0:00 [संगीत] नमस्कार संसद टीवी में आपका स्वागत है। मैं हूं प्रतिबिंब शर्मा और आप देख रहे हैं इनसाइट और इनसाइट में आज हम पुलिस स्मृति दिवस को केंद्र में रखकर बात करेंगे पुलिस शक्ति सामर्थ्य को बढ़ाते हुए पुलिस सुधारों की।
0:47 21 अक्टूबर को ही पुलिस स्मृति दिवस मनाया गया है। इस 21 अक्टूबर 1959 को लद्दाख के हॉटस्प्रिंग्स में भारतीय क्षेत्र में एक असमान टकराव में चीनी सेना द्वारा घात लगाकर 10 बहादुर पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई थी। इन 10 वीर पुलिसकर्मियों की स्मृति को सम्मान देने के लिए 1962 में आयोजित पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के सम्मेलन में हर साल 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। आजादी से आज तक लगभग 400 से ज्यादा पुलिसकर्मी देशवासियों की रक्षा करते हुए शहीद हो चुके हैं। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल और प्रेरणा से राजधानी दिल्ली में पुलिस स्मारक देश को समर्पित किया गया और
1:34 इसी पुलिस स्मारक पर जाकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शहीद पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि अर्पित की पुलिस स्मृति दिवस पर और प्रधानमंत्री ने भी विशेष संदेश जारी कर पुलिसकर्मियों के योगदान को याद किया। हम आज इनसाइट में पुलिसकर्मियों के योगदान के साथ-साथ बात करेंगे। समय के साथ-साथ पुलिस की बढ़ती चुनौतियों और आधुनिकीकरण की आवश्यकता की। बात करेंगे विशेषज्ञों से। दो विशेषज्ञ हमारे साथ स्टूडियो में मौजूद हैं। राकेश सिन्हा जी पूर्व सांसद राज्यसभा हमारे साथ मौजूद हैं। आपका बहुत-बहुत स्वागत है। नीलू रंजन वरिष्ठ पत्रकार हमारे साथ इस वक्त यहां पर विद्यमान है। नीलू जी आपका भी बहुत-बहुत स्वागत है। और डॉक्टर विक्रम सिंह पूर्व पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश हमारे साथ इस वक्त वर्चुअली जुड़े हुए हैं। डॉक्टर
2:20 विक्रम जी आपका भी बहुत-बहुत स्वागत है। आपसे ही शुरू करता हूं विक्रम जी। अ पुलिस में आपने जो है बरसों सेवा दी है और पुलिस में क्या कुछ बदलाव होने चाहिए या पुलिस को शक्तिशाली बनाने के लिए क्या कुछ किया जाने चाहिए उसके लिए भी आपने विचार प्रेषित किए हैं। लेकिन क्या आपको लगता है मोटे तौर पर पुलिस का जॉब जो है पुलिस की जो सेवा है वो थैंक्स जॉब है। वो उसके काम को जो है उस तरीके से सराहा नहीं जाता या फिर कह सकते हैं कि उसको उस तरीके से पहचान नहीं मिलती। रिबिम जी नमस्कार विद्वान पैनलिस्ट को मेरा नमस्कार। पुलिस विभाग एक इकलौता
3:07 विभाग है। 36 साल की सेवा का निचोड़ अगर मैं एक वाक्य में कहूं इकलौता विभाग है जहां तपस्या करने के लिए तनख्वाह मिलती है। ऐसा कोई विभाग ढूंढना मुश्किल है जहां सीधे पीड़ितों के आंसू पोछने के लिए आपको तनख्वाह मिलती है। और यह सही है। कुछ लोगों की अवधारभावना हो सकती है कि जब चमन को थी जरूरत तब खून दिया हमने। जब बाहर आई तो चमन ने पूछा तेरी जरूरत क्या है? लेकिन पुलिसकर्मियों से अपेक्षा की जाती है स्वाभिमान को दांव पर ना लगाएं। उसकी कीमत ना लगाएं। कोई प्रशंसा कर दे तो बहुत सुंदर ना करें तो भी सुंदर, उभयधर्मी रहे तो भी सुंदर। आप अपना कर्म कीजिए कर्म योगी की तरह। क्योंकि पुलिस की वर्दी अपेक्षा करती है कि आप कर्मयोगी रहेंगे। तमाम चुनौतियों के बाद भी आप अगर देख रहे हैं कि पुलिसकर्मी में क्रांति कहां सन 80
