क्या आपका भी मन बहुत भटकता है? || आचार्य प्रशांत, गीता दीपोत्सव (2024)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो मानसिक स्वास्थ्य, अहंकार और आत्मज्ञान पर चर्चा करता है। इसमें आचार्य प्रशांत ने मन की स्थिरता, अहंकार के अस्तित्व और उसके झूठ पर गहराई से विचार करते हुए खुद को जानने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

  • अहंकार एक झूठ है जो हमारे अस्तित्व का ढांचा बनाता है।
  • मन और अहंकार का संबंध समझना महत्वपूर्ण है ताकि हम अपनी आंतरिक शांति को पा सकें।

इंट्रो

वीडियो की शुरुआत में, आचार्य प्रशांत ने कहा कि अहंकार एक बड़ा झूठ है जो हमारे जीवन में निरंतर तनाव और चिंता का कारण बनता है। वह उदाहरण के माध्यम से यह समझाते हैं कि जब हम अपने बारे में असत्य बातों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं, तो हमारी स्थिति कैसे होती है।

लाओ त्सु का प्रश्न

आचार्य प्रशांत लाओ त्सु के प्रश्न का उल्लेख करते हैं: "क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं?" और इसकी महत्वपूर्णता पर चर्चा करते हैं। वह स्पष्ट करते हैं कि मन का स्थिर रहना आवश्यक है और इसकी भटकन को समझना जरूरी है।

मन का स्वामी कौन है?

इस भाग में, आचार्य प्रशांत बताते हैं कि मन हमेशा किसी न किसी का होता है। मन का स्वामी हमारे अहंकार के भीतर छिपा होता है। जब हम अपनी स्थितियों का दोष मन पर डालते हैं, तो वास्तव में हम अपने स्वामी को छिपा लेते हैं।

मन और अहंकार का संबंध

आचार्य स्पष्ट करते हैं कि मन और अहंकार के बीच एक गहरा संबंध है। वह बताते हैं कि हमारा अहंकार अक्सर हमारे मन के भटकने का कारण बनता है, जिससे हमारी मानसिकता में अस्थिरता आती है।

अहंकार का अस्तित्व

इस अध्याय में, अहंकार के अस्तित्व के बारे में चर्चा की जाती है। आचार्य कहते हैं कि अहंकार एक मानसिक निर्माण है। यह हमें भ्रम में रखता है और हमारी वास्तविकता से दूर करता है।

अहंकार का झूठ

आचार्य इस मुद्दे पर जोर देते हैं कि अहंकार एक मौलिक झूठ है। यह वास्तविकता में कुछ नहीं है, लेकिन हमें यह अहसास दिलाने की कोशिश करता है कि हम कुछ हैं।

ऋषियों की करुणा

आचार्य ऋषियों की करुणा की चर्चा करते हैं। वह बताते हैं कि ऋषियों ने हमारी सुविधाओं के लिए हमारे अहंकार को स्वीकार किया और वह इसKaruna पर आधारित है।

अपने भीतर का झूठ

यहाँ, आचार्य स्पष्ट करते हैं कि हमें अपने भीतर के झूठ की पहचान करनी होगी। यह झूठ हमें भ्रम में रखता है तथा हमारी आंतरिक शांति को बाधित करता है।

मन और विषयों का समुदाय

आचार्य बताते हैं कि हमारे मन में जितने भी विचार और विषय होते हैं, वे सभी अहंकार के चारों ओर केंद्रित होते हैं। यह एक भौतिक समुदाय जैसी स्थिति बनाता है।

मन की भटकन

इस खंड में, आचार्य मन की भटकन के कारणों का विश्लेषण करते हैं। यह भटकन अक्सर हमारे अहंकार और बाहरी विषयों से जुड़ने के कारण होती है।

विषयों से जुड़ने की आवश्यकता

आचार्य इस बात पर जोर देते हैं कि हमें विषयों से जुड़े रहने की आवश्यकता महसूस होती है। यह अक्सर हमारी सुरक्षा का एक तरीका होता है।

संतों की मुलाकात

इस भाग में, संतों की मुलाकात की चर्चा की गई है। आचार्य बताते हैं कि संतों की बातों में हमारी दैनिक समस्याओं का समाधान नहीं होता।

शब्दों की परिभाषा

आचार्य शब्दों की सही परिभाषा की आवश्यकता पर चर्चा करते हैं। सही शब्दों का उपयोग समझने में महत्वपूर्ण होता है।

पोटा और आलू

यह खंड पोटा और आलू जैसे शब्दों की सांस्कृतिक भिन्नता को दिखाता है। आचार्य विभिन्न भाषाओं और उनके अर्थों की जांच करते हैं।

मन की स्थिति

आचार्य कहते हैं कि मन की स्थिति सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों से प्रभावित होती है। हमें इस प्रभाव को समझना जरूरी है।

बोरियत और अध्यात्म

आचार्य यह कहते हैं कि अध्यात्म असली बोरियत को मिटाने का एक उपाय है। यह हमारे जीवन में आनंद लाने की कोशिश करता है।

बच्चों का खेल

इस भाग में, आचार्य ने खेल के माध्यम से जीवन को देखने का तरीका स्पष्ट किया है। मन के खेल को समझने की जरूरत है।

समापन

आचार्य प्रशांत वीडियो का समापन करते हैं, जिसमें वे कहते हैं कि हमें अपनी आंतरिक स्थिति का अवलोकन कर अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहिए।

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Transcript

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0:00 आपकी हालत कैसी रहेगी उदाहरण के लिए आपने दुनिया में घोषित कर रखा है पीएचडी हैं और आप है पांचवी फेल तो आपकी दिन रात हालत कैसी रहेगी यह अहंकार की स्थिति होती है वह एक बड़ा भारी झूठ है क्यों कहा जाता है कि अहंकार का मुंह सुरसा के मुख की भाति सदा खुला ही रहता है क्योंकि वह एक झूठ है वो एक ऐसा झूठ है जो कितने भी सहारे ले रहे उसका झूठ होना सच में तब्दील नहीं हो जाएगा शरीर झूठ नहीं है अहंकार झूठ है शरीर तो तथ्य है मिट्टी है अहंकार की प्रकृति समझ में आ रही है एक डरी हुई चीज जो कभी पूरी नहीं हो पाएगी क्योंकि वह है ही नहीं चैन नहीं है उसे शांति नहीं है तो इसलिए व कभी इससे रिश्ता बनाता है कभी इससे रिश्ता बनाता है फ ना रात की नींद ना दिन का आराम यह भी जो हो रहा है है यह भी बस बच्चों का खेल ही कोई बन के

0:45 बैठ गया है मुझे तो पता नहीं है फ बन के बैठ गया है मैं डूडू मुझे सब पता है मेरा नाम आचार्य जी है बताऊंगा मुझसे पूछो मुझसे मैं बताऊंगा कुछ नहीं है यह बच्चों का खेल है खेल लो आज लाजू एक प्रश्न से शुरुआत कर रहे हैं और प्रश्न का उत्तर हम तभी दे पाएंगे जब कुछ मूल बातें एकदम स्पष्ट होंगी प्रश्न है क्या आप अपने मन को स्थिर

1:32 रख सकते हैं क्या आप मन के भटकाव के पार देख सकते हैं उसके आगे और प्रश्न आते हैं समय रहे तो और भी प्रश्न ले लेंगे पहले मन की बात क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं तो सबसे पहले कहा आप फिर कहा मन और फिर कहा स्थिर आप मन और स्थिर इसमें ऐसा लगेगा जैसे विषय वस्तु मन है जैसे केंद्रीय बात मन

2:21 है जैसे मन का भटकना समस्या हो और उस समस्या के बारे में प्रश्न करा गया हो अगर ऐसा लगेगा तो शुरू में ही गड़बड़ हो गई क्या कहा है क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं तो मन से भी पहले कौन आता है आप आप माने मैं अहम मन यूं ही नहीं होता मन सदा किसी का होता है मन तो जैसे पालतू जानवर है या नौकर

3:10 है या किसी वृत्त की परिधि है सदा उसके केंद्र में कोई होता है सदा उसका स्वामी कोई होता है आज मन खराब है आज मन चंचल है आज मन उदास है जो मालिक है वह अपने आप को छुपा करके सारी बात मन पर डाल देता है है ना अरे मन तो बड़ा पापी होता है यह ऐसा ही है जैसे अपराध करने वाले ने स्वयं को बचा करके अपने उपकरण पर सारा दोष डाल दिया

