0:02 क्या हम यज्ञ जानते हैं? हम ना ध्यान जानते हैं, ना यज्ञ जानते, ना पूजा जानते, ना पाठ जानते, ना भजन जानते, ना कीर्तन जानते हैं। ना हम ये जानते वो क्या है? ना हम ये मानते कि हमारी समस्या क्या है? तो तुम्हारे काम क्या आएगा? यज्ञ का अगर असली अर्थ पता हो। तो यज्ञ बहुत पवित्र और पावन चीज है। लेकिन यह जो इधर-उधर पंडित घूम के यज्ञ कराते रहते हैं इन्हें यज्ञ का क्या पता है? इनके लिए तो यज्ञ का मतलब है लकड़ी जलाना। उसमें घी डाल दो और वो हर छोटी शॉपिंग की जगह पर वो सब होता है ना खरीददारी का कि फलानी यहां पर यज्ञ हवन और
0:48 पूजा पाठ की वस्तुएं मिलती हैं और उसके यहां पे जाकर के आप उसको बस बोल भर दो यज्ञ खड़ा खट खड़ा खट पूरी रेसिपी आपके सामने रख देगा ऐसे आपको आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति होने वाली है क्या बोल बोलिए अगर आपको खुद नहीं पता हो तो आप क्या कर रहे हो? वो पंडित बोल देता है अब ना यह अब तीसरी उंगली आगे करो तो आप तीसरी कर देते हो कभी दूसरी कर देते हो कभी कुछ कर देते हो कहता है अब ऐसे उठाओ ऐसे डालो कई घरों में तो बड़ा आतंक फैल जाता है कहते देखो ऐसे डालना था और इसने ऐसे डाल दिया अब वो ऐसे डाल रहा पंडित जी ने कहा था ऐसे डालना और मां उसको ऐसे आंख दिखा रही है हम क्योंकि बोल तो सकते नहीं अभी पवित्र आयोजन चल रहा है तो वहां डांटवांट पढ़
1:34 नहीं सकती गाली गलौज हो नहीं सकती। बाद में खाएगा जूता। अभी तो बस आंख दिखाई जाती है ऐसे जोर से। अब वो बेचारा बच्चा ऐसे थरथरा के बैठा हुआ है। कह रहा और पता नहीं क्या-क्या होना है। अभी मेरी तो होती रही पंडितों मतलब तो बता दो। बोल क्या रहे हो? उसे खुद ही नहीं पता। नारियल रख के बैठ गया, केला रख के बैठ गया है। सेब रख के बैठ गया है। बूंदी का लड्डू ला रहा है। करोगे क्या इसका? क्यों? क्यों डाल रहे हो आग में? बताओ। यज्ञ का अगर वास्तविक अर्थ नहीं पता तो उससे लाभ कैसे पाओगे बताओ और कोई भी पूजा कर रहे हो ओम जय जगदीश हरे अरे जगत पता नहीं जगदीश की क्या बात कर रहे हो कुछ पता भी कर लोगे या बस यही बोल
2:19 दोगे कि तुम सबके स्वामी स्वामी तुम्हारी तुम्हारी अर्धांगिनी है काहे झूठ बोल रहे हो जगदीश से तुम सबके स्वामी सबसे बड़ा स्वामी अहंकार है और वहां जाकर बोल रहे हो मात-पिता तुम मेरे कैसे मात-पिता अभी बैंक का फॉर्म भरोगे उसमें लिखोगे मेरे बाप का नाम जगदीश है [हंसी] तो काहे वहां पर झूठ बोल रहे हो खड़े हो के क्या फायदा मिलेगा बताओ ऐसी आरती से कुछ अर्थ तो समझेंगे या नहीं समझेंगे यही वजह है कि जगत घोर रूप से अधार्मिक होता जा रहा है कुछ जानना नहीं कुछ समझना नहीं बस करे जाना है करे जाना है निभाना है वहां अमेरिका में पंडित इंपोर्ट होते हैं। कहते हैं भाई देखो अब मुंडन कराना है तो
3:07 कोई तो आएगा ना जो मंत्र बोलेगा। कहे तुम खुद क्यों नहीं पढ़ सकते हो? कौन से मंत्र हैं? या ऋषियों ने कहा था कि सबके नहीं ये नहीं है मंत्र। बोलो धर्म बोध के लिए है या अंधानुकरण के लिए है कि समझा नहीं जाना नहीं बस करे जा रहे हैं और उसका जो खतरनाक नतीजा निकलता है जानते हैं क्या होता है फिर एक पीढ़ी आती है जो कहती है इन चीजों का कोई अर्थ तो है नहीं तो हमें करनी ही नहीं
3:56 बिना जाने समझे पूजा पाठ करतेकरते यह स्थिति आ गई कि अब एक पीढ़ी खड़ी हो गई है जो किसी भी तरह की पूजा कोई पाठ कोई जप करना ही नहीं चाहती और हम उनको दोष नहीं दे सकते क्योंकि उन्होंने अपने घर में यही देखा है मां-बाप को दादा-दादी नाना नानी को कि ये बिना जाने समझे कुछ भी करते रहते हैं बस ऐसे ही खड़े हो जाते हैं। करना है ऐसा है वैसा है। घंटी बजा रहे हैं और साथ में इधर देख रही है कि बहू क्या कर रही है। ये करते हो नहीं करते हो? इधर घंटी बज रही है। वहां कुकर ने सीटी मार दी तो देख तुम किसको बेवकूफ बना रहे हो? वहां वो छोटू खड़ा हुआ है। अब वो जिंदगी में कभी घंटी नहीं बजाएगा। क्योंकि उसने देख लिया ये क्या है?