3:53 में जो टेक्नोलॉजी थी पुलिस थाने में केवल क्राइम, किट बॉक्स और एक लाठी। इसके अलावा कुछ भी नहीं था। आज जब एक भयावत स्थिति आ गई है फिदाई हमले ड्रोन टेक्नोलॉजी मशीन लड़ने और इस तरीके की एआई इनेबल्ड सोशल मीडिया को लेके अफवाहबाजी और नाना प्रकार के जो क्राउड फंडिंग और फ्लैश मॉब्स आ रहे हैं उससे डील करने के लिए हमारे पुरुष और महिला पुलिसकर्मियों ने जो मुंहतोड़ जवाब दिया है मैं उनके जज्बे को सलाम करता हूं। लेकिन शो के दौरान मैं यह कहूंगा कि अब वक्त आ गया था कि 100 साल पुलिस में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आज अच्छी बात है कि दो कान तीन कानून उनका बदलाव आ गया है। साक्ष्य अधिनियम भारतीय न्याय संहिता जो कि इंडियन पीनल कोर्ट को रिप्लेस किया है और क्रिमिनल प्रोसीजर कोर्ट टू को भारतीय नागरिक सुरक्षा संिता लेकिन जो बड़ी लंबी
4:40 यात्रा है जो साइबर क्राइम है उसको डील करने के लिए हमको और आगे चलना होगा। संतोष का विषय है कि हमारे यहां बीटेक एमटेक लड़के लड़कियां भर्ती हो रहे हैं। ना केवल डिप्टी एसपी आईपीएस के रैंक पे बल्कि कास्टेबल के लेवल पे भी और उन्होंने एक मानक स्थापित किया है। लेकिन पुलिस को आप अकेले ना देखें क्योंकि जो एंड प्रोडक्ट जो पब्लिक है वह संतुष्ट होती है डिस्पोजल से और इससे संतुष्ट होती है कि न्याय जहां पर 5 करोड़ अगर वाद लंबित है आपको देखना होगा फास्ट ट्रैक कोर्ट में हम क्या कर सकते हैं हम प्रोसीक्यूशन अच्छा कैसे कर सकते हैं और विशेषकर जो महिला उत्पीड़न से संबंधित प्रकरण है उनको त्वरित न्याय दिलाने के लिए हम फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की स्पेशल जो कि निर्भया केस में ये व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट ने भी की थी तो इन तमाम बिंदुओं के ऊपर हम लोगों को चर्चा करनी
5:26 चाहिए, मंथन करना चाहिए। बड़ी अच्छी शुरुआत की है गृह मंत्री जी ने और आगे भी आप देखिएगा बड़े सकारात्मक क्योंकि जो काम पिछले 50 साल में नहीं हुआ यह पिछले 5 साल में हो गए हैं। राकेश सिन्हा जी एक सांसद के तौर पर भी आपने बहुत नजदीक से देखा है पुलिस के कामों को और शायद पुलिस से जुड़ी हुई एक संसद की कमेटी से भी आप जुड़े रहे हैं। सबसे पहले तो आज एक अवसर है 4000 पुलिसकर्मियों ने देश के लिए शहादत दी है। लेकिन शायद आम लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं है। ज्यादातर नकारात्मक पक्ष ही पुलिस का सामने लाया जाता है। लेकिन पुलिस के बगैर देश में अमन कायम नहीं हो सकता। यह बात स्पष्ट कर दी है डॉ. विक्रम सिंह ने। उन्होंने थोड़ा सा अंधेरा पक्ष भी बताया और उसका उजला पक्ष भी बताया कि
6:13 किस प्रकार अब जो है तकरीबन 100 साल के बाद तो कम से कम एक पहल शुरू हुई है। तीन नए कानून लाए गए हैं क्योंकि 1800 61 में जब ये पुलिस अधिनियम लाया गया था तो वो तो अंग्रेजों ने इसीलिए लाया गया था कि आधिपत्य जो है भारत पर जमाए जा सके पुलिस के माध्यम से कानून के माध्यम से। ये करवट बहुत देर से क्यों ली गई है? देखिए सबसे बड़ी बात यह है कि आप इस कानून का नाम देखिए और यह नरेंद्र मोदी जी का जो एक दृष्टिकोण है डीलोनाइजेशन ऑफ इंडियन माइंड उसका एक हिस्सा है। जब ये ब्रिटिश राज्य में 1861 में कानून बना था तो उसका एजेंशन क्या था? उसकी मान्यता थी कि क्रिमिनल्स पर के लिए कानून बनाया गया। यानी अस्यूम कर लिया गया कि जो कोई भी इस
6:59 कानून के पास आता है वो अपराधिक चरित्र का है या अपराधिक होने का संदेह है। यह जो कानून बना है इसका नाम ही ऐसा है नागरिक सुरक्षा। यानी इस कानून का उद्देश्य है नागरिकों को केंद्र में रखकर उनके जीवन को सुरक्षित करने के लिए कानून को ढालना। तो एक बुनियादी अंतर औपनिवेशिक काल के कानून और भारत के कानून में है। दुर्भाग्य की बात यह है कि 1861 में कानून बना था। उस वक्त हम ब्रिटिश राज के दास दास्ता में थे और 1973 में छोटे-मोटे उसमें संशोधन हुए। लेकिन किसी सरकार ने यह जरूरी नहीं समझा कि इसमें आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। देश स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिकों के और बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए कानून को बनाया जाना। इसलिए नरेंद्र मोदी
