0:11 नमस्कार स्वागत है आपका संसद टीवी पर। मैं हूं मनोज वर्मा और आप देख रहे हैं हमारा खास कार्यक्रम मुद्दा आपका। आज हम बात करेंगे भारत और अमेरिका संबंधों की। इस मुद्दे पर बात इसलिए क्योंकि अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो चार दिवसीय भारत यात्रा पर हैं। भारत आए अमेरिका के विदेश मंत्री ने सेवा तीर्थ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान रक्षा, क्वाड, व्यापार, टेक्नोलॉजी समेत द्विपक्षीय हितों के सभी मुद्दों पर और पश्चिमी एशिया के मौजूदा हालात पर विचार विमर्श हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अमेरिकी विदेश मंत्री की इस बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उपस्थित थे।
0:57 अमेरिकी विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का संदेश दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिका यात्रा के लिए आमंत्रित किया। अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है? मुद्दा आपका में भारत और अमेरिका संबंधों को केंद्र में रखकर इसके विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे। दो खास मेहमान मेरे साथ जुड़े हुए हैं। फॉर्मर एंबेसडर प्रभु दयाल जी हमारे साथ जुड़े हैं। प्रभु जी बहुत-बहुत स्वागत है आपका संसद टीवी पर। साथ ही हम बात करेंगे प्रोफेसर राजीव नैन जी से जो नेशनल मंडेला शांति संघर्ष अध्ययन केंद्र जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर हैं। बहुत-बहुत स्वागत है आपका राजीव जी। लेकिन शुरुआत प्रभु जी मैं आपसे
1:43 करूंगा क्योंकि अमेरिकी विदेश मंत्री की जो यात्रा है वो ऐसे समय पर हो रही है जब पश्चिमी एशिया में तनाव का माहौल है और भारत की ओर दुनिया देख रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री की इस यात्रा को आप कैसे देखते हैं? यह यात्रा क्यों महत्वपूर्ण है? बरोच जी अपने शो में बुलाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। जैसा आपने कहा पश्चिमी एशिया में जो तनाव है वो खत्म होता नहीं नजर आ रहा है और इस तनाव से पूरी दुनिया को नुकसान हो रहा है। ऑयल एंड गैस सप्लाई थम गई है। अब हम हमारे देश को भारत को तो बहुत नुकसान है क्योंकि हम पश्चिमी एशिया से बहुत ज्यादा ऑयल एंड गैस इंपोर्ट करते
2:28 हैं। जी। इसके अलावा देखिए जो अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते हैं उनमें बहुत खटास आ गई थी। जब से ट्रंप साहब अपने सेकंड टर्म में राष्ट्रपति बने उन्होंने एक के बाद एक ऐसे कदम उठाए जिससे भारत में बहुत नाराजगी हुई। सबसे पहले तो उन्होंने हमारे एक्सपोर्ट्स पे 25% टेफ लगा दिया। फिर क्योंकि हम रशिया से तेल खरीद रहे थे। हमारे रशियन ऑयल परचेजेस की वजह से हम पर 25% और टेरिफ लगा दिया। इसके अलावा जब हमने पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर छेड़ा क्योंकि पाकिस्तान ने हमारे ऊपर टेरर अटैक किया था पहलगाम में तो ट्रंप साहब ने ये ऐलान किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच
