कानून बनाने वाला और कानून लागू करने वाला एक ही व्यक्ति हो तो उसको पार्लियामेंट्री सिस्टम कहते हैं और यदि कानून बनाने वाले अलग लोग हैं लागू करने वाले अलग लोग हैं तो ऐसी व्यवस्था को

1:00:04 अध्या सात्मक व्यवस्था के नाम से जाना जाता है एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका है हमारे देश का जो जुडिशरी सिस्टम है वह पूरी तरह से इंडिपेंडेंट है वह संसद के अधीन नहीं है वह केवल संविधान के अधीन है उसको किसी भी प्रकार से किसी भी अन्य तरीके से दबाव या फिर प्रभाव करने की कोशिश नहीं की जा सकती हमारे संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार दिए गए हैं सरकार के लिए नीति निर्देशक तत्व दिए गए हैं और नागरिकों के कर्तव्यों का भी वर्णन किया गया है केंद्र राज्य के संबंधों का स्पष्ट वर्णन है सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित सरकार को चुनने का आधार है पूरे

1:00:50 देश की एकल नागरिकता है आपातकालीन प्रावधान भी स्पष्ट रूप से दिए गए हैं स्थानीय शासन का भी वर्णन है इसके अलावा पिछड़े वर्ग अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान भी उल्लेखित है संविधान के भीतर ही तो हमारे संविधान की विशेषताएं हैं लंबा संविधान लिखित संविधान कई देशों से लिया गया कठोर और लचीली प्रणाली संशोधन की एकात्मक संघात्मक तत्त्वों का मिश्रण संसदीय शासन प्रणाली एकीकृत स्वतंत्र न्या न्यायपालिका मूल अधिकार नीति निर्देशक तत्व और मूल कर्तव्य केंद्र राज्य संबंधों का निर्धारण और उल्लेख सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार एकल

1:01:36 नागरिकता आपातकालीन प्रावधान स्थानीय शासन पिछड़े वर्ग अनुसूचित जाति जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान हमारे देश के संविधान के कई भागों को या संविधान में पहले भाग बनाए गए भागों को अनुसूचियों में बांटा गया और अनुसूचियों को एक तरीके संविधान को अनुसूचियों में बांटा गया अनुसूचियों को भागों में बांटा गया और भागों को कई अनुच्छेदों में आर्टिकल में बांटा गया है तो हमें समझना है कि भारतीय संविधान की अनुसूचियां कौन-कौन सी हैं ये 12 अनुसूचियां हम अभी याद कर लेंगे सबसे पहली अनुसूची है अनुसूची का मतलब है

1:02:23 जैसे कि किसी भी किताब को आप देखेंगे तो उस किताब में यूनिट वाइज दिखा जाता है उस यूनिटों में कई चैप्टर होते हैं तो यह अनुसूचिया मतलब यूनिट है इस यूनिट में किन बातों का वर्णन है वह हमें याद रखना है पहली अनुसूची याद करनी है पहली अनुसूची याद करनी है राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के बारे में जानकारी है कि देश में कितने राज्य होंगे और कितने यूनियन टेरिटरी होंगे दूसरी अनुसूची में राष्ट्रपति उप उपराष्ट्रपति राज्यपाल पीठासीन अधिकारियों के वेतन और उनके बारे में वर्णन है तीसरी अनुसूची में सभी इस तरीके के लोगों के शपथ का वर्णन है कि वह

1:03:08 किस तरीके से शपथ लेंगे कौन उन्हें शपथ दिलाएगा ताकि इसके माध्यम से वह समझ सके कि उन्हें कौन से कार्य करने हैं चौथी अनुसूची में राज्य में सीटों का आवन राज्यसभा के लिए हर एक राज्य से कितनी सीटें लाई जाएगी हर एक राज्य को कितनी सीटें दी जाएगी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र के लिए वर्णन पांचवी अनुसूची में है छठवीं अनुसूची में असम मेघालय त्रिपुरा और मिजोरम के जनजातीय क्षेत्र के लिए वर्णन दिया गया है जनजातीय क्षेत्र के लिए वर्णन दिया गया है एटी डबल एम भी रख सकते हैं एटी एमएम सातवी में केंद्र और राज्यों के बीच