7:46 जी की सरकार और गृह मंत्री अमित शाह जी इसके लिए अभिनंदन के पात्र हैं कि जिन्होंने एक बड़ा कदम उठाया और ये काम सफल हुआ। देखिए इस इस कानून में जो देर हुई उसका एक बड़ा कारण है कि जो यूरोप के यूरोप केंद्रित हमारी मानसिकता थी सरकारों का दर्शन था। उस दर्शन में ने हमारे मस्तिष्क को जिसको कहते हैं फैटीग इंग्लिश में कहते हैं एक आलस्य भाव डाल दिया था। इसलिए जब उन कानूनों को आप पढ़ेंगे तो ऐसे शब्दों का प्रयोग है और ऐसे कानून थे ना जो व्यवहार अव्यवहारिक थे बल्कि वो भारत के नागरिकों के चरित्र पर सवाल था। तो अब घास काटने के लिए सजा थी। उस वक्त घास काटने के लिए सजा बनाई गई थी। अब घास काटने पर सजा थी। यानी घास काटने वाले तो
8:31 लाखों पूरा देश ही जेल चला जाएगा। तो ये एक मौलिक परिवर्तन हुआ। जो दो महत्वपूर्ण इसमें परिवर्तन जो रेखांकित किया गया इस कानून में वह मैं टिप्पणी करना चाहूंगा। पहला इसमें कि सबसे बड़ी बात है कि जीरो एफआईआर करना। अब आपके पास अपराध हुआ और आप किसी खास पुलिस स्टेशन में जाकर ही अपना एफआईआर लॉज कराएं। इसके जगह आप कहीं से भी किसी पुलिस स्टेशन से एफआईआर लांच कर सकते हैं। यह नागरिकों को दिया गया पर किया गया विश्वास और उनको दी गई सुविधा है और जीरो एफआईआर के साथ यह भी है कि इलेक्ट्रॉनिक रूप से एविडेंस देखिए समय बदल गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स चीजें आ गई हैं। मोबाइल आ गया है। कंप्यूटर आ गया। अब उस एविडेंस को कोर्ट नहीं मानती थी। अब उसको एविडेंस के रूप
9:18 में माना गया है। फॉरेंसिक एविडेंस को माना गया। तो मेरे कह इसमें जो जो दूसरा जो सबसे दार्शनिक रूप से परिवर्तन जिसको मैं कहता हूं वह यह है कि समुदाय को और पुलिस के बीच में जो एक खाई थी जिसके कारण विक्रम जी ने कहा कुछ लोगों पर ऐसा है और सही में पुलिस का एक एक वर्ग है जिसके कारण से पुलिस भयभीत होता था जो जैसे अमित शाह जी ने कहा है और अमित शाह जी का जन्मदिन है और अमित शाह जी इस कानून को लाए तो एक तो जन्मदिन की का उन्हें अभिनंदन करते हुए मैं कहना चाहता हूं इस साहसिक कानून लाने के लिए मोदी जी के उस दर्शन डीकोलानाइजेशन के दर्शन को जमीन पर उतारने के लिए कि यह गोल्डन एरा है। यह स्वर्णिम युग है कानून का। क्योंकि सु उस युग में अपराध से हम नागरिक बन गए। हम अपराधी से नागरिक बन गए। कानून के भय से
10:04 हम कानून हमारा अवसर बन गया। तो एक जो सबसे बड़ी इसमें उन्होंने एक सुविधाजनक बात कही है कि जब पुलिस स्टेशन आप जाते थे तो लगता था एफआईआर फॉर व्हाट? इसका परिणाम क्या होगा? एफआईआर लॉज होगा कि नहीं होगा? अब होता है कि एफआईआर उस समाधान के लिए है। तो पहले एफआईआर एक बर्डन था। पुलिस एफआईआर लॉज करती नहीं थी। उसके लिए मशक्कत करनी पड़ती थी। उसके लिए पैरवी करना पड़ता था। खास करके जो मार्जिनलाइज लोग हैं, जो हास्य के लोग हैं उन्हें बहुत समस्या का सामना करना पड़ता था। इसलिए मैं मानता हूं कि डीकोलोनाइजेशन के साथ-साथ नागरिकों को दी गई एक बहुत बड़ी राहत और सुविधा है। सकारात्मकता इसमें है। भारतीयता का बोध है और बदली हुई परिस्थिति को को संबोधित किया गया। ये जन केंद्रित बनना चाहिए। नीलू जी अह जब
10:52 पुलिस रिफॉर्म्स की बात आती है अह यानी कि मानवीय चेहरा मानवीय पक्ष जो है वो जो है जुड़ा रहना चाहिए पुलिस की कारवाई के साथ-साथ और बहुत ही स्पष्ट रूप से कह दिया यहां पर राकेश सिन्हा जी ने कि जो पहले कानून की टैगलाइन थी उसमें और जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा जो नाम दिया गया है उसी में ही अंतर समाहित है। पहले डर और अपराधी सिद्ध करने के लिए कानून था। अब जो है नागरिकों की सुरक्षा प्रदान करने के लिए ये कानून है। ये जो है व्यवहारिता में लाया गया एक बड़ा बदलाव है। नहीं देखिए निश्चित रूप से ये बड़ा बदलाव है। लेकिन हम अगर सेंट्रिक करें सिर्फ पुलिस पे कि पुलिस किन परिस्थितियों में काम करती है और उसको क्या-क्या चाहिए।