3:17 में उन्होंने मध्यस्थता की और इस वजह से युद्ध रुका। हालांकि भारत ने बार-बार ये कहा कि हम आपने कोई मध्यस्थता नहीं कही। पाकिस्तान ने आके खुद हमसे दरख्वास्त की कि आप ये लड़ाई खत्म करें। हम आपसे पीस चाहते हैं, शांति चाहते हैं। लेकिन ट्रंप साहब अपनी बात कहते रहे। बार-बार उन्होंने कहा कि हमने की इससे भारत में बड़ी नाराजगी हुई। इसके अलावा ट्रंप साहब की कुछ ऐसी पॉलिसीज है वीजा एंड इमीग्रेशन को लेके जिनसे भारतीय नागरिकों को बहुत नुकसान हुआ। जैसे उनकी एच वन बी वीजा पॉलिसी है। उन्होंने कुछ ऐसी कंडीशन लगा दी जिससे हमारे लोगों को अमेरिका जाना मुश्किल हो गया। और एच वन बी वीजा के सबसे ज्यादा एपिकेंट्स भारत से होते थे। तो
4:03 ऐसे सब कारण हुए जिनकी वजह से बहुत ज्यादा खटास आती गई रिश्तों में और जो मार्को रुडी है वो इस वक्त आए हैं क्योंकि अमेरिका चाहता है कि ये रिश्ते अच्छे हो देखिए अमेरिका को ये जो पश्चिमी एशिया का युद्ध है ये बहुत भारी पड़ रहा है इस पर बहुत ज्यादा खर्चा हुआ है वहां पर बहुत उनका ट्रंप साहब का विरोध हो रहा है और अमेरिका ने ये सोचा था कि हम इसको जल्दी से जीत लेंगे। ईरान में रिजीम चेंज कर देंगे। ईरान घुटने टेक देगा। ऐसा तो कुछ हुआ नहीं। अब वो वहां फस गए। उन्होंने चाइना के साथ बातचीत करने की कोशिश कही। बड़ी धूमधाम से वहां गए। उनका रिसेप्शन हुआ। लेकिन नतीजा कुछ लिखना नहीं। चीन अभी भी अपनी वैसी पॉलिसी बनाया जो
4:48 अमेरिका के लिए खतरा पैदा कर। जैसे जो वो इंडोपसिफिक में अमेरिका चाहता है कि सप्लाई चे बनी रहे और इंडोपसिफिक में एक सिक्योर एरिया बना रहे मैरिटाइम ट्रैफिक के लिए वो चीन उसके लिए खतरा है और चीन कोई भी अमेरिका की बात मानने को तैयार नहीं तो उस वक्त लग रहा था जब ये चीन गए कि ये कॉर्ड का कोई इंटरेस्ट नहीं है। अब इनको बार-बार ये लगा कि कॉर्ड तो इनके लिए जरूरी है और भारत की तरफ इन्होंने दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया। जाहिर सी बात है जाहिर सी बात है प्रभु जी क्वाड की बैठक दिल्ली में हो रही है। विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में है। एक महत्वपूर्ण बैठक जिसे कह सकते हैं कि दिल्ली में जो वैश्विक परिस्थितियां हैं उसके मद्देनजर दिल्ली की बैठक को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
5:35 जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका के विदेश मंत्री इस बैठक में भाग लेने वाले हैं। लेकिन महत्वपूर्ण पहलू इस बैठक का यह है जो आपने प्रभु जी बात कही कि अमेरिका भारत के संबंधों में खटास। यह खटास अमकी फैसलों के कारण अगर पैदा हुई तो हुई। भारत ने कोई उसका उत्तर उस तरह से नहीं दिया क्योंकि भारत ने हमेशा अमेरिका के साथ अपने संबंधों को मजबूती के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की है। संबंधों को मधुर बनाने की कोशिश की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने और उसी का परिणाम है कि अमेरिका के विदेश मंत्री भारत आए हैं और भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले और उस मुलाकात के बाद राजीव जी जो उनका वक्तव्यव आया वो यह आया कि भारत के साथ संबंधों को अमेरिका की हिंद प्रशांत रणनीति का सबसे