4:43 एक पूरी पीढ़ी को अधार्मिक बना डाला हमने। करा है कि नहीं करा है? बोलिए ना। धर्म से ज्यादा मुक्तिप्रद कुछ नहीं और धर्म से बड़ा बंधन भी कुछ नहीं। खेद की बात है कि हमने धर्म को बंधन ही बना डाला। जीवन ही पूरा यज्ञ होना चाहिए। वो जो आप आहुति दे रहे हैं वह स्वयं की देनी है।
5:29 और वो जो ज्वालाएं हैं सब उनका काम है कि आपने जो कुछ आहुति में दिया हो उसको उठा के ऊपर पहुंचा देना। यह प्रतीकात्मक है। खुद को किसी ऐसी जगह झोंक दो जो तुम्हें उठा के सीधे आसमान से मिला दे। यह है यज्ञ का वास्तविक अर्थ। समझ में आ रही है बात? नहीं लकड़ी जलानी होती है और यज्ञ से जो धुआं निकलता है उससे हवा शुद्ध हो जाती है। कैसी बातें कर रहे हो? ऐसे इतना प्रदूषण है। तुम लकड़ी जलाओगे उससे हवा शुद्ध हो जाएगी। क्या है यह? अभी यह जब वीडियो प्रकाशित होगा देखिएगा।
6:15 अरे जब तुम कुछ जानते नहीं तो इतना बोल क्यों रहे हो? जाओ पहले हमारे पुरातन विज्ञान की कुछ जानकारी लेकर के आओ। ये सब वो बता रहे हैं कि लकड़ी जलाने से हवा शुद्ध हो जाएगी। अरे तुझे आचार्य किसने बना दिया? जब तू हमारी पुरानी स्वर्णिम संस्कृति के बारे में कुछ जानता ही नहीं है। और फिर मिस्टिकल महागुरु भी तो हैं। वो बताएंगे देयर इज एन एंशिएंट साइंस। [हंसी]
7:04 हो गया खत्म देखो उन्होंने बोला था एंशिएंट साइंस है अरे वो एंशिएंट साइंस नहीं है वो सीधासीधा एक प्रतीक है भूलना नहीं है कि सारी बात किसकी हो रही है अपनी अहम की हो रही है वही परेशान है वही दुखी है उसी से राहत चाहिए उसी का समर्पण करने की सारी बात है। पहले मैंने तुझे वह सब कुछ दिया जो मुझे व्यर्थ ही प्रिय था। जो मुझे व्यर्थ ही प्रिय वही मेरा बंधन है। दिया स्वाहा और अंततः मैंने स्वयं को भी दिया स्वाहा।
7:51 यह यज्ञ है। ऐसे ही आगे और समझ लीजिएगा कि पूजन का, नमन का इनका क्या अर्थ है? मूर्ति का क्या अर्थ है। यह सब जाने बिना अगर आप मंदिर जा रहे हैं तो लाभ नहीं होगा। और मंदिर बहुत लाभ की जगह हो सकती है। अगर उसको रूढ़ की जगह ना बना दिया जाए। सबसे पहले तो यह समझना होगा कि उपनिषद किसी ब्रह्म की स्तुति के लिए नहीं रचे गए। वो आपके लाभ के लिए रचे गए। इतनी सी बात अगर पकड़ ली तो उपनिषदों को समझने में बहुत सहायता मिलेगी।
8:39 ब्रह्म की स्तुति के लिए नहीं रचे गए हैं। ये आपके लाभ के लिए रचे गए हैं। समझ रहे हो? इनका लाभ इतिहास में इंसान को बहुत कम मिला है और इसीलिए कम मिला है क्योंकि हमें इनको कभी पढ़ना आया ही नहीं। हम जानते ही नहीं है कि उपनिषदों को पढ़ना कैसे है। हम उपनिषदों को ऐसे पढ़ते हैं जैसे किसी दूसरे की कहानी हो। जैसे कि इनकी विषय वस्तु कोई ब्रह्म, सत्य, आत्मा इत्यादि हो। आप किसी से भी पूछिएगा कि उपनिषद की विषय वस्तु सब्जेक्ट मैटर क्या है?