11:37 उसमें एक चीज है कि कानून जो है वह वक्त के हिसाब से आपको बनाना चाहिए ताकि पुलिस उस बदलते हुए समय में टेक्नोलॉजी का यूज़ करते हुए और लोगों को जो सुरक्षा देना है जो बाकी न्याय देना है जो जांच करनी है वो सब चीजें कर सके तो यह एक पुलिस को असिस्ट करने के लिए है कि जनता को कैसे वह न्याय दिलाए त्वरित निर्णय दिलाए और उसके लिए कानून में जो 150 साल पुराना कानून है उसको बदल के और टेक्नोलॉजी के हिसाब से नया लाना मेरा जो अपना मानना है कि पुलिस को अगर आप पुलिस की चीजों को समझते हैं कि उस कहां पे उसको कौन सा टास्क आपने दिया है। मान लिया कि आपने पुलिस को सीआरपीएफ से और तमाम लोगों को आपने जंगल में नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए भेजा। बहुत टफ पोजीशन में है वो कि चारों तरफ
12:24 जंगल में हर तरफ नक्सली हैं। कौन है नक्सली नहीं है नहीं पता। आप बीच में कैंप लगा के और पता चला कि आपको 10 कि.मी. बाद कहीं कोई कैंप और है। मतलब बीच में कहीं कोई नहीं है। सिर्फ चारों तरफ आपका हॉस्टाइल है और वहां रह रहे हैं तो वहां पुलिस को एक एक आपने टास्क दिया तो उसको उसके हिसाब से जरूरत के हिसाब से आप टेक्नोलॉजी हथियार बाकी चीजें उपलब्ध करवाएं। एक अगर पुलिस कहीं लगा हुआ है सुरक्षा में इंडिया गेट पे या बाकी दिल्ली में किसी कोने में लगा हुआ है तो उसकी वहां पे क्या जरूरत है? वहां पे कौन सी टेक्नोलॉजी उसको चाहिए, कौन से उसको सामान चाहिए जिससे वो बेहतर कर सके। होता क्या है कि हम मतलब पुलिस को अगर देखेंगे तो मैं तो ये मानता हूं कि पुलिस एक ऐसी चीज है कि चाहे वो कोरोना आए या दिवाली हो या
13:11 छठ हो या कोई त्यौहार हो कहीं कुछ हो जाए। तो बाकी लोग घर में बैठे होते हैं। अपने परिवार के साथ मना रहे होते हैं। पुलिस एक ऐसी चीज है जो सड़क पे होती है। कोरोना में जब सब घरों में बंद थे और कहा जाता है कि बाहर ना निकले तो सड़कों पे सिर्फ और सिर्फ पुलिस ही कर रहा था। उसको उसको भी कोरोना हो सकता है। उसके भी फैमिली हैं। तो जरूरत के हिसाब से उसके साथ अगर कोई सिस्टम खड़ा होता है। जैसे अभी ये सिस्टम खड़ा होता दिख रहा है। तीनों कानूनों में बदलाव किया। वो तो बड़े पैमाने पे देश के लिए है। मैं एक छोटा सा उदाहरण आपको देता हूं। अ 2023 की बात है जब ऑपरेशन चल रहा था नक्सलियों के खिलाफ वो सीआरपीएफ के बल्ब कोबरा और सब लगे हुए थे तो वहां पे नक्सली जो है कि सुरक्षा बल ना आए तो लोहे का स्पाइक जो है
13:57 लगाते थे जहर बुझा के और वो बूट जो है उसको चीर के अंदर जाता था और पैर घायल होता था वहां पे औरकि जहर लगा होता था तो चार पांच जो है जवानों के पैर काटने पड़ गए थे इतने मतलब मुश्किल वक्त में काम करते हैं लोगों को यह पता होना चाहिए कि सिर्फ ऐसे नहीं है कि पुलिस गए और जो आप पुलिस देख रहे हैं वही है। काम कैसे करती हैं। तो अमित शाह जी ने तत्काल कहा कि अब आगे ऑपरेशन रोक दो क्योंकि हम अपने जवानों का पैर नहीं गवा सकते हैं। फिर वो एक सेंसर लगा हुआ जूता बनवाया गया। उसको लेकर के आगे चलते थे। अगर कहीं कुछ मेटल का दिखता था तो उससे आवाज आती थी। फिर उसको निकालते थे। तो इस ढंग से और वहां क्या-क्या जरूरत है? अगर कोई घायल हो गया बीच में अबुज मार्ग के जंगल में चली लाएंगे कैसे? हेलीकॉप्टर पहले नहीं था। अब हेलीकॉप्टर लिया एयरफोर्स से उसके नीचे
14:44 स्टील का प्लेट लगा के बुलेट प्रूफ किया और अगर कोई घायल हो गया तो तत्काल वहां से रायपुर लाके या जहां भी है अच्छे हॉस्पिटल में इलाज करवाना। तो अगर आप पुलिस के साथ खड़े होते हैं तो नक्सली आज 50 साल बाद खत्म हो रहे हैं। उसकी जरूरतों को आपने समझा। आपने जंगल में भेज दिया या किसी काम के लिए भेज दिया। उसके साथ अगर खड़े नहीं है आप। उसकी जरूरतों को नहीं समझ रहे हैं तो फिर वो रिजल्ट नहीं आता है। एक जो सबसे बड़ी समस्या है जिसके कारण से मतलब जो पुलिस फ्रेंडली नहीं हो पा रही है और उस पे कई बार कहा गया गृह मंत्री जी ने भी कहा कई राज्य सरकार ने भी कहा लेकिन हो नहीं पा रहा है वो है छुट्टियों का कि भाई 8 घंटे 10 घंटे आप 12 घंटे काम ले लो लेकिन तीन-ती दिन तक चार-चार दिन तक वो घर ना जाएं वो लगातार काम करते हैं ओवर बर्डन
