0:00 इस अदालत में आरोपी को पेश किया जाए। यह न्यायालय अब आरोपनामा की सुनवाई के लिए तैयार है। आरोपी है आचार्य प्रशांत। आरोप है भगवत गीता के साथ छेड़छाड़। सिन्हा जी आप कारवाई शुरू करें। तो 25 आरोप हैं हमारे कुल मिला के हर आरोप के लिए हमने कड़ी से कड़ी रिसर्च की है। तो आरोपी पे यह आरोप है कि गीता को मोनेटाइज किया गया है। टीचिंग है इच्छाओं से मुक्ति लेकिन पेड कोर्सेज, सब्सक्रिप्शन, डोनेशंस, एड्स पूरा ही
0:45 इकोसिस्टम खड़ा किया है। पर ये ये कहां लिखा है कि कृष्ण नहीं है। आरोप है कि एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया जा रहा है जहां क्रिटिकल थिंकिंग कम होती है। डिपेंडेंस को बढ़ाया जाता है। ये इल्जाम मुझ पे नहीं है तो आप पे है। मैं क्यों जवाब दे रहा हूं? आप दो ना जवाब। एग्जामित है। इसको कौन चला रहा है? आ गया आ गया आ गया आ गया आ गया आ गया आ गया पीछे पीछे पीछे पीछे माय लॉर्ड आरोपी को कंट्रोल में करिए कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं। मेंटेन द डेकर ऑफ़ ऑफ कोर्ट। लोग कहते हैं कि कॉपीराइट स्ट्र्राइक्स का
1:32 यूज करके क्रिटिकल चैनल्स जो आपके खिलाफ सबूत इकट्ठा करती है उनको आप सप्रेस कर देते हो। एक आर्गुमेंट का जवाब देने की बजाय जिसने प्रश्न किया उसी पर ब्लेम किया जाता है। गीता में उन्हें जो भी अच्छा नहीं लगता है वो गीता से लेकर लोकधर्म में डाल देते हैं। रिगार्डेड बाय मेनी पीपल एस एक्सट्रीम और डेंजरस अनन्या जी। यहां एक कल्ट चलाया जा रहा है। ये क्या बोल रही हैं? डमरू डमरू बजाइए। मान नहीं रही है। अनन्या जी मेंटेन द डेगर ऑफ़ ऑफ कोर्ट। इतनी महंगी बुक्स हैं आपकी। ₹200 ₹300 की किताबें हैं। पब्लिशिंग फ्री क्यों नहीं कर देते हैं? करोड़ों सब्सक्राइबर्स हैं इनके। लेकिन क्या वो लोग कुछ बदले हैं?
2:18 आपने अध्यात्म को मेजरेबल बना दिया है। अब थोड़ी बात गंभीर होने वाली है तो सब थोड़ा ठीक से बैठ जाएं। अगर गीता जेन्युइनली एंटी कास्ट है तो कृष्ण खुद शंकर को प्रॉब्लम क्यों कहते? अरे उसी श्लोक में स्त्री को पाप योनि कहा। तो हिंदू धर्म के अलावा और भी धर्म है भारत में भी और विश्व में भी। तो इतने सारे धर्म बहुत सारे पुनर्जन्म को मानते हैं। तो इतने सारे धर्म एक साथ गलत कैसे हो सकते हैं? ये कौन सा तर्क है दैट द मेजॉरिटी इज द अथॉरिटी? ये कौन सा तर्क है? आप यह मत सोचिएगा कि ये जो लड़ाई यहां चल रही है, यह गीता के एक इंटरप्रिटेशन और दूसरे इंटरप्रिटेशन के बीच की है। नहीं नहीं, यह वो लड़ाई नहीं चल रही। आप यह भी मत सोचिएगा कि यह जो यहां बहस चल रही है, वो रशनलिटी और स्पिरिचुअलिटी के बीच की है। यह वो बहस भी नहीं। यह यहां जितनी बातचीत चल रही है वो इसलिए चल रही है कि आपके ऊपर
3:08 आप जान ही नहीं रहे हो कि हम जो काम कर रहे हैं उस काम का महत्व क्या है? धर्म की आज से ज्यादा ग्लानि किसी काल में हुई है। तो नहीं हुई है तो आज ही जरूरत है ना धर्म को अभ्यत्थान की। अभ्यर्थान धर्मस तदत्मानम हम वो काम कर रहे हैं और वो श्लोक आपको यहां आरोपों की घड़ी में नहीं दिखाया जाएगा। इस अदालत में आरोपी को पेश किया जाए।
4:51 यह न्यायालय अब आरोपनामा की सुनवाई के लिए तैयार है। आरोपी है आचार्य प्रशांत और भगवत गीता। आरोप है भगवत गीता के साथ छेड़छाड़। सिन्हा जी आप कारवाई शुरू करें। गीता के साथ छेड़छाड़। गीता ने एफआईआर करी क्या? आपकी आवाज नहीं आ रही। हेलो। हां। गीता के साथ छेड़खड़ गीता ने एफआईआर करी क्या? माननीय आरोपी पे कुल मिला के हमारे 25 आरोप है और
5:39 हर आरोप के लिए हमने कड़ी से कड़ी रिसर्च की है। मैं एक-एक आरोप आपको बताऊंगी और फिर आरोपी जवाब दे सकते हैं। तो शुरू करते हैं। माननीय पहला आरोप गीता दूसरे अध्याय 13वे श्लोक स्क्रीन पेश किया जाए। आवाज नहीं आ रही भाई इनकी भी। देखिए ये ये वकील लगाए गए हैं मेरे खिलाफ।
6:31 और मेरा वकील कहां है? इधर के तो तीन लगा दिए। मेरा कहां है? मेरा कहां है भाई? हां? मेरा वकील कहां है? ये बताओ। ये है तो मेरी आवाज जा रही है ना? हमें तुम्हारी चीजें नहीं चाहिए। अच्छा अब समझ में आया फाउंडेशन के पास पैसे नहीं थे तो मुझसे कहा गया है अपना वकील खुद बनो और उधर ये तीन खड़े कर दिए हैं बताइए जी क्या आरोप है तो 25 आरोप है हमारे कुल मिला के और हर आरोप के लिए हमने कड़ी से कड़ी रिसर्च की है। तो मैं एक-एक आरोप करके
7:18 बताऊंगी और फिर आरोपी जवाब दे सकते हैं। अह जज माने पहला आरोप हमारा गीता दूसरा अध्याय 13वां श्लोक स्क्रीन पर पेश किया जाए। सबने पढ़ लिया है। अब पढ़ा नहीं होता तो परीक्षा में फेल होते ना। इस पे तो कई बार परीक्षा हो चुकी है सबकी। जी सबने पढ़ ही लिया है। हम बताइए कृष्ण कह रहे हैं जैसे शरीर में बचपन जवानी बुढ़ापा आता है उसी प्रकार मृत्यु के बाद देही को दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है। अब यहां देखें देहांतर शब्द है।
8:05 दो शब्द हैं। देह और अंतर। देह मतलब शरीर और अंतर माने दूसरा। संस्कृत तो बिल्कुल प्लेन है। लेकिन आरोपी का कहना है कि दूसरे फिजिकल शरीर में जाना ही नहीं है। यह अहंकार कि एक अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना है। अब हमें तो यहां अहंकार कहीं दिख नहीं रहा। माननीय यह रीडिंग सदियों की वेदांतिक परंपरा में नहीं आती। किसी प्रमुख भाष्यकार ने यह नहीं कहा है कि यह यहां बात अहंकार की हो रही है। अरे देखिए सदियों से जो अर्थ चला आ रहा है उसको बदलने से पहले किसी से पूछ तो लिया होता। नहीं पूछा। अरे अनन्या जी सेल्फ कंट्रोल।
8:50 माननीय सेल्फ कंट्रोल तो आरोपी को करना चाहिए था टेक्स्ट के साथ। नहीं कौन सा वाला सेल्फ कैपिटल है स्मॉल एस? अरे अगर कैपिटल एस है तो उसे कोई कंट्रोल कर नहीं सकता वो अनंत है और स्मॉल एस है तो वो खुद को कंट्रोल करेगा इससे बड़ा पाखंड नहीं हो सकता तो सेल्फ कंट्रोल जैसी कोई चीज होती नहीं वो वैसे ही है जैसे सेल्फ हेल्प खैर आगे बढ़िए तो पहला आरोप फिर यही है कि देहांतर का यह अर्थ कहां से आया कहां से आया? क्या वेदांत से आया? देहांतर से पहले देखिए वहां आता है देही। वो पहला
9:38 ही शब्द है श्लोक का। एक कई वकील ऐसे हैं पता नहीं कि ये आरोप भी ठीक से समझा पाए हैं कि नहीं। आरोप यह लगता रहा है कि यहां बात हो रही है आत्मा के पुनर्जन्म की। यह आरोप लगता रहा है कि यह जो 13वा श्लोक है दूसरे अध्याय का यह तो स्थापित करता है कि आत्मा का ही पुनर्जन्म होता है। तो जो यह आरोप लगा रहे हैं वह सिद्ध करें ना कि इसमें आत्मा कहां लिखा हुआ है? आत्मा कहां लिखा हुआ है कि आत्मा का पुनर्जन्म होता है। पुनर्जन्म होता है। इससे तो मैंने कभी इंकार करा ही नहीं।
10:23 आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता। यह कहा है मैंने और इस बात पर पूरा वेदांत एक सम्मत है। लॉर्ड तो इतना ही तो लिखा है कि जो देही है वो जैसे जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं को पार करता है। पहले कुमार रहता है माने बच्चा रहता है। फिर यौवन आता है। फिर जरा बुढ़ापा तो आगे फिर लिखा है कि इसी तरह से देहांतर होता है। इसमें यह कहां लिखा है कि आत्मा का यह सब कुछ हो रहा है। तो ले दे के अब मूल प्रश्न यह आएगा कि यह
11:09 देही कौन है? उसी से सिद्ध होगा कि देहांतरण माने क्या? देही कौन है? देही का शाब्दिक अर्थ क्या है? जो देह में रहता है और स्वयं को देह का स्वामी घोषित करता है। एक तरह समझिए द रेसिडेंट ओनर ऑफ द बॉडी रहता है देह में और खुद को देह का मालिक भी मानता है। वो है देही। जो पारंपरिक अनुवाद रहा है इसका जिसकी अभी वकील साहिबा दुहाई दे रही थी। पारंपरिक अनुवाद कहता है कि आत्मा देही है। आत्मा देही है। क्या आत्मा देही हो सकती है? वेदांत दर्जनों बार
11:54 हर जगह पर हर तरीके से गूंज कर दहाड़ कर घोषणा करता है कि आत्मा का देह से कोई संबंध नहीं हो सकता। जब आत्मा का देह से कोई संबंध नहीं हो सकता तो आत्मा देही कैसे है? आत्मा अचल है। जब आत्मा अचल है। अचल माने जो हिल ही नहीं सकता। जो अचल है वह एक देह से दूसरी देह में कैसे चला जाएगा? जो अचल है वो चला कैसे जाएगा? आत्मा अजात है। जो अजात है उसका तो पहला ही जन्म नहीं हो सकता। उसका दूसरा जन्म कैसे हो जाएगा?