9:27 कोई नहीं मिलेगा जो आपसे कहे कि उपनिषद की विषय वस्तु है तुम्हारा जीवन। तुम हो उपनिषदों के केंद्र में। आपसे बताया जाएगा कि उपनिषद तो ब्रह्म विद्या के भंडार हैं। और जहां आपसे कह दिया गया कि उपनिषद ब्रह्म विद्या के भंडार हैं। तहां आपका उनसे रिश्ता जरा दूरी का हो गया। होगी भाई कोई ब्रह्म विद्या वो हमारी जिंदगी के केंद्र पर तो नहीं हो सकती ना। क्योंकि अपनी जिंदगी के केंद्र पर तो मैं स्वयं बैठा हूं ना। ब्रह्म विद्या अगर महत्वपूर्ण भी है तो किसके लिए? मेरे लिए। तो यह बात तो निर्विवाद है कि किसी भी व्यक्ति, किसी भी जीव के लिए सर्वोच्च महत्व किसका होता है? अपना खुद
10:15 का। जब आपके लिए सबसे ज्यादा महत्व आपका खुद का है तो उपनिषद भी भाई आपके ही बारे में है। तुमने अपनी सच्चाई को अपनी प्रकृति के नीचे छुपा रखा है। जब तुम यह जानते हो तब तुम ब्रह्म हो। जब तुम यह नहीं जानते तब तुम प्रकृति से जुड़े हुए बस एक जीव हो। तुमने अपनी सच्चाई को अपनी प्रकृति माने अपनी दुनिया के नीचे छुपा रखा है।
11:00 जो यह बात जान गया वो वही ब्रह्म हो गया जिसकी बात इस श्लोक में है कि ब्रह्म ने अपने आप को प्रकृति से नीचे छुपा रखा है। ब्रह्म ने थोड़ी छुपा रखा है। तुमने छुपा रखा है। क्योंकि बात ब्रह्म की है ही नहीं। ब्रह्म तो एक उपकरण है। एक विधि है। तुम्हें सत्य तक ले आने का क्योंकि परेशान तुम हो। उपनिषद ब्रह्म के लिए तो नहीं रचे गए ना। उपनिषद आपके लिए रचे गए हैं। उपनिषद आपकी परेशानी दूर करने के लिए रचे गए हैं। आपकी परेशानी दूर करने के लिए ब्रह्म का निर्माण किया गया है एक विधि के रूप में। वरना ब्रह्म है क्या? कुछ नहीं। उपनिषद खुद कहते हैं। ना रूप है ना रंग है ना आकार है। ना उसकी कल्पना कर सकते हो। ना उसका विचार कर सकते
11:46 हो। तो ब्रह्म तो कुछ है नहीं। ब्रह्म कुछ नहीं है पर आप बहुत कुछ हो और आप बहुत कुछ क्या हो? आप बहुत कुछ परेशान हो। आपकी परेशानी हटाने के लिए ब्रह्म आवश्यक है। ब्रह्म उस बिंदु का नाम है जहां आपकी परेशानियां मिट जाती हैं। और आप अपनी परेशानियों से कुछ यूं गुथे हुए हो। कि जहां आपकी परेशानियां मिटती है वहां आप भी मिटते हो। तो इसीलिए ब्रह्म का आना अहम के विलोप के साथ बताया जाता है। वास्तव में अहम का विलोप नहीं है। परेशानियों का, कष्टों का विलोप है। लेकिन हम अपने कष्टों से बिल्कुल एकाकार हो चुके हैं। तो कष्ट मिटे नहीं के हम भी साफ हो गए। हम भी साफ हो गए। मतलब हमारा
12:33 झूठ साफ हो गया। तो इसीलिए कहा जाता है कि सच तब मिलता है जब अहंकार मिट जाता है। समझ में आ रही है बात? वास्तव में सच किसी को नहीं चाहिए। हमें तो अपनी परेशानियों से मुक्ति चाहिए। ठीक ना बात? सच किसको चाहिए? हमें तो झूठ से आजादी चाहिए। लेकिन जब आपकी पूरी जिंदगी में झूठ रेशे रेशे में अंदर तक समा चुका हो तो झूठ से आजादी का फिर क्या मतलब होता है? इस जिंदगी से ही आजादी। ये जो मेरे पूरे ढर रहे हैं जिस केंद्र से मैं जी रहा हूं उससे ही आजादी। तभी तो तो फिर परेशानियों से मुक्ति का मतलब हो जाता है अहम माने मैं से मुक्ति। क्योंकि मैं जब तक हूं तो मेरी हस्ती का मतलब ही है एक परेशान हस्ती। परेशानी तो तभी हटेगी
13:21 जब मेरी हस्ती ही हट जाए। इसलिए कहा जाता है कि अहम का मिटना जरूरी है सच को पाने के लिए। वरना अहम को मिटाने की कोई जरूरत नहीं। अगर आपका अहम ऐसा हो कि उसमें परेशानी है ही नहीं तो काहे को हटाना है अहम को? लेकिन हमारा अहम परेशानियों से गु्थमग्था है। इसलिए अहम को हटाना पड़ता है। समझ में आ रही है? अध्यात्म अहम हटाने के लिए नहीं है। अध्यात्म क्या हटाने के लिए है? जमीन पर बात करिए। बिल्कुल। अध्यात्म आपकी कष्ट, पीड़ा, दुख, संताप, परेशानी हटाने के लिए है। बिल्कुल समझिए बात को। और वो अध्यात्म जो आपका दुख नहीं हटाता बिल्कुल बेकार। अभी छोड़िए। अध्यात्म की कोई जरूरत नहीं है इंसान को। अगर इंसान आंतरिक तौर पर विषाद में ना हो,