1:03:54 शक्तियों का विभाजन आठवें में हमारे देश में कौन सी भाषाएं संवैधानिक दर्जा प्राप्त करती है उनका वर्णन नौवें में भूमि सुधार कानूनों को जो कि पहले संविधान संशोधन से बनाई गई थी दसवें में दल परिवर्तन को जो 52 में संविधान संशोधन से बनाई गई थी 11वें में पंचायतों का वर्णन है जो 73वें संविधान संशोधन से 1992 में बनाई गई थी और 12वीं अनुसूची भी नगरपालिका 74 संविधान संशोधन जो भी 1992 में ही बनाई गई थी तो 12 अनुसूचियां एक बार फिर से याद करिएगा अभी याद करनी है पहली अनुसूची में हमारे देश के बारे में वर्णन है कितने

1:04:41 राज्य और कितने केंद्र शासित प्रदेश होंगे दूसरी अनुसूची में जो बड़े-बड़े पद है राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति राज्यपाल इनके वेतन भत्तों के बारे में जानकारी दी गई है तीसरी अनुसूची में इनको कसमें दिलाई गई हैं कि कौन कसम दिलाएगा और कसम क्या होगी चौथी अनुसूची में राज्यसभा के लिए किस राज्य से कितनी सीटें आएगी उसका वर्णन है पांचवी अनुसूची में अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति क्षेत्र का वर्णन है छठवीं अनुसूची में असम त्रिपुरा मेघालय और मिजोरम के राज्यों के लिए वर्णन किया गया है कि यहां के क्षेत्र में जो जनजातीय क्षेत्र हैं वहां पर कैसे शासन चलाया

1:05:26 जाएगा सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्य के मध्य में जो भी शक्ति वितरण है उसका वर्णन है आठवी अनुसूची में भाषाओं के बारे में वर्णन है नौवी अनुसूची में पहला संविधान संशोधन के तहत 1951 में जोड़ी गई थी भूमि सुधार कानून डाले गए हैं 10वीं अनुसूची में दल बदल वाले कानून की बातचीत है 1985 में बनाया गया था दल बदल कानून 52 वां संविधान संशोधन से जोड़ा गया था और 11वीं और 12वीं अनुसूची में 11वीं पंचायत और 12वीं नगर निगम के लिए है जो 1992 में 73 और 74 व संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ी गई थी 73वें और 74 वें

1:06:15 संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ी गई थी अब आते हैं भारतीय संविधान के स्त्रोत हमारे देश के संविधान का निर्माण किन-किन जगहों से चीजों को लेकर किया गया था हमारे देश के संविधान के निर्माण में कौन-कौन से देशों के संविधान ने मदद की थी हमें देखना पड़ेगा कि संविधान निर्माण में कहां-कहां से क्या-क्या लिया गया था सबसे ज्यादा हमारे देश के संविधान पर प्रभाव पड़ा है भारत शासन अधिनियम का जी हां महोदय भारत शासन अधिनियम 1935 क्योंकि अंग्रेजों ने बड़ा सोच समझ के बहुत ही लंबा कानून बना दिया था भले ही वह लंबे समय तक नहीं लागू हुआ

1:07:02 लेकिन फिर भी भारत शासन अधिनियम से भी हमने बहुत कुछ लिया क्या-क्या चीजें हमने ली भारत की संघीय व्यवस्था न्यायपालिका आपातकालीन उपबंध राज्यपाल का कार्यालय लोक सेवा आयोग प्रशासनिक विवरण केंद्र और राज्य के बीच में शक्तियों का विभाजन केंद्र और राज्य के बीच में शक्तियों का विभाजन यह भारत शासन अधिनियम 1935 से लिया क्योंकि काफी लंबे समय तक ब्रिटेन के द्वारा हम पर शासन किया गया है हम वहां के सिस्टम से भली बाती वाकिफ है क्योंकि ब्रिटेन ने अपने सिस्टम के अनुसार ही यहां पर भी सिस्टम डेवलप कर लिया

1:07:47 था इसलिए हमने फिर उनका भी अध्ययन करवाया और ब्रिटेन से हमने ली संसदीय श प्रणाली संसदीय शासन प्रणाली पार्लियामेंट्री सिस्टम विधि का शासन कानून के सामने कोई बड़ा छोटा नहीं होगा विधाई प्रक्रिया किस तरीके से कानून बनेंगे एकल नागरिकता देश में कैबिनेट प्रणाली परम अधिकार लेख संसदीय विशेष अधिकार कि सांसद को आप क्या-क्या अतिरिक्त अधिकार देंगे और हमारे केंद्र में द्विसदनीय व्यवस्था होगी लोकसभा और राज्यसभा होगी यह हमने ब्रिटेन से ग्रहण किया कनाडा के संविधान से हमने यह सीखा कि