3:56 हो है ना जैसे बंदू चलाने वाले हाथ ने अदालत में बंदूक हाजिर कर दी हो कि यही गुनहगार है मन की क्या परिभाषा है अहम ने अपने इर्दगिर्द जिन विषयों को एकत्रित कर लिया होता है उन विषयों के समुदाय को मन कहते हैं अ हम ने अपने इर्दगिर्द जिन भी विषयों से संबंध बैठा लिया होता है उन विषयों के लिए एक संयुक्त संज्ञा है

4:44 मन तो इसको मैं अक्सर आपसे ऐसे भी कहा करता हूं कि मन अहम के चारों ओर बसा हुआ मोहल्ला है अहम केंद्र में है और अहम ने अपने चारों ओर एक बस्ती बसा ली है उस बस्ती में सब उसके रिश्तेदार रहते हैं दोस्त रहते हैं जिनसे अहम का लेना देना है वह सब उस बस्ती में रहते हैं है ना आप उस बस्ती को देखें तो बस्ती बहुत बड़ी है ध्यान से नहीं देखेंगे तो बस्ती ही बस्ती दिखाई देगी बस्ती के बीचोबीच जो बैठा हुआ है वो नहीं दिखाई देगा क्योंकि वो एक है

5:30 वह मात्र एक है जो बस्ती के मध्य में बैठा हुआ है और बस्ती में उसने कितने बैठा लिए हैं अनेक आप यहां तक कह सकते हो अनंत मन ऐसा जबरदस्त एक मोहल्ला हो जाता है ऐसे उसमें अद्भुत गुण आ जाते हैं कई तरह की उसमें अनंतता एं जैसे दिखने लग जाती हैं मन की गति अनंत है मन की चाल अनंत है बहुत तरह की बातें बोली जाती हैं मन की माया अनंत है मन की पीड़ा भी अनंत

6:19 है अरे मन की गहराइयों में क्या छुपा हुआ है किसी को नहीं पता जैसे कि अथाह गहराइयां हो तो मन जब इतना लंबा चौड़ा और ऐसा अद्भुत उसका चत्र तो सारा ध्यान मन ही खींच ले जाता है मन के केंद्र में जो बैठा है उस पर ध्यान नहीं जाता है मन के केंद्र में कौन बैठा है अहम तो पहली जो हमें सावधानी बरतनी है वह यह कि मन की बात करना छोड़ें अहम की बात करें मन तत्काल बदल जाएगा अगर आप बदल जाए आप जैसे होते हैं उसी तय होता है कि आपका मन कैसा होगा मन को लेकर के आपके पास कोई सीधा अधिकार

7:06 या नियंत्रण नहीं हो सकता कहते ना मन बदलना है चलो मन बदलने के लिए पहाड़ों पर चलते हैं चलो मन बदलने के लिए पिक्चर देख लेते हैं कुछ और कर लेते हैं मन नहीं बदलेगा इतना हो जाएगा कि एक चादर के ऊपर आप दूसरी चादर डाल दें पिछला रंग दिखना बंद हो जाएगा पिछले दाग धब्बे दिखने बंद हो जाएंगे पर वह कहीं चला नहीं गया जो पिछली परत थी तह थी वह कहीं चली नहीं गई है उसके ऊपर आपने कुछ डाल दिया है जल्दी जरूरत पड़ेगी उसके भी ऊपर कुछ डालने की इसीलिए फिर हम कहते हैं कि बाप रे बाप कितने तल है मन के मन से उलझे रह जाना बहुत आसान

7:53 है आसान ही नहीं है मात्र सुविधाजनक है सुविधाजनक भी नहीं है कहिए कि अनिवार्य है क्योंकि अगर मन की बात नहीं करी तो अहम की बात करनी पड़ेगी अहम फस जाएगा मन की बात भी कौन कर रहा है अहम अहम अपनी बात क्यों करेगा कभी सीधे भूलिए नहीं कि मन की बात मन करने नहीं आता मन की बात भी मैं करता हूं ना मैं मैं मन की बात करता ही इसीलिए हूं ताकि मुझे अपनी बात ना करनी पड़े समझ रहे बात मैं मन की बात करता ही इसीलिए हूं ताकि मुझे अपनी बात ना करनी

8:41 पड़े अब देखते हैं कि मन का निर्माण कैसे होता है अहम कुछ है नहीं संतों से लेकर के गीता तक और अष्टावक्र से लेकर नागार्जुन तक सब आपको लगातार यही पढ़ा रहे हैं कि अहम एक बड़ी अद्भुत इकाई होता है जो मात्र अपनी नजरों में होता है अन्यथा पार मार्थी तल पर वास्तविक अर्थ में उसका कोई अस्तित्व नहीं है पर वह अद्भुत इसलिए क्योंकि अपनी दृष्टि में तो वह है इसीलिए हम कहते हैं कि अहम यदि है भी तो

9:28 बस रिक तल पर है व्यवहार की भाषा में हम मैं आदि कह देते हैं जगत व्यापार चलना मुश्किल हो जाएगा अगर हम वैसे ही हो जैसे हैं पर मैं कहना छोड़ दे तो इस दुनिया में तो ऐसे ही चलता है मैं तुम मेरा तेरा लेकिन इस मैं नामक इकाई का अपना कोई स्वतंत्र पमार्ट अस्तित्व नहीं है इसको खोजने जाओ य कहीं नहीं मिलती वास्तव में यह अनुभव ही तभी तक होती है जब तक इसको खोजने नहीं जाओ जो ही इसे खोजने निकलो तो पता चलता है कि जिसको खोज रहे हैं वह है ही नहीं और जो खोजने निकला है वह भी खोज में मिट जाता

10:17 है समझ आ रही बात तो अहम बड़ी अजीब हालत में रहता है उसकी हालत से हमको थोड़ी तो संवेदना रखनी पड़ेगी अपनी हालत से भाई हम और कोई नहीं है हम ही है अब सोचो आप कि आप कुछ ऐसा बने बैठे हो जो बस आपके अपने प्रचार के कारण है आप वास्तव में वह हो नहीं तो आपकी दिन रात कैसी हालत रहेगी हमने आहम के बारे में क्या कहा वह मात्र अपनी दृष्टि में है वह मात्र अपने देखे हैं अगर स्वतंत्रता से निष्पक्षता से उसको

11:03 खोजा जाए तो वह नहीं मिलेगा हां अ हम स्वयं कहे कि मैं हूं तो उसका होना सिद्ध होता रहता है और जब अ कहता है मैं हूं तो साथ ही साथ वो यह भी मान लेता है कि तुम हो क्योंकि बात बड़ी बेमेल हो जाएगी बड़ी अतार्किक हो जाएगी अगर मैं कहूं कि मैं तो हूं पर तुम नहीं हो इस तरीके से एक दूसरे की पीठ खुजा के काम चलता रहता है मैं भी हूं तुम भी हो ठीक है ना अब मैं आपसे पूछ रहा हूं आपकी हालत क्या रहे अगर आपको पता हो कि कोई ऐसी चीज है आपके बारे में जो सिर्फ आपके प्रचार के कारण है जो सिर्फ आपके आग्रह आपके हठ आपके झूठ के कारण है अन्यथा नहीं है आपकी हालत कैसी रहेगी उदाहरण के लिए आपने दुनिया में घोषित कर रखा है पीएचडी है और आप है पांचवी

11:49 फेल और दुनिया को आपने क्या बता रखा है आप पीएचडी है तो आपकी दिन रात हालत कैसी रहेगी अपनी हालत बयान करते हुए कुछ शब्द बताइए डरे हुए असुरक्षित धकधक लगी रहेगी लगातार आप हां हां और लगातार आप लोगों को पटा कर रखना चाहोगे लगातार आप लोगों को अपने पक्ष में रखना चाहोगे लगातार आप दबंग लोगों से अच्छा रिश्ता रखना चाहोगे है ना जो समाज दुनिया वगैरह के बाहुबली होंगे आप उनकी गुड बुक्स में रहना चाहोगे हां बहुत बढ़िया और लगातार आप ऐसों से दूर रहना चाहोगे जो आपकी पोल खोल सकते हैं तो