12:40 तो जब पुनर्जन्म की बात आती है तो सबसे पहले तो इस बात का खंडन करना जरूरी है कि पुनर्जन्म आत्मा का नहीं होता भाई। और मैंने यह कभी नहीं कहा कि पुनर्जन्म नहीं होता। पुनर्जन्म होता है पर आत्मा का नहीं। पुनर्जन्म किसका होता है? पुनर्जन्म प्रकृति का होता है। और दो तरीके से होता है पुनर्जन्म। दो तरीके से एक ऐसे कि जैसे सागर में लहरें आती हैं। यह इतना सुंदर उदाहरण है कि मैं इसको बार-बार देता हूं। सागर है उसमें लहरें आती हैं, गिरती हैं। फिर लहर आई फिर गिरी। लेकिन उसका यह अर्थ नहीं है कि पहली लहर की कोई विशिष्टता थी जो बची रह जाएगी और फिर वही विशिष्टता
13:28 किसी दूसरी लहर में हमें नजर आएगी। ऐसा कुछ नहीं होता है। पुनर्जन्म ऐसे ही होता है कि जैसे पेड़ पर पत्ते आते हैं। पुनर्जन्म ऐसा ही होता है कि पेड़ जब गिर जाता है तो पुनः मिट्टी हो जाता है। फिर वो मिट्टी घास हो जाती है। उस पे घास के फूल आते हैं। उन फूलों को किसी चिड़िया ने खा लिया। चिड़िया ने अंडे दिए। उसमें से छोटे-छोटे बच्चे चिड़िया के पैदा हो गए। पुनर्जन्म प्रकृति में ऐसे होता है। यह एक ये प्राकृतिक पुनर्जन्म है। यह स्थूल चीज है। यह दो अलग-अलग देहों के मध्य पुनर्जन्म की घटना है। एक देह गिरी वो देह मिट्टी हो गई। उस मिट्टी के कुछ हिस्से से कोई दूसरी देह खड़ी हो गई। यह एक प्रकार का पुनर्जन्म है और जो दूसरे प्रकार का
14:14 पुनर्जन्म होता है वह एक ही देह के भीतर भीतर होता है और वो लगातार चलता रहता है। हालांकि जो पहली कोटिका है वो भी लगातार ही चल रहा है। सागर से लहरें लगातार ही उठ रही हैं। जो एक ही देह के भीतर पुनर्जन्म होता रहता है। वह अहंकारिक है और क्योंकि अहंकार भी प्रकृति का ही हिस्सा है। तो इसीलिए है वह भी प्राकृतिक। माने दो तरह के जिन पुनर्जन्मों की मैं बात कर रहा हूं वह दोनों ही प्राकृतिक हैं। एक स्थूल हो गया और एक सूक्ष्म हो गया। स्थूल कौन सा है? वो सागर की लहरों वाला। वो शरीर के मिट्टी में गिरने के बाद शरीर के एक हिस्से का घास हो जाना। वह स्थूल
15:00 पुनर्जन्म है। और प्राकृतिक ही दूसरा पुनर्जन्म कौन सा हुआ? जिसमें अहंकार है भीतर। वह प्रतिपल नए-नए विषयों के साथ रिश्ता बनाता रहता है। अभी वह था क्या? मैं पैसे वाला हूं। थोड़ी देर बाद वह चला जाएगा और वह कहेगा मैं परिवार वाला हूं। अभी उसका रिश्ता इस घड़ी से बना है तो कहेगा मैं घड़ी वाला हूं। थोड़ी देर में उसका रिश्ता अपने यारों से बन जाएगा तो कहेगा मैं यारों का यार हूं। अभी इस घर में है तो कहेगा मैं इस घर का मालिक हूं। अभी दूसरी देर में उस घर में चला जाएगा। किसी गाड़ी में बैठ जाएगा तो कहेगा मैं गाड़ी का मालिक हूं। वो अपने
15:45 विषय लगातार बदल रहा है। आई एम एक्स आई एम व बनता जा रहा है। लो हो गया पुनर्जन्म। यह सूक्ष्म पुनर्जन्म है। यह भीतर भीतर घटना घट रही है। पुनर्जन्म निसंदेह होता है। पर आत्मा का पुनर्जन्म जैसी कोई बात नहीं होती है। पुनर्जन्म प्रकृति का ही होता है। देह के बाहर भी और देह के भीतर भी। देही कौन है? कहां चला गया वो श्लोक? देही कौन है? निसंदेह वह जो देह को अपनी संपत्ति समझता है वही देह है। क्या
16:33 नाम हुआ उसका? अहंकार अहंकार वही है देही। आत्मा नहीं देही है। आत्मा नहीं देह धारण कर लेती। आत्मा कुछ नहीं धारण कर सकती। एक बात बताइए। आत्मा यदि अनंत है तो उसने अगर देह धारण करी तो देह भी कितनी बड़ी होनी चाहिए? अनंत ये तो फंस गए ना जो अनंत है वह अपने ऊपर कुछ धारण कैसे कर लेगा जो अनंत है वह एक देह से निकल के दूसरी देह में कैसे चला जाएगा जो अनंत है उस पर कर्म फल का प्रभाव कैसे पड़ जाएगा तो आत्मा देही है यह बात सर्वथा अमान्य है वेदांत की दृष्टि में और मुझ पर जो आरोप लगे हैं वह तो यहां साफ-साफ दिखाए जा रहे
17:19 हैं। अब वकील नहीं है मेरे पास। चलो कोई बात नहीं। पर मेरे पक्ष की भी तो कुछ दलीलें दिखा दी जाए। वेदांत से ना जाने कितने मंत्र हैं और कितने उदाहरण हैं जो सीधे-सीधे स्थापित करते हैं कि आत्मा देही नहीं होती। क्या मेरे साथ इंसाफ होगा और वकील साहब लोग कुछ वो भी दिखाएंगे? जी कमलेश जी पेश किया जाए। हां यही है। ये ये मेरी तरफ के हैं। तुम ये कठोपनिषद 1.2.22 पहला ही शब्द है अशरीरम। एक सेकंड रुक जाइए। वो देख नहीं पा रहे
18:06 हैं। उनके में बदली नहीं है अभी तक। ये ऐसे ही है ये मुकदमा भी। ना तुक ना तर्क बस यह रंग बिरंगी पट्टियां लगा दी। मैं आ रहा था कि आज गीता सत्य ने मुझे पकड़ लिया। हथकड़ी लगा दी। आंखें बांध दी अब बोल रहे हैं मुकदमा चलाएंगे। बताओ ये कहां का इंसाफ है? पहला ही शब्द क्या है? यह आत्मा के लिए प्रयुक्त है। पहला ही शब्द श्लोक में आपको क्या दिखाई दे रहा है? आत्मा अशरीरी है। आत्मा का शरीर से कोई संबंध नहीं। जो असीम है जो असीम है उसका शरीर से क्या
18:51 रिश्ता बनाओगे? जो असीम है उसका शरीर से क्या रिश्ता बनाओगे? शरीर की तो अवस्थाएं बदलती रहती हैं। और मंत्र साफ-साफ कह रहा है कि वह है जिसकी अवस्था बदलती नहीं क्योंकि उसकी कोई अवस्था है ही नहीं। वह वह है जिसकी कोई अवस्था हो नहीं सकती। और दिखाइए अपनी तरफ के तो जल्दी से दिखा दिए। ये भूलिएगा नहीं। यह सब लोग अभी अदालत में मौजूद हैं।
19:37 कंगारू कोर्ट मत बना दीजिएगा। यह देखिए कुछ नहीं दिखा रहे हैं यहां। मेरे सामने कुछ नहीं आ रहा। ये देखिए ये हमारी न्याय व्यवस्था है। ये तुमने लॉक लगा दिया। बंद होगा बार-बार। हटाओ इसको। यही ठीक है। आप लोग उपद्रव के लिए तैयार रहिएगा। यह मुझे कोई भी सजा सुना सकते हैं। गीता दूसरा अध्याय 24वां श्लोक आत्मा सर्वव्यापी है। अब सर्वव्यापी है माने
20:25 क्या होता है? जो हर जगह है। जो अगर शरीर के अंदर ही है तो हर जगह कैसे हो सकती है? जो शरीर ही के भीतर है। क्या वो सर्वव्यापी हो सकता है? आत्मा स्थिर है। क्या शरीर स्थिर है? अगर शरीर स्थिर नहीं है तो आत्मा यदि शरीर के भीतर होती तो वो कैसे स्थिर हो जाती? जब शरीर इधर-उधर भाग रहा है तो फिर आत्मा भी भक्ति इधर-उधर। पर आत्मा तो स्थिर है। आत्मा नित्य है। क्या शरीर नित्य है? तो आत्मा नित्य फिर कैसे हो जाएगी? आत्मा का शरीर से कोई लेना देना नहीं है। आत्मा अनंत है। आत्मा अनंत है। जो अनंत है उसे असीम भी होना पड़ेगा।
21:11 क्या शरीर असीम है? अष्टावक्र गीता पहला अध्याय तीसरा ही श्लोक। राजा जनक ने सवाल करा है। मुनि अष्टावक्र राजा जनक का आत्मा से परिचय कराते हैं। उन्हें उनकी असली पहचान बताते हैं और कहते हैं तुम तुम वो हो जो ना पृथ्वी है ना जल है ना अग्नि है ना वायु है ना आकाश है। पंचभूत में से कुछ नहीं हो। तुम आचार्य शंकर के निर्वाण शटकम में भी आपको यही बात सुनने को मिलती है। जो पंचभूतों में कुछ भी नहीं वह पंचभूत से बने शरीर में स्थित हो सकता है क्या? मेरा प्रश्न है आपसे यह शरीर है। यह शरीर
21:57 पंचभूत से बना है। जो पंचभूत से बना है। अगर कुछ उसके अंदर होगा तो वो भी किससे बना होगा? पंचभूत से। क्या आपके शरीर के भीतर ऐसा कुछ भी है जो पंचभूत से ना बना हो? क्योंकि शरीर पंचभूत से बना है। माने भौतिक है। एलिमेंट्स से बना है। तो शरीर के भीतर जो होगा उसे भी किससे बना होना पड़ेगा? पंचभूत। पंचभूत से ही। पर यह तो कह रहे हैं कि आत्मा वो नित्य नित्य में वर्णन है। आत्मा वो जिसका पंचभूत से कुछ लेना ही देना नहीं। जब आत्मा का पंचभूत से कुछ लेना देना नहीं तो आत्मा इस पंच भौतिक शरीर में कहां से आ जाएगी? अष्टावक्र गीता का ये अगला श्लोक चौथा पहला अध्याय
22:43 आत्मा का परिचय देते हुए कह रहे हैं। स्वयं को शरीर से अलग जानो तुम। तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा हो। यह बात कही नहीं गई नहीं गई है। मैं इसको प्रकोष्ठ में कह रहा हूं। तुम स्वयं को शरीर से अलग जानो। शुद्ध चैतन्य में स्थित रहो। शांत रहोगे। बंधन मुक्त रहोगे। शरीर से अलग। शरीर से कोई लेना देना नहीं। अब वो श्लोक जिसको मैं आपके सामने बहुत बार उधरत किया करता हूं। दूसरा अध्याय 22वां श्लोक ना हम देहो ना में देहो ना हम देहो ना में देहो ना मैं देह हूं ना देह मेरी है यह आत्मा का रिश्ता है देह के
23:30 साथ ना आत्मा देह है ना आत्मा देह की स्वामी है तो देही क्या आत्मा हो सकती है हम दूसरे अध्याय के 13वें श्लोक को लेकर मुझ पर जो आरोप लगाया गया है उसकी बात कर रहे हैं कि देही कौन है यहां कहा जा रहा है न में मैं देहो न में देहो माने देह मेरी नहीं है। अगर देह आत्मा की नहीं है तो क्या देही आत्मा हो सकती है? लेकिन जितने भी परंपरागत सब भाष्य और अर्थ वगैरह चलते रहे हैं उसमें बड़ी सुविधा से देही की आगे लिख देते हैं आत्मा। मुकदमा क्या मुझ पर चलना चाहिए? जिन्होंने देही को आत्मा घोषित कर दिया। उनसे आकर पूछो ना कि ये इतना बड़ा ब्लंडर
24:15 कैसे कर दिया? ऑब्जेक्शन में लॉर्ड हमने आत्मा नहीं कहा है। हमने जीवात्मा कहा है। आत्मा आप आप मेरे शब्द को बदल रहे हैं। लोक धर्म में आत्मा और जीवात्मा एक ही होते हैं। यही तो सबसे बड़ी समस्या है ना। वहां दो चलते हैं। एक परमात्मा और एक जीवात्मा। और आत्मा और जीवात्मा एक ही माने जाते हैं वहां। और उनको मुझसे बड़ी समस्या यही है कि मैं बता रहा हूं कि आत्मा और जीवात्मा अलग होते हैं। एक नहीं होते। जो मुझ पर आरोप लगा रहे हैं। उनकी भाषा में उनके शब्दकोश में आत्मा और जीवात्मा