1:08:34 केंद्र और राज्य में भले ही संघीय व्यवस्था में विचार व्यक्त किया जाता है कि केंद्र और राज्य की शक्तियां बराबर रहेगी लेकिन हमने केंद्र को ज्यादा शक्ति दी हमने यह सीखा कनाडा के संविधान से अवशिष्ट शक्तियां केंद्र को मिलेगी यह कनाडा के संविधान से लिया केंद्र और राज्यों के बीच में राज्यों के राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र करेगा यह कनाडा के संविधान से लिया और उच्चतम न्यायालय एक परामर्शी न्याय निर्णय भी देगा यह भी हमने कनाडा के संविधान से सीखा आयरलैंड के संविधान से हमने राज्य के नीति निर्देशक तत्व लिए आयरलैंड के संविधान सेही हमने सीखा कि राष्ट्रपति का निर्वाचन कैसे किया जा सकता है और राज्यसभा के सदस्यों का

1:09:19 नामांकन कैसे हो सकता है यह हमने आयरलैंड के संविधान से लिया ऑस्ट्रेलिया के संविधान से समवर्ती सूची जहां केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं यह समवर्ती सूची हमने ऑस्ट्रेलिया के संविधान से ली व्यापार और वाणिज्य की पूरी फ्रीडम होनी चाहिए और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक यदि कोई कानून में संसद में विरोधाभास उत्पन्न हो जाए लोकसभा और राज्यसभा से वह पारित ना हो पाए तो एक साधारण कानून के लिए संयुक्त बैठक का प्रावधान फ्रांस के संविधान से हमने सीखा कि कोई राजा की जरूरत नहीं होगी एक व्यक्ति जो कि प्रमुख होगा देश का उसे चुना जा सकता है स्वतंत्रता समता और

1:10:08 बंधुता हमने फ्रांस के संविधान से सीखी है दक्षिण अफ्रीका के संस संविधान से संविधान संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन कैसे होगा वह राज्यसभा के मेंबर कैसे चुने जाएंगे उसको भी भी हमने इससे ग्रहण किया है अब आते हैं हमारे देश के संविधान की प्रस्तावना या उद्देशिका पर यह हमारे देश के संविधान का सबसे पहला पॉइंट है जिसे हम कहेंगे कि क्लियर होता है कि हमारे देश के संविधान का आखिर मकसद क्या है वह हमारे देश के नागरिकों को क्या देना चाहती हैं और वह कैसा भारत चाहती है यह उद्देशिका को पढ़कर ही समझा जा सकता है

1:10:56 संविधान की प्रस्तावना उद्देशिका संविधान बनाने का उद्देश्य ही है उद्देशिका कोई पूछे उद्देश्य का मतलब संविधान बनाने का लक्ष्य सर्वप्रथम अमेरिकी संविधान में ऐसी उद्देशिका को जगह दी गई थी 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा संविधान सभा में जो उद्देशिका प्रस्तुत की गई थी उसी को 22 जनवरी 1947 को हमारे देश की उद्देशिका के रूप में जगह दी गई उद्देशिका के चार मूल तत्व हैं पहला मूल तत्व उद्देशिका कहती है कि हमारे देश में जो भी कानून बनाने वाली संस्था रहेगी संसद जो भी कानून लागू करने वाली संस्था रहेगी सरकार

1:11:43 और जो भी न्याय देने वाली संस्था न्यायपालिका है इन सभी को शक्ति कौन देगा हमने कहा संविधान देगा पर फिर संविधान को शक्ति कौन देगा हमने कहा हमारे देश की जनता उसे स्वीकार कर रही है वह आत्मसात कर रही है कि महोदय हम उस बात को मान लेते हैं सभी लोगों के द्वारा उसमें कही गई बातों को स्वीकार किया जाता है इस मा इस मानसिकता के आधार पर संविधान को शक्ति दी गई है देश के नागरिकों के द्वारा मैंने आपने हम सब लोगों ने संविधान को स्वीकार किया इसी से संविधान शक्तिशाली बना और उसी शक्ति के आधार पर वह बाकी लोगों को सभी सरकारों को सभी प्रकार की संसद को या सभी

1:12:32 प्रकार की न्यायपालिका जो आजादी से लेकर अभी तक रही है उनको शक्ति प्रदान करती है तो संविधान के अधिकारों का स्त्रोत भारत की जनता भारत कैसा राष्ट्र है एक संप्रभु है उस पर किसी भी अन्य राष्ट्र का कोई नियंत्रण नहीं है वह अपने क्षेत्र में पूर्ण रूप से निर्णय ले देने वाला सर्वोच्च है समाजवादी है हमें गरीबी भुखमरी दूर करनी है संसाधनों को एक व्यक्ति के हाथ में नहीं रहने देना है सबके पास पहुंचाना है हमारे देश का संविधान ऐसा है जहां किसी भी रिलीजन को या किसी भी प्रकार से सरकार के द्वारा रिलीजन का समर्थन नहीं किया जाएगा लोकतांत्रिक है