12:35 आप ज्ञानियों से दूर रहना चाहोगे दूर ही नहीं रहना चाहोगे ज्ञानी का होना भी आपकी धड़कन बढ़ाने रक्तचाप बढ़ाने के लिए पर्याप्त है तो आप ज्ञानी को मिटाना चाहोगे भले ही ज्ञानी स्वयं आप पर आक्रमण करने ना आ रहा हो पर आप अपनी ओर से उस पर आक्रमण करने जाओगे क्योंकि अगर वह है भी तो उसका वजूद ही आपके लिए खतरा है आज वह आप पर आक्रमण नहीं कर रहा पर कल उसने आप पर नजर डाल दी तो आप मिट जाओगे उदाहरण के लिए आप जिस यूनिवर्सिटी से पीएचडी होने का दावा करते हो उसके वाइस चांसलर के प्रति आपका क्या रुख रहेगा यह दृष्टि रहेगी ज्ञानियों के प्रति क्योंकि वह व्यक्ति है तत्काल आपकी पोल खोल सकता है यह अहंकार की स्थिति होती है वह एक बड़ा भारी झूठ

13:24 है लेकिन उसे जीना है उसे जीना है उसे झूठ बन के ही जीना है उसको लगता है अस्तित्व का मतलब ही होता है झूठ का अस्तित्व उसको लगता है कि अगर उसने अपना झूठ हटा दिया तो वह स्वयं ही हट जाएगा वह कहता है कि मैं माने झूठ तो अगर झूठ हट गया तो मैं ही गायब हो जाऊंगा तो बहुत डरा हुआ रहता है तो लगातार रिश्ते बनाता रहता है अब समझ में आ रहा है कि इतने विषयों से संबंधित होना हमारी मजबूरी क्यों है नेटवर्किंग करके रखने का भाई किसी भी दिन आफत आ सकती है पैसा भी बहुत सारा रखने का क्योंकि किसी भी दिन आफत आ सकती है अब पीएचडी बोल

14:10 कर के नौकरी ले ली है कुछ कर लिया है वह सब चली जाएगी किसी भी दिन जा सकती है तो बहुत सारा पैसा जोड़ के रखो नौकरी चली गई तो अपना क्या होगा क्योंकि पता है कि तुम्हारे पास जो है वह झूठ है व कभी भी छिन सकता है यह अहंकार है तुम्हारे पास जो कुछ है वो झूठ पर आधारित है कभी भी छिनेगा तो इसीलिए बहुत तरह की सुरक्षा के इंतजाम रखता है पुलिस वालों से बना के रखो भाई किसी भी कोई एफ दिन कोई एफआईआर कर सकता है कि इस आदमी की डिग्री छूटी है तो मैं पहले ही वहां पर जाकर के सब बंदोबस्त इंतजाम प्रबंध सेटिंग करके रखूंगा नेताओं से बनाकर रखो भाई किसी भी दिन कुछ हो सकता है मीडिया से बना के रखो भाई किसी भी दिन अखबारों में बदनामी छप सकती है समझ में आ रही है बात अब समझ में आ रहा

14:56 है कि क्यों कहा जाता है कि अहंकार एक अपूर्णता है जो सदा किसी ना किसी के सहारे की तलाश में रहता है और कोई भी सहारा वो ले ले कोई सहारा पूरा नहीं पड़ता अभी उसे और सहारे चाहिए क्यों कहा जाता है कि अहंकार का मुंह सुरसा के मुख की भाति सदा खुला ही रहता है क्योंकि वो एक झूठ है वो एक ऐसा झूठ है जो कितने भी सहारे ले रहे उसका झूठ होना सच में तब्दील नहीं हो जाएगा झूठ माने मिथ्या है ही नहीं फॉल्स रंग नहीं है ही नहीं प्रतीत होता है प्रतीत भी बस इसलिए होता है क्योंकि प्रतीत होना मजबूरी है चोरी छुपे रह लेगा तो दूसरों की नजर तो पड़ सकती है ना उस परे और चोरी छुपे तो

15:42 रहता ही है कितना कितना भी चोरी छुपे रह ले दूसरों की नजर तो उस पर पड़ेगी ही ना साधारण कामों के लिए भी जगत से संबंधित तो होना ही पड़ेगा जिसको कहते हैं कि भूमिगत हो जाना चोर वगैरह क्रिमिनल्स कई बार हो जाते हैं अंडरग्राउंड तो भी खाने पीने के लिए कुछ करने के लिए तो साधारण रिश्ते तो बनाएंगे ना दुनिया से डर तो लगातार लगा ही रहता है कभी भी धर लिए जाएंगे वो हम है वो अहंकार है हमारा होना ही एक झूठ है शरीर झूठ नहीं है अहंकार झूठ है शरीर तो तथ है मिट्टी है लहर है मिट्टी से लहर उठी है पूरा अध्यात्म देह की बुराई करने में लगा रहता

16:28 है देह बुरी है देह विषयो वासनाओं का घर है देह कुछ नहीं है देह तो वैसे ही है जैसे ये आपके पांव के नीचे जमीन है सर के ऊपर आसमान है यही देह है पंचभूत देह में क्या है लेकिन एक बहुत विशेष तत्व होता है अहंकार जिसको ना तो यह कहा जा सकता कि तथ्य है मिट्टी की तरह और ना यह कहा जा सकता कि असत है बिल्कुल क्योंकि वह कम से कम अपनी दृष्टि में तो है तो सारा अध्यात्म अहंकार के लिए ही होता है अध्यात्म का मतलब होता है कि सबसे पहले

17:15 तो ज्ञानियों ने ऋषियों ने आपकी खातिर एक समझौता किया समझौता यह किया कि आपकी हस्ती को स्वीकृति दी माना एक्नॉलेज किया उन्हें भी पता है कि अहंकार तो है ही नहीं आप रोते हुए जाइए ऋषिवर बड़ा दुख है जीवन संताप से भरा हुआ है ऐसा है वैसा 50 बातें अब ऋषिवर अगर बैठे हुए हैं परमार्थिक आसमान पर तो वहां बैठे हुए क्या बोल सकते हैं वह तुम तो कुछ नहीं जब तुम ही नहीं तो तुम्हारा दुख कैसा सीधा जवाब तो यही होना चाहिए मैं बहुत गंभीरता से विचार कर रहा हूं फिजूल के प्रश्न बंद कोई प्रश्न आए बोलो प्रश्न करता से तुम हो

18:02 ही नहीं जब प्रश्न करता ही नहीं है तो प्रश्न कैसा लेकिन वो ऐसा नहीं करते वो सबसे पहले एक समझौता करते हैं हमारी खातिर पूरा अध्यात्म उसी समझौते से शुरू होता है वह समझौता यह है कि माना जाता है कि अहम है यह माना जाता है किसकी खातिर जो दुखी है उसकी खातिर क्योंकि हमको दिख रहा है कि ना दुखी है ना दुख है पर जो दुखी है वह तो रो ही रहा है ना तो सबसे पहले तो उसके दुख को अभि स्वीकृति दी जाती है एक्नॉलेजमेंट दिया जाता है कि हां है और फिर वहां से शुरू करके उसको वहां तक लाया जाता है जहां दुख

18:47 मिट जाए दुखी के मिटने से लेकिन शुरुआत में तो मान लिया जाता है जैसे कोई छोटा बच्चा आपके पास रोता हुआ आए बोले फने कमरे में भूत है और भूत ने हमें गिरा दिया और हमारे देखो ऐसे यहां चोट लग गई है कोनी में तो आप बोलो अले अले भूत ने तो बला बुला किया चलो दोनों मिलकर भूत को मलते हैं और फिर आप उसको लेकर जाए और कमरे की बत्ती जला दें और फिर वहां दोनों मिलकर भूत को खोजे और भूत नहीं मिले जब नहीं मिले तो फिर आप उसको समझा द कि देखो भूत तो है ही नहीं लेकिन शुरुआत कैसे की गई मान लिया गया अच्छा तू कह रहा है भूत तो मैंने मान लिया तो शुरुआत ऋषियों की करुणा से होती है वो करुणा वश वो बात भी

