क्या प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती? || आचार्य प्रशांत (2020)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो प्रेम की परिभाषा और वास्तविकता पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि प्रेम को केवल एक भावना या अनुभूति नहीं माना जा सकता, बल्कि यह एक ऐसा मार्ग है जो हमें जीवन की ऊंचाइयों तक ले जाता है। वीडियो में आत्मज्ञान और आध्यात्मिक ग्रंथों के महत्व पर जोर दिया गया है, जो हमें प्रेम के सच्चे अर्थ को समझने और अंधविश्वासों से दूर रहने में मदद करते हैं।

मुख्य बातें:

  • प्रेम की एक निश्चित परिभाषा होती है, और यह केवल एक एहसास नहीं है।
  • सच्चा प्रेम वह है जो हमें आत्मज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है।
  • सांसारिक ज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक ज्ञान भी आवश्यक है।
  • अंधविश्वासों से बचने के लिए हमें अपने जीवन का ईमानदारी से अवलोकन करना चाहिए।

परिचय

आचार्य प्रशांत श्रोताओं द्वारा प्रेम के बारे में पूछे गए सवालों और टिप्पणियों का जवाब देते हैं। वह बताते हैं कि अक्सर लोग प्रेम को परिभाषित नहीं करने की बात करते हैं, इसे सिर्फ एक एहसास या अनुभूति मानते हैं जो हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। आचार्य प्रशांत इस धारणा को चुनौती देते हैं और प्रेम की एक वास्तविक परिभाषा की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

साधारण प्रेम और उसकी वास्तविकता

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि प्रेम की परिभाषा निश्चित रूप से होती है, लेकिन लोग अक्सर संतों, शास्त्रों और ज्ञानियों की बातों पर ध्यान नहीं देते। वे प्रेम को केवल एक भावना मानते हैं और इसकी गहराई और वास्तविकता को समझने की कोशिश नहीं करते। आचार्य प्रशांत "प्रेम प्रेम सब कहे, प्रेम न जाने कोय" की पंक्ति को उद्धृत करते हैं, जिसका अर्थ है कि हर कोई प्रेम के बारे में बात करता है, लेकिन कोई भी वास्तव में इसे नहीं जानता।

प्रेम की असली पहचान

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सच्चा प्रेम वह है जो हमें उस मार्ग पर ले जाता है जिस पर चलकर हम जीवन की ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकते हैं। यह वह मार्ग है जो हमें बेहतर इंसान बनाता है और हमारी चेतना को शुद्ध करता है। वे कहते हैं कि प्रेम किसी व्यक्ति या घटना का नाम नहीं है, बल्कि हमारी चेतना की मूल तड़प का नाम है। यह हमेशा से हमारे भीतर है और हमें इसे पहचानने की आवश्यकता है।

प्रेम का अनुभव और उसकी गहराई

आचार्य प्रशांत कहते हैं कि प्रेम वह नहीं है जो आता है और चला जाता है। यह वह नहीं है जो किसी व्यक्ति के आने या जाने से छिन जाता है। प्रेम तो हमेशा हमारे भीतर रहता है, एक बेचैनी और एक तड़प के रूप में। यह वह विरह है जो हमें उस अंतिम शांति और विश्राम की तलाश में ले जाता है।

प्रेम का मार्ग और उसकी ऊँचाई

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि प्रेम का मार्ग वह है जो हमें अंतिम मुक्ति और शांति की ओर ले जाता है। वे कहते हैं कि आत्मज्ञान के अभाव में हम प्रेम के सच्चे अर्थ को नहीं समझ पाते हैं। हमें जीवन के बारे में जानकारी फिल्मों, दोस्तों और परिवार से मिलती है, जो स्वयं ज्ञानी नहीं हैं। इसलिए, हम अंधविश्वासों में जीते हैं और प्रेम के बारे में गलत धारणाएं रखते हैं। आचार्य प्रशांत दो प्रकार के अंधविश्वासों के बारे में बताते हैं: बाहरी अंधविश्वास, जो सांसारिक ज्ञान के अभाव में होता है, और आंतरिक अंधविश्वास, जो आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में होता है। वे कहते हैं कि आंतरिक अंधविश्वास को दूर करने के लिए हमें आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए और अपने जीवन का ईमानदारी से अवलोकन करना चाहिए।