1:13:20 डेमोक्रेटिक है चुनी हुई सरकार होगी और हमारे देश का प्रमुख भी चुना हुआ होगा वह वंशानुगत नहीं रहेगा हमारे संविधान का उद्देश्य क्या है न्याय प्रदान करना आजादी प्रदान करना समता और बंधुत्व का भाव पैदा करना नागरिकों में संविधान लागू करने की तारीख 26 नवंबर 1949 है जिसे फाइनली 26 जनवरी 1950 में स्वीकार किया गया भारत के संविधान का कौन सा भाग कल्याणकारी राज्य के आदर्श की घोषणा करता है तो कल्याणकारी राज्य के आदर्श की घोषणा राज्य के नीति निर्देशक तत्व में है यहां पर शायद उद्देश्य का लिख भी दिया गया हो तो भी

1:14:07 नीति निर्देशक तत्व हम आगे पढ़ेंगे अब थोड़ा सा मामला यहां पर क्या हमारे देश की उद्देशिका में क्या हमारे देश की उद्देशिका में सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णय हैं तो जी महोदय सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सारे अपने निर्णय के माध्यम से हमारे देश के संविधान की उद्देशिका के बारे में बहुत टिप्पणियां की है और बताया है सबसे पहला मामला है बेरू बाड़ी संघ मामला 1960 जिसमें कहा गया था कि उद्देशिका संविधान का भाग नहीं है कहा गया था लेकिन केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नहीं नहीं उद्देशिका संविधान का भाग है और

1:14:54 उसमें संशोधन किया जा सकता है एलआईसी ऑफ इंडिया मामला 1995 उद्देशिका संविधान का आंतरिक भाग है और 42 व संविधान संशोधन के माध्यम से महोदय एक बार आज तक एक ही बार उद्देशिका को बदला गया था तीन शब्द जोड़े गए थे समाजवाद पंथ निरपेक्ष और अखंडता हमारे देश की उद्देशिका में एक बार संविधान संशोधन हुआ है एक बार कब 1976 में 42 व संविधान संशोधन में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में तीन शब्दों को

1:15:42 समावेशित किया गया समाजवाद पंथ निरपेक्षता और अखंडता 26 जनवरी 1950 को भारत की वास्तविक संवैधानिक स्थिति क्या थी तो भारत लोकतंत्र गणराज्य था संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य था संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न पंथ निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य था संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य था तो समाजवादी और पंथ निरपेक्ष शब्द तब नहीं थे यह बाद में जोड़े गए थे तो भारत संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक राज्य था 2021 का यह प्रश्न था प्रमुख

1:16:29 तथ्य क्या है यह गैर वाद योग्य और गैर न्यायिक प्रकृति का है इसका मतलब उद्देशिका में कही गई बात यदि कोई सरकार नहीं दे पाती है तो क्या उस सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है नहीं उद्देशिका में कही गई बात यदि फुलफिल नहीं भी होती है तो भी आप सरकार को इस बात के लिए खड़ा नहीं कर सकते हैं सरकार को इसके लिए आप किसी भी कोर्ट में नहीं ले जा सकते हैं महोदय ना तो विधायिका की शक्ति का स्त्रोत है और ना ही यह प्रतिबंध लगाता है ना ही यह सरकार को शक्ति देता है उद्देशिका ना

1:17:17 उस पर कोई बैन लगाता है अ स्पष्टता की स्थिति में यह संविधान की व्याख्या करने में सहायक है किंतु स्पष्ट प्रावधानों का उद्देशिका के आधार पर कोई अन्य अर्थ नहीं लिखा लिया जाएगा सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट कहना है अगर क्लेरिटी नहीं है तो उद्देशिका हमारी मदद करेगी लेकिन क्लेरिटी है तो जबरजस्ती उद्देशिका से कोई अर्थ निकालने की कोशिश नहीं करेगा अब आते हैं हमारे देश के संविधान में सबसे पहला आर्टिकल है संघ और इसका क्षेत्र आगे बढ़ने से पहले एक बार पुनः कमेंट्स कर दीजिएगा क्या अभी तक की सारी बातें क्लियर