19:36 मान लेते हैं जो उनको पता है कि झूठी है क्योंकि बच्चा रो रहा है क्या करें वो मैं क्या कर ठीक है मान लो हां हा तुझे बहुत दुख है मान लिया बहुत दुख है चल भूत को खोजते हैं भूत तो मिला ही नहीं अहंकार वही भूत है जिसको खोजो तो कभी नहीं मिलेगा वह सिर्फ अज्ञान में पनपता है जब तक मानते रहोगे वह रहेगा जब तक बस अंधा विश्वास है वह रहेगा जैसे ही जिज्ञासा और प्रयोग परीक्षण शुरू होते हैं उसका कुछ पता नहीं चलता ठीक है अहंकार की प्रकृति समझ में आ रही

20:22 है एक डरी हुई चीज जो कभी पूरी नहीं हो पाएगी क्योंकि वह है ही नहीं जिसको कभी भी चैन संतुष्टि भरोसा आश्वस्त नहीं होगा क्योंकि उसके मूल में झूठ बैठा है जिसके पास डिग्री है ही नहीं वह 100 तरह की डिग्रियां बनवा ले और समाज के 500 बड़े लोगों से अपने पक्ष में प्रशंसा स्तुति आदि गवा ले तो भी क्या कभी उसको चैन पड़ेगा भीतर ही भीतर लगातार उसको शंका बनी रहेगी क्या कोई पोल खोल ना

21:09 दे वह बन गया होगा समाज का बड़ा कद्दावर आदमी वहां दूर कोई बैठा होगा एकदम नया नवेला सा पत्रकार 25 साल का बस और व पत्रकार एक साधारण सा सवाल पूछ देगा और यह साब हो सकता है 50 साल के हो गए हो और इनके पास दुनिया भर का रुतबा रसूक है और इनका दिल धक से धड़क जाएगा कि बाप रे किने सवाल पूछा क्या किसी ने सवाल पूछा यह सब बातें होती दिखाई देती हैं बड़े-बड़े इज्जतदार रुतबे दार लोग बड़े अनुभवी लोग बड़े ज्ञानी लोग और कैसे उनके पसीने छूटने लग जाते हैं जैसे ही कोई घर का बच्चा भी सवाल पूछ दे क्योंकि उन्हें अच्छे से पता है कि कुछ है जो उन्होंने छुपा रखा

21:55 है देयर इज स्केलेटन इन द प्रोवर्बियल कबर्ड जाने भी दो यारों तो कमिश्नर था पता नहीं डिमेलो नाम था डिमेलो हां डिमेलो डिमेलो व लाश है क्या कर रहे हैं आप लोग ने फिल्म नहीं देखी है मैंने पांच बार देखी है कम से कम वो तो कमिश्नर डिमेलो है ये जो डार्क ह्यूमर होता है ना ये मुझे बहुत पसंद आता है जब वो अंत में दो सत्य के खोजी पूरी पिक्चर में वह लगे रहते हैं कि

22:42 दुनिया को सच बताएंगे भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करेंगे और दोनों अंत में आखिरी दृश्य है कि दोनों दोनों को जेल ले जाया जा रहा है कि यही दोनों चोर है और पीछे से धुन बज रही है हम होंगे कामयाब हम होंगे कामयाब एक दिन भारत राष्ट्र महान है हम पूरी पिक्चर में तीन घंटे यह तीनों दोनों लग करके जो गड़बड़ हुई होती है ठेकेदारों और नेताओं के बीच में साठगांठ और यह सब हुआ होता है और कमिश्नर की हत्या हुई होती है तो यह दोनों मिलकर के इनमें से एक फोटोग्राफर होता है शायद और एक शायद पत्रकार होता है कुछ ऐसा ही है यह दोनों लगे रहते हैं उसका एक्सपोज करने में और अंत में क्या देखा जाता है इन्हीं दोनों को पकड़ लिया गया कि यही दोनों गुनहगार है हत्या भी इन्होंने करी और ये जेल जा रहे हैं तो वो कमिश्नर की लाश

23:30 है उसको पूरी फिल्म में घुमाया गया है ऐसे दिखा के कि बंदा अभी मरा तो है ही नहीं व पूरी फिल्म ही जैसे दो तीन दिन के अंदर की हो तो कभी उसको साड़ी पहना रहे हैं कभी कुछ कर रहे हैं अंत में उसमें स्टेज पर एक महाभारत और राम लीला का कुछ हाइब्रिड भी हो जाता है तो उसमें भी कमिश्नर को कोई रोल दे देते हैं द्रौपदी बना देते हैं उसको हां द्रौपदी बना देते हैं किब यह तो बेचारी मौन व्रत धारी रजस्वला द्रौपदी है यह शर्म लज्जा के मारे क्या बोलेगी भरी सभा में तो उसको खड़ा कर रखा और कभी इधर गिर रही कभी उधर गिर रही है तो लाश है उसको साड़ी में ऐसे लपेट लपेट के खड़ा कर रखा है एक भारी

24:17 भीम कर दिया उसका काम उसको संभालना और कमिश्नर इतना मोटा समझ में आ रही है बात जो उसकी पूरी कॉमिक अपील है वह इसी में है कि कैसे एक लाश को जीवित दिखाने में बहुत हास्यास्पद स्थितियां पैदा हो जाती हैं है लाश और उसको दिखाना क्या है कि जीवित है उसी से कॉमेडी पैदा हो रही है वह अहंकार है लाश है लेकिन दुनिया भर को यह जताना है कि प्राण है जैसे खाल लोहार की सांस लेत प्राण उसको गाड़ी में बैठा रखा है कभी

25:04 दिखा रखा है कि वह रोगी है तो उसको व्हील चेयर पर डाल रखा है जगह-जगह उसकी लाश लेकर घूम रहे हैं और दुनिया को यह दिखाना है कि यह तो अभी और दोनों की दुर्गति हुई जा रही है उस कमिश्नर की लाश को ढोने में यही दुर्गति हमारी है हम अपने भीतर एक लाश ढो रहे हैं हम अपने भीतर एक झूठ ढो रहे हैं उस झूठ का नाम है मैं मैं से नहीं समझ में आएगा उस झूठ का नाम है करता डुअल डुअल श्री कृष्ण से ज्यादा बेहतरीन तरीके से इस बात को शायद ही किसी ने समझाया हो कहते हैं गुणा गुणेश वतं गुण ही गुणों से मिलकर काम करते हैं लेकिन जो मूर्ख होते हैं क्या अहंकार

25:53 अमूढ़ आत्मा जो मूर्ख होते हैं उन्हें लगता है हम कर रहे हैं सब कुछ ही इस प्रकृति की रासायनिक क्रियाओं से घटित हो रहा है जिसको कहते हैं कि तीन गुण आपस में गति कर रहे हैं लेकिन एक मूर्ख आक के उसका श्रेय लेलेना चाहता है कि मैंने करा है जो कुछ हो रहा है सच पूछो तो तुम्हारी अनुमति के बिना हो रहा है जो हो रहा है उसमें तुम्हारा कोई योगदान नहीं है कोई तुमसे अनुमति मांग नहीं रहा कोई तुमसे सहमति भी नहीं मांग रहा लेकिन फिर भी एक है विदूषक उसको कूद कर आना है मंच पर और कहना

26:39 है यह सब कुछ मैंने किया वो अहंकार है अहंकार माने करता डुअल जो डूइंग का हैपनिंग का श्रेय ले लेना चाहता है वास्तव में डूइंग है ही नहीं हैपनिंग है मात्र गति है गतिक कोई नहीं है कर्म है करता कोई नहीं है कर्म निरंतर हो रहे लेकिन एक मान्यता है झूठी धारणा है कि कर्म हो रहे हैं तो करने वाला कोई होगा जरूर होगा वह अहंकार है और अहंकार के पास स्वयं ही यह प्रमाण है कि वह नहीं

27:24 है प्रमाण क्या है लगातार बना हुआ उसका डर वो इतना डरा हुआ है कि समझ जाता है कि मेरे जो दावे हैं अपने ही बारे में वह दावे यथार्थ नहीं हो सकते और इसी डर के कारण वह दुनिया भर का संचय करता है कहानियां बनाता है गुटब करता है जितने दुनिया के आप कृत्य देख रहे हैं वह अहंकार के डर से ही होते हैं और डर तो उसमें रहेगा ही अहम हो और डर ना हो ये नहीं हो सकता तो अहम ने जो गुटब करी है जो अपने आसपास पूरा मोहल्ला बैठाया है उसको मन कहते