14:07 परेशान ना हो। इस बिंदु को बिल्कुल पकड़ कर रखना है। जब तक आप एक विनम्र तरीके से ऋषि के सामने नहीं बैठे ये कहते हुए कि मैं बहुत परेशान हूं। मुझे बचाओ तब तक उपनिषद आपको समझ में नहीं आएंगे। क्योंकि उपनिषद है ही उसके लिए जिसने सबसे पहले यह माना है कि वो परेशान है। कष्ट नहीं है तो उपनिषद काहे को चाहिए? कष्ट नहीं है तो उपनिषद का करोगे क्या बाबा? जाओ मस्त रहो अपनी दुनिया में। समझ में आ रही है बात? तो आपको आपके बारे में यहां क्या बताया गया? ब्रह्म के बारे में नहीं। आपके बारे में यहां पे अभी-अभी क्या बताया गया? तुमने अपनी सच्चाई को अपनी इस झाड़ झंखाड़
14:55 भड़ी दुनिया के नीचे छुपा दिया है। जैसे ब्रह्म स्वरचित जाले में छुप जाता है। ये दुनिया तुमने ही रची है। ये बात इल्जाम के तौर पर नहीं कही जा रही है। यह बात आपकी उम्मीद के तौर पर कही जा रही है। मुझसे कहते हैं लोग कहते हैं हम आपको कोई भी अपनी तकलीफ बताते हैं। आप तो हम ही पर इल्जाम लगा देते हो। यू आर द डिजीज कि तुम अपना कष्ट स्वयं हो। मैं कहता हूं यह बात मैं इल्जाम के तौर पर नहीं बोल रहा हूं। यह बात मैं तुम्हारी उम्मीद जगाने के लिए बोल रहा हूं। नहीं समझ में आ रही बात? मैं तुमसे कह रहा हूं कि बेटा यह तुमने ही रची है पूरी समस्या और अगर तुम रच सकते हो
15:43 तो हटाना भी तुम्हारे ही हाथ में है। अब बताओ ये जो मैं बात बोल रहा हूं ये आक्षेप की है। इल्जाम की है या सशक्तिकरण की है? मैं आपके हाथ में ताकत दे रहा हूं। मैं कह रहा हूं ये तुम्हारी दुनिया है। ये जाल तुमने रचा है। और तुमने रचा है तो तुम रचने से बाज भी आ सकते हो ना। अगर तुमने रचा है तो तुम काट भी सकते हो ना? और काटने की जरूरत नहीं है। बस जो रचने की प्रक्रिया है उसमें अपने आप को निवेशित करना बंद करो। माने सीधी बात और रचना बंद करो। यह जो तुम रचना करे ही जा रहे हो जालों की अपने लिए बस उसको बंद कर दो। तुम्हें और
16:30 बहुत कुछ नहीं करना है। जो पुराने जाले हैं काट लेंगे अपन उनको। लेकिन ऐसे का क्या करें जो अपनी सारी ऊर्जा पुराने जालों को काटने की अपेक्षा नए जालों को बनाने में लगा रहा हो। तो पहली बात मेरी ये रहती है अपने लिए नए जाल बुनना बंद करो। फिर पुराने जालों का काम तमाम किया जाएगा। प्रकृति माने वह सब कुछ जो तुमको दिखाई देता है अपनी इंद्रियों से जिसका अनुभव कर सकते हो, सोच सकते हो, स्मरण कर सकते हो सब कुछ प्रकृति है। मन की विषय वस्तु प्रकृति है। मन स्वयं भी प्रकृति है। दृश्य और दृष्टा दोनों प्रकृति है। प्रकृति समझ गए? प्रकृति को
17:16 ये नहीं सोचना है कि पहाड़ पे जो पेड़ है और उस पे जो कौवा बैठा है उसको प्रकृति बोलते हैं। आप जो अपनी गाड़ी में बैठे हुए हैं वह सब भी प्रकृति का ही खेल चल रहा है। समझ में आ रही है बात? आपने सुपर कंप्यूटर बना दिया वो भी प्रकृति ही है। क्योंकि वो कहां से निकला? मस्तिष्क से निकला है। मस्तिष्क क्या है? प्रकृति है। और जो आपके सामने चीज रखी हुई है वो भी क्या है? वो विचार का विषय है। वो आदमी ने बनाई है। वो प्रकृत नहीं है। वो मानव कृत है। समझ में आ रही है बात? तो यह सब कुछ प्रकृति का ही हिस्सा है। दो तरह की प्रकृति है। एक वह जो आपने नहीं बनाई और एक वो जो आपने बनाई पर आपने भी
18:02 बनाई तो आपको किसने बनाया? प्रकृति ने। तो मानव कृत जो है वो भी सब प्रकृति ही है। ये स्पष्ट हो रहा है। सब कुछ प्रकृति है। ये आपने रचा है और आप इसी में फंसे हुए हो। उपनिषद सीधे-सीधे कह रहे हैं बेटा यह झमेला तुमने खड़ा करा है। आज की भाषा में कहें तो यह रायता तुमने फैलाया है और साफ भी तुम ही करोगे। और जब वो कह रहे हैं तुमने फैलाया है तो वो तुम्हें ताकत दे रहे हैं, हौसला दे रहे हैं कि तुम इतने ताकतवर हो कि तुमने इतना बड़ा रायता फैला दिया। तुम अपने आप को कमजोर क्यों समझते हो?