15:30 जो है और जो पुलिस के पोस्ट खाली हैं खासतौर पे राज्यों में जो हैं वो एक बड़ी समस्या है जो पुलिस को इतना इतना स्ट्रेस कर देती है। इतना वो दबाव में होते हैं कि जो रिजल्ट आप पीपल्स फ्रेंडली होना चाहते हैं। चाहते हैं कि पुलिस जो है वो जनता के फ्रेंडली हो। जनता के साथ काम करे। लेकिन वो इतना अपने दबाव में होता है वो कि वो सिर्फ और सिर्फ ड्यूटी कर रहा होता है। जी। तो ये समस्या जो है इसका समाधान अभी नहीं निकला है। ये मुझे लगता है कि तमाम राज्य सरकारकि पुलिस लॉ एंड ऑर्डर स्टेट गवर्नमेंट का सब्जेक्ट है और उन्हीं को यह अदा करना पड़ेगा। लेकिन जो पुलिस सुधार है वह सेंट्रल गवर्नमेंट का भी एक एजेंडे में है। उसके लिए पैसे देती है राज्य सरकारों को लगातार सहायता जा रहा है। तो वो एक लाना चाहिए और कैसे आएगा वो वो देखना
16:17 पड़ेगा। वही डॉक्टर विक्रम यहां पर बात चल रही थी पुलिस के मानवीय पक्ष की। पुलिस के मानवीय पक्ष की को लेकर ही शायद इस तीन कानून को इंट्रोड्यूस किया गया और इसने जो है बहुत राहत दी है आम लोगों को जो अपराध से ग्रस्त होते हैं या छोटे-मोटे अपराध से लेकर बड़े अपराधों की जो है एफआईआर दर्ज करवाने के पक्ष में रहते हैं उनको जो है कहीं दूर नहीं जाना है। वो अभी आसपास के किसी भी पुलिस स्टेशन में करा सकते हैं। उनको आपराधिक क्षेत्र के पुलिस स्टेशन तक जाने की जरूरत नहीं है। ऑनलाइन जो है अब जो है एफआईआर होने लगी है। बहुत राहत मिल गई है। लेकिन क्या इससे पुलिस महकमे में दबाव और ज्यादा बढ़ गया है? क्योंकि अब ज्यादा एफआईआर दर्ज होने लगी है। पुलिस के पास शिकायतों का भंडार ज्यादा होने लगा है
17:04 और पुलिस की संख्या उतनी की उतनी है। यानी कि लगातार कम होती जा रही है। बताया जा रहा है अलग-अलग राज्यों में 21% से भी ज्यादा जो है रिक्तियां जो है सामने आ रही हैं। रिक्त पड़े हैं बहुत सारे पुलिस से जुड़े हुए पद उस पर भी काम करने की आवश्यकता है। एक बात और आपने कहा कि जो है आतंकवाद जो है वो जो है तकनीक से लवरेज है। उसका सामना करने के लिए भी हमें उतना ही इक्विप्ड होना पड़ेगा। तकनीक से उतना ही जुड़ना पड़ेगा। उस पर भी काम करने की जरूरत है। अभी और आपने जो कहा क्राइम क्राइम का पैटर्न फर्स्ट टाइम ऑफेंडर्स और जो चरमपंथी है वो किस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं। ड्रोन टेक्नोलॉजी हो एआई हो एआई के माध्यम से फेक फेक डी फेक न्यूज़ और अफवाह फैला देना। लेकिन सबसे पहले हम पुलिस की संख्या
17:50 नफर ऊपर आ जाए। यूएनओ कहता है कि 222 प्रति लाख जनसंख्या पर एक आदर्श है वो तो जब होगा तब होगा लेकिन नीलू जी के अपने प्रांत में जो संख्या है वो सबसे कम है भारत में और नागालैंड में सर्वाधिक है यानी एलोकेशन से भी ज्यादा है जो बिहार में और हां राकेश सिन्हा जी के भी राज्य में जो नागा जो बिहार की संख्या है वो तो करीब लगभग 80 के करीब है प्रति लाख तो यात्रा लंबी है रिक्रूटमेंट हमें करना पड़ेगा लेकिन ट्रेनिंग की सुविधा रखने के उपरांत और जो टेक्नोलॉजी की बात हम जब ट्रेन भर्ती करते हैं तो यही नहीं कि सिर्फ पीटी परेड और ड्रिल सिखा दें। अब आपको जो टेक्नोलॉजी है साइबर क्राइम्स है जो आपकी आईईडीज हैं जो इन तरीकों से इसकी काट क्या है? और इसका समाधान क्या है? इन्वेस्टिगेशन की गुणवत्ता कैसे बढ़ाएं और