1:18:02 हुई हैं कई सारे लोग ढेर होते चले जाएंगे ये युद्ध है इस रणभूमि में जो अंतिम क्षण तक बना रहेगा समझ जाना कि शूरवीर तो वही है यह बाकी तो केवल आने जाने वाली हवाएं हैं जो थोड़े ही समय में शांत हो जाएगी बने रहना है निरंतर क्योंकि अभी तो युद्ध प्रारंभ हुआ है अभी तो हमने जीवन का प्रारंभ किया है अभी तो और चार घंटों का और महान संग्राम है तो अभी तो शुभारंभ हुआ है कुछ

1:18:48 विद्यार्थी वॉइस मिसमैच की शिकायत कर रहे हैं मुझे बता दीजिएगा कि क्या वॉइस मिसमैच है यदि वॉइस मिसमैच है तो यस कहिए और नहीं है तो नो कहिए एक बार आप लोग रिफ्रेश कर दीजिएगा बस केवल एक बार रिफ्रेश कर दीजिएगा कई सारे विद्यार्थी नो कह रहे हैं तो मेरी रिक्वेस्ट है कि जिन लोगों को वाइस मिस मैच लग रहा है वे लोग एक बार रिफ्रेश कर ले शायद वाइस मिसमैच का प्रॉब्लम नहीं आएगा क्योंकि वॉइस मिसमैच

1:19:34 होता तो सभी को लगता अधिकतर लाल लाली क्लियर कह रहे हैं और कुछ नो कह रहे हैं कि वॉइस मिस मैच बिल्कुल क्लियर है सब कुछ कोई बात नहीं शुरुआत करते हैं फिर से आगे बढ़ते हैं अब हम बातचीत करने जा रहे हैं हमारे देश के संविधान में भाग एक अनुच्छेद एक से चार अनुच्छेद एक क्या कहता है भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ है मतलब हमारा देश एक तरीके से राज्यों से मिलकर बना हुआ देश है पर क्या इन राज्यों को इस देश से अलग

1:20:22 होने का अधिकार है नहीं इसीलिए तो हमारे देश के संविधान में अखंडता वर्ड यूज किया है कि हमारे देश का राज्य कभी भी अपने राष्ट्र से अलग नहीं हो सकता है फिर हमारे देश के संविधान में आर्टिकल दो है आर्टिकल दो में वर्णन है संसद को राज्यों के पुनर्गठन की शक्ति है मतलब संसद अगर चाहे तो एक राज्य को दो राज्यों में बांट दें या दो राज्यों को एक राज्य बदल दे आर्टिकल तीन कहता है कि राज्यों के पुनर्गठन के संबंध की प्रक्रिया क्या होगी और चार कहता है कि राज्यों के पुनर्गठन हेतु संविधान संशोधन की कोई जरूरत नहीं है केवल एक

1:21:09 साधारण कानून के माध्यम से हमारे देश में किसी नए राज्य का निर्माण किया जाएगा तो आर्टिकल पहला कहता है कि हमारा देश राज्यों से मिलकर बना है पर राज्य को अलग होने की अनुमति नहीं है दूसरा कहता है कि संसद नया राज्य बना सकती है राज्य का पुनर सीमांकन कर सकती है तीसरे में प्रक्रिया का वर्णन है और चौथे में कहा गया है कि राज्य के निर्माण के लिए संविधान संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं होगी आर्टिकल तीन राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में कोई विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के बाद ही संसद में पेश किया जाएगा

1:21:57 आर्टिकल तीन महत्त्वपूर्ण है सवाल बनता है इसलिए ध्यान से सुनते चलना राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में कोई विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के बाद ही संसद में पेश किया जाएगा राष्ट्रपति के द्वारा अनुमति देने से पहले संबंधित राज्य विधान मंडल का मत जाना जाएगा राष्ट्रपति महोदय अनुमति देने से पहले भले उस राज्य के विधान मंडल से पूछेगी लिखित में बता देगी कि इतने टाइम में बता दो कि आपकी राय क्या है राय भी बतानी पड़ेगी राय भी लेनी पड़ेगी राज्य विधान मंडल के मत हेतु समय

1:22:42 सीमा का निर्धारण राष्ट्रपति करेंगे राष्ट्रपति राज्य विधान मंडल के विचार अथवा सिफारिश मानने के लिए बाध्य नहीं है राष्ट्रपति उसे बदल सकते हैं हमारे देश में 1950 में जब राज्य बने थे ना तो उस समय क्योंकि राज्यों का निर्माण अलग-अलग राजाओं के देशी रियासतों को जोड़कर किया गया था और इसी कारण से राज्यों को चार भागों में बांटा गया था राज्यों का चार भागों में एक तरीके से विभाजन था पहले में वह राज्य थे जो ब्रिटिश प्रांत के द्वारा भारत को डायरेक्टली भारत में जोड़ दिए थे दूसरे में वे देशी रियासतों के राज्य थे जहां