18:48 तुम अपनी करतूत देखो। तुम कोई छोटे-मोटे कलाकार हो। तुमने पूरी पृथ्वी खा ली। तुमने दुनिया तबाह कर दी। तुम इतने ताकतवर हो। और एक बार तुमको दिखाई दे गया कि ये सब करा तो तुम ही ने है। फिर तुम कहते हो अगर फैला सकता हूं तो समेट भी सकता हूं। नियत पलटने की बात है। पलट दो नियत। नियत पलटने को उपनिषद बार-बार चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं पलटो ना नियत अहम कि जिस दिन नियत पलट गई उस दिन वो भ्रम है। नियत पलटने का खेल है सारा। तुम चाह क्या रहे हो? हम
19:35 ये जाला तुम पर किसी ने बाहर से नहीं फेंका। ये तुम्हारे पेट से निकला है। जैसे मकड़े के पेट से जाल निकलता है वैसे ही सब कुछ तुम्हारे पेट से निकला है। तुम्हारे पेट से ही जो कुछ निकल रहा है वही तुम्हारा मकड़ जाल है। अपने पेट की वृत्तियों पर जरा काबू करो। ब्रह मैं फिर कह रहा हूं। ब्रह्म क्या है? विधि मात्र है उपनिषदों की सारे ज्ञान की सब ऋषियों की सारी बात किसके बारे में है उनका उनका सरोकार किससे है
20:21 आपकी तकलीफ से उपनिषद आपकी तकलीफ मिटाने को रचे गए हैं आप दुख में नहीं होते ऋषियों को कुछ नहीं पड़ी थी इतनी बातें करने की समझ में आ रही है तो कोई भी बात ऐसे नहीं पढ़ लेनी है किसी भी आध्यात्मिक ग्रंथ की कि जैसे वो बात किसी दूसरे के बारे में हो। जैसे वो बात किसी सिद्धांत के बारे में हो। एक-एक बात किसके बारे में है? कहीं आप पढ़ रहे हैं कुछ और उसमें लिखा हुआ है द ईगो। उसको द ईगो मत पढ़ लेना। ऐसा लगेगा कि पड़ोसी की ईगो की बात हो रही है। समझ रहे हो बात को? वो वो प्रॉपर नाउन है।
21:09 वो आपके अहम की बात हो रही है। उसको अपनी जिंदगी के आईने में नहीं देखोगे तो कोई लाभ नहीं होगा। बस फूल और जाओगे कि मैं ज्ञानी हो गया हूं। आज मैंने 18 पन्ने और पढ़ लिए किताब के। समझ में आई बात? मैं परमात्मा कौन है? तुम्हारी असलियत। तुम्हारी असलियत। लेकिन यह सब मकड़जाल रचा किसने है? तुमने। कौन आएगा तुमको प्रेरित करने? तुमको अनुप्राणित करने कि छोड़ दो ये सब।
21:55 जो तुम हो उसी की याद उसकी याद आती कैसे है जानते हो विरह बनकर वियोग बनकर शब्द को पकड़ना दुख बनकर ये जो एक-एक कष्ट हमें सताता है यह वास्तव में हमें हमारी ही याद दिलाने के लिए है। भले आपको याद आए ना आए वो आपकी करतूत है। आपको जो भी चीज मानसिक तौर पर कष्ट दे रही है जानते हो क्यों दे रही है वो तुमको ये बता रही है कि तुमको ऐसा होना नहीं था तुम ऐसे हो क्यों गए तुम्हारी सच्चाई कुछ और है। दुख का मतलब ही यही होता है ना कुछ ऐसा हो गया जो होना नहीं था। दुख का मतलब
22:43 ही यही है कि तुम दूर हो। किससे दूर हो? भ्रम से नहीं। तुम स्वयं से दूर हो। उसी तुम्हारी सच्चाई का नाम ही तो ब्रह्म है ना। आई एम आत्मा। ब्रह्म। यह आत्मा ही ब्रह्म है। तुम्हारी सच्चाई का ही नाम ब्रह्म है। और ब्रह्म ही तुमको जान देता है। अनुप्राणित करता है, उठाता है अपनी ओर आने के लिए। इसीलिए ब्रह्म से ही यहां प्रार्थना की जा रही है कि हे परमात्मा बचाओ। तुम्हें और कौन ऊर्जा देगा अपने बंधनों को काटने की? तुम्हारे दुख के अलावा। तुम्हारे दुख के अलावा कोई और ऊर्जा हो
23:30 नहीं सकती। अगर तुम उस दुख को दबाओ नहीं, छुपाओ नहीं। अगर तुम उस दुख की गहराई में पहुंच जाओ तो वो दुख ही तुम्हारे सारे जालों को सारे छोटे-छोटे दुखों को काट देगा। समझ में आ रही है बात? यही वजह है कि संतों ने विरह के वियोग के इतने गीत गाए हैं। तुम सोचते हो कि अरे बेचारे बड़े अभागे थे। उनको विरह हो रहा है, वियोग हो रहा है। वो रो रहे हैं और अपने आंसुओं की बात कर रहे हैं और बार-बार कह रहे हैं कि आन मिलो, आन मिलो। कहां हो राम?