6:22 महत्वपूर्ण आधार बताया जो अमेरिका के विदेश मंत्री हैं उन्होंने। इसको आप कैसे देखते हैं? देखिए बिल्कुल उन्होंने सही कहा देखिए ठीक है जब दो राष्ट्र मिलते हैं तो उनके अपनेप हित होते हैं और उनके हित साधन साधने का एक अलग-अलग एक तरीका होता है। देखिए ट्रंप के पूर्व के जो राष्ट्रपति थे चाहे ट्रंप भी जो पहले बार आए थे तो उन्होंने इस संबंध को एक अलग दिशा देने की कोशिश की। इस बार उन्होंने उतनी उनका एक रास्ता कुछ अलग था। फिर भी कुछ मूलभूत जो तत्व होते हैं किसी भी रिश्ते के वो अभी भी माना जाता है कि कायम है और उसमें से एक है जो अभी आपने बात कहा हिंद प्रशांत जो क्षेत्र है उसमें दोनों देशों के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता
7:09 और ठीक है जो भी अभी गए हैं वो चीन गए चीन के साथ जो बातें आई सब सर्वविदित है सब जग जाहिर है कि बहुत ज्यादा सफलता उन्हें मिली नहीं और ट्रंप को वहां के राजा राष्ट्रपति ने वहां पर उन्हें आईना दिखा दिया कि आप है क्या आप और हम अपने हितों के लिए करेंगे तो हम अपने हितों के लिए साधने के लिए हम कुछ भी कर सकते हैं वो एक तरह से चीन ने उन्हें बता दिया तो ये तो सत्य है लेकिन भारत और अमेरिका के जो आधारशिला संबंध की है वो बहुत ही धीरे-धीरे आगे बढ़ती गई है और उसे एक बार झटके में ट्रंप के कुछ नीतियों के चलते बिखर नहीं सकती
7:55 है। यह बात भी इस वक्त क्वाड में आने के बाद साबित हो गई है कि अभी भी चारों देश जो है मिलकर एक बड़ा ही सर्वव्यापी एक नीति का निर्माण जो करने का जो संकल्प चारों राष्ट्रों के बीच था और भारत और अमेरिका में विशेष करके था वो अभी भी कायम है और उसके लिए देखिए अभी हमारे सुरक्षा की अगर हम बात करें तो अमेरिका के साथ अभी भी हमारे सुरक्षा के कई आयाम है जो कि हम साथ मिलके काम करते दोनों राष्ट्रों के बीच में देखिए कई डायलॉग चले हुए हैं। उसमें मंत्री स्तर के डायलॉग से लेकर जो हमारे आर्म फर्सेस के लोग हैं उनका डायलॉग है। इंडस्ट्री का डायलॉग चलता है। वहां पर प्रोक्योरमेंट पॉलिसी कैसे हो उसके लिए भी
8:41 डायलॉग चलता है। एडवांस टेक्नोलॉजी के भी दोनों के देशों के बीच में कैसे-कैसे हम एक नई दिशा दे सकते हैं। केवल बाजार भारत ना बनकर एक आरएडी का भी रिसर्च एंड डेवलपमेंट का भी एक उपयोगिता दोनों देशों के बीच विन विभिन्न सिचुएशन लाई जा सकती है। यह भी उपयोगी दोनों देश मानते हैं। बट देखिए यहां पर एक समय ऐसा था आज से 20 साल 21 साल पहले तक कि अमेरिका के लैबोरेटरीज में वहां के लोग कम होते थे और चीन और इजराइल के लोग ज्यादा होते थे। यहूदी कहिए, इजराइल कहिए, यहूदी कहिए। लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि चीन के स्थान पर भारत की जो हमारी जनसंख्या है, हमारा जो पपुलेशन डिविडेंड है, उसकी उपयोगिता हो सकती है। तो उसे हम कैसे आरएडी में कैसे
9:27 लाए और सुरक्षा में भी लाया गया और बाकी क्षेत्रों में भी इस बार बात पर बल दिया गया। तो यह विनविन सिचुएशन दोनों देश के बीच था। तो वो देखिए अभी भी वह कायम है। ट्रंप की कुछ अपने वक्तव्यों से वो इस आधारशिला को समाप्त नहीं किया जा सकता है। उसके साथ-साथ अगर देखेंगे राजनीतिक क्षेत्र में भी तो देखिए दोनों जनतांत्रिक देश है। ठीक है? बहुत समय तक इन्हें स्ट्रेंज डेमोक्रेसी कहा जाता था। लेकिन है डेमोक्रेसी में तो मतभेद आते ही हैं। मतभेद भी आए लेकिन उसके साथ-साथ एक कंसेंसस बिल्डिंग एक बातों को आगे ले चलने की परंपरा जो होती है उस परंपरा को भी दोनों देशों ने अच्छे खासे तरीके से निभाया और काफी इसमें एक एक कहेंगे कि इसमें सफलता भी हासिल की और अभी हम पा रहे