1:23:28 झगड़ा होने की कोई दिक्कत नहीं थी तीसरे में तीसरे में वे राज्य थे जहां पर थोड़ा रिस्क था कि कहीं यह राज्य फिर प्रॉब्लम खड़ी ना कर दे और चौथे में डाले गए थे केंद्र शासित प्रदेश असम बिहार बंबई मध्य प्रदेश म उड़ीसा पंजाब संयुक्त प्रांत पश्चिम बंगाल हैदराबाद जम्मू कश्मीर मध्य भारत मैसूर पटियाला राजस्थान सौराष्ट्र ान कोर विं प्रदेश अजमेर भोपाल बिलासपुर बिहार कुच बिहार कुर्ग दिल्ली हिमाचल प्रदेश कच्छ मणिपुर त्रिपुरा और भाग चौथे में अंडमान

1:24:16 निकोबार लक्ष द्वीप द्वीप समूह को डाला गया था पर फिर आज तो 28 राज्य हैं तो यह जो आज 28 राज्य हैं और आठ केंद्र शासित प्रदेश है ये इन 5060 वर्षों की प्रक्रिया के बाद बने हैं कई सारे कमीशन बनाए गए थे जो तय करेंगे कि भारत में राज्य क्या छोटे-छोटे बनाए जाए या राज्यों का क्या किस आधार पर निर्माण किया जाए तो राज्यों के पुनर्गठन के लिए कई आयोग आए सबसे पहला आयोग था डार कमीशन डार आयोग फिर धर आयोग बनाया गया फिर जेवीपी कमेटी बनाई गई थी महोदय जेवीपी समिति फजल अली आयोग

1:25:03 1953 केवल इकलौता आयोग यही था महोदय जिसने कहा था कि भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण किया जाना चाहिए लेकिन केवल भाषा के आधार पर नहीं भाषा उसमें राज्यों के निर्माण में एक आधार होना चाहिए पर ये तीनों कमेटियों ने मना कर दिया था कि भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन नहीं होना चाहिए राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर नहीं तीनों कमीशन ने कहा था केवल फजल अली आयोग ने कहा था कि राज्यों के पुनर्गठन का आधार भाषाई आधार हो परंतु एक राज्य एक भाषा का फार्मूला नहीं प्रशासनिक आधार सांस्कृतिक

1:25:51 आधार और आर्थिक आधार भी होने चाहिए हमारे देश के संविधान में आर्टिकल 5 से लेकर आर्टिकल 11 तक नागरिकता के बारे में वर्णन है कि हमारे देश में कौन नागरिक बनेगा किसको भारत की नागरिकता मिल सकती है या भारत की नागरिकता मिलने का क्या आधार होता है तो हमारे देश के संविधान में भाग दो में आर्टिकल 5 से 11 में नागरिकता का वर्णन है हमारे देश में एकल नागरिकता है एक नागरिकता है राज्यों की कोई नागरिकता नहीं होती है देश की नागरिकता होगी संघ सूची का विषय है यह पूरा संघ सूची तय करेगी नागरिकता के संबंध में कानून बनाने

1:26:38 की शक्ति केवल पार्लियामेंट को है जैसे कि आर्टिकल तीन ये नोट मत करना कानून बनाने की शक्ति पार्लियामेंट को है मूलतः यह प्रावधान उस समय दिए गए थे जब देश का विभाजन हुआ था और भारत का संविधान लागू हुआ था पाकिस्तान से भारत और भारत से पाकिस्तान बड़ी संख्या में लोगों का आना जाना हुआ था तो आर्टिकल दो आर्टिकल 5 से 11 में भाग दो में क्या लिखा गया है कि जन्म के आधार पर वंश के आधार पर रजिस्ट्रेशन के आधार पर देशी करण के आधार पर और क्षेत्र का समावेश होने के आधार पर भारत की नागरिक मिल सकती है तो

1:27:25 भारत की नागरिकता को मिलने के पांच तरीके हैं महोदय भारत की नागरिकता को प्राप्त करने के पांच तरीके हैं जन्म वंश पंजीकरण देशकर क्षेत्र का समावेशन नागरिकता क्या है नागरिकता एक प्रकार का अधिकार है जो कुछ लोगों को मिलेगा जिनको मिलेगा वह उस क्षेत्र के विशिष्ट अधिकार प्राप्त लोगों का समूह होगा जैसे मैं आप नागरिकता निषेध का एक विचार है इसमें गैर नागरिक सम्मिलित