24:17 और कृष्ण तुम्हारे लिए आंखें तरस गई। तुम सोचते हो कि बेचारों को बड़ी तकलीफ है। वो तकलीफ नहीं है। उनके साथ कुछ बहुत शुभ हो रहा है। क्योंकि वो दुख ही अब उनके दुखों को काट देगा। दूरी को काट देगा। आम आदमी को कोई होता है गृह वियोग कुछ नहीं होता। इसीलिए आम आदमी प्रकृति के जंजाल में ही उलझा रह जाता है। तुम्हें कोई तकलीफ होती ही नहीं है। इसीलिए तुम्हारे भीतर आग उठती ही नहीं है। तकलीफ से ही तो आग उठेगी ना। तुमने तो नई-नई चीजें बना ली है। एक्सेप्ट थिंग्स एज दे आर। रिमेन पीसफुल वेयरवर यू आर। तो आग काहे को उठेगी?
25:05 अभी मैं देख रहा था एक किसी की कहावत है चलती है कि इफ इट डजंट ब्रेक यू इट मेक्स यू स्ट्रंगर कुछ ऐसे है ना इफ इट डजंट ब्रेक यू इट मेक्स यू स्ट्रंगर अगर ये तुमको तोड़ ही नहीं देता तो तुमको मजबूत बनाता है। यह बात कोई बहुत गहरी नहीं है लेकिन फिर भी इसमें कुछ लाभ है। तो अभी किसी ने अपने Facebook पर या कहीं पर डाल रखा था। यही पोस्टर्स को काट रखा था। डाल के लिखा था कि नहीं बिल्कुल भी नहीं। जबरदस्ती दुख झेलने की कोई जरूरत नहीं है। हम ये सोच कर के दुख क्यों झेलें कि दिस विल मेक अ स्ट्रांगर। जहां कहीं भी
25:52 दुख से बचा जा सकता है हम तो बचेंगे। जहां कहीं भी सुख को पाया जा सकता है हम तो पाएंगे। हमें नहीं हमें नहीं होना स्ट्रंगर। ये आम आदमी है। समझ में आ रही है बात? और जब तुम ऐसे करने लग जाते हो तो तुम्हारी मर्जी तो चलनी है ना। तुम्हारी मर्जी चलने लगती है। तुम कहते हो कि मुझे दुख नहीं झेलना। दुख का अनुभव होना भी बंद हो जाता है। क्योंकि सब अनुभव किसकी मर्जी से चलते हैं? अनुभोक्ता की मर्जी से। एक्सपीरियंसर की मर्जी से। तुम अगर तय कर लो कि तुम्हें दर्द नहीं
26:38 झेलना है तुम पेन किलर ले लोगे। एक्सपीरियंस होना बंद हो जाएगा। तुम्हारी मर्जी। और यह बहुत मनहूस चीज है जो हमारे साथ हो जाती है क्योंकि दूरी बनी हुई है, बीमारी बनी हुई है लेकिन दुख का अनुभव होना बंद हो गया है। प्रकृति में भी कहीं पर तुमको जब दर्द होता है, हाथ में दर्द होता है वो काहे को होता है? प्रकृति ने ये दर्द की व्यवस्था क्यों करी है? प्रकृति ने दर्द की व्यवस्था क्यों करी है? ताकि तुम स्वस्थ हो सको। तुम्हारे अगर कहीं पर हड्डी टूट गई है। तुम्हारा जबरदस्त दर्द होता है। वो दर्द क्यों होता है? ताकि तुम उस जगह पर विशेष ध्यान देकर उसका उपचार कर सको और फिर से स्वस्थ हो
27:25 जाओ। वो जगह फिर से जुड़ जाए। दर्द का उपयोग ही यही है इस पूरी व्यवस्था में कि आप स्वस्थ हो सको। प्रकृति ने भी दर्द का निर्माण इसीलिए किया है ताकि आप स्वस्थ हो सको। और मानसिक तौर पर भी आपको दुख इसीलिए आता है ताकि आप मानसिक तौर पर स्वस्थ हो सको। प्रकृति आपके साथ जो कुछ भी करती है वो वास्तव में आपको किसी ना किसी तरीके से स्वस्थ करने के लिए करती है। आपको बहुत चोट लग जाती है। आप बेहोश हो जाते हो। जानते हो प्रकृति आपको बेहोश क्यों कर देती है? आप हो नहीं गए हो। ये प्रकृति की व्यवस्था है कि आप बेहोश हो जाओ। प्रकृति आपको बेहोश क्यों कर देती है? ताकि अब आप हाथपांव नहीं चलाओ। क्योंकि अब