18:36 प्रोसीक्यूशन हम कैसे करें? नए कानून के बारे में उनका मार्गदर्शन करें। जीरो एफआईआर अगर आप नहीं करेंगे तो इसके दुष्परिणाम क्या होंगे? जो आपके ऑडियो वीडियो के तरीके से आपकी बिना कोर्ट में लाए पेशी हो सकती है और वीडियो के जरिए ही जो माफिया आदि हैं जो कोर्ट में आकर के जबरन धन वसूलते थे अब उनको लाने की जरूरत ही नहीं है। वीडियो के आधार पर ही उनकी पेशी होगी। हालांकि इसका माफियाओं ने बड़ा अपोज किया कि उसके मौलिक अधिकार का हनन है। तो अधिकार पहले सामान्य जनता का आता है। उसके बाद माफियाओं का आता है। लेकिन अगर मैं सामने एक दो फिगर्स दूंगा। 200 साल की चंबल घाटी पूरे डकैती की फिगर होगी मुश्किल से 200 करोड़ और एक साल की साइबर क्राइम की लूट की फिगर जा रही है 2000 करोड़ तो आप समझ सकते हैं कि किस तरफ आपको ध्यान ज्यादा देने की आवश्यकता है। जनसंख्या बढ़ाएं प्रशिक्षित जनसंख्या
19:22 बढ़ाएं वो जमाने चले गए जब 10थ या 12th या इस तरीके के सामान्य शैक्षिक क्वालिफिकेशन के आधार पर हम चयन करते थे। आज आपको गुणवत्ता देख के और यह संतोष का विषय है कि आज कास्टेबल भी बीटेक और एलएलबी आ रहे हैं और यह हर्ष का विषय है कि बड़े अच्छे इन्वेस्टिगेटर्स हैं। लेकिन अगर आप इसको तीन चरण में देखें कि पहले रिक्रूट अच्छी तरीके से करें। जो भ्रष्टाचार की शिकायत आ रही है तो कम से कम जीरो टॉलरेंस टू करप्शन। अब जिस तरीके की बातें आ रही है मैं विश्वास नहीं करना चाहूंगा। लेकिन अगर हम उसको स्वीकार नहीं करेंगे तो इसका हम निराकरण कैसे करेंगे? भ्रष्टाचार के जीरो टॉलरेंस और जो भ्रष्टाचार में सित है उनको तुरंत बर्खास्त करें। इसके अलावा जो लेटेस्ट टेक्नोलॉजी है आपकी उसको अपने को अपग्रेड करना। अब आप कहेंगे अगर एक साल में हमने रिफ्रेशर कोर्स नहीं कराया तो हम पिछड़ते चले जाएंगे। नारको टेररिज्म पे आ जाएंगे।
20:09 जो आपका पंजाब में पश्चिम बंगाल और सीमा के स्टेट्स में यहां तक कि यूपी का वह पोर्शन जो 728 कि.मी. नेपाल से लगा है। वहां नारकोटिक्स की एक समस्या है और उस नारकोटिक्स की समस्या को लेकर के जो टेररिज्म को फला जो फलता फूलता है और उनकी आड़ में नाजायज बांग्लादेशियों को ला के बसाने का एक रैकेट है। मानव तस्करी मैं नहीं करूंगा। डेमोग्राफी चेंज जी करने का जो प्रयास किया जा रहा है इन चीजों की जरूरत है। आपकि राकेश जी स्वयं एक राजनेता हैं और एक जो है पुलिस को लेकर एक ये भी आता है कि राजनीतिक दबाव लगातार बना रहता है तो उनका जो है काम उससे प्रभावित होता है। अ लेकिन एक कानून जो है यहां भी पुलिसकर्मियों को
20:57 और कानून के रक्षकों को राहत देने के लिए ये सरकार एक और कानून लेकर आई है जिसमें केवल राजनेता ही नहीं जनप्रतिनिधि ही नहीं बल्कि प्रधानमंत्री को भी उसके दायरे में लाने का प्रयास किया गया है। अपनी तरफ से चकि देरी हो गई है। अह लेकिन अपनी तरफ से इस सरकार ने लगभग 10 11 12 वर्षों में लगातार अपनी तरफ से प्रयास करने की कोशिश जरूर की है। देखिए जहां तक पुलिस की बात है, आप एक चीज जानना चाहिए कि पुलिस इज द मोस्ट विजिबल रिप्रेजेंटेटिव ऑफ द गवर्नमेंट। भारत सरकार के गृह सचिव किसी बाजार में घूमते पाए जाए और एक कांस्टेबल जाए तो हम कांस्टेबल को भारतीय राज्य के रूप में पहचानते हैं। गृह सचिव के परिचय के बाद ही हम जान पाएंगे कि
21:42 क्या बात है। बहुत बड़ी बात कही। तो इसलिए पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ जाती है और पुलिस पर आशा भी है और निराशा भी है। पहले मैं उसका उत्तर दे दूं जो आपने पूछा कि नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने एक बात तो स्थापित कर दिया है। ये कानून के सामने सभी बराबर है। ये जो दर्शन था रूल ऑफ लॉ का इसको उन्होंने स्थापित किया। उसी के तहत जो आपने प्रश्न कहा वह एक तरह से एक उत्तर ही है। लेकिन जो बात मैं यहां कहना चाहता हूं कि मैं मेरा सौभाग्य है कि मैं इस कानून के बनाने की प्रक्रिया में स्टैंडिंग कमेटी का हिस्सा था। होम स्टैंडिंग कमेटी का जितना बारीकी से इस पर डिस्कशन हुआ पक्ष और विपक्ष सब लोगों ने खुलकर बात की। इसके नाम को लेकर इसके नाम से लेकर नाम पर भी बहुत विवाद था। भाषा का