1:28:12 नहीं होते ताकि नागरिकों में राष्ट्रवाद की भावना विकसित की जा सके ताकि राज्य के द्वारा अपने नागरिकों के कल्याण को सर्वोपरि माना जाए नागरिकता प्रदान करने के दो सिद्धांत होते हैं जस सोली और जस सांगुइनिस जस सोली का मतलब है जन्म के आधार पर नागरिकता मोतीलाल नेहरू समिति 1928 इसके पक्ष में थी जस सांगुइनिस रक्त संबंध के आधार पर नागरिकता जो समिति का कहना था कि इससे नस्लीय विचार उत्पन्न होंगे और यह लोकाचार के खिलाफ है तो नागरिकता के दो आधार होते हैं जन्म और ब्लड रिलेशन तो ब्लड रिलेशन और जन्म भारत

1:28:57 में दोनों ही माने गए हैं लेकिन ब्लड रिलेशन को कहते जस सांगुइनिस और जन्म के आधार को कहते हैं जस सोली जो कि मोतीलाल नेहरू समिति 1928 में नेहरू समिति बनाई गई थी उसने इसका समर्थन किया था लेकिन इसका समर्थन नहीं किया था क्या भारत में नागरिकता को त्यागा जा सकता है क्या भारत की नागरिकता को छोड़ा जा सकता है जी हां भारत की नागरिकता को छोड़ा भी जा सकता है स्वेच्छिक त्याग इच्छा से भारत की नागरिकता का त्याग उस व्यक्ति का प्रत्येक नाबालिक बच्चा भी अपनी भारतीय नागरिकता खो देगा मतलब अगर उस व्यक्ति ने अपनी

1:29:45 नागरिकता छोड़ी है तो वह अगर उसका कोई बच्चा 14 वर्ष या उससे कम आयु का है तो उसकी भी नागरिकता चली जाएगी उसके त्यागने के साथ लेकिन अगर उसका बच्चा 18 वर्ष का है या 15 से ज्यादा वर्ष का है तो उसकी नागरिकता नहीं जाएगी उसे आजादी है कि वह भारत का नागरिक रहना चाहता है या नहीं बर्खास्तगी के द्वारा एक व्यक्ति एक समय में केवल एक ही देश का नागरिक होगा यह प्रावधान तब लागू नहीं होता जब भारत युद्ध का सामना कर रहा हो और सरकार द्वारा संविधान का अपमान नागरिकता फर्जी तरीके से प्राप्त सात वर्षों से लगातार भारत से बाहर या युद्ध के दौरान दुश्मन के साथ

1:30:32 अवैध रूप से व्यापार या संचार ऐसे सिचुएशन में सरकार किसी की नागरिकता को खत्म भी कर सकती है तो स्वेच्छिक त्याग हो सकता है बर्खास्तगी हो सकती है या सरकार के द्वारा वंचित किया जा सकता है वर्ष 2019 में हमारे देश में नागरिकता संशोधन अधिनियम लाया गया सीएए के तहत जिसमें पाकिस्तान अफगानिस्तान बांग्लादेश के अल्पसंख्यक लोगों को भारत में नागरिकता देने का प्रयास किया गया नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन 31 दिसंबर 2014 को या

1:31:18 उससे पहले अफगानिस्तान बांग्लादेश पाकिस्तान से भारत आए हिंदू सिख बौद्ध जैन पारसी और ईसाइयों को अवेद प्रवासी नहीं माना जाएगा मतलब उन्हें भारत की नागरिकता मिल गई है यह समझा जाएगा फिर एक शब्द आता है ओसीआई ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया इसका अभिप्राय क्या होता है कई बार इकोनॉमिक्स में यह शब्द काफी चर्चा का विषय होता है ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया गृह मंत्रालय के द्वारा 2005 में इसे प्रारंभ किया गया

1:32:04 था भारतीय मूल का एक ऐसा व्यक्ति जो 26 जनवरी 1950 के बाद भारत का नागरिक बनने के योग्य है किंतु 26 जनवरी 1950 के बाद से विदेश की नागरिकता ले ली हो विदेश की परिभाषा में में पाकिस्तान अथवा बांग्लादेश नहीं है इन दो देशों को छोड़कर क्योंकि जब भारत बना था तब यह भी निर्मित हुए थे तो इन दो देशों को छोड़कर भारत के वंश वाला कोई भी व्यक्ति जो किसी अन्य देश की नागरिकता ले चुका हो यदि वह भारत के लिए आवेदन करें तो हम उसको ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया दे