25:00 एक ही चीज होती है। आप भी जब तक गीता में नहीं आए थे। क्या आप आत्मा और जीवात्मा अलग-अलग जानते थे? आपके लिए भी आत्मा जीवात्मा एक ही बात थी। अष्टावक्र गीता छठा अध्याय पहला श्लोक मैं आकाश के समान अनंत हूं। और यह जगत घड़े के समान है। क्या आकाश घड़े में समा सकता है? तो क्या आत्मा जगत में भी समा सकती है? जब जगत में नहीं समा सकती तो क्या शरीर में समा जाएगी? श्लोक कह रहा है मैं तो वह हूं जो आकाश के समान अनंत है। आत्मा को आकाश की उपमा बार-बार दी जाती है वेदांत में। आत्मा आकाश समान है। आत्मा आकाश तुल्य है।
25:47 और जगत क्या है? घड़े के समान। क्या घड़े में आकाश समा जाएगा? नहीं समा जाएगा ना। और पूरा जगत ही घड़ा है। तो यह यह क्या है? यह तो घड़े का भी एकदम छोटे से छोटा हिस्सा है। क्या उसमें आकाश समा जाएगा? समझ आएगा क्या? तो आत्मा कहां से शरीर में हो गई? छांदोग्य उपनिषद 8.1.1 शरीर तो मृत्यु के अधीन है। परंतु आत्मा अशरीरी है। आत्मा अशरीरी है। कठोपनिषद 1.2.18
26:34 आत्मा ना कभी जन्म लेती है ना मरती है। किसी कारण से उत्पन्न नहीं होती और ना आत्मा से कुछ उत्पन्न होता है। ना आत्मा को पैदा करने वाला कोई है ना आत्मा से कभी कभी कोई पैदा होता है। आत्मा ना जन्म लेती है। ना आत्मा मरती है। अजन्मी है। नित्य शाश्वत सनातन है। शरीर नष्ट हो जाता है। आत्मा नष्ट नहीं होती है। आत्मा अजन्मी है। जब आत्मा अजन्मी है तो आत्मा का पुनर्जन्म कैसे हो जाएगा? पुनर माने दूसरा पहला ही कहां है? दूसरा कहां से हो जाएगा? आत्मा अचल है। ईशा उपनिषद ईशावास्य चौथा पांचवा श्लोक।
27:26 वह परम तत्व ना तो जन्म लेता है ना ही जन्म रहित है। जितनी भी बातें किसी भी भौतिक या मानसिक पदार्थ पर लगाई जा सकती हैं। आत्मा उन सबसे परे है। क्योंकि आत्मा अचिंत्य है। चिंतन करा जा सकता है मुक्ति का भी और चिंतन करा जा सकता है बंधन का भी। तो इसीलिए जब आत्मा की बात आती है तो मुक्ति और बंधन दोनों की नेति हो जाती है क्योंकि कोई भी मानसिक उपाधि आत्मा पर लागू नहीं होती है। जो कुछ शरीर के भीतर है क्या वो मानसिक उपाधियों से मुक्त होगा? नहीं। पर आत्मा
28:12 निरुपाधि है। आत्मा पर कोई मानसिक उपाधि नहीं लगती है। ऑब्जेक्ट लॉर्ड ऑब्जेक्शन सुनिए सुनिए। बंधन नहीं होंगे तो परिवार टूट जाएंगे। माय लॉर्ड। ये इन सब आरोपों का असली आधार खोले दे रही हैं। बहुत जल्दी। मुकदमा लंबा चलना इतनी जल्दी बता दिया कि इन आरोपों की असली वजह क्या है तो गड़बड़ हो जाएगी। वो देखिए कुछ आपका कंघी कर रहे हैं।
29:13 जज साहब अब मैं भी आरोप मैं पहले पढ़ दूंगी स्नेहा जी आपको और कोई आरोप इस इस आरोप के संबंध में और नहीं वो कुछ और भी बोलना चाहते हैं अब मौका देना पड़ेगा बोलिए बोलिए क्या इसी से संबंधित ना दूसरा अध्याय 13वा श्लोक ना हम बहुत अच्छे उपनिषद आत्मा स्थूल नहीं सुख सूक्ष्म नहीं, छोटी नहीं, लंबी नहीं, लाल नहीं, चिकनी नहीं, छाया नहीं, अंधकार नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं, आस्तिक नहीं, आंख, कान, वाणी नहीं, मन नहीं, तेज नहीं, प्राण, मुख माप ये नहीं, वो नहीं। खाती नहीं, उसे कोई नहीं खाता। इनमें सब में जो प्रमुख केंद्रीय शब्द है जो बार-बार आ रहा है वो क्या है? नहीं। जो भी कुछ तुम आत्मा के बारे में कह सकते हो आत्मा वो नहीं। वो नहीं। तो यह कैसे
30:01 तुमने दावा कर दिया कि आत्मा शरीर के भीतर रहती है। जो शरीर के भीतर है उसके बारे में तो फिर सब कुछ ही कहा जा सकता है। और आत्मा के बारे में जो कुछ भी कहा गया है हमेशा नकार में कहा गया है। कभी उसको ले कोई पॉजिटिव असरशन नहीं करा जाता। अवधूत गीता नास्त देहो न में विदेहो मैं वो हूं जिसका कोई शरीर नहीं और मैं वो भी जो शरीर रहित नहीं क्योंकि अगर यह भी कह दिया कि शरीर रहित हूं तो भी कुछ कह दिया और आत्मा वो जिसके बारे में कुछ भी नहीं कहा जाना चाहिए यानी वर्चनी य है आत्मा
30:50 ना बुद्धि से कोई रिश्ता ना मन से ना इंद्रियों से ये बाकी तो आपने मुझे अपनी किताब दे दी बाकी से मेरा कोई लेना देना नहीं आपका है पुनर्जन्म निसंदेह होता है लेकिन उसका नहीं जिसको साधारण धर्म में जीवात्मा कहा जाता है। पुनर्जन्म प्रकृति
31:37 मात्र का होता है। वो अलग-अलग मनुष्यों में भी पुनर्जन्म ले रही है। मनुष्य से मेरा अर्थ है अलग-अलग प्राणियों में भी जितने भी भूत हैं जितने भी प्राणी हैं उनमें भी और एक प्राणी के भीतर भी वो लगातार पुनर्जन्म ले रही है। इंटर और इंट्रा दोनों किस्म का रीइकार्नेशन लगातार चल रहा है। अगर आप यह कह रहे हैं कि आत्मा है जो जाकर पुनर्जन्म ले रही है तो यह आप गलत कह रहे हैं। आत्मा वेदांत का बहुत पवित्र, बहुत केंद्रीय शब्द है। उसका प्रयोग बहुत सम्मान और समझ के साथ किया जाना चाहिए। बात आ रही है समझ में? अब अब यह भी समझना जरूरी होगा कि
32:23 एक व्यक्ति के भीतर से कुछ जीवात्मा जैसा निकलता है और दूसरे व्यक्ति में चला जाता है और चला ही नहीं जाता। यहां से वह उसके पाप, पुण्य और पुराने कर्म, फल और पुरानी स्मृतियां वगैरह भी लेकर के चला जाता है। और दूसरे व्यक्ति के भीतर घुस जाता है। एक तरह से ट्रांसप्लांट हो जाता है। उसके गर्भ में जाकर के जीवात्मा घुस गई। यह मान्यता इतनी शताब्दियों तक प्रचलित क्यों रही? क्योंकि ये मान्यता वेदांत की नहीं है। यह मान्यता इतनी शताब्दियों तक चली। क्यों? यह इसलिए चली क्योंकि इसके साथ बड़े जबरदस्त स्वार्थ जुड़े हुए थे।
33:11 तुम कैसे किसी को सिद्ध करोगे कि तेरी जाति या तेरे लिंग के आधार पर मैं तुझे अधिकार नहीं दे रहा या तेरा शोषण कर रहा हूं तो यह बात जायज है। यह कैसे सिद्ध करोगे? यह सिद्ध करने का यह तरीका है कि तुम इस लिंग में या इस वर्ण इस जाति में पैदा ही इसीलिए हुए हो क्योंकि तुम्हारे भीतर जो जीवात्मा आई वो पीछे के तुम्हारे कुछ कुकर्म या पाप लेकर आई थी। अगर तुम्हारी पीछे से वो जो जीवात्मा चली आ रही है वो ठीक-ठाक होती तो तुम स्त्री बन के काहे को पैदा होते? तुम शूद्र बनकर काहे को पैदा होते?
33:57 तो तुम पुराने पापी हो और जब तुम पुराने पापी हो तो अब तुमसे गुलामी कराने का या तुम्हारा शोषण करने का हमारा हक है। बात समझ में आ रही है? इस मान्यता को बनाए रखने के पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण थे। आप किसी को गुलाम बनाएं। उसको पता है कि उसके साथ अन्याय हो रहा है तो कभी ना कभी विरोध करेगा। पर आप किसी को गुलाम बनाए और उसको जता दें कि तेरी गुलामी तेरे ही पिछले जन्म के पापों की सजा है। तो अब वो विरोध नहीं करेगा क्योंकि अब तो आप इंसाफ कर रहे हैं। भाई पिछले जन्म में
34:44 तुमने हमसे ₹ लाख उधार लिए थे। चुकाए नहीं थे। तो अब इस जन्म में हमें हक मिल जाता है तुमसे ₹ लाख की बेगार कराने का। बेगार माने अनपेड फोर्स लेबर कैसे? क्योंकि अब हम बता रहे हैं ना देख के कि ₹ लाख का तुम पर पिछले जन्म का कर्जा चढ़ा हुआ है। तो चलो हमारे दो लाख उतारो। और अब तुम विद्रोह भी नहीं करोगे। बल्कि तुमको यह लगेगा कि यह तो इंसाफ हो रहा है। इंसाफ ही नहीं हो रहा है। तुम अब अगर उण हो गए, कर्ज मुक्त हो गए तो अब तुम्हें आशा रहेगी कि शायद अगले जन्म में तुम भी पुरुष बन जाओ और सेठजी बनकर पैदा हो। आ रही है बात समझ में? तो इसलिए यह जो
35:31 पर्सनल ट्रांस माइग्रेशन का कांसेप्ट है यह इतने दिनों तक चलता रहा। नहीं तो वेदांत दर्शन में इसका कोई आधार नहीं है। बिल्कुल कोई आधार नहीं है। ना हम देहो नमे देहो गरजती हुई उक्ति है। याद रखिएगा ना हम देहो नमे में देहो और इस पर बहुत बार बोल चुका हूं। ये यही मेरा सबमिशन इस पर इतना ही था। बाकी आगे अब इतने स्नेहा जी द लर्नड प्रोसकटर्स देखिए अब हम जीवात्मा कह रहे हैं। ये कुछ और कह रहे हैं। डिसाइड कैसे होगा?
36:19 ये तो मेरी बात वर्सेस उनकी बात हो गई है। नहीं समझ में आया। क्या कह रहे हैं आप? ठीक है। हम दूसरे ही आरोप पे पहुंचे। जी अ दूसरा आरोप है गीता चौथे अध्याय पांचवें श्लोक से श्लोक का अर्थ पेश किया जाए। हे अर्जुन मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत गए हैं। मैं उन सबको जानता हूं पर तुम नहीं जानते। गीता चौथा अध्याय पांचवा श्लोक तो इससे क्या सिद्ध होता है? जी। तो कृष्ण खुद यहां अर्जुन से कह रहे हैं कि मेरे और तेरे बहुत से जन्म हुए हैं। मैं जानता हूं तुम नहीं जानते। तो माननीय यहां मेरे जन्म और तेरे जन्म की बात हो रही है। दो अलग-अलग लोग हैं। कृष्ण
37:06 हैं और अर्जुन हैं। दो व्यक्तित्व हैं। और उनके खुद के जन्म की बात हो रही है कि कृष्ण के जन और अर्जुन के जन और कृष्ण के जन भी अतीत के जन जो कृष्ण जानते हैं और अर्जुन के खुद के अतीत के जन जो कृष्ण जानते हैं। यानी कि कृष्ण के बहुत सारे जन्म हुए हैं और अर्जुन के बहुत सारे जन्म हुए हैं। तो फिर यहां आरोपी कहते हैं कि कोई पर्सनल सेल्फ का पुनर्जन्म नहीं होता। लेकिन यहां तो खुद कृष्ण कह रहे हैं कि उनके जन्म और अर्जुन के जन्म। तो यह पर्सनल जन्म नहीं है। यहां यह पर्सनल पुनर्जन्म नहीं है। तो फिर क्या है? कृष्ण के अनेक जन्म हुए हैं
37:52 और उसके आगे आप इनफरेंस लेकर के कह रही हैं कि इससे यह सिद्ध होता है कि यह कृष्ण का पर्सनल पुनर्जन्म है। इन दोनों वाक्यों के बीच में आपका जो एजमशन है वह आप देख पा रही हैं। कृष्ण कह रहे हैं मेरे अनेक जन्म हुए हैं। और उससे जो निष्कर्ष इन्फेरेंस निकाला जा रहा है वो यह है कि यह कृष्ण का पर्सनल रिब्थ है। उसकी बात हो रही है। इन दोनों के बीच में एजंप्शन क्या है? कि कृष्ण एक पर्सन है। अब गीता में कृष्ण क्या एक व्यक्ति के रूप में सामने आ रहे हैं?