28:11 हैं जैसे आपने पुरानी हिंदी फिल्मों में देखा होगा कि किसी छोटी जगह पर जो एकदम दबंग बाहुबली नंबर एक लत है किसी जगह पर उसकी कोठी होती है और कोठी के चारों ओर उसने लगभग एक किलोमीटर वर्ग क्षेत्र में क्या फैला रखा होता है अपने लोगों की बस्ती देखा है कि नहीं देखा है जैसे चक्रव्यूह में होता है एक के बाद एक चक्र है और बीच में कौन खड़ा है जो परम योद्धा है ये उस तक आसानी से नहीं पहुंच सकते चारों ओर पहले यह सब है तो मन समझ लीजिए जैसे अ का सुरक्षा कवच

29:02 है आपके मन में कुछ भी यूं ही नहीं होता आपके मन में जो कुछ भी है वह इसलिए ताकि आपके झूठ को बचाए रख सके जो चीज आपके झूठ को बचाएगी नहीं वह मन में बसेगी नहीं वह मन को काट करके अहम पर आघात करेगी कुछ अगर है जो मन को बहुत प्यारा है जो मन में आकर के शांति पूर्वक कुशलता पूर्वक बस गया है तो उसका जीवन में एक ही काम है अहंकार को बचाना फिर दोहराते हैं मन अहंकार के इर्दगिर्द जमा हुई विषयों की बस्ती है हां हां रहा होगा अगर वहां भी गैंगस्टर वाला मामला है तो बिल्कुल रहा होगा एक बीच

29:49 में और उसने अपने चारों तरफ पूरी बस्ती बसाई होगी जैसे अभी यह फिल्म आई थी उसमें भी तो था गैंगस्टर फिल्म केजीएफ बीच में उनका महल है और चारों तरफ उनके लोगों की बस्ती है यह मन है यह मन है ऐसे ही वहां किसी को नहीं बसा लिया जाता देखिए आपके मन में कौन है जो भी आपके मन में है वह कहीं ना कहीं इसलिए है कि वह आपके होने को स्वीकृति देता होगा माने आपके झूठ को सच मानता होगा आप मन में लाओगे उसी को जो कह दे कि हां तेरा जो झूठ है वो मैंने सच माना तो ठीक अब हम तुम्हें अपने मन में प्रवेश देते हैं तुम दिन को कहो रात तो हम रात कहेंगे

30:34 ठीक है एग्री यस एग्री ओके यू कैन कम तब वो मन में आ जाएगा किसका विचार मन का विचार मन मन के पास कोई एजेंसी नहीं है मन करता नहीं है मन करता नहीं है करता कौन होता है अहम मन तो विषयों का संकलन है जैसे अब यह सब मैं बैठा हूं मैंने यह सब चीजें अपने आसपास रख ली है मन ऐसा है यह सब क्या है यह विषय है इनको आसपास रख लिया मन ऐसे है तो मन के पास अपना कोई कर्तृत्व नहीं होता है मन

31:22 अपने आप में पैसिव है इसीलिए आपसे कह रहा हूं कि जब हम कहते हैं ना कि मन उदास है मन चंचल है तो वह बात पूरी तरह सही नहीं होती जिसको आप मन की चंचलता कहते हो वह फुटबॉल की चंचलता है फुटबॉल चंचल तो होती ही है फुटबॉल चंचल होती है कि नहीं होती है पर क्या हम कहेंगे कि फुटबॉल चंचल है तुम फुटबॉल को देखो तो कितनी चंचल दिखाई देगी मैच चल रहा है फुटबॉल कैसे दिखेगी रुख नहीं रही पर क्या फुटबॉल चंचल है चंचल कौन है फुटबॉल को मारने वाला तो उसी तरह से मन की चंचलता वास्तव में अहम की विकता है अहम की विकता मन की चंचलता के

32:10 रूप में प्रकट होती है मन नहीं चंचल होता समझ रहे हो विषय क्यों इधर उधर भागेंगे भाई मन नहीं चंचल होता है अहम कभी इस विषय से रिश्ता बनाता है और कभी तो चंचल कौन है और चंचल इसलिए क्योंकि विकल है विकल माने बेचैन चैन नहीं है उसे शांति नहीं है तो इसलिए व कभी इससे रिश्ता बनाता है कभी इससे रिश्ता बनाता है ठीक वैसे जैसे कभी इसको पास देते हो कभी उसको पास देते हो कभी इससे लेते हो कभी उस वहां तो फिर भी जो खिलाड़ी हैं वह कई सारे हैं यहां पर खिलाड़ी बस एक एक खिलाड़ी है जो कभी इस

32:57 विषय को पकड़ता है कभी उस विषय को पकड़ता है किसी भी एक विषय के साथ वह सेटल नहीं हो सकता वह शांत नहीं बैठ सकता क्योंकि किसी भी विषय में क्षमता ही नहीं है कि झूठ को सच बना दे हां हर विषय के पास जाया इसी आशा से जाता है कि क्या पता यह मेरी हस्ती को प्रमाणित कर दे क्या पता इससे जुड़ कर के जो है नहीं वह हो जाए क्या पता इससे जुड़ के चैन मिल जाए हम तो विषय नहीं कूद फान मचा रहे हैं मन माने विषयों का हमने क्या कहा समुदाय

33:44 विषय नहीं कूद फान मचा रहे वैसे भी मन तो सूक्ष्म होता है ना क्या कूद फान मचाएंगे इतनी बाहर वस्तुएं हैं उन वस्तुओं में से जिसने आप जिस जिनसे आपने रिश्ता बना लिया उनको विषय बना के यहां बैठा लेते हो वह क्या बेचारे कूद फात मचाएंगे वो तो छवियां है मन में उन वस्तुओं की छवियां होती हैं जिन वस्तुओं से आपने रिश्ता बना लिया तो व छवियां क्या खूद फान मचाएगी मन नहीं चंचल होता अहम चंचल है और चंचल होना उसकी मजबूरी है उसे चंचल होना पड़ेगा रुक के टिक के थमके तो वह बैठ सकता है ना जिसको घर मिल गया हो जिसको आश्वस्त मिल गई हो हमको ना कोई घर है ना आश्वस्त

34:32 है उसका तो यही है कि कहीं जरा सा कुछ खटका हुआ उसकी नींद खुल जाती है मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई मेरी चोरी पकड़ी तो नहीं गई आप कोई बड़ी भारी चोरी करके बैठे हो क्या हालत रहेगी आपकी और सोचो अ की क्या हालत रहेगी जिसने दुनिया की सबसे बड़ी चोरी कर दी है जिसने किसी ऐसे को अस्तित्ववाद घोषित कर दिया जो आप काले को गोरा बोल दे एक झूठ यह हुआ अमीर को गरीब बोल दे एक झूठ यह हुआ आदमी को औरत बोल दे एक झूठ यह हुआ छोटे को बड़ा बोल दे एक झूठ यह हुआ हुआ ना और सोचो झूठों में झूठ क्या है जो है

35:18 ही नहीं उसे हुआ बोल दे अहंकार ने वो झूठ बोल रखा है कैसे उसको कभी चैन मिलेगा फ ना रात की नींद ना दिन का आराम लगे हुए हैं यह करने में वह करने में इधर उधर दुनिया भर का खुर पेंच कभी किसी से नाता जोड़ा कभी किसी से कुछ करा कभी कहीं जाकर टाका बिड़ाया शतरंज के मोहरे हो गए दुनिया के सब विषय इसको इससे लगाओ इसको उससे जोड़ो क्या पता बात बनी जाए बात बनती नहीं जिंदगी ख खत्म हो जाती है समझ में आ रही बात

36:06 य तो जो चुनौती आज हमें दे रहे हैं लाउज प्रश्न चुनौती के रूप में क्या आप अपने मन को स्थिर रख सकते हैं क्या आप मन के भटकाव के पार देख सकते हैं जी हां देख सकते हैं अगर हम मन की बात करना बंद कर दे मैं मन की बात करता है ताकि मैं को मैं ना देखना पड़े मन की बात बंद मेरी बात शुरू मेरे होने से मन है ना आप ना रहो तो मन रहेगा क्या आप ना रहो तो मन रहेगा क्या जो कुछ स्मृति में पड़ा हुआ है वह विषय नहीं कहलाता विषय तभी है जब अहम उससे संबंध बनाता है जिस क्षण आपने संबंध बनाने की