22:28 विवाद था। नाम पर विवाद था। ये बलात्कार के केस पर कितना सजा दी जाए, कितनी नहीं दी जाए? इलेक्ट्रॉनिक एविडेंस पर क्या किया जाए? एफ जीरो एफआईआर पर किया जाए। एक-एक बात पर सूक्ष्म रूप से हुआ और हमें पूरा समय दिया गया। सभी सदस्यों को कहा गया कि आप लिख कर दे सकते हैं। हम बोल सकते हैं। कमेटी को के पास रिप्रेजेंटेशन दे सकते हैं। तो एक हमने एविडेंस भी लिया सब लोगों का। इसलिए दो दो तीन बात जो मैं कहना चाहता हूं कि पुलिस के बारे में जो और होना चाहिए जिसके कारण ये जो बार-बार बीच में आ जाती है जैसे चांद के ऊपर एक काला धब्बा लग जाता है। पुलिस के बारे में शिकायत आती है। राज्य तो अपना काम कर चुकी है। भारत में एक परंपरा नहीं है। उस परंपरा को लाना चाहिए। जिसको कहते हैं सोशल ऑडिटिंग। यह काम राज्य नहीं कर सकती है। भारत में
23:14 ऐसे नॉन गवर्नमेंट संस्थाओं की कमी है जो हर स्थान पर पुलिस की भूमिका की एक सोशल ऑडिटिंग करें। उस सोशल ऑडिटिंग को सार्वजनिक करें और सरकार को दें। इससे पुलिस के ऊपर एक मोरल एक दबाव रहेगा। यह मोरल दबाव राज्य सरकार तो कानून से चलती है। सरकार आदेश से चलती है। सरकार हैरार्की से चलती है। लेकिन जब ऑडिटिंग होगा मान लीजिए किसी खास थाने के अंतर्गत एक एनजीओ ने ऑडिटिंग किया। कितनी महिलाओं की क्या शिकायत है? पुलिस के से क्या बर्ताव था? कितने बच्चों के केस क्या हुए? तो जैसे दो-तीन केसेस बढ़ रहे हैं अब आज के समय में। जैसे आर्थिक नीतियां बदल रही हैं तो आर्थिक नीतियों का परिणाम ये सब है। पहला एक तो जो महिलाओं की ट्रैफिकिंग
23:59 है इसका बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है। बहुत बढ़ रहा है। उसके अलग-अलग रूप हैं ट्रैफिकिंग के। एक दूसरा चिल्ड्रन का भी ट्रैफिकिंग बढ़ रहा है। तीसरा ड्रग्स का प्रभाव समाज में बढ़ रहा है। अब पुलिस के सामने चुनौतियां इन तीनों को रोकने का। तीनों छद्म रूप से हो रहे हैं। बहुत मुश्किल है इसको ढूंढ पाना। और ऐसे लोग इसमें इन्वॉल्व हैं जिनके बारे में अपेक्षा नहीं की जाती है। तो इस इस मामले में जो कम्युनिटी पुलिसिंग की व्यवस्था इसमें है और सामुदायिक पुलिसिंग को और भी प्रसार करने की जरूरत है जिससे कि पुलिस और पीपल फ्रेंडली रिलेशनशिप हो। जैसे हम सरकारी महकमे में जाते हैं, कर्मचारी से फ्रेंडली हम मिलते हैं, बात करते हैं और काम तो कानून से ही होता है। ठीक उसी तरह से फ्रेंडली रिलेशनशिप बनाने की इस कानून
24:45 में को का प्रयास किया गया कि ये पुलिस के पास जाने में, पुलिस स्टेशन जाने में हम हिचके नहीं और हिच को दूर किया गया। इनहिबिशन जिसको अंग्रेजी में कहते हैं वो नहीं हो। एक अंतिम बात जो मैं कहना चाहता हूं कि पुलिस के स्टेशनों में जब मैं सदर में था और मैंने प्रश्न भी किया था कम से कम ऐसे सैकड़ों पुलिस स्टेशन थे जहां टेलीफोन की सुविधा नहीं थी। वायरलेस तो बहुत दूर की बात है। उनके पास जो व्हीकल था वो इतना पुराना व्हीकल था जिसको स्टार्ट होने में ही एक घंटे लग जाते थे। पुलिसकर्मियों की कमी थी। इस कानून के द्वारा एक कोशिश की गई है कि पुलिस को के वेपंस को, पुलिस की ट्रेनिंग को, पुलिस की मानसिकता को, मानसिकता को भी मॉडर्नाइज करने की और अंतिम एक जो मैं सजेशन देना चाहता हूं कि पुलिसकर्मियों पे जैसा बताया
25:33 गया कि उन पे प्रेशर बहुत रहता है और काम का जैसा उन्होंने कहा कि दिवाली के समय भी नहीं अपने घर के फेस्टिवल के समय नहीं वो उनके परिवार भी उनके लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है। तो इसमें मानसिक बीमारी उन पे होती है। कुछ दिखाई पड़ता है, कुछ तो हर एक पुलिस स्टेशन को एक साइकेट्रिक से जोड़ना चाहिए जिससे उनको समय-समय पर उनको सलाह देना, उनसे मशवरा करना, उनसे बातचीत कराना जिससे पुलिस वालों को वो भी एक ह्यूमन बीइंग हैं। वो कभी-कभी 18 घंटे ड्यूटी करके जाते हैं। कभी-कभी परिवार के फंक्शन को छोड़ देते हैं। कभी परिवार में संघर्ष भी हो सकता है। तो पुलिस के साथ ये ये जो वहां के शिक्षण संस्थाओं और और साइकेट्रिक जो डॉक्टर हैं इन दो का सीधा संबंध होना