38:37 गीता में कृष्ण कौन है? कौन है? एक निर्वयक्तिक सिद्धांत। ठीक। गीता में कृष्ण एक प्रिंसिपल है। वो क्या है प्रिंसिपल? द ईगो इज अ रेंज। द ईगो इज अ रेंज। उसी रेंज का जो अपर एंड है वह कृष्ण है। उसी रेंज का जो लोअर एंड है वह अर्जुन है। प्रत्येक व्यक्ति में वो दोनों एंड्स होते हैं। क्योंकि जीव पैदा हुआ है तो अहंकार के साथ ही पैदा होता है। अहंकार अपने आप में एक एक रेंज है जिसमें अहंकार स्वयं ही चुनता है कि उसको कहां पर होना है। पल प्रतिपल जो उसका ऊपरी सिरा है वह कृष्ण है।
39:25 जो उसका नीचे वाला सिरा है वह अर्जुन है। जब कृष्ण कह रहे हैं मेरे बहुत सारे हो चुके हैं जन्म तो आशय है कि हर जगह पर हर काल में ऐसे लोग मौजूद होते हैं जिनका अहंकार ऊपरी छोर पर अवस्थित होता है। और हर जगह पर हर काल में ऐसे लोग मौजूद होते हैं जो अहंकार के निचले छोर निचले सिरे के पास बैठे होते हैं। यहां प्रिंसिपल्स की बात हो रही है। ये सिद्धांत है। ये दो व्यक्ति नहीं है। और यह बात कृष्ण को देखकर के और ज्यादा सफाई से समझ में आएगी कि गीता के श्री कृष्ण कोई व्यक्ति नहीं है। अगर गीता के श्री कृष्ण व्यक्ति होते तो
40:12 अपना ही परिचय उन्होंने जिस रूप में दिया है उस रूप में कैसे दे देते? कैसे कह देते कि जो मेरी शरण में आते हैं तर जाते हैं। किसी व्यक्ति की शरण में जाने से कौन तर जाता है? कैसे कह देते मामकम शरणम ब्रज आओ मेरी शरण में आओ मात्र मेरी शरण में आओ। गीता के श्री कृष्ण कोई व्यक्ति होते तो विराट रूप का फिर क्या अर्थ हो जाता? व्यक्ति कोई भी व्यक्ति विराट रूप तो अपना दिखा नहीं सकता। पर ये ये कहां लिखा है क्या कि कृष्ण नहीं है यह भी कहां लिखा है कि पर्सन है बट फिर तो दोनों ही नहीं लिखा है तो वो फिर पूरी गीता को पढ़ के अपना दिमाग भी लगाना पड़ेगा ना या बस कृष्ण देखा तो यह मान लिया कि किसी व्यक्ति की बात हो रही है
40:59 किसी व्यक्ति की बात नहीं हो रही है और भूलिएगा नहीं नाम है श्रीमद्भगवत गीता गीत है पोएट पोएट्री है और पोएट्री में ऐसा हो नहीं सकता कि सिंबॉलिज्म ना हो। पोएट्री में ऐसा हो नहीं सकता कि मेटाफर्स ना हो और यूफेमिज्म्स ना हो। बताने का तरीका है। कोई भी ऊंची चीज जब बताई जाती है तो उसमें पढ़ने वाले की बुद्धिमत्ता पर कुछ भरोसा किया जाता है। बिना पॉइंटर्स के किसी बात को समझा पाना कठिन हो जाता है। पॉइंटर्स सिंबल्स यह सब बहुत उपयोगी लिटरेरी डिवाइसेस होते हैं।
41:47 लेकिन उनमें यह माना जाता है कि गुड फेथ से ही पढ़ा जाएगा। उनमें यह माना जाता है कि जो पढ़ रहा है वो यह नियत लेकर नहीं पढ़ेगा कि मुझे उसमें डिस्टोर्ट ही करना है। अब ऐसे तो आप जिस अध्याय की बात कर रही हैं उसी अध्याय में श्री कृष्ण कहते हैं कि गीता मैंने सूर्य से कही थी। तो चलिए कृष्ण व्यक्ति हैं तो सूर्य भी फिर व्यक्ति हो गए और अगर कृष्ण व्यक्ति नहीं है तो सूर्य से गीता कैसे कही थी वो बुलाया होगा सूर्य को नीचे आओ यहां जमीन पर सामने बैठो और फिर सूर्य को गीता बताई होगी श्री कृष्ण कहते हैं गीता मैंने सूर्य को कही थी। क्या मैं इसको लिटरली ले सकता हूं? अगर
42:34 मुझे इसे समझना है तो मुझे इसे कैसे लेना पड़ेगा? सिंबॉलिकली ही तो लेना पड़ेगा ना। तो यह कैसा इंसिस्टेंस है कि मुझे हर चीज की लिटरल मीनिंग लेनी है। तो गीता मैंने सूर्य को बताई। इसकी अब लिटरल मीनिंग बता दो ना। क्या है? इसका तो अर्थ सांकेतिक ही हो सकता है और संकेतों का सही अर्थ समझना यह हमारी नियत पर निर्भर करता है। नहीं तो हम कह सकते हैं कि हां गीता में श्री कृष्ण कुछ बहकी सी बातें कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वह सूर्य जो है दैट शाइनिंग स्टार उसको उन्होंने जाकर के या तो खुद उठकर गए होंगे सूर्य के ऊपर बैठे होंगे या सूर्य को बुलावा भेजा होगा तो सूर्य पृथ्वी पर आए होंगे सूर्य सूर्य सूर्य
43:24 और सूर्य को फिर गीता समझाई गई होगी तो एब्सर्ट हो जाएगा अगर आप उसको लिटरली ही लेना चाहेंगे तो और सिर्फ गीता ही एब्सर्ट नहीं हो जाएगी। दुनिया की एक-एक किताब एब्सर्ट हो जाएगी। अगर आप गुड फेथ में उसे सही तरीके से इंटरप्रेट नहीं करेंगे तो। दुनिया की हर किताब एब्सर्ट हो जाएगी। मैं उन सबको जानता हूं। मैं कौन हूं उन सबको जानने वाला। इसी से पता चल जा रहा है कि यहां पर किसकी बात हो रही है। कृष्ण अपना परिचय इसी श्लोक में दिए दे रहे हैं। पता चल रहा है कि किसी व्यक्ति पर्सन की बात नहीं हो रही है। कृष्ण वो हैं जो
44:09 जानते हैं ईगो ऑपरेशन को। मैं जानता हूं कि प्रत्येक व्यक्ति में प्रत्येक जन्म में प्रत्येक काल में प्रत्येक जगह पर ईगो कैसे ऑपरेट करती है। मैं उनका जानने वाला हूं। जो ही उस सब चीज को जानता है उसी में कृष्णत्व है। उसी में कृष्णत्व है। अब ऐसे समझ लीजिए कि यह बात जो है सिर्फ आपको भगवत गीता में नहीं मिल रही। यह बात आपको बौद्ध धारा में भी मिलेगी। जैसे कृष्ण कह रहे हैं मेरे बहुत जन्म हुए हैं। ठीक उसी तरीके से बौद्धों में भी बुद्ध को एक नहीं माना जाता। वहां भी कहते हैं देयर हैस बीन एन अनडिंग सक्सेशन ऑफ बुद्धाज। अनइंडिंग सक्सेशन ऑफ बुद्धाज़। तो वहां भी
44:56 आप बिल्कुल यही कह सकते हैं कि बुद्ध के अनेक जन्म हुए हैं। और गौतम बुद्ध जिनको हम आदर देते हैं, पूजते हैं उनको बस एक बुद्ध माना जाता है। शाक्य मुनि बुद्ध हैं वो। गौतम बुद्ध हैं वो। वैसे यहां पर आप अगर आप ऐतिहासिक दृष्टि से ही कुछ कहना चाहते हैं तो आप कह सकते हैं कि कुरुक्षेत्र पर देवकी नंदन कृष्ण मौजूद है। पर कृष्णों की तो एक निरंतर श्रंखला ही रही है। ठीक वैसे जैसे बुद्धों की रही है। क्यों? क्योंकि बुद्धत्व हो कि कृष्णत्व हो। यह व्यक्तित्व नहीं है। यह सिद्धांत है। जो कोई जगा हुआ है, जो कोई जानने वाला है, मैं उन सबको जानता हूं। अर्जुन, जो भी कोई
45:42 जानता है, उसके अहंकार ने कृष्णत्व चुना है। उसी की बात हो रही है। यहां पर कृष्ण यहां व्यक्ति नहीं है। कृष्ण किसी भी व्यक्ति के द्वारा किया गया उच्चतम चुनाव है। हम इसका हमने काव्यात्मक अर्थ भी पेश किया है। हम चाहते हैं कि सभी काव्यात्मक अर्थ गाएं इसका श्लोक का तो वेश बदलते रहते हैं। तटिनी कौन है? जिसके पास तट होते हैं। वो कौन है?
46:29 वह कौन है? तटनी, नदी, प्रकृति। तो प्रकृति में काल आता है। समय की धारा है। किस समय पर वो चेतना पैदा हो रही है। जो अहंकार का ऊंचा छोर चुनती है। उस समय से यह निर्धारित हो जाता है कि वेश कौन सा धारण किया जाएगा। वेश बदलते रहते हैं। कृष्णों की, बुद्धों की तो श्रृंखला रही है। बस उनके वेश बदलते रहते हैं। वेश कैसा होगा यह कौन तय करता है? समय की धारा तटनी तय करती है। रूप बदल जाता है, देश बदल जाता है, वेश बदल जाता है। नदी है तो तीर है। तीर माने
47:15 किनारा और तृषा। तृषा माने प्यास और नीर माने पानी। पानी। अरे अहंकार की प्यास ही बताती है कि कुछ तो होगा ना जो प्यास को बुझाता भी होगा। प्यास के बुझने की कोई संभावना ही ना होती तो प्यास भी नहीं होती। प्यास के बुझने की कोई संभावना नहीं होती तो प्यास भी नहीं होती। अर्जुनों का होना ही यह बताता है कि कृष्ण को होना पड़ेगा। अंधेरे से आपकी घबराहट यह बताती है कि प्रकाश होता होगा। कुछ नहीं तो आप अंधेरे से घबराते नहीं। इतने सारे लोग इन्होंने बैठा रखे हैं कुछ।
48:01 आप मेरा साथ देना चाहेंगे? तो चलिए गाते हैं इसको जोर से। एकदम बहका देते हैं। गाइए तो है कभी रूप होनी है
48:52 पता नहीं किसको सुख मिल रहा है और किसका स्वार्थ हो रहा है यह सिद्ध करके कि कृष्ण नाम है किसी कालखंड में पैदा हुए व्यक्ति विशेष का व्यक्ति तो आते हैं चले जाते हैं कृष्ण क्या चले गए हैं? पूछ रहा हूं। कृष्ण प्रतीक हैं कृष्णत्व के। कृष्ण प्रतीक हैं कृष्णत्व के। पर हमें अपने भीतर झांक कर देखना पड़ेगा कि हमारा कौन सा स्वार्थ है जो कृष्ण को भी एक साधारण व्यक्तित्व बना देना चाहता है। हमारे ही जैसा साधारण व्यक्तित्व इंसान था आया कुछ करा कुछ कहा फिर चला गया।
49:41 वो बात ऐतिहासिक हो सकती है। बिल्कुल हो सकती है। बिल्कुल हो सकता है कि कल इतिहास में और खोज हो और पता चले कि हां वासुदेव कृष्ण नाम के एक व्यक्तित्व हुए वह बिल्कुल पता चल सकता है। पर गीता के कृष्ण कालबद्ध नहीं है भाई। क्योंकि गीता वह है जो खुद ही आपको काल से आगे कालातीत में अकाल में ले जाना चाहती है। तो गीता के जो कृष्ण है वह कालबद्ध नहीं है। वह अपना परिचय गीता में ही बहुत बार देते हैं कि मैं क्या होकर बोल रहा हूं वह स्वयं ही बता देते हैं। हम अब तीसरे आरोप की ओर जाते हैं। तीसरा आरोप
50:26 है गीता के चौथे अध्याय नौवें श्लोक से पेश किया जाए। अब यहां दो चीजों पर बात हो रही है। एक है त्यक्तवा देहम यानी शरीर छोड़कर और दूसरा है पुनर्जन्म नैति यानी पुनर्जन्म नहीं होता। माननीय कृष्ण ने दो शब्द दिए हैं। देह और पुनर्जन्म। कोई अंबगिविटी नहीं है और कोई मेटाफर भी नहीं है। शरीर छोड़कर यानी कि शरीर छोड़ा जा रहा है। और पुनर्जन्म नहीं होता यानी कि जो यहां पर समझाएगी अगर वह हो तो फिर पुनर्जन्म नहीं होगा। यानी पुनर्जन्म नहीं होने का एक तरीका दिखाया जा रहा है। यानी होता तो है। अब आरोपी ने कहा है कि शरीर छोड़ना यानी
51:16 अहंकार का थिन होना कुछ है जो यह बताते हैं कि कुछ अहंकार है वह पतलू हो जाता है। हमें थोड़ा समझ में नहीं आता कैसे वह मोटा होता है और फिर पतलू होता है। और यहां तो मुझे कहीं मोटा पतलू होने कुछ भी नहीं दिख रहा हमें। तो यह शरीर छोड़ने को अहंकार का मोटा पतलू होना क्यों बता दिया इन्होंने? शरीर माने क्या? आपका जो शरीर शाम को था अभी वही है। तो किस शरीर के छोड़ने की बात हो रही है? आरोप में स्पष्ट करें। हमारे हिसाब से तो जो देह है, शरीर है, उसी को छोड़ने की बात है। अभी जब आपने वाक्य शुरू किया तो एक शरीर था। जब वाक्य खत्म किया तब तक दूसरा हो गया था शरीर। किस शरीर को छोड़ने की बात हो रही है? आप यह कह रहे हैं कि हर सेकंड मेरा शरीर बदल रहा है। मैं नहीं कह रहा विज्ञान कह रहा है और जो