28:12 आप जो भी करोगे गड़बड़ ही करोगे। आप इस लायक नहीं हो कि आप कुछ अपनी भलाई कर सको। तो प्रकृति आपको बेहोश कर देती है ताकि आपकी हीलिंग अब प्रकृति अपने तौर पर शुरू कर सके। आप बेहोश हो जाओ। क्योंकि आपको बहुत चोट लगी है। आप सदमे में हो और आप दर्द में हो। अब आप क्या करने वाले हो? आप कुछ उल्टा पुल्टा उपद्रव करोगे। तो प्रकृति कहती है नहीं तुम गिर जाओ। तुम बेहोश हो जाओ। अब तुम सो गए हो। अब मैं तुम्हारा इलाज करूंगी। और जब आप बेहोश होते हो तो आपका इलाज होता है होता है। और फिर छ सात घंटे बाद प्रकृति आपको दोबारा होश में ले आ देती है। ठीक वैसे जैसा अस्पताल में सर्जरी में होता है। यही किया जाता है ना वो आपको बेहोश कर दिया जाता है। फिर आपका प्रोसीजर होता है और फिर आपको दोबारा होश दे दिया जाता है। प्रकृति भी यही करती है। वो जो भी कर रही है वो
28:59 आपको बेहोशी भी इसलिए देती है ताकि आपका उपचार हो सके। लेकिन हम बड़े सुरमा हैं। हम हैप्पीनेस के पुजारी हैं। हम कहते हैं नहीं किसी भी तरीके से दर्द को तो हटाना है। मिटाना नहीं है। सिर्फ हटाना है। कहां से हटाना है? आंख के सामने से हटाना है। मिटाना नहीं है। आंख के सामने से हटाना है। बना रहे दिखे नहीं। ये दो बहुत अलग-अलग बातें हैं। दर्द को मिटाना। दर्द को मिटाने का काम आध्यात्मिक आदमी का है और दर्द को हटाने का काम साधारण संसारी का है। वो मौजूद है दर्द का कारण। बस मैं उसकी ओर देखना नहीं चाहता क्योंकि देखूंगा
29:44 तो तकलीफ होगी और नहीं देखूंगा। समझ में आ रही है बात? तो दुख से बड़ा कोई दोस्त नहीं है आपका। और उसी दुख के लिए यहां पर परमात्मा से प्रार्थना की जा रही है। उससे कहा जा रहा है कि तुम ही मुझे मुक्ति दो। मेरा उद्धार करो। मुझे एकत्व प्रदान करो। एकत्व समझते हो क्या है? तुम यहां हो, मैं यहां हूं, मैं छिटक आया हूं। तुम केंद्र पर हो, मैं आगे निकल आया हूं। मैं प्रकृति के जंजाल में फंस गया हूं। एकत्व माने स्वयं से एकत्व। मुझे स्वयं से मिला लो। और वो मिलाने को तैयार है। तुम खुद से मिलने को तैयार हो। क्योंकि खुद से दूर होकर तुम वैसे ही परेशान हो। तुम्हारी परेशानी ही तुमको तुमसे मिलाएगी। वास्तव में योग या मुक्ति हम जिसको आप कह
30:33 दीजिए युक्ति। युक्ति माने मिल जाना या मुक्ति। वो बिंदु ही वो है जहां आपकी सब झंझटें खत्म हो जाए। समाधि वो बिंदु ही है जहां आपकी सब समस्याओं का समाधान हो जाए। तो केंद्र पर भूलिएगा नहीं। आपकी समस्याएं हैं। मुझे बड़ा विचित्र सा लगता है जैसे कल हो रहा था कि हम बातें करनी शुरू कर देते हैं। इसने ऐसा बोला, उसने ऐसा बोला और कृष्णमूर्ति ऐसा बोलते हैं। तुम कहां हो उसमें? तुम ऐसे पढ़ते हो जैसे किसी और ग्रह के किसी एलियन की बात हो रही हो। खुद को बिल्कुल ही भूल गए। वो मनोरंजन के लिए बातें। तो फिर मैंने एकदम
31:20 ऊबकर अंत में कहा था कि भाई वह आलू वाली की भी बात कर लोगे जो तुम्हारी वास्तविक समस्या है। जमीन की बात तो हम कभी करते ही नहीं है। हम बिल्कुल ऐसे हवाई बातें करते हैं। तो कुल समस्या जबकि यही होगी बस कि वो सामने बैठ के आलू बेच रही है। और दिमाग उसी में लगा रहता है सारा। लेकिन कोई आकर बताएगा नहीं कि असली बात यह है। बातें ऐसी होंगी कि वो ऐसा होता है ना जब मैं ऑब्जर्वर को देखता हूं तो ऑब्जर्व ऑब्जर्व जो है वो 5 डिग्री इधर हो जाता है और फिर कृष्णमूर्ति बोलते हैं कि ऐसा वैसा तुमसे ही बोल रहा हूं क्योंकि तुम इन झंझटों में बहुत फंसे हो और अभी तो उबासियां मार रहे हो। ये क्या है? चेतना के केंद्र पर बैठी क्या चीज हुई है?