10:15 हैं कि देखिए अभी सांस्कृतिक क्षेत्र से सुरक्षित शिक्षा के क्षेत्र में देखिए शिक्षा के क्षेत्र में इतनी बड़े पैमाने पर हमारे भारत से छात्र वहां जा रहे हैं। मैं वहां फुल ब्राइट में गया था। उस समय भी चाइना आगे था। लेकिन आज के दिन में हमने चीन को बहुत पीछे छोड़ दिया। तो हम हर एक क्षेत्र में शिक्षा का क्षेत्र कहिए, सुरक्षा का क्षेत्र कहिए, राजनीतिक क्षेत्र कहिए, हर क्षेत्र में हम दोनों की एक एक कॉम्प्लीमेंटेरिटी बनी हुई है। उस कॉम्प्लीमेंटेरिटी का यह परिचायक है कि इन सारी चीजों के बावजूद इन सारी विषम विषम परिस्थितियों के बावजूद दोनों राष्ट्र एक साथ कार्य करने को अभी भी संकट है। जी जाहिर सी बात है अमेरिकी विदेश मंत्री का प्रधानमंत्री
11:01 नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात करना और बैठक में डिफेंस टेक्नोलॉजी और व्यापार जैसे मुद्दों पर चर्चा होना ये दिखाता है कि दोनों देश कहीं ना कहीं इन मुद्दों पर एक साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। दरअसल मजबूत भारत और मजबूत अमेरिका दोनों ही वैश्विक स्थिरता के लिए जरूरी हैं। एक बड़ा मुद्दा मैं प्रभु जी आपसे समझना चाहता हूं इस मुद्दे को क्योंकि मजबूत भारत और मजबूत अमेरिका दोनों ही वैश्विक स्तर के स्तिरता के लिए जरूरी है। इसके पीछे आप वजह क्या देखते हैं? क्यों ये जो मुद्दा है वो महत्वपूर्ण हो जाता है वैश्विक संदर्भों में? देखिए अमेरिका और भारत दोनों सबसे बड़ी डेमोक्रेसी है। अमेरिका दुनिया की सबसे
11:48 पुरानी डेमोक्रेसी है। हम इस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी हम मल्टीेशियल है। मल्टी एथनिक है। मल्टीलिंगल है। मैं तो न्यूयॉर्क में चार चार काउंसिल जनरल था। मैंने देखा कि हमारे दोनों देशों के बीच में कितनी कॉमनैलिटीज है। कितने ऐसे कॉमन इंटरेस्ट लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि ट्रंप साहब की नीतियों से हमारे बटरल रिलेशंस को नुकसान पहुंचाए। लेकिन अमेरिका के कुछ ऐसे इंटरेस्ट है जो चाहते हैं कि यह रिश्ते फिर मजबूत होते जाए और उनमें से सबसे बड़ा जो सेक्टर है वो डिफेंस प्रोडक्शन सेक्टर देखिए अमेरिका जो है वो दुनिया का सबसे बड़ा डिफेंस प्रोडक्ट एक्सपोर्टर है। भारत
12:37 सबसे बड़ा इंपोर्टर है। तो एक कॉमन एरिया है जिसमें अमेरिका का डिफेंस प्रोडक्शन बेस चाहता है कि भारत के मार्केट में ज्यादा से ज्यादा अमेरिकन वेपनरी आए और वो नाराज है कि हम रशिया से क्यों लेते लेकिन डिफेंस इंडस्ट्री सेक्टर चाहता है कि हमारे पॉलिटिकल रिलेशंस अच्छे अगर पॉलिटिकल रिलेशन अच्छे नहीं होंगे तो डिफेंस एक्सपोर्ट्स कहां पॉसिबल है? आप उनहीं कंट्री से खरीदेंगे जहां से आपके रिश्ते अच्छे हैं और पिटिकली तंदुरुस्त है। तो डिफेंस प्रोडक्शन सेक्टर का ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन पे बहुत जोर रहा है कि आप रिश्ते दुरुस्त कीजिए। इसके अलावा देखिए अमेरिका में बाय एनलार्ज जो लोग हैं वो
13:23 चाहते हैं कि इंडिया में जो इतना बड़ा मार्केट है उसको अमेरिकन इंडस्ट्री पूरी तरह से यूटिलाइज कर सके और अगर ये टेररिफ्स एक दूसरे को नुकसान पहुंचाएंगे तो फिर कहां से अच्छा हो सकता है बटरल ट्रेड तो मेरे विचार में जो वहां पर मैन्युफैक्चरर्स हैं ट्रेडर्स हैं इकोनॉमिक लॉबी है ये चाहती है अब प्रोफेसर नारायण ने बिल्कुल सही कहा कि देखिए भारत से इतने ज्यादा स्टूडेंट्स जाते हैं। अमेरिकन यूनिवर्सिटीज को फायदा होता है। वो फ्री में नहीं जाते हैं। वो फीस भरते हैं। अमेरिकन यूनिवर्सिटी का बहुत फायदा होता है। लेकिन एक बात और अभी जो ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन की पॉलिसीज है उन्होंने डिरेज करना स्टूडेंट शुरू कर दिया है। ऐसी पॉलिसीज बनी है कि