52:01 यह ना समझे वो बिना समझे इल्जाम लगा रहा है। अंधविश्वासी है। शरीर प्रतिपल बदल रहा है कि नहीं बदल रहा है? तो किस शरीर की बात कर रही हैं आप? मैं स्नेहा हूं। मेरा एक शरीर है। एक शरीर नहीं है ना? एक शरीर है? नहीं। क्या एक शरीर है? किस शरीर के बदलने की बात हो रही है? प्रदीप जी थोड़ा हेल्प कर दीजिए। स्थूल अर्थ लेना कितना सुगम लगता है अहंकार को। देखिए क्या कहा जा रहा है श्लोक में। कह रहे हैं कि अर्जुन जो कोई
52:47 प्रकृति को समझ लेता है जो कोई प्रकृति को समझ लेता है वो शरीर को त्यागने एक तो मैं जानना चाह रहा हूं कि इस शरीर क्यों लिखा आपने? उसमें इस कहीं नहीं है। वहां है शरीर को त्यागने के बाद। इस शरीर क्यों लिख रहे हो? पहले तो ठीक करिए। वह शरीर को त्यागने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता। मुझे ही प्राप्त होता है। शरीर को पकड़े कौन रहता है? अहंकार अहंकार वही कहता है ना मैं देह हूं। देह मेरी है। वही कहता है। उसी को कहा जा रहा है कि जब वो प्रकृति को समझ लेता है। माने
53:32 खुद को समझ लेता है। प्रकृति अहंकार भी तो प्रकृति ही है। तो अहंकार द्वारा प्रकृति को समझना माने अहंकार द्वारा खुद को समझना। आत्मज्ञान की बात हो रही है। जब अहंकार खुद को समझने लगता है तो शरीर यानी ये शरीरों की जो बदलती हुई श्रंखला है जो प्रवाह है शरीरों का इसमें वो बार-बार फंसता नहीं है कि शरीर की एक अवस्था अब छूटी और छूटनी क्योंकि शरीर बदल गया। एक अवस्था छूटी तो वो जाकर के अब दूसरी अवस्था को पकड़ ले। शरीर की दूसरी अवस्था को पढ़ने का क्या मतलब हुआ? कि पहले मस्तिष्क में डर था तो अहंकार ने कहा मैं डरा हुआ हूं। शरीर की अवस्था बदली। अब मस्तिष्क में कुछ और आ गया। लोभ
54:19 आ गया तो अहंकार ने कहा मुझे लोभ हो रहा है। मैं लोभी हूं। मुझे ऐसा हो रहा है। मुझे ही प्राप्त होता है। किसको प्राप्त होता है? कृष्ण को प्राप्त होता है। कृष्ण कौन है? अहंकार के घटने का सिद्धांत। जो अहंकार प्रकृति को समझने लगता है वो घटने लगता है। अर्जुन अहंकार जब स्वयं को जानने लगता है तो घटने लगता है। मुझे ही प्राप्त होता है। कृष्ण को प्राप्त होता है। कृष्ण अहंकार के घटने का ही निरवयक्तिक सिद्धांत है। अर्जुन आत्मज्ञान के द्वारा अहंकार घटने लग जाता है। अहंकार के घटने का क्या अर्थ होता है? अहंकार की इस मान्यता का घटना कि
55:06 मैं सत्य हूं, मैं आत्मा हूं। मैं देह का स्वामी हूं। मैं कर्मों का कर्ता हूं। मैं इस जगत का भोगता हूं। इन बातों से अहंकार मुक्त होने लगता है। इसी मुक्ति को कहते हैं अहंकार का अब धीरे-धीरे क्षीण होना, दुबला होना। दुबला होने का यह अर्थ है। हम शून्य नहीं हो जाता पर क्षीण होकर के न्यून हो जाता है अहंकार। ठीक है? शरीर को त्यागने के बाद शरीर को त्यागने से कोई कोई बड़ी बात नहीं है अहंकार के लिए। शरीर को तो उसे प्रतिफल त्यागना ही पड़ेगा। क्योंकि जिस शरीर से वो पिछले क्षण संबंधित था वो शरीर बदल गया। दिक्कत यह
55:51 होती है कि वह पिछले शरीर के के त्याग के बाद जल्दी से जाकर के अगले शरीर से और अगली अवस्था से और जो अब सामने नए विषय आ गए होते हैं अगले पल उनसे अपना रिश्ता बना लेता है। कुछ छूटा नहीं इस हाथ से कि वो जल्दी से दूसरे हाथ से कुछ और पकड़ लेता है। यह है इसका अर्थ। इसका अर्थ यह नहीं है कि मरने के बाद पुनर्जन्म होता था पर अब नहीं होगा। भूलिएगा नहीं। भूलिएगा नहीं अच्छे से कि वेदांत के महावाक्य क्या है। भूलिएगा नहीं कि केंद्रीय सिद्धांत क्या है और एक और नियम है जिसको ध्यान में रखे बिना कम से कम गीता की बात नहीं की जानी चाहिए।
56:37 गीता खुद एक स्मृति ग्रंथ है। गीता श्रुति नहीं है। और नियम यह है कि स्मृति के सभी ग्रंथों का अर्थ श्रुति के प्रकाश में ही किया जाएगा। तो आपको गीता का कोई अर्थ करना है। आप जैसे मुझसे पूछते हैं ना कि गीता का यही अर्थ आपने कैसे निकाल दिया? यह बहुत बार कहते हैं। कहते हैं मनचाहा अर्थ निकाल रहे हैं। गीता का कोई श्लोक है। उसका ऐसा अर्थ आपने कैसे बता दिया? क्योंकि गीता स्मृति ग्रंथ है। स्मृति का जो भी अर्थ निकलना है वह उपनिषदों के प्रकाश में ही निकलेगा। उपनिषदों के महावाक्य हैं। चार महावाक्य प्रमुख हम जानते हैं। उन चार प्रमुख महावाक्यों के अलावा दर्जनों और भी
57:22 महावाक्य हैं। आप उन्हीं को ले लीजिए तो उनसे स्पष्ट हो जाएगा कि गीता के किसी भी श्लोक का क्या अर्थ निकालना है। तो गीता का अर्थ अपनी मर्जी से यूं ही बिना किसी संदर्भ के नहीं निकाला जा सकता। गीता का अर्थ उपनिषदों से पूछकर ही निकाला जाएगा। और उपनिषद एकमत है इस बात में कि पुनर्जन्म प्रकृति का होता है। आत्मा चलायमान नहीं है। आत्मा अजात है। आत्मा अमर है। आत्मा असंग है। आत्मा को किसी के चरणों में नहीं बैठ जाना। आत्मा कभी कलुषित कलंकित नहीं हो जाती। आत्मा एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति की
58:07 अलग-अलग नहीं होती। क्योंकि आत्मा किसी व्यक्ति की नहीं होती। उपनिषद इस बारे में बिल्कुल एकमत है। उन्हीं उपनिषदों के प्रकाश में गीता का अर्थ किया जाता है। हम इसका काव्यात्मक कर दिखा दीजिए। आप लोग किसी काम के नहीं है। काव्यात्मक अर्थ ऐसे देख रहे हैं जैसे पहली बार देखा हो। वाह! दांत भी दे दीजिए ऐसेसे भी कर दीजिए जब काव्यात्मकर सामने आता है तो क्या करते हैं वो नहीं जन से अब युद्ध करो हर की
58:58 अभी यही स्वयं से तुम युद्ध करो वो पार नहीं जन्म के नहीं आ करो हर की अभी नहीं स्वयं से तुम युद्ध करो बताइए और क्या है चौथा आरोप है गीता के आठवे अध्याय 16 वे श्लोक से उसके पहले प्रोसीक्यूशन यह एक्सेप्ट करती है कि आरोपी ने कम्युनिटी को गाना तो काफी अच्छा सिखाया है। काफी जोरजोर से गा रहे हैं।
59:44 जोर से गाते हैं और काफी यूनाइट हो के भी गाते हैं। धुन में भी तो जोर से तो गा ही नहीं रहे हैं। सांप सूंघ गया है। ऐसे ही इस तरह के नकली वकील बैठे हैं तो देखिए। हां? इनके गले में ही इनके शब्द फंसे जा रहे हैं। और जिस दिन मुझ पर असली अदालत बैठेगी उस दिन इनका क्या होगा? कुछ नहीं होगा। उठ उठ के भाग और जाएंगे। हम अब ब्रह्मलोक तक के सभी लोग पुनरावर्ती हैं। ऐसा कहा जा रहा है श्लोक में और मुझे प्राप्त करके पुनर्जन्म नहीं होता। माननीय यह तो पोस्टमॉर्टम ज्योग्राफी है। लोक हैं पुनरावर्तनी है। मामोपैत्य है। यानी कि एक स्पेसिफिक डेस्टिनेशन की बात हो रही है।
1:00:30 जहां से वापसी नहीं होती। माने क्या कि बाकी लोकों से वापसी होती है। पुनर्जन्म होता है। अब आरोपी कहते हैं कि मोक्ष कोई डेस्टिनेशन नहीं कंटीन्यूअस मूवमेंट है। लेकिन कृष्ण कह रहे हैं मामू पे मुझे प्राप्त करके माननीय यह अराइविंग है। ट्रैवलिंग नहीं जैसा आरोपी कहते हैं। तो अराइविंग के लिए कृष्ण को खुद कोई डेस्टिनेशन होना चाहिए ना। व्हाट इफ कृष्ण इज अ मूविंग डेस्टिनेशन? आप आप अपने एजमशन खुद ही नहीं देख पा रहे। आप मान रहे हैं कृष्ण इज अ स्टेशनरी डेस्टिनेशन। हां बिल्कुल कहा है कि जो मुझे प्राप्त कर लेता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता। पर आप यह मान रहे हैं कि कृष्ण इस खंभे की तरह एक स्टेशनरी डेस्टिनेशन
1:01:16 है। व्हाट इफ कृष्ण इज एन एवर रिसीडिंग डेस्टिनेशन लाइक द होराइजन। जिसकी ओर तो बढ़ा जा सकता है पर जिसको कभी प्राप्त नहीं करा जा सकता। अगर कृष्ण यहां सत्य के प्रतिनिधि है तो सत्य क्या होता है? अनंत। इनफाइनाइट। इंफिनिटी को क्या प्राप्त करा जा सकता है? हां, उसकी ओर बढ़ा जा सकता है। तो कृष्ण डेस्टिनेशन यदि है भी तो वो एक मूविंग डेस्टिनेशन है। एक इनफाइनाइट डेस्टिनेशन है। आप बढ़ लो उसकी ओर। कभी पा नहीं सकते। हां। उसकी पढ़ने में मुक्ति है। पाने का ख्याल आत्म प्रवंचना है। देखिए यहां श्लोक में क्या कहा जा रहा है। हालांकि ये थोड़ी नाइंसाफी है गीता छात्रों के साथ क्योंकि आठवें अध्याय पर अभी हम आए नहीं पर अब
1:02:02 आरोप है तो है जवाब देना पड़ेगा। कह रहे हैं कि जो कुछ तुम्हें जमीन पर मिल सकता है साधारण से साधारण और जो कुछ भी तुम्हारी कल्पना में आ सकता है ऊंचे से ऊंचा ब्रह्मलोक तक वो सब ऐसा है जिस तक जाओगे और फिर निराश होकर वापस आओगे पुनरावृत्ति होगी। ब्रह्मलोक कैसे समझ लीजिए कि आज के समय में किसी अमीर आदमी का सबसे बड़ा महल सबसे बड़ा महल उसको भी पा लोगे तो भी चैन नहीं मिलेगा। यह बात कही जा रही है कि जमीन से लेकर ब्रह्मलोक तक साधारण स्थिति से लेकर जो उच्चतम स्थिति तुम सोच
1:02:51 सकते हो वहां तक सब कुछ परिवर्तनशील है और जो कुछ है उसकी पुनरावृति होती है। माने चक्र अहंकार का वहां लगा ही रहता है। पाओगे गवाओगे। आशा बैठाओगे निराश हो जाओगे लेकिन जो इस चक्र को समझ लेता है कृष्ण को पाने का अर्थ है इस चक्र को समझ लेना लेकिन जो इस चक्र को समझ लेता है वो फिर इस चक्र से बाहर आ जाता है यह पुनर्जन्म का यही चक्र है। एक आशा मरी दूसरी का जन्म हो गया। जीवन से एक विषय विदा हुआ दूसरा पैदा हो गया। यह है पुनर्जन्म। लेकिन जो अहंकार को समझ लेता है आत्मज्ञान
1:03:37 की बात है फिर से जो अहंकार को समझ लेता है वह फिर इस चक्र में नहीं फंसता कि जीवन से एक विषय विदा हुआ दूसरा पैदा हुआ एक आशा मरी और दूसरी जन्मी एक खेल में पिटे दूसरे में फिर से खड़े हो गए उसके साथ फिर यह होना बंद हो जाता है क्योंकि वह अपने ही भीतरी खेल को जान गया है। यह आशय है यहां पर। यहां यह नहीं है कि कृष्ण कहीं किसी लोक में बैठे हुए हैं और जीवात्मा उड़ती हुई जाएगी और कृष्ण को पा लेगी तो फिर उस जीवात्मा का पुनर्जन्म नहीं होगा। ये ये कैसा कैसा चाइल्डिश इंटरप्रिटेशन है और मुझे यह नहीं समझ में आता कि कौन से लोग हैं जिनके स्टेक्स हैं इस चाइल्डिश इंटरप्रिटेशन में जो चाहते