समापन

आचार्य प्रशांत श्रोताओं को आध्यात्मिक ग्रंथों के करीब आने और अपने जीवन का ईमानदारी से अवलोकन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वे कहते हैं कि यही वह तरीका है जिससे हम प्रेम के सच्चे अर्थ को समझ सकते हैं और अंधविश्वासों से दूर रह सकते हैं।

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Transcript

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0:01 [संगीत] आप बार-बार हमारे साधारण और सांसारिक प्रेम को झूठा सिद्ध करने में लगे रहते हैं आप बार-बार कहते हैं कि हमारे प्रेम में कोई दम नहीं हमारा प्यार कुछ असली नहीं जब दुनिया के ब बे बड़े ज्ञानी भी आज तक प्यार की कोई परिभाषा नहीं दे पाए तो आपको कैसे पता कि हमारा प्यार सच्चा है कि नहीं अच्छा तरीका है

0:48 ना यह ईमानदारी से जांचना भी नहीं है कि हम जिसको प्यार कह रहे हैं वह क्या है उसमें कितनी असलियत है कितना धोखा है कितना शरीर है उसमें कितना मन है और कितनी आत्मा है इसकी कोई जांच पड़ताल करनी नहीं है तो कह दो कि प्रेम की तो कोई सर्वमान्य सार्वजनिक परिभाषा होती नहीं तो फिर कोई भी चीज प्रेम कहला सकती है ऐसे और भी कई बार सवाल आए हैं टिप्पणियां आई है जहां कहा गया है कि साहब प्यार को अल्फाज में कुछ बोला नहीं

1:35 जा सकता प्यार तो सिर्फ एक एहसास होता है एक अनुभूति होती है एक फीलिंग होती है और प्यार तो प्यार करने वाला ही जानता है प्यार सबके लिए अलग-अलग होता है तो आप क्यों फिर हमको चुनौती देते रहते हैं और परेशान करते हैं नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि प्यार की कोई परिभाषा नहीं होती है यह दो कौड़ी की शायरी से थोड़ा ऊपर उठोगे दृष्टा के पास जाओगे ज्ञानियों के पास जाओगे तो वह तुमको बताएंगे कि निश्चित रूप से प्रेम की परिभाषा होती है और बड़ी सरल परिभाषा होती

2:20 है कई बार पहले भी उद्धृत कर चुका हूं पर जब भी मैंने बोला है तुमने शायद देखा नहीं होगा क्योंकि दो तरह के वीडियोस होते हैं मेरे एक वह जिस पर मैं जिनमें मैं संतों पर शास्त्रों पर ज्ञानियों पर और धर्म पर बोलता हूं वह वीडियोस तुम लोग देखना पसंद नहीं करते और दूसरे वीडियोस होते हैं जिनमें कि आम जनता के जो सामान्य मुद्दे होते हैं जिनसे संबंधित व सवाल पूछते हैं उन पर मैं बोलता हूं उनको तुम खूब देखते हो तो व जो असली और

3:09 केंद्रीय आध्यात्मिक वीडियो हैं उनको तुमने कभी देखा ही नहीं होगा तो जो बात अब बोलने जा रहा हूं तुम्हें लेगा पहली बार बोल रहा हूं पहली बार नहीं बोल रहा 10 बार बोल चुका हूं प्रेम प्रेम सब कहे प्रेम न जाने कोय जा मर्ग साहब मिले प्रेम कहावे सोय तो तुम में से जिन भी लोगों को य गलतफहमी है कि प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती वह इन पंक्तियों को अच्छे से समझ ले दोहरा ले रट ही ले भीतर बस जाने दे खून में बहने लगे ऐसा कर ले प्रेम प्रेम सबको ई कहे यह हमारा हाल है पूरी दुनिया का हाल है जिसको देखो वही प्रेम प्रेम कर रहा है सब आशिक हुए पड़े