14:10 स्टूडेंट्स के वेट टाइम इंटरव्यू के लिए वगैरह वगैरह ऐसे हो गए हैं जिनकी वजह से एक तरह से लग रहा है कि वो डिरेज कर रहे हैं फॉरेन स्टूडेंट्स को और वो ये कहते भी है कि हम नहीं चाहते कि हमारे यहां पॉलिटिकल एक्टिविटीज हो क्योंकि खासतौर पे जो मिडिल ईस्ट से जो स्टूडेंट्स गए हैं उन्होंने बहुत कभी-कभी दंगा फसाद किया है प्रो पैलेस्टाइन रैलीज वगैरह तो इसकी वजह से ओवरऑल जो स्टूडेंट्स की उनके रिलेटेड पॉलिसी है वो ऐसी हो गई है कि हमारे स्टूडेंट को नुकसान हुआ। फिर भी मार्को यूबियो की जो ये विजिट है ये रिश्तों को दुरुस्त करने की एक कोशिश है और ये बहुत महत्वपूर्ण बात है कि ट्रंप साहब ने वहां से कॉल किया और ये मैसेज दिया कि वो 100% इंडिया के साथ है और कोशिश करेंगे कि
14:56 रिश्ते अच्छे हो। ये संदेश अच्छा जाता है और ये इंडिकेट करता है कि चलिए रिश्ते खराब हो गए हो लेकिन उनको ठीक करने की पूरी तरह से अमेरिका भी कोशिश करेगा। जी। अह जाहिर तौर पर जो अमेरिकी राष्ट्रपति का संदेश लेकर अह अमेरिका के विदेश मंत्री भारत आए हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को जो डोनाल्ड ट्रंप का संदेश दिया है, अमेरिका आने का निमंत्रण दिया है। यह दिखाता है कि अमेरिका भी भारत के साथ अच्छे और मधुर रिश्ते रखना चाहता है। क्योंकि दोनों देशों के बीच जो व्यापार जो कारोबार जो अर्थव्यवस्था का मुद्दा है वो बेहद महत्वपूर्ण है। भारत और अमेरिका आने वाले वर्षों में 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। जाहिर तौर पे अमेरिका को भी जरूरत भारत की है और वैश्विक परिस्थिति
15:42 में भारत जिस तेजी के साथ उसकी अर्थव्यवस्था उसका रूप आकार बड़ा हो रहा है उसकी तेजी से गति आगे बढ़ रही है। वो अपने आप में दुनिया में बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था मानी जा रही है। मैं आपसे राजीव जी इस मुद्दे को समझना चाहता हूं क्योंकि अर्थव्यवस्था का मुद्दा है। अमेरिका के सामने भी चुनौतियां हैं और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ उसका आकार भी बढ़ रहा है और दुनिया में तेजी के साथ वो आगे बढ़ रही है। इस मुद्दे को आप कैसे देखते हैं? बिल्कुल देखिए भारत आज के दिन विश्व की चौथी बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर कर आई है और यह आर्थिक शक्ति जो बनी है उसके कई आयाम है देखिए ट्रेड ट्रेड पर उन्होंने जो सेंशंस लगाया वो तो एक पहलू है लेकिन एक सप्लाई चीन की जो एक सुरक्षा देने की
16:30 बात थी उसमें भारत की एक अच्छी खासी भूमिका देखिए ट्रंप वन के समय भी देखी गई थी जब वो चीन से व्यापार हटा रहे थे तो वह किधर जाते तो कहां जाते तो उसमें भारत की तरफ निश्चित ही एक स्वाभाविक दृष्टि आई थी और उसके बाद बातचीत हुई और काफी कुछ आगे बढ़ना शुरू किया था। काफी कन्वर्जेंस ऑफ इंटरेस्ट जो काफी कही गई हितों में आर्थिक हितों का भी आपस में एक समावेश पाया गया और वो उनके उनके जैसे सस्ते दाम पर जो उनके कॉम्पिटिटिव प्राइस पर हमारे यहां भी प्रोडक्शन काफी कुछ उन्हें मिलने शुरू हो गए। एक बड़ा बाजार भारत है और अमेरिका के कई सारे उत्पादों का यहां पर लोग
