धर्म का क्या अर्थ? || आचार्य प्रशांत (2019)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो धर्म के सच्चे अर्थ और "मैं" की धारणा से मुक्ति के महत्व पर केंद्रित है। यह बताता है कि कैसे हम जीवन में कई भूमिकाएँ निभाते हैं, लेकिन अपनी मूल पहचान को भूल जाते हैं, जो कि "मैं" है। धर्म इस "मैं" के प्रति हमारे दायित्व को पूरा करने और इससे मुक्ति पाने का मार्ग है।

  • धर्म का अर्थ है वह धारणा रखना जो सभी धारणाओं से मुक्ति दिलाए।
  • "मैं" हमारी पहली और सबसे बड़ी भूल है, जिससे अशांति पैदा होती है।
  • हमें अपनी सभी भूमिकाओं के दायित्वों को निभाते हुए "मैं" के प्रति अपने कर्तव्य को याद रखना चाहिए।
  • धर्म "मैं" का इलाज है और यह सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है।

धर्म का अर्थ

धर्म का अर्थ है उस धारणा को बनाए रखना जो आपको सभी अन्य धारणाओं से मुक्त कर दे। हम जीवन में कई भूमिकाएँ निभाते हैं, जैसे माँ, बहन, पत्नी, लेकिन ये सभी धारणाएँ हैं, सत्य नहीं। सत्य तो नित्य होता है, जो नींद में भी नहीं मिटता। धर्म का अर्थ है अपनी अंतिम धारणा को याद रखना, जो आपको बाकी सभी धारणाओं से मुक्ति दिला दे। अपनी उस पहली पहचान को याद करो जहाँ से तुम्हारी जीवन यात्रा शुरू हुई थी।

प्रथम धारणा

तुम्हारी पहली धारणा क्या है? तुम नानी, दादी, बहन, भाभी, माँ, पत्नी तो बाद में बने, सबसे पहले क्या थे? सबसे पहले थी मूल वृत्ति, "मैं"। यह वह पहली धारणा है जिसके कारण तुम्हें और भी कई धारणाएँ पकड़नी पड़ीं। और हर धारणा झूठी है। पहला झूठ है "मैं"। एक बार जब तुम "मैं" कह देते हो, तो तुम्हें हजार झूठ और बोलने पड़ते हैं। धर्म का अर्थ है अपनी इस प्रथम धारणा को फिर से याद करना और यह याद रखना कि यही तुम्हारी पहली भूल थी, यही तुम्हारी पहली अशांति है।

दायित्वों की पूर्ति

तुम अपनी बाकी सब पहचानों से जुड़े दायित्वों की पूर्ति करते रह जाते हो, लेकिन तुम भूल जाते हो कि किरदारों के नीचे का किरदार क्या है? तुम भूल जाते हो कि वर्णमाला का पहला अक्षर क्या है? तुम भूल जाते हो कि तुम्हारी जीवन कहानी किस लफ्ज़ से शुरू हुई थी। तुम अपने बाकी सब फर्ज निभाते चलते हो, लेकिन एक फर्ज भूल जाते हो। इस "मैं" को भी तो तृप्ति देनी है, क्योंकि इसी ने तो सारा खेल शुरू करा है। धर्म का मतलब है याद रखना कि बहन, बेटी, भाभी, अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित यह सब तुम बाद में हुए। किस्से की शुरुआत हुई थी "मैं" होने से।

मैं का इलाज

"मैं" कोई बड़ी शांतिप्रद चीज तो है नहीं। "मैं" तो रोग है और रोग के प्रति एक ही दायित्व हो सकता है, उसका इलाज। धर्म कहता है बाकी सब दायित्व बाद में निपटा लेंगे। एक दायित्व है जो सर्वोपरि है, "मैं" के प्रति जो तुम्हारा कर्तव्य है। धर्म इसीलिए पहला कर्तव्य है। धर्म कर्तव्यों से ऊपर का कर्तव्य है। धर्म वह कर्तव्य है जिसके आगे सारे कर्तव्य फीके हैं।