3:56 हैं प्रेम प्रेम सब कोई कहे प्रेम ना जाने कोई लेकिन प्रेम जानता कोई नहीं है क्यों इसलिए नहीं कि प्रेम जाना जा ही नहीं सकता जैसे तुमने सवाल में कहा है कि प्यार की तो कोई परिभाषा होती नहीं ना सिर्फ एहसास है यह रूह से महसूस करो अब एहसास भीतर क्या हो रहा है व भी पता नहीं रूह किसी ने देखी नहीं तुम्हारी तो तुम भी इस तरीके की बात का फायदा उठाकर कहते हो कि प्यार तो सिर्फ एक एहसास होता है ना एक भीतर की भावना तो हमें भी हो गया है नहीं ऐसा नहीं है जब कह रहे हैं प्रेम ना जाने कोय तो आगे भी बात कही गई है जा मार्ग साहब मिले जिस रास्ते पर चलके साहब साहब माने वह जो सबसे ऊंचा हो सकता है तुम्हारे भीतर जा

4:42 मार्ग साहब मिले प्रेम कहावे सोए जिस रास्ते पर चलकर तुम जिंदगी की ऊंचाइयां हासिल कर सको जिस रास्ते पर चलकर तुम वह बेहतर से बेहतर इंसान हो सको जिस रास्ते पर चलकर तुम्हारी च तना साफ से साफ और ऊंची से ऊंची जगह पर पहुंच सके प्रेम कहावे सोए उसको प्रेम कहते हैं और बाकी ये इधर-उधर की जो हरकतें हैं इसको पकड़ लिया उसको छोड़ दिया यह मिल गया हंस दिए यह मिल गया रो दिए यह प्रेम नहीं कहलाता है तो प्रेम की परिभाषा निश्चित रूप से होती है ना जाने कहां से तुम लोगों ने यह ब्रह्म वाक्य पकड़ लिया है कि लव कैन नॉट बी

5:28 डिफाइंड यह फिल्मी बातें इनसे बाहर आओ कि प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती प्रेम की परिभाषा निश्चित रूप से होती है ठीक है बस जिन्होंने जान के समझ के परिभाषित किया तुम्हारी जिंदगी में उनके लिए कोई जगह नहीं है तुम ऐसी जिंदगियां जी रहे हो जिसमें इधर उधर के छोटे मोटे लेखक हो गए या इधर उधर के स्पीकर हो गए इन सबकी बातों के लिए तो तुम्हारे जीवन में मन में स्थान है पर जो असली लोग थे जिनकी के दम पर पूरा दर्शन शास्त्र खड़ा है जिनके दम पर सारे धर्म खड़े हैं शताब्दियों से जिनके धर्म पर पूरा अध्यात्म है जिन्होंने इंसान को इंसान

6:13 बनाया उनसे तुम्हारा कोई परिचय नहीं उनसे तुम दूर दूर कटे कटे रहते हो तो फिर उनकी तुम्हें बात भी पता नहीं तो फिर तुम इस तरह की अनाड़ी पने की बातें करते हो कि प्रेम की तो कोई परिभाषा होती नहीं और कितना झूठा है हमारा प्रेम इसी से समझ लो कि आगे और कहा है कि छिन चाड़ेला भी गया उसको प्रेम नहीं कहते तो सीधी एक पहचान हो गई प्रेम की यह कि वह प्रेम जो हो गया वह प्रेम हो ही नहीं सकता वह प्रेम जो आया है जीवन में

7:00 वह प्रेम नहीं हो सकता कि तुम कहो कि फलाना व्यक्ति आया मेरे जीवन में तो मुझे प्यार मिल गया झूठी बात या तुम कहो कि फलाना व्यक्ति मेरे जीवन से चला गया तो मेरा प्यार छिन गया बराबर की झूठी बात प्रेम किसी घटना का किसी व्यक्ति का नाम नहीं है प्रेम किसी अफसाने का किसी कांड का किसी अफेयर का नाम नहीं है प्रेम तुम्हारी चेतना की मूल तड़प का नाम है है वो हमेशा से है तुम में इसीलिए प्रेम आएगा नहीं क्योंकि तुम पैदा हुए हो उस तड़प के साथ जब पैदा हुए हो उसके साथ तो फिर व बाद में थोड़ी तुम्हारे जीवन में प्रवेश करेगी व तो पैदा होने के क्षण से है इसी तरीके से मरते समय तक ज्यादातर