1:04:23 हैं कि ऐसा बचकाना अर्थ प्रचलित रहे। क्या आरोप है? मोक्ष की परिभाषा को इगो इगो डिसोल्यूशन और एक कंटीन्यूअस मूवमेंट ने बदल दिया तो और क्या होगा मोक्ष का अर्थ और मोक्ष का क्या अर्थ होगा आप बताइए मोक्ष माने और क्या हो सकता है अगर मोक्ष कंटीन्यूअस डिसोल्यूशन नहीं है तो मोक्ष माने और क्या हो सकता है अच्छा दे रखा है ट्रेडिशनल मीनिंग वन टाइम इवेंट अच्छा एक बार झटके से कुछ हो जाता है इन अनदर वर्ल्ड वि वर्ल्ड वेयर इज दैट वर्ल्ड अगर वर्ल्ड की बात हो रही है तो वर्ल्ड्स तो जितने हैं वह सब साइंस के परव्यू में आते हैं। कौन सा वर्ल्ड? कैसा वर्ल्ड? और उस वर्ल्ड में आप पहुंच भी जाओगे तो पहुंचने
1:05:09 वाला कौन है? अहंकार ही तो है। आप पहुंच तो गए, चांद पर पहुंच गए, मंगल पर पहुंच गए। वहां पहुंचने वाला कौन है? अहंकार ही तो है। वर्ल्ड बदलते रहेंगे। उस वर्ल्ड में पहुंचने वाला थोड़ी बदल जाएगा। या ऐसा होने वाला है कि आप चांद पर पहुंचे तो अहंकार बदल गया। ऐसा होता है क्या? या ऐसा होता फ्लाइट लेके यूएस जाते हो तो अहंकार बदल जाता है। ऐसा होता है क्या? वर्ल्ड तो बाहर है। वो बदलता रहेगा। अहंकार भीतर है। वो काहे को बदल जाएगा वर्ल्ड के साथ? अब ये मैं कुछ आपके ऊपर भी छोड़ता हूं। ऊपर लिख रखा है ट्रेडिशनल मीनिंग एपी मीनिंग। अब वह एपी मीनिंग है या ट्रुथफुल मीनिंग है। यह आपके ऊपर छोड़ता हूं कि आपको इन दोनों में से कौन सी स्वीकार है। जो ऊपर वाली है वो तो लगातार चलती ही रही
1:05:54 है कि मोक्ष का अर्थ होता है कि आपकी जीवात्मा बिल्कुल खट से कहीं और पहुंच गई है और आप एनलाइटेंड वगैरह हो गए हो या ब्रह्मलीन हो गए हो और वो सब चला है और उसके दुष्परिणाम आप जानते हो क्या रहे हैं। हम् इतने सब यह बाबा लोग घूम रहे हैं। सब ने अपने आप को मुक्त घोषित कर दिया है। इनको निर्वाण है। इनको मोक्ष है। वह एनलाइटेंड हैं। एक दिन एक स्थान नियत कर दिया जाता है। इनका यहां मोक्ष हुआ था। इनका नदी किनारे हुआ था। इनका पेड़ के ऊपर हुआ था। उनका झाड़ के अंदर हुआ था। अब आपको वही सब पसंद है तो ठीक है।
1:06:39 उस तरह की मूर्खता को हटाने का मुझ पर इल्जाम लग रहा है। चलो ये भी ठीक हम चलिए मान लिया दिस डिफेमेशन ऑफ बाबास स्ट्रेट डिफेमेशन मी लॉर्ड दिस एंटायर थिंग इज डिफेमेशन ऑफ़ भगवत गीता चलिए मान लिया कि डेस्टिनेशन एवर रिसीडिंग है जो आप कह रहे हैं। बट फिर बात तो ये उठती है ना कि चलिए मैंने कुछ किया और मैं इस डेस्टिनेशन पे पहुंच गई। फिर आप बोलो अरे अरे वो तो पीछे चला गया और फिर मैं आगे जाऊंगी। फिर डेस्टिनेशन पीछे चले
1:07:26 जाएगी। आप यहां से वहां पहुंचने में भी जो अभी है वही रह जाती हैं क्या? तो मैं वहां पहुंच गई इससे आशय क्या है? कौन पहुंच गया? आप यहां से वहां पहुंचने में बदल जाती हैं। जब आप ही बदल गई हैं तो डेस्टिनेशन वैसी की वैसी कैसे रह गई? वो डेस्टिनेशन आपने यहां अपने लिए सेट करी थी। आपने करी थी। आप वहां तक पहुंची आप बदल गई। तो डेस्टिनेशन अगर स्टेशनरी भी है तो आपकी कैसे है? आप भी तो प्रतिफल बदल रहे हैं। पर यह जानने स्वीकारने के लिए भी कुछ आत्मबोध चाहिए कि मैं वो हूं जो लगातार बदल रहा है। और यहां जिस डेस्टिनेशन की बात हो रही है इतना तो आप भी मानेंगी वो है फ्रीडम फ्रॉम
1:08:11 द सेल्फ। जब सेल्फ लगातार बदल रहा है, लगातार बदल रहा है। लगातार बदल रहा है। मरने को तैयार नहीं है। फिजियोलॉजिकली पैदा हुआ है। देह जब तक है वह रहेगा। जैसे देह लगातार बदल रही है और देह के बाहर की स्थितियां लगातार बदल रही है। वैसे ही वो जो फिजियोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट है भीतर अहंकार नाम का वो भी लगातार बदल रहा है। तो उसको आप जीरो कैसे कर दोगे? कैसे कर दोगे? और कर लो ना जीरो। मैं जीरो करने से मना नहीं कर रहा। मैं कह रहा हूं टेंडिंग टुवर्ड्स जीरो। आप लगे हुए हो घोषित करने में कि जीरो ही होगा एग्जैक्ट। मैं कह रहा हूं टेंडिंग टू जीरो कर लो। सेफ खेल लो यार। 0.0001
1:09:00 कर लो। आप कह रहे हो वंस जीरो ऑलवेज जीरो। मैं कह रहा हूं ऐसा देह में किसी भी चीज के साथ होता है क्या? एक बार नाखून काट लेते हो, कटे रह जाते हैं। पूछ रहा हूं। देह में कुछ भी ऐसा है जो कि लौट कर नहीं आता। कितने लोग हैं जो एक बार नहा लेते हैं तो फिर कभी नहीं नहाते। कितने लोग हैं जो सुबह का कार्यक्रम साल में एक बार करते हैं और कहते हैं अब तो निवृत्त हो गए निर्वाण। वंस डन सील्ड। देह खुद लगातार बदल रही है। जब देह लगातार बदल रही है तो वो अहंकार जो फिजियोलॉजिकल है जो देह की
1:09:47 ही पैदाइश है उसको आप वंस एंड फॉर एवर कैसे मार दोगे? वो सदा के लिए और आखिरी बार एक फाइनलिटी के साथ कैसे मारा जा सकता है? वो लगातार रहेगा। हां उसे वो वो अगर खुद को जान रहा है तो वह कम होता जाएगा। कम होता जाएगा। आप उसे कम करोगे वह लौट कर आएगा। इस बार वह थोड़ी कम तीव्रता थोड़े कम एंप्लीट्यूड के साथ लौट कर आएगा। लेकिन आपका यह दावा करना कि हमने तो साहब उसको शून्य ही कर दिया। ये ये दावा बड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण है और और अहंकार से ही भरा हुआ दावा है ये कि मैंने अहंकार को शून्य कर दिया। माननीय जज साहब तो बेसिकली आरोपी Google
1:10:34 मैप्स को बदल रहे हैं। डेस्टिनेशन हटा दिया है। इनफाइनाइट जर्नी रख दी और डाटा चार्जेस आरोपी के फॉलोअर्स भर रहे हैं। ऑर्डर ऑर्डर इनफाइनाइट जर्नी का मतलब इनफाइनाइट सब्सक्रिप्शन भी है क्या? डमरू डमरू बजाइए। मान नहीं रही है। अनन्या जी मेंटेन द डेकोरम ऑफ कोर्स। ये बढ़िया है जज साहब। ये वेटरन है हमारे। अब पुनर्जन्म हमारा बस एक ही और आरोप है। पांचवा आरोप। फिर हम अगले भाग में जाएंगे। गीता के श्लोक 15 अध्याय और आठवें श्लोक से है।
1:11:25 जीव कौन है? पढ़ लीजिए पहले। जब जीव शरीर को ग्रहण करता है या छोड़ता है तो मन संस्कारों, प्रवृत्तियों और इंद्रियों को साथ लेकर चलता है। जैसे वायु किसी जगह से सुगंध को अपने साथ उठा ले जाती है। ठीक है? जीव है कौन? जीव माने? अहंकार। जीव माने? ठीक है? जब अहंकार एक विषय से हुए अनुभवों में लात खा के दूसरे विषय को जाकर पकड़ता है तो पिछले विषय से उसको जो अनुभव हुए थे क्या उनको त्याग दिया होता है उसने। आपकी गर्लफ्रेंड थी। ठीक है? आपने ना जाने क्या उम्मीदें बनाई
1:12:11 थी? क्या छवि आपने रची थी। वहां लात पड़ गई। अब आप जब अगली तलाशते हो तो क्या पिछला अनुभव भूलकर तलाशते हो? तो अहंकार यही करता है। पिछले विषय के अनुभवों को उठा करके साथ लेकर के अब अगले विषय की तलाश करता है। अब इस श्लोक को पढ़िए। समझ में आ गई बात? यह पिछली गर्लफ्रेंड है। यह तो छूट गई है। पर इसके साथ कु हुए अनुभवों की बदबू तो मैं साथ ले चलूंगा ना। अब इसके पास मैं जाऊंगा वो पुराने वाले की बदबू लेके। शारीरिक बदबू नहीं अनुभवों की बदबू। यहां सुगंध लिखा है। मैं दुर्गंध कह रहा हूं। क्योंकि अहंकार के पल्ले सुगंध तो पड़ती नहीं। अहंकार के हिस्से में तो दुर्गंध ही
1:12:57 आनी है। यह कह रहे हैं कि जैसे वायु होती है और फूल के ऊपर से जाती है तो फूल की खुशबू को साथ ले जाती है। फूल वही रह जाता है पर खुशबू साथ ले जाती है। इसका अर्थ क्या है? इसका यही है। पिछले विषय से जो अनुभव हुए वो अहंकार को बदल देते हैं। और यह बदला हुआ अहंकार पिछले हुए अनुभवों की गठरी को लेकर के अगले विषय की तलाश में निकलता है। अगले अनुभव के लिए। यह है इसका अर्थ। इसमें कहां से आ गया कि देह बदलेगी तो जीवात्मा उड़ेगी। यह बात इसमें कहां से आ गई? जज साहब, इन्होंने मेरा आरोप ही नहीं कहने दे दिया। आप आप कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। आरोप तो हम लगाएंगे ना। हां, यू कैन कंटिन्यू विद योर चार्जेस। आप
1:13:44 आप भी आरोपी के ही पक्ष में चले गए हैं लगता है। आरोपी अपने ये नया आरोप आरोप पे तर्क बहुत अच्छे से रख रहे हैं। एक आरोप और जुड़ गया। ये खुद ही अदालत लगवाते हैं। और केस फिक्सिंग कर रखी है। जी कहिए आप बात तो पूरी करिए अपनी। कहिए इसमें क्या? नहीं बस हम इतना ही कहना चाहते हैं कि यहां यह कहा जा रहा है कि मन सहित इंद्रियों को साथ लेकर कोई चला जाता है और दूसरे शरीर प्राप्त कर लेता है शरीर छोड़कर कहां लेकर जाता है अगले विषय के पास
1:14:32 बट इधर तो विषय की बात ही नहीं हो रही है लिखा है ना कहां है श्लोक से दिखाइए ना एक शरीर को ग्रहण करता है या छोड़ता है शरीर माने मैं जो यहां पर हूं मैं ही हूं जो यहां इसके साथ संबंधित था। यह बदला मैं बदल गया। शरीर बदल गया। असल में हम जो फंडामेंटल प्रिंसिपल उसको समझ नहीं रहे हैं। द बॉडी एंड द ईगो आर फ्लूइड। ये जितने आरोप है ना उनके आधार में यह भ्रम है। दैट द बॉडी एंड द ईगो आर स्टेशनरी कंस्ट्रक्ट्स। जिस व्यक्ति ने अपने आप को जरा भी देखा है तो वह यह जान जाएगा कि बॉडी भी एक फ्लूइड चीज है। एक डायनेमिक चीज है।
1:15:17 लगातार बदलती हुई चीज है। यह तो आपको साइंस ही बता देगा। सेल्फ ऑब्जरवेशन की जरूरत ही नहीं है। और सेल्फ ऑब्जरवेशन आपको यह बता देगा कि ईगो भी लगातार बदलती हुई चीज है। ये आपका सारा कंफ्यूजन इसलिए पैदा हो रहा है क्योंकि आप इस फंडामेंटल प्रिंसिपल को ही नहीं समझ पा रहे। ईगो कोई एक चीज नहीं है। इसी तरह से बॉडी कोई एक चीज नहीं है। बॉडी को बदलना या छोड़ना माने सिंपली स्ट्रीम ऑफ टाइम। क्योंकि टाइम मतलब बॉडी लगातार चेंज हो रही है। टाइम माने बॉडी के जो ऑब्जेक्ट्स हैं वो लगातार चेंज हो रहे हैं। टाइम माने ईगो के भी जो ऑब्जेक्ट्स हैं वो लगातार चेंज हो रहे हैं। इट्स एन एवर चेंजिंग ईगो इन एन एवर चेंजिंग बॉडी विथ एवर चेंजिंग ऑब्जेक्ट्स। यह है यह