मूल कर्तव्य

हम छोटे-मोटे कर्तव्य निभाने में बड़े कुशल हैं, और जो मूल कर्तव्य है उसको भूल जाते हैं। धर्म है अपने मूल कर्तव्य का पुनरस्मरण। तुम बाजार गए थे दवाइयां लेने, लेकिन वहां पकोड़े भी थे, जलेबियां भी थीं, जादूगर का खेल भी था, और गोलगप्पे भी थे। और यह जो बाकी चीजें थीं, ऐसा नहीं कि तुम्हें इनकी जरूरत नहीं थी, लेकिन असली महत्व किस बात का था? दवाई लेने गए थे। बाजार जाके सब नंबर दो से नंबर 100 तक के काम कर डाले, नंबर एक का काम भूल गए। धर्म है नंबर एक का काम।

प्रथम करणीय

संतों ने तुम्हें बार-बार याद दिलाया है कि मत भूलो दुनिया में क्यों आए थे। तुम बहुत व्यस्त हो, तुम बहुत सारे काम कर रहे हो, बस वही नहीं कर रहे जो करना चाहिए, जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और जो सर्वाधिक उपेक्षित है, उसी का नाम धर्म है। "मैं" को उसके विसर्जन तक ले जाने का नाम ही धर्म है और वही प्रथम करणीय है।

पहचानों का खेल

यह देखना पड़ेगा कि अभी यहां बैठे हो, एक फोन आता है और तुम पुनः बेटे या पति हो जाते हो। ऐसा नहीं है कि तुम पति उस दिन हुए थे जिस दिन ब्याह हुआ था तुम्हारा। पति तुम उस पल हो जाते हो जब फोन आता है। अभी यहां बैठे हो तो साधक हो, श्रोता हो। घर से फोन आ जाएगा तो बेटे या पते हो जाओगे। यह पकड़ो। पहचानों का खेल अतीत में नहीं मिलेगा तुमको। तुम देखो कि अभी कैसे पहचाने शिकंजा कसती हैं तुम पर।

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Transcript

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0:06 धर्म का मतलब होता है वो धारणा रखना जो तुम्हें समस्त धारणाओं से मुक्ति दे दे। तुमने अपने ऊपर यह जितने भी नाम रखे हैं जितने भी किरदार रोल्स रखे हैं। कहा ना अभी मां हूं, बहन हूं, पत्नी हूं। यह धारणाएं हैं। ये धारणाएं हैं। जब तुम सो जाते हो तो क्या किसी की मां या किसी की पत्नी रहते हो? जब

0:54 चेतना की जागृत अवस्था में आ जाते हो। तो सिर्फ तभी ये ख्याल और स्मृति आते हैं ना कि तुम किनहीं विशेष किरदारों में हो। तो ये धारणाएं हैं। सत्य तो नहीं है। सत्य तो नींद के साथ मिट नहीं जाता। नित्य होता है ना। पर नींद के साथ बीवी तो मिट जाती है और मां भी मिट जाती है। मिट जाती है ना। और अगर मूर्छित हो गई तो फिर तो कहना ही क्या? एकदम ही नहीं बचती। फिर तो नाम भी पुकारो उसका तो नाम भी मिट जाता है। तो ये सब क्या है किरदार धारणाएं हैं। पर यह छोटी मोटी धारणाएं

1:40 हैं। धर्म का मतलब होता है एक आखिरी धारणा रखना। और ऐसी धारणा जो बाकी सब धारणाओं से मुक्ति दिला दे। तुम्हारी क्या है आखिरी धारणा यह पता करो जो आखिरी है वो वास्तव में पहली है जहां से शुरुआत हुई है तुमने अपने आप को क्या माना कि तुम्हारी इस जीवन यात्रा की शुरुआत हुई तुम्हारे इस किस्से का पहला अक्षर क्या है तुम्हारी वर्णमाला शुरू कहां से हो रही

