Important lecture by Jagadguru Shree Kripalu Ji Maharaj

Parmeshwari Devi Ji www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में, परमेश्वरी देवी जी भक्तों के देर से आने और अनुशासन की कमी पर अपनी निराशा व्यक्त करती हैं। वह इस बात पर जोर देती हैं कि आश्रम में रहना एक बड़ा त्याग है और भक्तों को अपने कल्याण के बारे में सोचना चाहिए, न कि केवल शारीरिक सुखों में लिप्त रहना चाहिए। देवी जी भक्तों को आत्म-चिंतन करने और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

  • भक्तों के देर से आने पर निराशा व्यक्त की गई है।
  • आश्रम में रहने के त्याग पर जोर दिया गया है।
  • आत्म-चिंतन और कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने का प्रोत्साहन दिया गया है।

कीर्तन में देरी

परमेश्वरी देवी जी कीर्तन में लोगों के देर से आने पर अपनी नाराजगी व्यक्त करती हैं। वह कहती हैं कि लोग अपनी मर्जी से आते हैं और उन्हें किसी भी प्रकार का अनुशासन नहीं है। वह सवाल करती हैं कि क्या भक्तों को उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों का एहसास है और क्या वे इसे महत्व दे रहे हैं।

आश्रम जीवन का त्याग

देवी जी बताती हैं कि जो लोग घर छोड़कर आश्रम में आए हैं, उनमें से अधिकांश आश्रम के ही रहने वाले हैं। बाहर से आए हुए लोग भी बाल-बच्चे वाले नहीं हैं। वह कहती हैं कि आश्रम में रहना एक बहुत बड़ा त्याग है, यह कोई साधारण बात नहीं है।

अनुशासन और कल्याण की कमी

परमेश्वरी देवी जी भक्तों में अनुशासन और अपने कल्याण के प्रति चिंता की कमी पर निराशा व्यक्त करती हैं। वह कहती हैं कि लोग अपनी मर्जी से अपने कमरों से निकलते हैं, बिना किसी डर या चिंता के। वह सवाल करती हैं कि क्या वे केवल शारीरिक सुखों में लिप्त रहना चाहते हैं और अपने आध्यात्मिक विकास की परवाह नहीं करते हैं।

आत्म-चिंतन का महत्व

देवी जी कहती हैं कि जब तक कोई व्यक्ति स्वयं अपने कल्याण के बारे में नहीं सोचता, तब तक किसी के कहने का कोई असर नहीं होता। चाहे भगवान हों या गुरु, वे केवल बकवास करते रहेंगे यदि व्यक्ति स्वयं परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है। वह सभी को आत्म-चिंतन करने और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

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Transcript

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0:01 लुट लो [संगीत] के लोगों की जब मर्जी होती है तब कीर्तन ने आते हैं अ कर दो कि मैं यहां आया हूं जब उसके बाद जो लोग आए हैं खड़े हो जाए तो दो [संगीत] कर दो कि आप लोग घर छोड़कर यहां आए हैं इसमें अधिकांश लोग तो आश्रम के रहने वाले हैं

0:49 [संगीत] है और बाहर से भी जो आए हैं कि वह कोई बाल-बच्चे वाले नहीं है है मेरे प्रिय लापरवाही क्यों है महाराज जी व देर में आते हैं तो हम लोग पहले आवे हम महाराज जी से कम थोड़े ही हैं [संगीत] अजय को कि आखिर क्या सोचा है कि दिन-रात जो आप लोगों के पीछे मैं इतना लेबर कर रहा हूं कि उसकी यही दक्षिणा दे रहे हैं आप लोग

1:37 ऑन करो कर दो [संगीत] हुआ है अजय को तो बड़ी मस्ती से जब मन में आता है तब चलते हैं अपने-अपने कमरों से अ है ना अनुशासन है न किसी का डर है ना अपने कल्याण की परवाह है है कर दो कि अब इस शरीर का यह सुख चाइना है तो अनंत जन्म चाहा है और चावलों 10 20 50 साल जब

2:25 तक जियो कि हमारे पास क्यों आते हो कि अ क्या लेक्चर सुनते हो कि अ एक बहुत बड़ा त्याग है साधारण आश्चर्य नहीं है यह है और अधिकांश लोग तो उसको होते हैं दिल में है कौन-कौन लव बजे हम छुट्टी कर देते हैं

3:11 इतनी सारी रात आप लोगों को कम पड़ती है सोने को अ [संगीत] कर दो कि यमन की गुलामी है घ्र कर दो [संगीत] कर दो हैं अगले दो-चार इसमें बूढ़े है बहुत ही या बीमार है

3:59 कर दो [संगीत] कि मैं आप सोच तो सब लोग मुझे कुछ नहीं कहना है तो मेरे कहने का तो कोई असर होना ही नहीं है जब तक जीव स्वयं न सोचें अपना कल्याण भगवान हो गुरुओं कोई हो बकवास करता रहे हो ए बैठ जा उ

4:49 लुट लो

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