1:16:04 फ्रेमवर्क है जिसके भीतर यह यह सारे ऑपरेशंस चल रहे हैं। उस फ्रेमवर्क को समझे बिना आप गीता को इंटरप्रेट करेंगे तो आप चीजों को स्टेशनरी समझेंगे। आपको लगेगा कि मुक्ति कोई डेस्टिनेशन है। बॉडी कोई ऐसा फिक्स्ड ऑब्जेक्ट है। ऐसा नहीं है ना? सब बदल रहा है लगातार। उसकी बात हो रही है। ये जो भी कुछ कहा जा रहा है। उसको प्रवाह की भाषा में समझें। सब कुछ खुल जाएगा। एकदम स्पष्ट हो जाएगा। एक प्रवाह की भाषा तो इधर जो शब्द लिया गया है अवापनोती जिसका अर्थ हम समझे हैं नीचे आकर पूरी तरह ग्रहण करना नीचे आकर और उत्क्रामति का है ऊपर निकलना तो
1:16:50 नीचे नीचे आकर क्यों बोला गया है बोल रही हूं बड़ा करिएगा शरीर को प्राप्त करता है, बाहर निकलता है। इससे बाहर निकला, इसको प्राप्त किया। ये पिछली गर्लफ्रेंड थी। इसके साथ ये मेरा पिछला शरीर था। इससे मैं बाहर निकल आया। यह नया शरीर हुआ। इसको प्राप्त किया। बस तो ऊपर नीचे की बात नहीं है। इधर ऊपर नीचे कहां लिखा है? स्नेहा जी पूरी परंपरा एक तरफ ऊपर नीचे तो लिखा भी नहीं है कहीं पर कहां लिखा है अवापनोती और उत्क्रामती
1:17:36 कमलेश जी आप क्लॉट से पूछ सकते हैं हम डिजिटल अदालत हैं सिर्फ इसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा है अरे तो ये चार्जशीट तो आपकी ही है ना ये थोड़ा काम कम करते हैं लोग हां ठीक है। ऐसा हो भी सकता है। उसमें छोड़ने को क्यों कहा गया है? उठना और पाने को क्यों कहा गया है? अवगमन। अव शब्द का क्यों इस्तेमाल है? बात बहुत सीधी है।
1:18:21 मुक्ति का क्या अर्थ होता है? जितने विषय थे उन सबको छोड़ा। उन सबके साथ अपना तादात्म छोड़ा। तो जब भी छोड़ने की बात होगी तो वहां अगर उठने की भाषा लगाई जाए तो यह अनुचित नहीं है ना। छोड़ने के लिए कहा गया है उठना। और फिर से पकड़ने के लिए कहा गया है गिरना। तो यह बात तो स्पष्ट ही है। विषय आप जितने पकड़ते हो उतने भारी होते हो तो गिरोगे। नीचे गिरोगे। विषयों को आप जितना छोड़ते हो उतना उठते हो तो आप ऊपर चले जाओगे। वही है छोड़ने को
1:19:06 उठने की भाषा में कहा गया है वो एक ही बात है ये और सुंदर कर दिया गया है इस प्रयोग के द्वारा काव्य को तो और अच्छा ही है माननीय पूरी परंपरा एक तरफ आरोपी अकेले दूसरी तरफ और फॉलोअर्स कह रहे हैं कि यही सही है अनन्या जी गैलीलियो भी अकेला ही था आप उनके के फैन है क्या? नहीं नहीं मैं तो बस। आप दोनों चुप हो जाइए। मेंटेन द डेकर ऑफ़ ऑफ़ कोर्ट। परंपरा के ही तो सताए हुए हैं। आप इनसे कहोगे कि परंपरा का पालन करो तो काहे के
1:19:52 लिए करेंगे? परंपरागत ही जो परंपरागत ही जो अर्थ थे उन्हीं से तो हैरान परेशान होकर के यह यहां पर आए हैं। इसमें एक बात और समझिएगा। यहां सब जो बैठे हैं ये ये शिक्षित वर्ग है भारत का। ठीक है? एजुकेशन की दृष्टि से यहां तक कि इकोनॉमिक स्टेटस की दृष्टि से भी यह यह भारत की क्रीम है। एकदम टॉप पॉइंट 1% में भले नहीं आए। यहां पर कोई कोई बिलेनियर नहीं बैठा, कोई धनन्ना सेठ नहीं बैठा। लेकिन फिर भी भारत देश के लिए यह सब यहां
1:20:41 पर एक इलीट वर्ग ही बैठा हुआ है। यह वो वर्ग है जो समझता है, जो पढ़ा लिखा है, जो दिमाग चलाना जानता है, जिसके पास इंटेलेक्ट है। और यही वह वर्ग है जिसको अगर आप पारंपरिक अर्थों में उलझाकर रखेंगे तो यह धर्म ही छोड़ देगा और धर्म मनुष्य के लिए आवश्यक होता है। मैंने बार-बार बोला है मैन इज अ रिलीजियस एनिमल। मैं कर्मकांड वाले धर्म की बात नहीं कर रहा। मैं उस धर्म की बात कर रहा हूं जो अहंकार के विगलन के लिए आवश्यक है।
1:21:27 एक बहुत बड़ी लॉबी है जिसके स्वार्थ इस बात से जुड़े हुए हैं कि भारत के पढ़े लिखे लोग धर्म को छोड़ दें। वहां एजेंडा ही यही है कि पढ़े लिखे लोगों के सामने धर्म कि वह विकृत तस्वीर पैदा करो कि वो घिना जाए और धर्म को छोड़ दें। यही प्रोजेक्ट है, यही एजेंडा है। तो वह ताकतें बड़ी घबरा जाती हैं। आप यह मत सोचिएगा कि यह जो लड़ाई यहां चल रही है, यह गीता के एक इंटरप्रिटेशन और दूसरे इंटरप्रिटेशन के बीच की है। नहीं नहीं, यह वो लड़ाई नहीं चल रही है। आप यह भी मत सोचिएगा कि यह जो यहां बहस चल रही है, वह
1:22:14 रैशनलिटी और स्पिरिचुअलिटी के बीच की है। यह वह बहस भी नहीं है। यह यहां जितनी बातचीत चल रही है, वह इसलिए चल रही है कि आपके ऊपर कोई कब्जा करना चाहता है। यह यहां जो बातचीत चल रही है वो मीनिंग के लिए नहीं प्राइस के लिए चल रही है। और प्राइस आप हैं। पढ़ा लिखा वर्ग। एजेंडा क्या है? पढ़े लिखे वर्ग को धर्म से दूर कर दो। विशेषकर हिंदू धर्म से दूर कर दो। उनको यह दिखा दो कि धर्म में तो जितनी बातें कही गई है वो मूर्खतापूर्ण है ताकि
1:22:59 वो धर्म को बिल्कुल दुत्कार दें। लात मार दें धर्म को। ये एजेंडा है। नहीं तो होना तो ये चाहिए था कि अगर मैं धर्म का साफ सुथरा रूप आपके सामने ला रहा हूं तो मेरा समर्थन किया जाता। है ना? मैं सुधार ही तो कर रहा हूं। पर नहीं मुझसे समस्या है। समस्या उनसे कम है जो धर्म को बर्बाद कर रहे हैं। समस्या उनसे कम है लोगों को जो धर्म को बर्बाद कर रहे हैं। मुझसे समस्या है क्योंकि मैं धर्म का साफ और वास्तविक रूप आपके सामने ला रहा हूं। इससे समस्या क्यों है? क्योंकि खतरा पैदा
1:23:44 हो जाता है। क्या है खतरा? समझिएगा। खतरा यह है कि अब आपसे कोई आकर के कहेगा कि धर्म बेकार की बात है तो क्या आप मानेंगे? आ किसी का एजेंडा खराब हो गया। आप अगर गीता छात्र हैं और अब आपसे आके कोई कहेगा कि धर्म छोड़ दो तो क्या आप मानेंगे? बस यही एजेंडा है और इसलिए मेरे ऊपर यह सारे इल्जाम है क्योंकि एक बढ़िया प्रोजेक्ट चल रहा है कि कम से कम पढ़े लिखे लोगों को यह साबित कर दो कि धर्म बेकार की बात होती है। क्या बन जाओ? इंटेलेक्चुअल बन जाओ, रशलिस्ट बन जाओ, एथिस्ट बन जाओ या किसी और धर्म में जाकर धर्म परिवर्तन कर लो, कुछ भी कर लो।
1:24:33 पर भारतीय रूप से धार्मिक मत रहो। यह एजेंडा है। मैं उस एजेंडा की राह में बहुत बड़ी बाधा बन गया हूं। तो इसलिए इस तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। नहीं तो आप सोचिए ना मेरा तो समर्थन होना चाहिए था। बुद्धिजीवियों के और रेशनलिस्ट्स के जितने भी मंसूबे हो सकते हैं वो तो मैं साकार कर रहा हूं। कास्ट को चुनौती देने से लेकर के सुपरस्टिशन को चुनौती देना। मिसोजनी को चुनौती देना। यह सारे काम तो मैं कर रहा हूं। तो मेरा तो समर्थन होना चाहिए था।
1:25:20 पर मेरा विरोध हो रहा है। विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि वो चाहते हैं कि धर्म के साथ ये बात जुड़ी रहे कि धर्म स्त्री विरोधी है कि धर्म जातिवादी है कि धर्म अंधविश्वासी है। वो चाहते हैं धर्म के साथ यह बातें जुड़ी रहे। ताकि जब कोई खासकर कोई पढ़ी लिखी लड़की है वो कहे धर्म धर्म तो पिछड़े लोगों की चीज है। धर्म तो स्त्री विरोधी होता है। मुझे धर्म नहीं चाहिए। यह एजेंडा है कि आप लोग धर्म छोड़ दें। और मैं उस एजेंडा को ऑब्स्ट्रक्ट कर रहा हूं। इसलिए मुझ पर यह सब इल्जाम लगाए जा रहे हैं। पकड़ लो इन सबको। बात आ रही है समझ में?
1:26:05 किसी ना किसी तरीके से यह सिद्ध करना है कि धर्म बिल्कुल बेकार की बात है। विशेषकर हिंदू धर्म एकदम बेकार की चीज है। सड़ी हुई चीज है। छोड़ दो, छोड़ दो। घटिया चीज है। छोड़ दो। और मैं कह रहा हूं कि डोंट थ्रो द बेबी आउट वि द बाथ वाटर। कुछ बहुत विशेष है धर्म के पास। मनुष्य को सिखाने के लिए उससे हाथ मत धो बैठना और वो इतना विशेष है कि साधारण छोटी-मोटी समस्याएं नहीं वैश्विक जीवन की बड़ी समस्याओं का समाधान भी धर्म से ही हो सकता है। मैं इसलिए धर्म को बचाना चाह रहा हूं। इसलिए नहीं कि मैं
1:26:52 हिंदू हूं तो मैं चाहता हूं कि गीता बची रहे। यह मेरा एजेंडा नहीं है। मैं धर्म को इसलिए बचाना चाहता हूं क्योंकि दुनिया की बड़ी से बड़ी जो समस्याएं हैं और मनुष्य की जो भीतरी से भीतरी समस्याएं हैं उनका समाधान धर्म में है। मैं इसलिए धर्म को बचाना चाहता हूं। लेकिन बहुत बड़ी लॉबी है जो चाहती है कि धर्म समाप्ति हो जाए। अब इस लॉबी को बहुत अच्छा लगता है जब धर्म के नाम पर अंधविश्वास चलता है। बताइए क्यों अच्छा लगता है? अब वह कह पाएंगे देखा धर्म कितनी घटिया चीज होती है। तो इसीलिए इस लॉबी को बाबाओं से कोई दिक्कत नहीं होती। इसको दिक्कत मुझसे होती है। क्योंकि मैं दिखा रहा हूं कि धर्म उतनी भी बुरी चीज नहीं है जितना तुमने फैला रखा है
1:27:37 प्रोपेगेंडा। जब कोई मुझ पर इल्जाम लगाए तो एक बार यह भी तो सोचा करिए कि उसकी अपनी नियत क्या है? उसके अपने इरादे क्या हैं? और रशलिस्ट होने के साथ यह बड़ी दिक्कत है। रशलिस्ट होने का मतलब होता है मैं हर चीज को प्रमाण से और तर्क से परखूंगा। अरे खुद को कब परखोगे? हर चीज में तुम नहीं शामिल हो क्या? या तुम्हें हर चीज के नाम पे बस दूसरों को ही परखना है। अपनी नियत कब टटोलोगे? तो ना चाहते हुए भी मैं एक पॉलिटिकल क्रॉस फायर में फंसा हुआ हूं। यह मामला राजनैतिक
1:28:24 है। आप समझ रहे हैं? मेरा तो काम बहुत सीधा साधा है। सरल है, मासूम है। इंसान की जिंदगी बेहतर बने, यह मेरा काम है। और इंसान की जिंदगी बेहतर बनाने में उपनिषद योगदान देते हैं, तो मैं उपनिषदों को आपके सामने ला रहा हूं। ये मेरा काम है। इंसान की जिंदगी सिर्फ उपनिषद ही नहीं बेहतर बनाते और भी ग्रंथ बेहतर बनाते हैं। वो सब मैं आपके सामने ला रहा हूं। ये मेरा काम है। पर इस चक्कर में कुछ लोगों की दुकानें बंद हो रही हैं। उनकी भी जो चाहते थे कि धर्म का विकृत संस्करण भी प्रचलित रहे और उसके विकृत अर्थ भी प्रचलित रहे। माने जो पंगापंथी लोग थे और उनकी भी दुकानें बंद हो रही हैं जो चाहते थे कि सब पढ़े लिखे लोगों को घिनवा दो