17:16 परचेस करते हैं। उनका क्रय करते हैं और उसके चलते अमेरिका को वहां भी फायदा है और देखिए एक कॉम्प्लीमेंटिटी बढ़ी थी। भारत ने भी वहां निवेश किया। ऐसा नहीं है कि वहां से केवल निवेश लाए गए थे और उनके लिए भी उन्होंने रोजगार के अवसर जिसके लिए कि आज के दिन में ट्रंप इतना चिल्ला रहे थे कि रोजगार का हमें रोजगार देना है। अनइंप्लॉयमेंट को देखना है। तो देखिए रोजगार के अवसर भी उन्होंने दिया। हमारे इंडस्ट्रलिस्ट वहां गए। वहां उन्होंने इन्वेस्टमेंट किया और वहां पर रोजगार का निर्माण किया। और देखिए एक जिस तरह के ग्लोबलाइजेशन वैश्वीकरण विश्व में चारों तरफ हुआ था। भारत भी उसका हिस्सा बन गया था। अगर आज के दिन में वह चाहे कि वह एक अलग सी नीति अपनाएंगे और एक टारगेट करेंगे
18:03 चाहे टेरिफ से तो वह अब वो महसूस करेंगे कि ऐसी स्थिति में वह खुद को नुकसान पहुंचा रहे हैं। भारत पर टेरिफ लाकर उन्होंने अपने लोगों का के लिए महंगी चीजों को बना दिया और उसके साथ-साथ वहां इनफ्लेशन उनका खुद का बढ़ गया। उनकी इकॉनमी पर इसका जबरदस्त रूप से उनकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा और और आज के दिन में अमेरिका को अगर एक कॉम्प्लीमेंटेरिटी वाली रिश्ता रखते हमारा एक हर तरह से जुड़ाव वाला रिश्ता रहते तो भारत ऐसे कई पदार्थों का वहां पर भेजता था और निर्यात करता था और आयात भी करता था। तो इस रिश्ते को उन्हें कायम करना होगा और एक जो हमारे एक बड़ा सा समूह बना है हमारे वैज्ञानिक समूह है चाहे वह हमारे
18:49 एंटरप्रेन्यर्स है आज के देखिए दिन में देखिए वहां के कितने सारे वहां के कंपनियां बड़ी कंपनियों के जो व्यवसाय कहिए या उनके मैनेजर कहिए बिग मैनेजर सीईओ कहिए वो भारत से आए हैं तो उन्हें हर तरह के मैनेजेरियल से लेकर उन्हें हर तरह का उन्हें हमने भारत ने उनके साथ एक संबंध कायम किया और इस संबंध को उन्होंने काफी आगे बढ़ाते चले गए और यहां तक कि देखिए तीसरे देश में भी जाकर अगर साझा अपने भारत में अगर उत्पादन होता है तो एक अफ्रीका जैसे देश में चाहे साउथ ईस्ट एशिया देश में चाहे कहीं भी यूरोप से भी आप सस्ते दाम पर चीजों को लाएंगे क्योंकि ऑलरेडी यूरोप जूझ रहा है वहां के संघर्ष जो
19:35 यूक्रेन और रूस के बीच हो रहा है तो देखिए बहुत आयामी पक्ष दोनों राष्ट्रों का रहा है और इसको अगर थोड़ा सा इस छोटी सी जो फायदे के लिए अगर लंबे दौड़ का नुकसान पहुंचाते हैं तो पूरी की पूरी विश्व व्यवस्था इससे अस्थिर हो जाएगी और इस बात को आभास होना चाहिए जिस तरह से हाईटेक में इन्वेस्टमेंट हो रहा है हाईटेक से कैसे इकॉनमी को स्ट्रेंथन करें देखिए बड़ा सोच रखा था जो क्वाड बनी थी उसमें देखिए कितनी बड़ी सोच हुई थी ब्लू इकॉनमी से लेकर एडवांस टेक्नोलॉजी इमर्जिंग टेक्नोलॉजी सब पर उसमें एक साझा कार्य करने का एक योजना बनी थी। तो इस योजना को आगे ले जाने की आवश्यकता है ना पीछे ले जाने की और मुझे