7:45 लोगों में वह तड़प व बेचैनी बनी और बची ही रह जाती है तो वह लगातार भीतर एक कशिष है लगातार भीतर असमंजस की और हापो की और संशय की और अ विश्राम की स्थिति है जैसे भीतर कुछ घुटता सा रहता है भीतर कुछ अपूर्ण है जो कह रहा है कि ठीक से जिया नहीं जा रहा सांस नहीं आ रही तकलीफ है भीतर वह कहलाती है विरह वो ही प्रेम का दूसरा नाम है हम सबको कु ऐसा चाहिए जो हमें शांत कर

8:33 दे हम सबको कुछ ऐसा चाहिए जो हमें एक आखिरी चैन तक विश्राम तक पहुंचा दे वह प्रेम है जा मार्ग साहब मिले जिस रास्ते पर चलकर के तुम अंतिम मुक्ति शांति ऊंचाई पा लो उसका नाम प्रेम है समझ में आ रही है बात ज्यादातर तो जो हमारे रास्ते होते हैं जिनको हम प्रेम का रास्ता कहते हैं य तो छोड़ो उस पर शांति मुक्ति मिलेगी तुम्हारे जीवन में अगर थोड़ी बहुत शांति होती भी है तो प्रेम के कांड करके उसको भी गवा देते हो एक आम आदमी जिसकी जिंदगी में प्रेम

9:21 कहानियां ना हो वह तो हो सकता है तुमको थोड़ा बहुत शांत दिख भी जाए पर जिसने ने एक बार किसी ऐसी कहानी का श्री गणेश कर लिया कहते हैं आम भाषा में कि टाका भिड़ा लिया वह तुमको शांत दिख जाए अनुजित दिख जाए चुपचाप मौन अपने आप में पूर्ण अध्यान दिख जाए इसकी संभावना बहुत कम है इसकी संभावना कम इसीलिए है

10:06 क्योंकि आत्मज्ञान के अभाव में अध्यात्म के अभाव में हमें कुछ पता ही नहीं है कि इन मूल शब्दों का अर्थ क्या है जीवन के बारे में हमें जानकारी मिल रही है फिल्मों से या अपने ही जैसे दोस्तों यारों से या परिवार के लोगों से जो कि अपने आप में कुछ खास होशियार जानकार है नहीं तो हमें बड़े मौलिक संशय रह जाते हैं हम बड़े अंधविश्वास में जीते हैं अंधविश्वास यही थोड़ी है कि तुमने कोई जानवर

10:53 देखा और तुम कहने लग गए कि यह जो जानवर है ना यह वह फलाने का कद्दू सिंह है और वह मर कर के यही जानवर बन गया यही पर थोड़ी अंधविश्वास होता है अंधविश्वास माने कोई भी ऐसी चीज मान लेना जो तुमने समझी ही नहीं है अब तुम कह रहे हो आई एम इन लव मुझे प्यार हो गया है और बिना जाने तुम बोल रहे हो कि तुम्हें प्यार हो गया तुम्हें पता भी नहीं कि वास्तव में हुआ क्या है भीतर कुछ तो चल रहा है भीतर ही भीतर सरसराहट सी मची हुई है तन में पर पता नहीं है तुमको क्या है उसको जाने बिना तुम कह रहे हो कि हमें भी इश्क हो गया यह भी अंधविश्वास है बराबर का अंधविश्वास है और यह अंधविश्वास खूब पढ़े लिखे लोग भी पाल रहे