2:29 है? बुल्ले शाह कहते थे एक अलिफ पढ़ो। छुटकारा है। धर्म का मतलब है अपने अलिफ को याद रखना। अपने अ को याद रखना। जैसे प्रणव में होता है ना अकार उकार मकार तो अकार को याद रखना पहले को याद रखना अ कहां से शुरू हुए थे तुम नानी दादी बहन भाभी मां पत्नी तो बाद

3:17 में बने सबसे पहले क्या थे तुम सबसे पहले थी मूल वृत्ति मैं वो प्रथम धारणा है वो प्रथम धारणा है जिसके कारण फिर न जाने कितनी और धारणाएं तुम्हें पकड़नी पड़ी। और हर धारणा झूठी है। पहला झूठ क्या है तुम्हारा? मैं मैं एक बार कह दिया मैं तो उसके बाद हजार झूठ और बोलने पड़ते हैं। फिर बहन भाभी सब बनना पड़ता है। एक बार कहा नहीं मैं कि बीज डल गया अब न जाने कितनी पत्तियां निकलेंगी।

4:06 तो धर्म का मतलब है अपनी इस प्रथम धारणा को फिर से याद करना और याद करना कि यही तुम्हारी प्रथम भूल थी। यही तुम्हारी प्रथम अशांति है। यही तुम्हारी प्रथम पहचान है और इसी का तुम्हें निराकरण चाहिए। तुम अपनी बाकी सब पहचानों से जुड़े दायित्वों की पूर्ति करते रह जाते हो ना। अगर बहन हो तो बहन होने के दायित्व की पूर्ति करते हो। बेटी हो तो बेटी होने के। कहीं पर अगर तुम कर्मचारी हो तो कर्मचारी होने के दायित्व की पूर्ति करते हो। तुम किसी सभा इत्यादि के सदस्य हो तो वहां भी अपने दायित्व की पूर्ति करते हो। करते हो

4:51 ना? तुम अपने किरदार के हर रंग से संबंधित अपनी जिम्मेदारियों की पूर्ति करते हो ना। लेकिन तुम भूल ही जाते हो कि किरदारों के नीचे का किरदार क्या है? तुम भूल ही जाते हो कि वर्णमाला का पहला अक्षर क्या है? तुम भूल ही जाते हो कि तुम्हारी जीवन कहानी किस लफज़ से शुरू हुई थी। किससे शुरू हुई थी? मैं। तो तुम अपने बाकी सब फर्ज निभाते चलते हो। एक फर्ज भूल जाते हो। इस मैं को भी तो तृप्ति देनी है ना। क्योंकि इसी ने तो सारा खेल शुरू करा है। यही तो मूल वृत्ति है। इसको ही अगर शांति नहीं

5:40 दी तो पहला फर्ज तो निभाया ही नहीं। धर्म का मतलब है याद रखना कि बहन बेटी भाभी छोटी बड़ी अमीर गरीब शिक्षित अशिक्षित यह सब तुम बाद में हुई। किस्से की शुरुआत हुई थी मैं होने से। तो लाओ जरा मैं के प्रति जो दायित्व है उसे पूरा कर दें। अब मैं कोई बड़ी शांतिप्रद चीज तो है नहीं। मैं तो रोग है और रोग के प्रति एक ही दायित्व हो सकता है। क्या तो धर्म है मैं का इलाज। धर्म कहता

6:25 है बाकी सब दायित्व बाद में निपटा लेंगे। एक दायित्व है जो सर्वोपरि है। कौन सा दायित्व? मैं के प्रति जो तुम्हारा कर्तव्य है। तो धर्म इसीलिए पहला कर्तव्य है। धर्म कर्तव्यों से ऊपर का कर्तव्य है। धर्म वो कर्तव्य है जिसके आगे सारे कर्तव्य फीके हैं। धर्म ही कर्तव्य है। हम छोटे-मोटे कर्तव्य निभाने में बड़े कुशल हैं। और जो मूल कर्तव्य है उसको भूल जाते हैं। धर्म है अपने मूल कर्तव्य का

