0:00 [संगीत] आचार्य जी मेरा क्वेश्चन ये है कि क्रोध पे कैसे काबू पाया जाता है? अगर सिर्फ क्रोध पे काबू पाना हो तो उसके लिए तो बहुत विधियां हैं। हम सबसे अच्छी विधि यह है कि किसी को नियुक्त कर दो कि जब तुम्हें क्रोध आ रहा हो तो एक डंडा मारे और आदमी तगड़ा होना
0:46 चाहिए। देखा है ना तगड़े आदमी के सामने क्रोध आता नहीं। तुम्हारे सामने कोई सबल राष्ट्रपति प्रधानमंत्री खड़ा हो कभी आया है तुम्हें इतना क्रोध कि तुमने उछल के उसका गला पकड़ लिया हो और यही बेचारा कोई गरीब सब्जी वाला हो रिक्शा वाला हो वहां बात बातबात में तुनक जाते हो बॉस के सामने कौन क्रोध प्रदर्शित करता है हां अधीनस्थ हो तो उसके सामने तो फिर कुछ भी कर सकते हो। अगर सिर्फ क्रोध की घटना पर काबू पाना
1:33 हो तो व्यवहारिक तल पर बहुत उपाय हैं। सर पे पानी डाल लो या क्रोध आ रहा हो तो पूरा ही क्रोध कर डालो। अंजाम ऐसा होगा कि फिर बहुत दिनों तक नहीं आएगा क्रोध। यह सारे उपाय क्रोध की घटना को द इवेंट ऑफ एंगर उसको रोक सकते हैं। और खेद की बात है कि हमारा ज्यादा आशय हमारा ज्यादा प्रयोजन ही क्रोध की
2:19 घटना से होता है। समझना क्रोध एक चीज है। क्रोध की घटना दूसरी चीज है। क्रोध की घटना है वो अवसर, वो मौका जब तुम फट पड़े। और क्रोध है एक सुलगता हुआ जीवन। अभी कल या परसों ही मैं कह रहा था कि क्रोध की घटना है कुकर की सीटी का बच जाना। और क्रोध है नीचे जलती आग। भीतर बढ़ता हुआ तनाव और दबाव। सीटी तो तभी बजेगी जब दबाव एक सीमा को पार कर
3:04 जाएगा। पर हमें इस बात से कोई आपत्ति ही नहीं होती कि आग लगी हुई है और दबाव बढ़ रहा है। हमें आपत्ति सिर्फ तब होती है जब सिटी बज जाती है। फिर हम कहते हैं सीटी कैसे ना बजे? तो बैठ जाओ सीटी पे नहीं बजेगी। या सीटी निकाल के फेंक दो ना रहेगा बांस ना बजेगी सीटी क्रोध तो ऐसा है जैसे किसी घर में या होटल में फायर अलार्म लगा हो जब धुआं उठता है और तापमान बढ़ता है तो वो बजने लग जाता है। बजता है ना? अब बहुत अगर दिक्कत हो रही हो कि क्यों बजता है बीच-बीच में तो उसका तार काट दो
3:49 नहीं बजेगा। क्रोध की अभिव्यक्ति तो सिर्फ एक रासायनिक घटना है। बाजार में गोलियां आ गई है। तुम उनको खा लो। क्रोध उठेगा ही नहीं। इंजेक्शन आ गए हैं लगा लो। क्रोध तुरंत गिर जाएगा। तुम मुस्कुराने लग जाओगे। तुम मस्तिष्क पर ऐसा प्रभाव डाल सकते हो कि क्रोध ना आए। लेकिन कोई भी गोली तुम्हारा जीवन नहीं बदल सकती। अब बताओ क्रोध की घटना भर पर काबू पाना है या जीवन बदलना है? क्योंकि क्रोध की अभिव्यक्ति क्रोध की घटना यूं ही नहीं होती। उसके पीछे एक सुबगता हुआ सुलगता हुआ जीवन होता है। एक ऐसा जीवन होता है जिसकी कामनाएं