11:40 हैं खूब बुद्धिजीवी लोग भी पाल रहे हैं कि हमें भी प्यार हुआ है ठीक यह सब अंधविश्वास आत्मज्ञान के अभाव में देखो दो तरह के अंधविश्वास होते हैं एक बाहरी अंधविश्वास वो भौतिक ज्ञान सांसारिक ज्ञान फिजिकल नॉलेज के अभाव में होता है है ना जैसे कि कोई हो आदिवासी और उसको तुम यहां बुला लो शहर में अब वो रहता था शताब्दियों से किसी बीहड़ जंगल में जहां किसी तरह की कोई वैज्ञानिक प्रगति खोज कभी हुई नहीं और उसको तुम यहां बुला लो उसके सामने टीवी चला दो और टीवी

12:27 में से आवाज आने लगे उसके पटल पर चित्र दिखने लगे हैं तो कोई बड़ी बात नहीं है कि वह जो आदिवासी है वह नाचने लगे झूमने लगे या डर जाए या टीवी कोई प्रणाम करना शुरू कर दे आ रही बात समझ में तो यह तो अंधविश्वास है उसको लग रहा है कि टीवी के भीतर कोई बैठा है जो गाना गा रहा है उसके सामने तुम रेडियो रखोगे और रेडियो में से गाना आ रहा है तो घूम के रेडियो के पीछे जाएगा उसको लगा रेडियो के पीछे कोई बैठ के गाना गा रहा होगा और जब उसे रेडियो के पीछे भी कोई दिखाई नहीं देगा तो हो सकता है कि व रेडियो को अपना कोई देवता इत्यादि घोषित कर दे यह अंधविश्वास है क्योंकि उसे सांसारिक ज्ञान नहीं है ठीक है एक अंधविश्वास होता है भीतर का भीतर का

13:15 अंधविश्वास होता है जब तुम्हें भीतर का कोई ज्ञान नहीं होता आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है आत्म ज्ञान नहीं है तुम कौन हो मन तुम्हारा कहां से आता है कहां को जाता है कैसे चलता है इसका तुमको कुछ पता नहीं तब तुम्हारे जीवन में जो कुछ चल रहा होता है तुम उसके बारे में ठीक वैसे ही भ्रांति में रह जाते हो जैसे कि वह आदिवासी टीवी के बारे में भ्रांति में रह जाता है भ्रांति समझते हो ना भ्रम में व आदिवासी समझ रहा है कि टीवी में जो हो रहा है व टीवी के अंदर कोई वास्तव में है आदिवासी को संगीत सुनाई पड़ रहा सोच रहा है टीवी के अंदर वास्तव में कोई लड़की की है खूबसूरत और गाना गा रही है वैसे ही

14:02 तुम्हारे भी भीतर कुछ हो रहा है तुम्हें भी लग रहा है कि तुम्हारे दिल में वास्तव में कोई लड़की जो गाना गा रही है दोनों अंधविश्वासी हो आदिवासी को यह नहीं पता कि टीवी में कोई लड़की नहीं बैठी और तुमको ना हृदय का ना दिल का मतलब पता है ना प्रेम का मतलब पता है ना स्त्री पुरुष क्या है और उनमें वास्तविक भेद क्या है और आकर्षण क्या है यह पता है तो तुम्हें लग रहा है दिल के भीतर लड़की बैठी है गाना गा रही है दोनों अंधविश्वासी हो बाहर का अंधविश्वास मिटाने के लिए बहुत सारे विश्वविद्यालय हैं और संस्थाएं हैं और विज्ञान ने खूब तरक्की कर ली है अच्छी बात है बाहरी अंधविश्वास मिट रहा है भीतर का अंधविश्वास मिटने की जगह और

14:49 सघन होता जा रहा है हालांकि हम 21वी शताब्दी में बैठे हैं वही जो भीतर का अंधविश्वास है वो हटे इसके लिए तुम्हारी संस्था लगातार प्रयास कर रही है काम कर रही है न भीतर का अंधविश्वास तभी हटेगा जब तुम आध्यात्मिक ग्रंथों के करीब आओगे जब तुम एक तरफ तो ग्रंथों को पढ़ोगे और दूसरी तरफ अपने जीवन का ईमानदारी से और कड़ाई से अवलोकन करोगे तब भीतर का अंधविश्वास हटता है ठीक [संगीत] है h [संगीत]

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