1:29:09 धर्म से और कहो धर्म को छोड़ दो हमारी तरफ आओ धर्म को छोड़ो हमारी तरफ आओ उनकी सबकी दुकानें बंद हो रही है मैं थोड़ा और बोल सकता हूं बिल्कुल आपने कभी सोचा कि मैं आपको छह या आठ ग्रंथ पढ़ाता हूं। मुझ पर आरोप भगवत गीता को ही लेकर क्यों लगाए जाते हैं? इन्होंने क्या कभी कहा कि आचार्य जी उदाहरण के लिए लाउज का गलत अर्थ बता रहे हैं। इन्होंने कभी कहा इन्होंने अष्टावक्र गीता को भी लेकर कभी कहा कि अष्टावक्र गीता का क्योंकि ये खासकर भगवत गीता पर निशाना साध रहे हैं। यह चाहते हैं कि यह साबित हो जाए कि भगवत गीता जातिवाद के लिए उत्तरदाई है। और भगवत गीता
1:29:55 जैसा हिंदू समाज है उसकी रीड है। यह उसकी रीड तोड़ना चाहते हैं। इसीलिए मैं बाकी जितने ग्रंथों पर बोलता हूं उस पर ही आपत्ति नहीं करते। मैंने इतने भजनों पर इतना बोला ये कभी आकर कहते हैं कि आचार्य जी, बाबा बुल्ले शाह, कबीर साहब इनका विकृत अर्थ कर रहे हैं। इन्होंने कभी कहा? आपने ऐसा कोई आरोप नहीं सुना होगा। रिवु गीता अवधूत गीता पर भी मैं इतना बोलता हूं। इन्होंने कभी आपत्ति करी? नहीं करते। अगर मैं मिसइंटरप्रेट करता हूं भाई तो फिर तो मैं सब कुछ ही मिसरप्रेट करता होगा ना। अगर मैं मिसइंटरप्रेट करता हूं तो फिर तो मैं सब कुछ ही मिसरप्रेट करता आऊंगा। पर इन्हें तकलीफ भगवत गीता से है। और भगवत गीता से इन्हें तकलीफ इसलिए है क्योंकि भगवत गीता अगर इन्होंने भारतीय
1:30:41 समाज से उखाड़ दी तो यह जानते हैं कि यह भारतीय समाज से धर्म को ही उखाड़ देंगे। तो इनका पूरा एजेंडा है कि किसी तरीके से भारतीय समाज से गीता को उखाड़ दो। यह उखाड़ने का काम इन्होंने लगभग पूरा ही कर लिया था। उस काम को अब मैंने किसी तरह से आकर के रोका है। तो अब बहुत तकलीफ फैली हुई है और तकलीफ स्पेक्ट्रम के दोनों सिरों पर है। उनको भी तकलीफ है जो बिल्कुल इतने सालों तक गीता के न जाने किस तरह के अर्थ चलाते रहे। और उनको भी तकलीफ है। जो कह रहे हैं हां हां गीता के विकृत ही अर्थ हैं। इसलिए गीता को छोड़ दो। दोनों ही सिरों को तकलीफ है। बोला तो मैंने इतने उपनिषदों पर ही है।
1:31:28 उपनिषदों को भी लेकर के कुछ नहीं कहते या कम कहते हैं। बोला तो मैंने पाश्चात्य दर्शन पर भी है। ये उसको भी लेकर कोई टिप्पणी नहीं करते। वो कहते हैं वहां जो बोलना है बोलते रहो। पर यह मत साबित कर देना कि गीता अच्छा ग्रंथ है। क्योंकि गीता अच्छा ग्रंथ है। यह साबित हो गया तो फिर हम लोगों को धर्म से उखाड़ेंगे कैसे? यह आरोप वास्तव में आचार्य प्रशांत के विरुद्ध नहीं है। यह भगवत गीता के विरुद्ध है। और वह कह भी यही रहे हैं कि आचार्य जी तो अच्छे आदमी हैं। गीता बुरी किताब है। आचार्य जी ठीक-ठाक आदमी हैं और ठीक-ठाक काम करना चाहते हैं। पर गीता बुरी किताब है। ये गीता को अच्छा क्यों साबित करना चाहते हैं? अरे भाई गीता अगर सचमुच ही बुरी किताब होती तो मैं गीता आपको क्यों
1:32:14 पढ़ाता? ना होती गीता तो अपने दम पर आप कभी सोच पाते कि निष्काम कर्म जैसा कुछ हो भी सकता है? पूछ रहा हूं आपसे। पूछ रहा हूं। इतने सुंदर हीरे मोती गीता से उठे हैं। वो अब आपके जीवन का हिस्सा बन गए हैं। ना होती गीता तो वह सब मिलता आपको। गीता बुरी किताब है। पर यह सब लगे हुए हैं यह साबित करने में कि गीता तो बहुत बुरी किताब है। और इस यही साबित करने के लिए तर्क देते रहते हैं। कभी कहीं कुछ छापेंगे, कहीं कोई वीडियो निकालेंगे। वो वीडियो मेरे खिलाफ नहीं है। उस वीडियो का निशिका मैं नहीं
1:32:59 हूं। उस वीडियो का निशाना आप हैं। ये वो सब बातें इसलिए कही जाती हैं ताकि आप गीता से दूर हो जाएं। आपको निशाना बनाया जा रहा है। यू आर बीइंग हंटेड। यह सब चल रहा है। बात समझ में आ रही है? और यह जो चल रहा है वह कुछ हद तक सफल भी हो रहा है। क्योंकि जो फेंस सिटर्स होते हैं जब वह इस प्रकार का कोई वीडियो इत्यादि देखते हैं तो प्रभावित हो जाते हैं। उनको गीता से दूर ले जाने वाले लोग तो सक्रिय हैं। पर उनको गीता की ओर ले जाने वाले आप सक्रिय नहीं है। आप बस यहां बैठ गए हैं कि ठीक है सब बढ़िया ही चल रहा है।
1:33:51 जी आगे बढ़िए। जी अब क्योंकि पहला भाग खत्म हो गया है। हम ऑडियंस से भी पूछना चाहते हैं। अगर पुनर्जन्म में आप लोग भी कोई आरोप और ऐड करना चाहेंगे? नहीं। किसी के कोई और आरोप जो कवर नहीं हुए हैं। तीन ही आवाज आई है आपकी। बाकायदा भारी लोहे की हथकड़ियां लगेंगी। उस दिन तीन भी आवाजें नहीं आएंगी। अभी तीन आ गई हैं। बहुत बड़ी बात है। उस दिन तो जैसे होता है ना बहुत लोगों की मेल आती है
1:34:38 छोड़ने के बाद। वो कहते हैं कि हमने छोड़ तो दिया है। हमारा अकाउंट परमानेंट डिलीट करो ताकि कोई सबूत बाकी ना रह जाए कि हम यहां कभी आए भी थे। उस तरह की मेल आएंगी लोगों से। मैं दिन भर इन्हीं बातों से गुजरता हूं। दर्जनों मेल इसी तरह की आती है क्योंकि हर महीने हजारों लोग छोड़ते हैं। वो जो हजारों छोड़ते हैं उसमें से दर्जनों यही कहते हैं कि सब कुछ डिलीट कर दीजिए ताकि कोई भी निशान सबूत बाकी ना रह जाए। पता नहीं चलना चाहिए कि हम यहां कभी आए थे। आपको भी अगर निशाना बनाया जा रहा है तो यह देख के बनाया जा रहा है कि आप हल्के हैं, वलनेरेबल हैं। निशाना बनाने वालों को पता
1:35:25 हो कि आप निशाना नहीं बनेंगे तो कोई आप पर प्रयास भी नहीं करेगा। आप पर प्रयास करे जा रहे हैं। उसी से यह साबित हो जाता है कि आपको अभी कमजोर देखा जा रहा है। आपकी अपनी नियत को आधा अधूरा देखा जा रहा है। तो उनको यह उम्मीद रहती है कि ये आधे अधूरे हल्के लोग हैं। जरा इन पे जोर लगाओ। जरा इनका मन बहकाओ। यह भटक जाएंगे। काम हो जाएगा। आप में से ही कई लोग इस तरह का जब कोई वीडियो होता है या कोई बात होती है या कहीं पे कमेंटबाजी चल रही है तो उसका स्क्रीनशॉट वगैरह लेके या लिंक लेके कम्युनिटी पर डालते हैं और कहते हैं
1:36:11 आचार्य जी यह सब बातें कही जा रही हैं। कृपया इसका कुछ जवाब बताइए। इसका मतलब समझ रहे हो ना क्या है? वो जो बातें कही गई हैं भाई साहब को अपना कोई जवाब नहीं सूझ रहा है। बल्कि वो खुद डावाडोल हो गए हैं। उनका चित्त कांप गया है। वो अब यहां पर आ गए हैं कि आचार्य जी आप पर ही आरोप है। कुछ सफाई दो ना। इसलिए मैं आपसे कहता हूं मुझे आप पर भरोसा बहुत कम है क्योंकि जो मैक एटमॉस्फियर है उसको आप ना समझते ना समझना चाहते आप जान ही नहीं रहे हो कि हम जो काम कर
1:36:58 रहे हैं उस काम का महत्व क्या है हम धर्म को पुन स्थापित करने का काम कर रहे हैं उसके शुद्धतम रूप में बहुत सारे आपको यहां पे श्लोक दिखाए जा रहे हैं। एक श्लोक है जो नहीं दिखाया जा रहा। यदा यदा ही धर्मस्य ग्लने भवती भारत हम वो काम कर रहे हैं।
1:37:45 धर्म की आज से ज्यादा ग्लानि किसी काल में हुई है तो नहीं हुई है तो आज ही जरूरत है ना धर्म को अभ्युत्थान की अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानम हम वो काम कर रहे हैं और वह श्लोक आपको यहां आरोपों की झड़ी में नहीं दिखाया जाएगा। यह धर्म के अभ्युत्थान का आंदोलन है। और जितनी ताकतें हैं जो चाहती हैं कि धर्म बिल्कुल ही समाप्त हो जाए। वो इल्जाम नहीं लगाएंगी मुझ पर तो और क्या करेंगी? और जब मैं धर्म कह रहा हूं तो मैं समुदाय और संप्रदाय की बात नहीं कर रहा हूं।
1:38:31 मैं वास्तविक धर्म की बात कर रहा हूं। अहंकार के विगलन की प्रक्रिया, प्रयास और साधना को धर्म कहते हैं। यह धर्म की परिभाषा है। बात आ रही है समझ में? धर्म के नाम पर संप्रदायों को आगे बढ़ाने वाला काम करने वाले बहुत हैं। वह भी यही कहेंगे हम धर्म को बढ़ा रहे हैं। पर वो धर्म को नहीं बढ़ाते। वो किसको बढ़ाते हैं? किसी संप्रदाय किसी कम्युनिटी को बढ़ाते हैं। हमारा काम सांप्रदायिक नहीं है। हमारा काम
1:39:18 है एसेंशियल रिलीजसिटी को स्थापित करना। एसेंशियल रिलीजसिटी वास्तविक केंद्रीय धार्मिकता। अगर मैं किसी पंथ को बढ़ा रहा होता, किसी संप्रदाय को बढ़ा रहा होता तो मुझे उस पंथ उस संप्रदाय के लोगों का समर्थन मिल जाता ना। पर मुझे किसी का समर्थन नहीं मिलना है। क्योंकि मैं वास्तविक धार्मिकता को बढ़ा रहा हूं। यह बात अच्छे से समझ लीजिए कि आप अगर मेरे साथ चल रहे हैं तो किस राह पर चल रहे हैं। आपको पता भी नहीं है। आप में से बहुत लोग तो बस मुझे देख कर के मेरे साथ आ गए हैं। बिना यह जाने कि हमारी डगर कौन सी है। अच्छी बात है। क्यूट लोग हैं आप। मेरा मुंह देखा, मेरे साथ आ गए। पर यह भी तो समझ लो कि मैं कौन सी राह पर चल रहा हूं।
1:40:03 नहीं तो झटका खा जाओगे। कमलेश जी इज इट जस्ट मी और इट्स गेटिंग अ लिटिल हॉट इन हियर आर द एसी इज वर्किंग फाइन वेरी रिच ऑफ हर टू थिंक शी इज हॉट नॉट एनी मोर बेबी नॉट एनी मोर एसी वर्किंग फाइन अगले अगले आरोप पे कारवाई कर अगर गीता जेनुइनली एंटी कास्ट है तो कृष्ण
1:40:49 खुद शंकर को प्रॉब्लम क्यों कहते शूद्र का कर्म परिचर्या सेवा बताया गया है तो ऑडियंस में जितनी भी महिलाएं हैं हाथ खड़ा कर लीजिए अर्जुन कहते हैं स्त्रियां दूषित होने पर वर्ण संकट उत्पन्न होता है शूद्र ये तो लोअर हैं ही लेकिन फिर भी इन्हें सेव किया जाए अरे उसी श्लोक ने स्त्री को पाप योनि कहा। इसको कौन चला रहा है? आ गया, आ गया, आ गया, आ गया, आ गया, आ गया, आ गया पीछे, पीछे, पीछे। पीछे, माय लॉर्ड, आरोपी को कंट्रोल में करिए। उनको अपने हाथ में ले रहे हैं। मुझे नहीं पढ़नी गीता। अब थोड़ी बात गंभीर होने वाली है, तो सब थोड़ा ठीक से बैठ जाएं। माननीय, अब जाति के आरोपों पर आते हैं। गीता पहला अध्याय 41वां श्लोक। श्लोक और
1:41:38 उसका अर्थ स्क्रीन पर पेश किया जाए। आइए यह अर्जुन की व्यथा है। तो इस पे अर्जुन कहते हैं स्त्रियां दूषित
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