26:20 चाहिए। ये संबंध होने से पुलिस पुलिस की पर जो मानसिक दबाव है वो कम पड़ेगा। मानसिक दबाव जब भी हम मानसिक परेशानी या बीमारी की बात करते हैं तो भारत में अभी भी इतनी आधुनिकता के बावजूद भी यह है कि आप पागल घोषित करने की कोशिश कर रहे हैं। उस तरीके के सिस्टम में हम लोग आ नहीं पा रहे हैं और विशेष रूप से पुलिस के लिए हमें भी मानवीय रूप से सोचना चाहिए। हम अपेक्षा करते हैं पुलिसकर्मियों से पुलिस अधिकारियों से कि मानवीय पक्ष जो है उनका उजागर होना चाहिए। लेकिन हम जो है वो मानवीयता से नहीं देखते हैं। वहां पर हमें भी समाज को भी आगे आना चाहिए। संवेद रूप से क्या नीरू जी? नहीं देखिए निश्चित रूप से समाज को आगे आना चाहिए। लेकिन जो एक सबसे बड़ी समस्या जो हुई है ये मानसिकता
27:08 में हुई है। और जिसके कारण से पुलिस को उस रूप में देखा जाता है। सिर्फ यह नहीं कि पुलिस जो है वह गलत मतलब ब्रूटल होती है, अत्याचार करती है, यह करती है। भाई कहीं भी अगर प्रदर्शन हो रहा है, उग्र हो रहा है, रोकने की कोशिश करेगी। उसमें पैेट गन जो है गन जो है वो भी चलाना पड़ता है। आंसू गैस गोले छोड़ने पड़ते हैं। बात यह है कि एक ऐसी विचारधारा इस देश में रही जो सत्ता को सरकार को जनता के खिलाफ मानती रही और उकसाने में लगी रही कि ये सरकार जो है अलग है, जनता अलग है और पुलिस जो है वो जनता को दबाने का हथियार है। यह एक पूरा का पूरा यह विचारधारा अंदर में रही और इसको फैलाया गया। लेफ्ट लिबरल कहें आप अर्बन नक्सल कहें चाहे जो भी कहें ये एक
27:53 घर करवाया गया ये ये नहीं बताया गया कि पुलिस आपके बीच की है। अब जो ये सरकार कर रही है जो खासतौर पे गृह मंत्री का जो काम है वो करने का कि वो प्रॉब्लम देखते हैं और प्रॉब्लम का सॉल्यूशन क्या है वो ढूंढते हैं। वो वो सिर्फ तू तू मैं बहस में नहीं रहते हैं। जैसे कि तीन कानून में संशोधन की आपने कही कैसे उन्होंने वो न्याय पे आधारित बनाया। कैसे चीजें की वो डाटा पे जा रहे हैं। जितने क्रिमिनल हैं सबके बायोमेट्रिक्स जो है डाटा आ रहे हैं और वह सारे थानों में उपलब्ध है। जितने भी ड्रग स्मगलर्स हैं उनके अलग डाटा है जो वहां पे है। अगर अपराध में कहीं से एक फॉरेंसिक चीज कोई मिल गई बायोमेट्रिक कहीं मिला और उसको आपने जाके देख लिया अपने डाटा में और अगर पुराने से मैच किया तो
28:40 आपका केस एक दिन में सॉल्व हो गया। पुलिस को बहुत भागने की जरूरत नहीं है। नहीं है। और सबसे बड़ी बात यह है कि तकनीक समाहित करनी पड़ेगी। इनको और मजबूत करने के लिए इक्विप करना पड़ेगा। लेकिन हमें भी जो समाज को भी मानवीय संवेदना के साथ पुलिसकर्मियों को देखना पड़ेगा। इसलिए समाज के साथ मिलकर जो है पुलिसकर्मी काम कर पाएंगे और हमें और अधिक सुरक्षित रख पाएंगे। यह विषय बहुत वृद्ध है। बहुत विशाल है। किसी और समय और समय निकालेंगे। आप सभी विशेषज्ञों के साथ। फिलहाल समय है आपसे विदा लेने का। राकेश जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। नीरू जी आपका बहुत-ब धन्यवाद और एक बार फिर से अपनी विशेषज्ञता देने के लिए डॉक्टर विक्रम आपका भी बहुत-बहुत धन्यवाद वर्चुअली जुड़ने के लिए इनसाइट में आज के लिए इतना ही इनसाइट में आपसे फिर भेट होगी एक नए विषय के साथ।
29:26 फिलहाल मुझे आज्ञा दीजिए। बने रहिए संसद टीवी के साथ। नमस्कार। [संगीत] संसद टीवी के और भी प्रोग्राम्स देखने के लिए सब्सक्राइब करें हमारा YouTube चैनल और हां इन्हें लाइक और शेयर करना ना भूलें।