7:15 पुनरस्मरण। तुम बाजार गए थे दवाइयां लेने। लेकिन बाजार में दवाइयों भर की दुकान नहीं थी। वहां पकोड़े भी थे। और जलेबियां भी थी और जादूगर का खेल जादूगर का खेल भी था और गोलगप्पे भी थे सेल भी लगी और तमाम तरह की सेल लगी थी और यह जो बाकी चीजें थी ऐसा नहीं कि तुम्हें इनकी जरूरत नहीं थी कुछ वहां सब्जी भाजी मिल रही थी। तुम वह

8:03 भी लेने लग गए। तुम्हें उसकी जरूरत थी। ऐसा नहीं कि जरूरत नहीं थी। कुछ कपड़े मिल रहे थे। तुमने उनकी तरफ ध्यान लगा दिया। ऐसा नहीं कि वो कपड़े व्यर्थ है। उनकी भी तुम्हें जरूरत थी। तो यह जो तुम बाकी सब काम करने लग गए बाजार में ऐसा नहीं कि यह पूरी तरह व्यर्थ काम है। इनकी भी अपनी महत्ता लेकिन इनकी महत्ता बहुत पीछे की है। असली महत्व किस बात का था? दवाई लेने गए थे। दवाई लेते ना। बाजार जाके सब नंबर दो से नंबर 100 तक के काम कर डाले। नंबर एक का काम भूल गए। धर्म है नंबर एक का काम। धर्म कहता है उसको निपटा

8:50 लो। दो से 100 तक के तो पुछले हैं। वह हो जाएंगे। देखा जाएगा। फिर अगर वो नहीं भी हुए तो नुकसान जरा कम है। नंबर एक का काम भूल गए तो नुकसान भयंकर है। संतों ने तुम्हें बार-बार याद दिलाया है कि मत भूलो दुनिया में क्यों आए थे। तुम बहुत व्यस्त हो। तुम बहुत सारे काम कर रहे हो। बस वही नहीं कर रहे। करना चाहिए जो करना चाहिए जो करना चाहिए जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और जो सर्वाधिक उपेक्षित है उसी का नाम धर्म है। मैं को उसके विसर्जन तक ले जाने का नाम ही

9:35 धर्म है और वही प्रथम करणीय है। तो सर ये पकड़ना पड़ेगा हमने जीवन में कब कब अपनी मैं को मतलब एक एक रूप दिया लगातार देते हैं। यह देखना पड़ेगा कि अभी यहां बैठे हो एक फोन आता है और तुम पुनः बेटे या पति हो जाते हो। ऐसा नहीं है कि तुम पति उस दिन हुए थे जिस दिन ब्याह हुआ था तुम्हारा। पति तुम उस पल हो जाते हो जब फोन आता है। अभी यहां बैठे हो तो साधक हो, श्रोता हो। घर से फोन आ जाएगा तो बेटे या पते हो जाओगे। यह पकड़ो। पहचानों का खेल अतीत में नहीं मिलेगा

10:21 तुमको कि तुम याद करने लगो कि गर्भ में जब हम आठ सप्ताह के थे या आठ माह के थे तब क्या हुआ था। वो सब याद करने से कोई लाभ नहीं। तुम देखो कि अभी कैसे पहचाने शिकंजा कसती हैं तुम पर। वह प्रतिफल होता है। तो अजान जी अभी कैसे पहचाने? जैसे अभी किसी का फोन आ जाए तो मेरे पापा का फोन आ गया तो अभी कैसे पहचाने? और उस समय उनको कैसे समझाएं कि क्या चीज के लिए आए या समझाने की नियत किसकी है? जब खुद ही नहीं समझ रही तो किसी को क्या

11:07 समझाएगी? जो बेटी बनी बैठी है वह बाप को बोल रही है तुम बाप मत रहना। बाप कहेगा तू खुद तो बेटी बनी बैठी है और मुझे कहती है बाप मत रहना। बेटी नहीं बाप को समझा पाएगी कभी। मित्र मित्र को समझा सकता है। जब तक बेटी हो तब तक पिता के किसी काम की नहीं तुम। [संगीत]

11:54 हम हम्म [संगीत]

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