36:53 आवश्यकता छोड़ दी विषय सीधे स्मृति में चला जाता है निष्क्रिय हो जाता है पैसिव अब आपको व्यवहारिक तल पर कभी जरूरत पड़ेगी तो आप उसको कॉल कर लोगे जैसे सॉफ्टवेयर में होता है ना फंक्शन किसी चीज को कॉल करता है तो आप उसको कॉल कर लोगे छोड़ दोगे अब आपके पास यह जरूरत नहीं है कि आपके पास लगातार कोई मौजूद रहे सुरक्षाकर्मी की तरह जब शांत हो जाता है माने

37:40 आत्मस्तकम क्या दे इस बात का क्योंकि मन में कुछ था ही नहीं बल्कि अब आपने पूछ लिया कि क्या सोच रहे हो तो मन में कुछ आ गया आपके पूछने से आ गया अन्यथा कुछ नहीं था लेकिन य नहीं हो सकता कि गैंगस्टर साहब हैं पर सुरक्षा कवच तो वह जो पूरी बस्ती है वह खाली तब तक नहीं होगी जब तक उसके बीच में एक दबंग दिखने वाला लेकिन निहायत ही डरपोक गैंगस्टर जब तक बैठा हुआ है तब तक बस्ती खाली नहीं होगी अहम जैसे जैसे आत्मस्तकम जाता है

38:27 वैसे-वैसे विषयों से जुड़ने की जरूरत कम होती जाती है आपकी आध्यात्मिक प्रगति कितनी हो रही है उसको जांचने का एक यह तरीका हो सकता है कोई भी तरीका शत प्रतिशत फूल प्रूफ नहीं होता पर फिर भी आपको जिंदगी में कितने विषयों से जुड़ने की बाध्यता प्रतीत होती है और जब से जीवन में गीता आई है कितने विषय अनावश्यक लगने लगे हैं कितनी बैसाख है जो आपने त्याग दी और त्याग भी नहीं द गिर गई क्योंकि आप दौड़ने

39:13 लगे जो दौड़ रहा हो वह बैसाखी कहां तक ढोते ढोते दौड़ेगा जो दौड़ना शुरू कर दे वो भले ही बैसाखी त्यागने का संकल्प ना करे वो पाएगा कि दौड़ने की प्रक्रिया में बैसाखी अपने आप गिर गई है तो यह जांच अपने जीवन में कि कितनी चीजें आपने सिर्फ इसलिए पकड़ रखी थी कि उनसे आपको सहारा या सुरक्षा मिलता था और अब लगता है कि आवश्यकता नहीं है जरूरत नहीं है भाई हट जाओ व आके क थैंक यू सो मच फॉर सर्विसेस पर तुम्हारी जरूरत नहीं है आप घर से बाहर निकल रहे हैं अरे अरे मैं भी चलता हूं ठीक

39:58 कर लेंगे हो जाएगा आप ट्रेन का टिकट करा रहे नहीं नहीं मैं भी मैं भी चलता हूं ट्रेन है सीट है हम है पहुंच जाएंगे समझ में आ रही बात यह जितनी ऊंची बातें हैं यह ऊंचाइयों के लिए नहीं है यह जितनी ऊंची बातें हैं वह इसलिए हैं ताकि जमीन पर रहने वालों की जिंदगी बेहतर हो सके आसमानों की बातें आसमानों के लिए नहीं होती कृष्णों की बातें कृष्णों के लिए नहीं होती कई बार बात आती है कि भगवान महावीर और गौतम

40:43 बुद्ध समसामयिक थे मोटे तौर पर 203 साल उम्र में महावीर बुद्ध से जेष्ठ थे और एक ही क्षेत्र में वह भ्रमण करते थे यही पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र यहीं पर उनका पूरा काम चलता था तो लोग कई बार कहते हैं कि यह दोनों महानुभाव एक दूसरे से कभी मिले क्यों नहीं क्योंकि कोई जरूरत नहीं है क्योंकि कृष्णों की बातें कृष्णों के लिए नहीं होती क्या करेंगे एक दूसरे से मिलके हां जानते थे शायद एक दूसरे को क्योंकि कई बार ग्रंथों में उल्लेख आता है तो पता रहता है हिंदू ग्रंथों में उदाहरण

41:29 के लिए जैन मुनियों का बड़े आदर के साथ उल्लेख आता है लेकिन ऐसा कोई उल्लेख हमें नहीं मिलता कि जैन तीर्थंकर और उपनिषदों के ऋषि आमने सामने बैठे हुए हो आदर बहुत है पर आमने सामने बैठने की कोई आवश्यकता शायद है नहीं यही बात आप जब मध्यकाल में आ जाएं और वहां आप पाएं कि भक्ति मार्ग के इतने संत थे संत कवि थे बहुत कुछ छिटपुट मौके होंगे विरल जब उनमें आपस में मुलाकात हुई हो हां उनमें गुरु शिष्य का ही नाता हो जैसे रैदास है मीरा है तो अलग बात है अन्यथा आपस में नहीं मिलते थे और अब जनश्रुति है कह नहीं सकते

42:20 कि कितना सही है कितना गलत है उदाहरण के लिए एक जनश्रुति है कि बाबा फरीद और संत कबीर मिले वो जनश्रुति ठीक हो नहीं सकती क्योंकि दोनों का जीवन काल अलग है लेकिन फिर भी जो संदेश देने के लिए वह जनश्रुति निर्मित है वह संदेश महत्वपूर्ण है कहते हैं कि यह दोनों महापुरुष आपस में मिल रहे हैं तो दोनों के साथ दोनों को सुनने वाले उनके शिष्य वो बहुत सारे मौजूद हैं और बहुत उत्साहित हैं कि यह एक बड़ी अनूठी घटना घटने जा रही है यह दोनों मिलेंगे तो ना जाने क्या होगा और कई दिनों पहले से तैयारियां चल रही हैं और बड़ा रोमांच है एक विरल घटना घटने जा

43:09 रही है और होता क्या है य दोनों जन मिलते हैं एक दूसरे को देखते हैं मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते हैं इनका इधर से आ रहा था काफिला इनका इधर से आ रहा था और दिख रहा था कि अय मिलेंगे रास्ते में तो मिले भी बस इतना हुआ आमने सामने खड़े हुए मुस्कुराए और आगे बढ़ गए लोगों को समझ में नहीं आया बोले बैठे नहीं इनको चड्डा नहीं जमा बोले बरेश तो हु ही नहीं कुछ नहीं क्योंकि वह बातें उनकी एक दूसरे के लिए नहीं है हमारे लिए है तो जब यह ऊंची बातें भी

43:56 हो र तो उसमें अपने आप से पूछना जरूरी है कि मेरा जो जमीन का जीवन है उस पर कितना अंतर पड़ रहा है हर श्लोक से पूछिए हर दोहे से जवाब मांगिए तू मेरी जिंदगी में किस तरह प्रासंगिक है और नहीं प्रासंगिक है तो मैं तेरे साथ समय नहीं जाया कर रहा सिर्फ इसलिए थोड़ी कि कोई चीज धार्मिक मान ली गई है श्रेष्ठ मान ली गई है परंपरा में पूज्य मान ली गई है तो हम उसको रटते फिरेंगे मुझे यह जिंदगी जीनी है अपनी पार्थिव बताओ तुम इसमें कैसे बेहतरी ला सकते हो और वो बेहतरी ला सकता है अगर आप ये सवाल पूछेंगे सवाल पूछे बिना बस शत नमन

44:42 करेंगे तो कोई बेहतरी नहीं आएगी कि गा रहे हैं गा रहे हैं एक के बाद एक गा रहे हैं जैसे अभी था मैं बोल रहा हूं दोहरा रहे हैं सवाल करना तो जरूरी है ना यह मेरी जिंदगी में कैसे उपयोगी है मेरे दैनंदिन आचरण में इसकी सार्थकता क्या है और सार्थकता है पर सर ज्यादा झुका दोगे तो कुछ दिखाई नहीं देगा सारा खेल देखने का है परिभाषा हों से बात करते हैं है ना जिम्मेदारी माने क्या मोह माने क्या जितने भी