20:21 और मुझे पूरा विश्वास है कि अब आने वाले समय में महसूस करेंगे और दोनों देश एक दूसरे के साथ इकोनॉमिकली जो काफी इंटीग्रेट करने का प्रयास बिल्कुल प्रोफेसर राजीव जो भारत की अर्थव्यवस्था का मुद्दा है अमेरिका और भारत के बीच जो कारोबार की स्थिति है अर्थव्यवस्था की स्थिति है जो दोनों देशों को मजबूती प्रदान करती है भारतीय कंपनियों द्वारा अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 20.5 अरब डॉलर का निवेश दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और आर्थिक सहयोग को दर्शाता है। यह बड़ा यह बताता है कि अमेरिका को जितनी जरूरत भारत की है तो भारत की कंपनियों को भी अमेरिकी बाजार की आवश्यकता है। भारत को भी अमेरिका की दोनों देशों के बीच मधुर संबंध उसी आधार पर आगे बढ़ने हैं। जिसका
21:08 जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने जो विदेश मंत्री हैं अमेरिका के उनके साथ भी किया कि भारत अमेरिका के साथ मधुर रिश्तों के साथ आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन मुद्दा अगर बात किया जाए जो चीन का अभी डोनाल्ड ट्रंप ने चीन की यात्रा भी की। जाहिर तौर पर वैश्विक परिस्थितियों में जो भारत की भूमिका है उसका जिक्र बार-बार जो अमेरिकी विदेश मंत्री हैं उन्होंने प्रधानमंत्री जी के साथ मुलाकात में भी किया कि भारत की जो वैश्विक स्थिति है जो महत्वपूर्ण भूमिका है खासतौर से हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसे अमेरिका स्वीकार करता है। क्वाड की बैठक को प्राथमिकता अपनी बताया उन्होंने। प्रभु जी आप इस इस पहलू को कैसे देखते हैं? देखिए भारत और अमेरिका दोनों चाहते हैं कि
21:55 हमारे रिश्ते मजबूत होते रहे क्योंकि हमें एक दूसरे की जरूरत है। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनको हम जिनमें हमें अमेरिका का कोऑपरेशन चाहिए और बहुत से ऐसे मामले जिनको अमेरिका हमारा कोऑपरेशन चाहिए। लेकिन देखिए इस वक्त अमेरिका दो चीजों पर खास तौर पर जोर दे रहा है। एक तो कि भारतीय कंपनी अमेरिका में और इन्वेस्ट करे। जैसा प्रोफेसर राजीव नारायण कह रहे थे कि इन इन्वेस्टमेंट से वहां बहुत जॉब्स क्रिएट होती है। अमेरिका का बहुत फायदा और दूसरा ये कि अमेरिका से हम तेल खरीद ऑयल एक्सपोर्ट करना उनका एक बहुत बड़ा इंटरेस्ट है। तो इस सबके संदर्भ में अगर भारत के साथ पॉलिटिकल रिलेशंस अच्छे नहीं
22:42 है तो इस तरह के जो इन्वेस्टमेंट्स या ऑयल परचेजेस वगैरह पॉसिबल नहीं है। रिश्ते अच्छे होते हैं तो इंडोपेसिफिक रीजन में भी अमेरिका का बहुत फायदा है। क्योंकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमेरिका को सप्लाई चेन्न डिसरप्ट होने का बहुत खतरा है। अमेरिका की बहुत सी ऐसी चीजें जरूरतें हैं जो इस रीजन से आती है जैसे कंप्यूटर चिप्स है और बहुत सी ऐसी चीजें जो हाईटेक इंडस्ट्री के लिए जरूरी है। ये सब डिस्ट्रक्ट हो जाती है। अगर चाइना जो है वहां पर दबदबा ज्यादा करता है और कोशिश करता है कि उसके कंट्रोल में यह पूरी सप्लाई चेन हो। भारत भी चाहता है कि ये सप्लाई चेन्न ओपन रहे। अमेरिका भी
23:28 चाहता है तो उसमें एक नेचुरल कॉम्प्लीमेंटेरिटी ऑफ़ इंटरेस्ट है। हमारे इंटरेस्ट एक ही है। इसके अलावा देखिए कोई भी नहीं चाहता कि चाइना जो है पूरे उस रीजन में जो बाकी देश है उनप ऐसी जोर जबरदस्ती करे जैसे वो कर रहा है। अब देखिए लग रहा है कि हो सकता है ताइवान पे हमला करे। क्या ऐसा अच्छा होगा? अगर वहां पर स्टेबिलिटी बनी रहे यही सब बाकी दुनिया के लिए अच्छा है। तो इस वजह से जो ये कोर्ट की मीटिंग होगी अभी कुछ महीने बाद ये इंडोपेसिफिक रीजन में किस तरह से जिओपॉलिटिकल स्टेबिलिटी बनाए रखी जाए इस पे गौर करेगी और मेरे विचार में ये भारत के लिए बहुत जरूरी है। अमेरिका के लिए