32:08 क्या चीज बैठी हुई है? आलू वाली और बात इधर की, उधर की पता नहीं क्या-क्या बातें हो रही हैं। व्यर्थ एकदम हमारी चेतना कैसी है? ये देखना हो तो कहीं किसी चौराहे पर खड़े हो जाओ, लोगों का आना-जाना देख लो, किसी शॉपिंग मॉल पर खड़े हो जाओ। या कोई सोशल मीडिया ऐप खोल लो ना। वो भी रात में खोलना 34 बजे वो अपनी स्ट्रीम बदल देते हैं। वो जो आपको फीड दे रहे हैं वह दिन में अलग आती है। रात में अलग आती है। रात में खोलना 3:00 बजे तो जो मानवता का एक एक सम्मिलित चेहरा है एक कलेक्टिव फेस उससे परिचित हो जाओगे कि
32:55 हम कैसे लोग हैं। यह जितने सोशल मीडिया है रात में सब फॉरेन बन जाते हैं और दिन में वह बिल्कुल आपको दिखाएंगे कि देखिए मटर की सब्जी कैसे बनानी है और क्रिकेट मैच में क्या हो रहा था और ये सब चलेगा उसमें आप करेंगे और रात में देखो फिर कि उसमें क्या आता है ये हम हैं और हम ये बात नहीं करना चाहते क्यों क्योंकि मजा बहुत आता है ना यही रहने में और साथ ही साथ यह भी दिखाना है कि हम आध्यात्मिक हैं। तो आध्यात्मिक बातें कर लो, यह कर लो, वो कर लो और वो जो दूसरा कार्यक्रम है वो बगल
33:43 में पैरेलली अपना चल रहा है अनवरत। आचार्य जी प्रणाम। जैसा आपने कहा कि प्रकृति ही हमें उस दुख का अनुभव करवाती है। लेकिन जैसा कि अभी तक सुनते आ रहे हो कि प्रकृति की प्रकृति चाहती है प्रकृति चाहती नहीं कि हम अध्यात्म की ओर बढ़े। तो यह कैसे कि प्रकृति ही फंसाती है और प्रकृति ही हमें वह दिखाती भी कि हमें दर्द है। दोनों बातें हैं। इसीलिए प्रकृति मां भी है और माया भी है। दोनों है। तुम पर निर्भर करता है कि तुम उसका उपयोग
34:32 किस तरह से करते हो। प्रकृति ही बंधन है और प्रकृति में ही वह सारे संसाधन है जो तुम्हारे बंधनों को काटेंगे। संसार से मुक्ति का रास्ता संसार के बीचोंबीच गुजरता है। तुम पर निर्भर करता है कि प्रकृति तुम्हारे लिए क्या बन जाती है। इस दुनिया का तुम अपने लिए क्या इस्तेमाल कर लेते हो। जिन्हें इस्तेमाल नहीं करना आता है दुनिया उनके लिए नर्क है। जिन्हें इस्तेमाल करना आता है दुनिया उनके लिए एक जबरदस्त साधन है। वो दुनिया का ही इस्तेमाल करके दुनिया से ऊपर हो लेंगे। आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे
35:17 गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं। यहां पर बुद्ध हैं, गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले, मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े आचार्य प्रशांत ऐप [संगीत] पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस। ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित [संगीत] लाइव सत्र। हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद। गीता कम्युनिटी का एक्सेस, गीता परीक्षा, चयनित समाचार, ऑडियो बुक्स, कोड्स और भी बहुत कुछ। Google Play Ste या Apple App स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड
36:03 करें। [संगीत] hm [संगीत]