45:28 मेरे आरंभिक वीडियो हैं सब में बातचीत इसी बात को है कि तुम जिन शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हो तुम्हें उनकी परिभाषा पता है क्या लंबी चौड़ी बातचीत हो सकती है घंटों की बातचीत हो सकती है और परिभाषा ही स्पष्ट नहीं तो तुम बात किस पर कर रहे हो वन स्ट्रॉ मैन वर्सेस द अदर मैं पूछा करता था जैसे सामने बैठे हुए हैं मैं पूछ था हां भाई कितने लोग मानते हो ट ए इज ग्रेटर देन जीरो हाथ खड़े करो खड़े करो अरे कर दो यार यह देखा तुम सब लाल पार्टी में आ गए सब लोग

46:14 हाथ खड़े करो जितने लोग मानते हो ए इ ग्रेटर दन जीरो खड़े करो खड़े करो यह सब लाल पार्टी में आ गए नीचे करो कितने लोग मानते हो ए इज लेस देन जीरो हाथ खड़े करो तुम सब हरी पार्ट में आ गए अ व बाहर निकलो दूसरे का सर फोड़ दो बस यह किसी को नहीं पता है य है क्या यह य आस्तिक है यह नास्तिक है और यह वह प्रजाति है जिन्ह एग्नोर बोलते हैं और तीनों भयानक तरीके से लड़ रहे हैं पर आस्तिक माने क्या यह किसी को नहीं पता

47:02 है अस्ति माने एफर्मेशन की है किसके होने की बात हो रही है यह किसी को नहीं पता यह निगेशन कर रहे हैं नास्ति नहीं है किसका निगेशन कर रहे हो नहीं पता और वह बोल रहे हैं पता नहीं कुछ हो भी सकता नहीं इसम हमारा कोई रुख नहीं है पर किस बारे में तुम्हारा कोई ओपिनियन नहीं है यह इन्हे नहीं पता जब परिभाषाएं स्पष्ट ना हो तो बात किस बारे में हो रही है किस बारे में बात हो रही है सब्जियां बड़ी मस्त चीज होती है एक सब्जी होती है उसका एक जय कुछ नाम होता है

47:49 और उससे दो 400 मील दूर चले जाइए तो उस क्षेत्र में दूसरा नाम होता है अब 1 स करोड़ लोगों का देश हो गया यह तो बहुत संभव है कि एक नाम जो एक जगह एक सब्जी का हो वही नाम दूसरी जगह दूसरी सब्जी का हो अब कुछ कुछ नाम बताओ मजेदार सा निनवा तो सचमुच में होती है ऐसा बताओ जो जो कल्पना दौड़ा थोड़ी पटा लौकी क्या लौकी क्या कर दिया आपने क्या कोड़ा नहीं जानते क्या होता है कोड़ा होता है ऐसा जो नहीं होता अभी क्या बोला मैंने पोटा अब पोटा

48:35 पोटा पोटा ठीक है पोटा बंबई में पारसी समुदाय आलू को बोलता है और पोटैटो से मिलता जुलता है तो वहां क्या होता है पोटा माने आलू और पंजाब में पोटा माने क्या होता है पंजाब में पोटा माने क्या होता कुछ बोलो बैंगन अब ये दोनों आमने सामने बैठ गए हैं ठीक है ना ये इनका नाम है सोडा बटल वाला जमशेद जी सोडा बॉटल वाला सोडा बॉटल भी नहीं सोडा बॉटल ओपनर वाला और यह आकर बैठ गए इनका क्या नाम है हां हां हरदीप सिंह और दोनों लड़ गए

49:24 हैं कि पोटा सख्त होता है कि मुलायम कि उसमें बीज होते हैं कि नहीं होते हैं और सोडा बोतल वाले का एकदम ही ओपनर लग गया अपने पंजाबी भाई है भारी पड़ गए बोले बोल क्या बोल रहा है बोल रहा है पोटा में बीज होते हैं अब वोह बैंगन की बात कर रहा है वो आलू की बात कर रहा है एक के देखे बीज होते हैं एक के देखे नहीं होते पर दोनों समझ ही नहीं रहे कि बात हो किसकी रही है एक के देखे इतना बड़ा होता है एक कह रहा है नहीं इससे ज्यादा बड़ा होता ही नहीं एक कह रहा है कि लटकता है पौधे में

50:10 एक कह रहा है जमीन खोद के निकाला जाता है और सर फोड़ दिया एक दूसरे का किसकी बात कर रहे हो ये तो ये तो पूछना ही नहीं है कभी यह तो पूछना ही नहीं है कभी कि बात किसकी हो रही है परिभाषा क्या है आ रही बात समझ इससे भी आगे एक और सवाल होता है किसका पोटा किसका अब यहां पर कौन आ गया सीधे रोशनी के नीचे लाइमलाइट में अहंकार बात सही है तेरा पोटा जमीन के नीचे

50:58 होता है क्योंकि तेरा पोटा आलू है लेकिन मेरा पोटा जमीन के ऊपर होता है मेरा पोटा बैंगन है अहम कभी यह नहीं मानेगा कि सारी परिभाषाएं उसकी स्वयं की दी हुई है वह कभी भी यह नहीं मानेगा कि सब कुछ उसके सापेक्ष है वह यह दिखाएगा कि सब कुछ ही ऑब्जेक्टिव है इसी को हम कहते हैं कि अहम अपने आप को आत्मा दर्शा चाहता है अहम यह बताना चाहता है कि मामला एब्सलूट है एब्सलूट नहीं है रिलेटिव है वही पोटा उसके रिलेशन में आलू है और वही पोटा उसके रिलेशन में बैंगन है अहम की दुनिया में सब कुछ रिलेटिव

51:43 है आपका बेटा आपके रिलेशन में राजकुमार है आपका बेटा पड़ोसी के रिलेशन में लफंगा है समझ में आ रही बात लेकिन आप यह नहीं मानोगे कि हां वो राजकुमार है पर सिर्फ मेरे लिए पड़ोसी के लिए और पड़ोसी की बिटिया के लिए तो लफंगा ही है यह कभी नहीं मानोगे आप कहोगे राजकुमार है एब्सलूट एब्सलूट माने है अहम यही करता है वह है पर मात्र अपने रिलेशन में अपने देखे हैं और उसकी पूरी दुनिया भी बस उसी के लिए है माने मन किसके लिए है अहम के लिए है मन अहम के लिए मन स्थिर नहीं है तो माने कौन स्थिर नहीं है मन उदास है तो कौन उदास

52:29 [संगीत] है और कोई भी स्थिति हो चाहे वह उदासी की हो चाहे खुशी की हो कोई भी स्थिति हो वह स्थिति अपूर्णता की ही होती है हर स्थिति का काम है आना और जाना व वापस चली ही इसीलिए जाती है क्योंकि अपूर्ण निकली लगभग वैसे ही जैसे आप लोग अमेजन वगैरह से कुछ मंगाते हैं और अगले दिन उसको लौटा भी देते हैं मन लगातार यही करता रहता है मन नहीं वह क्या

53:15 करेगा ऑनलाइन ऑर्डर देगा माल आएगा एक दो दिन इस्तेमाल करेगा बात तो कभी बन ही नहीं सकती जब बात नहीं बनती तो फिर वह लौटता है और वह यूनिवर्स वह यूनिवर्सल सेट वह समुच्चय जहां से ऑर्डर किया जा सकता है जहां से विषय उपलब्ध हो सकते हैं वह अनंत है और कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं है कि 500 बार आपने कुछ मंगाया और लौटाया तो अब नहीं मंगा सकते जीवन पूरा फिर ऐसे ही प्रयोग और आशा में बीत सकता है बीत जाता है यह म मया आजमाया बात नहीं बनी लौटाया फिर अगली