1:32:52 देंगे मतलब वह डायरेक्टली भारत का नागरिक तो नहीं होगा लेकिन वह भारत के नागरिक के जैसे ही बहुत सारे अधिकार प्राप्त कर लेगा ओसीआई के लाभ पासपोर्ट में सरलता भारत में बैंक खाता खुल पाएगा गैर कृषि संपत्ति खरीद पाएगा भारत का ड्राइविंग लाइसेंस मिल जाएगा किंतु मतदान और सरकारी नौकरी का अधिकार नहीं है और कृषि योग्य भूमि खरीदने का उसे अधिकार नहीं होगा फिर एक शब्द होता है पर्सन ऑफ इंडिया ओरिजिन इंडियन ओरिजिन पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन पीआईओ भारतीय मूल का एक ऐसा व्यक्ति जो जन्म से या वंश से तो भारतीय है परंतु

1:33:40 विदेश में रहता हो बांग्लादेश चीन अफगानिस्तान भूटान नेपाल पाकिस्तान और श्रीलंका को छोड़कर विदेश माना जाएगा 15 जनवरी 2015 को पीआईओ कार्ड योजना को ओसीआई के साथ मिला दिया गया है मतलब वो सारी सुविधाएं पीआईओ वाले व्यक्ति को भी मिलेगी फिर है नॉन रेसिडेंट इंडियन एन आर आई यह एनआरआई क्या होता है भाई ऐसा भारतीय पासपोर्ट धारक शब्द पर गौर करना

1:34:30 ऐसा भारतीय पासपोर्ट धारक जो किसी वित्तीय वर्ष में कम से कम 133 दिनों के लिए किसी अन्य देश में रहता है और शेष दिनों में भारत रहता है उसे एनआरआई कहते हैं एनआरआई को वोट देने का अधिकार होता है केवल भारत में अर्जित आय पर वह टैक्स देने के लिए जिम्मेदार माना जाता है तो फिर से देख लीजिए एक बार आप लोग एक तो है ओवर सड सिटीजनशिप ऑफ इंडिया दूसरा है पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन तीसरा है एनआरआई नागरिकता से जुड़ा हुआ यह पहलू भी याद रखना है अब

1:35:18 हम आ रहे हैं अगले पड़ाव पर मूल अधिकार अब हम बातचीत करने जा रहे हैं मूल अधिकारों की अब हम चर्चा करने जा रहे हैं हमारे देश के नागरिकों को मिलने वाले फंडामेंटल राइट्स संविधान के भाग तीन में इसका वर्णन है आर्टिकल 12 से लेकर आर्टिकल 35 तक में इसका वर्णन है पहले सात मूलभूत अधिकार थे अब केवल छह मूल अध मूलभूत अधिकार है संपत्ति का अधिकार अब मूलभूत अधिकार नहीं है वह हमारे संविधान में निहित एक संवैधानिक अधिकार है आइए

1:36:07 देखते हैं मूल अधिकार अमेरिका के संविधान से ग्रहण किया गया है थोड़ा इसके इतिहास को भी समझने की कोशिश करते हैं मूल अधिकार मूल अधिकार नामकरण क्यों भाग तीन में वर्णित है व्यक्ति के सर्वांगी विकास के लिए जरूरी है राज्य के द्वारा इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता और कोई राज्य या सरकार उल्लंघन करें तो उसे कोर्ट में घसीटा जा सकता है कहा जा सकता है कि इससे कहिए कि मेरे मूल अधिकारों को ना

1:36:52 छेड़े नहीं तो स्थिति भयानक कर सकता हूं मैं उपचार प्राप्त करने का अधिकार भी मूल अधिकार में आर्टिकल 32 में है उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के द्वारा संरक्षण है लेकिन मूल रूप से उच्चतम न्यायालय के द्वारा भाग तीन को भारतीय संविधान का मेग्ना कार्टा कहा जाता है मेग्ना कार्टा क्यों कहते हैं मेघना कार्टा के तहत वैश्विक स्तर पर पहली बार लिखित अधिकारों की व्यवस्था हुई थी इस दुनिया में पहली बार ऐसा वर्णन मेग्ना कार्टा के तहत 1215 में इंग्लैंड के सम्राट जॉन के द्वारा दी गई थी सम्राट जॉन

1:37:39 का मेग्ना कार्टा मूल अधिकारों का जन्मदाता है इसके बाद समय-समय पर सम्राट के द्वारा नागरिकों को कई अधिकार दिए गए 1689 में बिल ऑफ राइट्स के तहत समस्त

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