4:37 पूरी नहीं हो पा रही है। वह चिढ़ा हुआ है। फिर वह बीच-बीच में फटा करता है। अनुकूल मौका पाकर के फटा करता है। जहां पाता है कि सामने कोई ऐसा है जिस पर फटा जा सकता है। वो फट जाता है। जो कोई क्रोध में दिखे समझ लेना कि जीवन नारकीय जी रहा होगा। नहीं तो क्रोध कहां से आता? क्रोध को उसी समय प्रेसिपिटेट करने वाली प्रकट करने वाली घटना हो सकता है बहुत छोटी सी हो। आपकी गाड़ी पर किसी ने खरोच मार
5:25 दी। आपने उसको गोली मार दी। खरोच का जवाब गोली। घटना छोटी सी थी। आपको क्या लग रहा है? गोली खरोच की वजह से चली? गोली खरोच की वजह से नहीं चली है। उसके पीछे एक जिंदगी है। जिसमें इच्छाएं बहुत है और पूर्णताएं बहुत कम। कामना ही जब पूरी नहीं होती तो क्रोध बन जाती है। क्रोध उठ नहीं सकता जब तक अपूरित कामनाएं ना
6:12 हो। और कामना क्यों करते हो? कामना इसलिए करते हो कुछ चाहिए। सीधी बात चाहना बुरा नहीं है। जैसे चाह रहे हो वैसे नहीं मिलता। जिस दिशा चलकर के चाह रहे हो उस दिशा नहीं मिलता। जब नहीं मिलता तो चिड़चिड़ाते हो। जब नहीं मिलता तो जो ऊर्जा कामना में लगी हुई थी वही ऊर्जा क्रोध बनकर उफनाती है। विस्फोट लेती है। जब चाहो तो बहुत सर्क होकर चाहो। यूं ही मत चाह लिया करो। चाहना भली बात है। आदमी को चाहना पड़ेगा। क्योंकि आदमी पैदा बंधन में होता
6:58 है। जो बंधन में पैदा हुआ है उसे मुक्ति तो चाहनी पड़ेगी। चाहो जरूर पर चाहते वक्त बहुत सावधान रहो। क्या चाह रहे हैं? ऊंची से ऊंची चीज मांगो और उसके लिए फिर न्योछावर हो जाओ। छोटाछोटा मांगोगे तो कभी संतुष्टि नहीं मिलेगी क्योंकि तुम्हें छोटे से संतुष्टि मिलनी ही नहीं है। एक क्रोध इस बात का होता है कि जो मांगा वो मिला नहीं। लेकिन जब मैं कहता हूं अपूर्ण कामना तो
7:45 मैं उस क्रोध की बात ज्यादा कर रहा हूं जो उठता है तब जब जो मांगा वो मिल गया। हम इस बात पर तो क्रोधित हैं ही कि जो चाह रहे हैं वह हो नहीं रहा। हम इस बात पर ज्यादा क्रोधित हैं कि जो चाहते हैं जब वो हो भी जाता है तो भी भीतर बेचैनी बनी ही रहती है। असफल आदमी का क्रोध तो चलो ठीक है। सफल आदमी का क्रोध असीम होता है। क्योंकि वह सफल तो हो गया लेकिन फिर भी भीतर कुछ सुबक की राह
8:30 है। इधर हाथ चला लिए उधर पहुंच गए लेकिन भीतर कोई है जिसके आंसू पूछते ही नहीं। एक अजीब सी है जो दरिद्रता चेहरे पर भी दिखाई देती है। आंखें जैसे किसी भिखारी की हो बहुत कुछ पा लेने के बाद भी। तो चाहना बड़ी जिम्मेदारी का काम है। यूं ही मत चाह लिया करो। चाह चाह के अपनी हालत इतनी खराब करी है। ऊपर वाले ने श्राप नहीं दिया है कि जीवन खराब रहेगा। ये हमने चाहा है। ध्यान से देखना। आज जिनको तुम कहते हो कि ये हमारी जिंदगी का बवार हैं। जीवन का
9:16 नर्क है। वो सब कभी तुम्हारी चाहतें हुआ करती थी। और 100-100 बार तुमने कहा था कि जान से ज्यादा चाहते हैं [प्रशंसा] तुम्हें। अब आज कहते हो ना चाहत है ना जान है। मुर्दा जिस्म है। होश पूर्वक चाहोगे तो मुक्ति मिलेगी सौंदर्य मिलेगा। बेहोशी में
10:01 चाहोगे तो बेचैनी मिलेगी और क्रोध मिलेगा। [संगीत]