54:01 चीज मंगाई और यही कारण है कि अहम की दुनिया में आशा बड़ा ऊंचा शब्द होता है और यही कारण है कि लोग कितना भी अपने आप को धार्मिक बोल ले कृष्ण भक्त बोल ले गीता से सब बच के निकलना चाहते हैं गीता से सब कतराते हैं क्योंकि गीता में निराश शब्द बहुत केंद्रीय है गीता में भी अष्टक गीता में भी हर जगह कहते हैं जो अभी तक आशा को पकड़े हुए हैं वह बंधक ही रहेगा वह दुखी ही रहेगा क्योंकि आशा का मतलब ही यही है मैं तो वही रहूंगा जो मैं हूं उम्मीद करूंगा कि इसके बाद अब इसको आजमा हंगा तो शांति मिल जाएगी मैं वही रहूंगा विषय बदलता चलूंगा इतना बड़ा मैंने विषयों का संसार

54:49 बसाया किस लिए है इसीलिए तो कि एक के बाद एक उसमें मैं कुछ अब बताओ कि हमें नए-नए अनुभवों की तलाश क्यों रहती है पहली बात तो नए अनुभव की परिभाषा क्या हुई नया विषय नया विषय क्यों चाहिए क्योंकि पुराना हर विषय नाकाफी पड़ेगा सफल पड़ेगा बोर हो जाओगे अब ये जो बोर शब्द है इसकी भी आध्यात्मिक परिभाषा करिए बहुत मजा आएगा कि बोर माने क्या एक कहीं पे किसी से मैंने कहा था कि पूरा अध्यात्म सिर्फ बोरियत से निपटने का उपाय है मनुष्य का जीवन माने एक सतत

55:40 ऊब तो अध्यात्म उस ऊब को मिटाने के लिए है द हाईएस्ट एंटरटेनमेंट आप सारा मनोरंजन इसीलिए करते हो ना कि उब से निवृत हो पाओ इसीलिए करते हो वो ऊब उस मनोरंजन से नहीं मिटेगी वो ऊब यहां से मिटती है तो जिन्हें मनोरंजन भी चाहिए उनके लिए सबसे ऊंचा मनोरंजन यही है गजब की बात हो गई आहम की डेफिनेशन बस जो कहता है कि मैं हूं जो कहता है मैंने किया जो कहता है मैंने भोगा वही बस यही है लेबोरेटरी जरूरत क्या है

56:26 बताओ जो कह रहा है और एलेबोरेट करेंगे वही अहम [हंसी] है जो सर ऐसे ऐसे हिला के कह रहा है कि समझ में नहीं आया वही अहम है हां बिल्कुल है अहम ना हो तो पूछेगा कौन और जवाब कौन देगा पर जितने प्रश्न पूछे जा रहे हैं वो सब इस भावना पर आधारित है कि मुझे समस्या है माने मैं सत्य सत्य को समस्या होती है माने में सत्य नहीं तो परमार्थिक तल पर यह पूरी

57:14 प्रश्नोत्तरी मिथ्या है ना किसी को कोई समस्या है ना समस्या का निदान या समाधान देने की कोई जरूरत है आप जब अद्वैत में भी विशुद्ध अद्वैत पर जाओगे उच्चतम अद्वैत पर जैसे रिभु गीता तो वहां गुरु शिष्य संवाद पर भी हंसा जाता है कहते क्या पूछ रहे हो और क्या जवाब दिया जाए वहां यह भी नहीं करा जाता कि गुरु के सामने नमन करना है अवधूत गीता कहती है सर झुकाऊ भी तो झुकाऊ किसके आगे मैं ही मैं तो हूं

58:02 अवधूत शिव को समर्पित होता है पर एक जगह पर आकर अवधूत गीता कह देती है कि महादेव के आगे भी सर कैसे झुकाऊं नमन करूं भी तो किसको और छोड़ो आप अष्टक गीता में साथ रहे हैं कैसे आप भूल गए अहो अहम नमो महम मैं ही हूं चलो एक काम करते हैं शतशत नमन खुद को ही कर लेते हैं अहो अहम अहो विस्मय का भाव अपने अपने अत्य का भाव अहो अहम और अब नमन करना नमो

58:49 मयम समझ में आ रही है बात ये यह भी जो हो रहा है है यह भी बस बच्चों का खेल ही कोई बन के बैठ गया है मुझे तो पता नहीं है फ बन के बैठ गया है मैं डूडू मुझे सब पता है मेरा नाम आचार्य जी है मैं बताऊंगा मुझसे पूछो मुझसे मैं बताऊंगा कुछ नहीं है यह बच्चों का खेल है खेल लो जब तक तुम्हें लगता है कि तुम्हें समस्या है तब तक तो यह खेल तुम्हें खेलना पड़ेगा ठीक

59:36 है वैसी सी बात है कि किसी को वहम हो गया है कि पीठ में छिपकली चिपकी है खुद तो दिख नहीं रही तो अब तुम्हें कोई दूसरा चाहिए होगा जो तुम्हें दिखा सके आईना या तुम्हारी पीठ को देख के बोल सके बता सके कि कुछ नहीं है जब तक वहम है तब तक दूसरे की जरूरत है और जो दूसरा है वही वहम है दोनों बातें एक जैसी है हम कौन है वही जो बोल रहा है जो सुन रहा है वह हम है जो दावा करता है कि उसने कह दिया जो दावा करता है मैंने सुन लिया वही है आपने कल रजिस्टर किया है गीता में कल

1:00:24 तो आप यहां कैसे आए जानते नहीं है आप क्या कि बात सिर्फ 400 लोगों के लिए नहीं हो रही है कहां है माइक कहां है कैमरा या चलती ट्रेन में हमने बस यूं ही गॉसिप शुरू कर दिए आप संस्था के साथ हो आप मिशन को समझते हो आप भली भाति जानते हो इस बातचीत में भले ही इस सभागार में 500 जने मौजूद हैं पर इस बातचीत को 5 लाख लोगों तक पहुंचना है आप ऐसे बीच-बीच में कुछ उछाल रहोगे तो क्या यह स्वार्थ की बात नहीं होगी कि हम 500 लोगों का तो काम हो जाए और जो बाहर देख रहे हैं उनको भी छोड़ो कि जिन लोगों तक सोशल मीडिया से पहुंचना है जो हमारे ही भाई बंधू अभी कम्युनिटी पर यह पूरी बात

1:01:12 सुन रहे हैं उन तक आपकी बात कैसे पहुंचेगी पहुंच जाएगी सोचिए आप आप आज आए हो आप पिछले दो दिनों में तो नहीं आए थे 2627 तारीख को लेकिन यहां जितनी बातचीत हो रही थी व आप सुनके लाभ ले रहे थे ना और बातचीत आप ना सुन पाते ठीक से तो आपको कैसा लगता आपकी बातचीत कोई कैसे सुन पाएगा हट से जनरल डब्बा बना देते हैं आपका ही हूं मैं मैं आपकी सेवा के लिए मौजूद हूं मैं तो कह रहा हूं यूज मी पूरा निचोड़ लो पर पूरा निचड़ तो पूरे के लिए निचड़ ना मात्र एक अंश के लिए क्यों मात्र

1:01:57 दो लोगों के लिए क्यों मेरा पूरा इस्तेमाल हो तो फिर पूरे विश्व के लिए हो ना मात्र सभागार के लिए क्यों आप कोई सवाल ही नहीं पूछेगा [संगीत] नमस्ते मेरा नाम अतिंद्र मैं एक यूएक्स डिजाइनर हूं हैदराबाद में और गीता सत्र से मैं पिछले 10 महीने से जुड़ा हुआ हूं गीता सत्र से जुड़ने के बाद मेरे जिंदगी में कॉन्फिडेंस आया सो आज हमने

1:02:45 शांति के दो तरीको के बारे में जाना एक काम शांति जो हम रोजमर्रा की जिंदगी में देखते कोई भी एक छोटी सी खुशी मतलब 10 चीज अगर खराब हो रही है तो उसम कोई एक चीज जो हमें खुशी देने लग जाए तो हम उसको शांति मान लेते हैं अगर एग्जांपल लिया जाए तो ऑफिस में सुबह से काम अच्छा नहीं हुआ लेकिन कोई एक काम अच्छा हो गया तो उससे हम लगता है कि हा चीज सुधर रही है परंतु जरूरी नहीं है कि ऐसा हो तो यह एक आम शांति है जो हमें लगता है कि हमें आगे चलकर सुकून देगी और दूसरी है परा शांति जो केंद्र के बदलने से आता है तो जो हमारा भीतरी केंद्र है जब वही बदल तो वहां से जो शांति आती है वह परा शांति है

1:03:30 [संगीत]

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