24:13 बहुत जी आपने आपने बात चीन की चीन का जिक्र किया आपने आपने ताइवान का उल्लेख किया जाहिर तौर पर जो इस समय वैश्विक स्थितियां हैं जो देशों के बीच रिश्तों का इस प्रकार का एक स्वरूप उभर के सामने आ रहा है जिसमें बात चाहे यूक्रेन या रशिया की बात की जाए रूस की बात की जाए या फिर इजराइल अमेरिका का तनाव ईरान के साथ जो है उसने दुनिया की जो आपूर्ति चैन है उसको प्रभावित किया है। दुनिया के कई देशों के बीच रिश्तों में तनाव है और इस सब को देखते हुए 26 मई को दिल्ली में जो क्वाड की बैठक विदेश मंत्रियों की हो रही है। उससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री के साथ बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि भारत चाहता है कि विश्व में जो मुद्दे हैं वो शांति के साथ संवाद के साथ उनका समाधान होना चाहिए। जाहिर तौर पर
25:00 दुनिया को एक दिशा दिखाता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विज़न। मैं आखिरी सवाल आपसे ही पूछना चाहूंगा प्रभु जी क्योंकि क्वाड की बैठक हो रही है विदेश मंत्रियों की 26 मई को महत्वपूर्ण माना जा रहा है इस बैठक को खासतौर से जो पश्चिमी एशिया का संकट है इस पर आपका क्या कहना है देखिए ये जो विदेश मंत्रियों की बैठक है ये बहुत अहमियत रखती है क्योंकि ये चारों का देश भारत अमेरिका जापान ऑस्ट्रेलिया ये सब इंडोपेसिफिक में जो चाइना की हरकतें हैं उनसे ये प्रभावित होते वहां अगर चीन अपनी जो जबरदस्ती से सप्लाई चे डिस्ट्रप्ट करता है अपना दबदबा बनाता है। इससे हम चारों देशों को बहुत नुकसान होता है। इसीलिए हालांकि हम कहते हैं कि कॉड इस नॉट
25:46 अ मिलिट्री अलायंस लेकिन अब कॉड कंट्रीज में भी एक मिलिट्री एक्सरसाइज शुरू हो गई है। हालांकि हम ये कहते हैं कॉर्ड के नहीं है। ये सिर्फ उनके जो पार्टनर कंट्रीज उनके आपस के लेकिन जो चाइना से मिलिट्री डेंजर्स इस पूरे रीजन में ये बढ़ते जा रहे ये कम नहीं हो रहे है और अमेरिका डिस्ट्रक्टेड है। अमेरिका जो है मिडिल ईस्ट में फसा हुआ। तो उसको वो चाहता है कि इंडिया जो एक पावरफुल कंट्री है हमारी खुद मिलिट्री स्ट्रगल स्ट्रेंथ काफी ज्यादा है। हमारा पूरी तरह से उसको कोऑपरेशन मिले। साथ ही साथ जो जापान और ऑस्ट्रेलिया का भी कोऑपरेशन मिले ताकि ये जो चाइनीस डेंजर है इसको रोका जा
26:32 सके। देखिए अभी तो फॉरेन मिनिस्टरर्स की मीटिंग हो रही है। अभी कुछ महीने बाद समिट होगी। उसमें ये उम्मीद है कि ट्रंप साहब खुद आएंगे। तो ये एक बहुत बड़ी बात है। ट्रंप साहब अगर आएंगे कोर्ट में शिरकत करेंगे तो चीन को जो संदेश जाएगा वो बहुत महत्वपूर्ण है कि चीन आप अपने को काबू में रखिए। नहीं तो आपको रोकने के लिए हम जो कदम उठा सकते हैं उठाइए। जी जाहिर है आशा है अमेरिका विदेश मंत्री की भारत यात्रा से भारत अमेरिका व्यापक वैश्विक राजनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूती मिलेगी। प्रभु जी राजीव जी आपने संसद टीवी से बात की। बहुत-बहुत शुक्रिया। बहुत-बहुत धन्यवाद हमसे बात करने के लिए। तो आज इस कार्यक्रम में इतना ही। मुझे दीजिए आज्ञा। नमस्कार।