0:00 [संगीत] क्या आपने कभी सोचा है कि वह मन जो हर समय भागता रहता है। कभी भविष्य की चिंता में कभी अतीत की याद में वही हमारे दुखों की जड़ भी है? बुद्ध ने कहा था मन को समझना ही मुक्ति है। पर आज के समय में जब हम तकनीक, सोशल मीडिया और भागदौड़ में उलझे हुए हैं। क्या यह बात अब भी उतनी ही सत्य है। इस वीडियो में हम जानेंगे मन क्या है? इसकी प्रकृति क्या है? और कैसे आज के युग में इसको समझकर हम सच में मुक्त हो सकते हैं। मन एक अदृश्य शक्ति जो हमारे विचारों, इच्छाओं और भावनाओं को जन्म देती है। बुद्ध ने इसे एक अनाथ राजा की तरह बताया जिसके पास शक्ति तो है पर दिशा
0:45 नहीं। बुद्ध का कथन जैसा विचार होता है, वैसा ही व्यक्ति बनता है। यह एक संकेत है कि मन कोई स्थाई वस्तु नहीं बल्कि एक प्रवाह है। आधुनिक उदाहरण आज आपका मोबाइल फोन 24 घंटे 7 दिन एक्टिव है। नोटिफिकेशन, रील्स, खबरें आप सोचते हैं कि आप उसे चला रहे हैं। पर क्या वाकई में आप चला रहे हैं या वह मन के जरिए आपको चला रहा है। साइकोलॉजी के अनुसार मनोविज्ञान बताता है कि हमारा दिमाग हर दिन 60 हजार से अधिक विचार उत्पन्न करता है। पर उनमें से ज्यादातर स्वचालित, अनजाने और अनावश्यक होते हैं। यही बौद्ध चिंतन कहता है। इन विचारों को देखो पर इनसे जुड़ो मत। बुद्ध
1:31 की एक घटना। जब एक व्यक्ति ने बुद्ध से पूछा मैं दुखी क्यों हूं? बुद्ध ने कहा क्योंकि तुम मन से जुड़ गए हो। जो विचार आए तुमने उन्हें पकड़ लिया और फिर तुमने उन्हें अपना स्वस समझ लिया। आधुनिक तुलना जैसे आपका कंप्यूटर वायरस से भर गया हो। आपके सारे फोल्डर खुलने लगते हैं। पॉपअप्स आते हैं। आप कुछ करना चाहते हैं। पर मशीन नहीं मानती। मन भी वैसा ही है जब तक आप उसे देखते नहीं। वह आपको चलाता रहेगा। पर क्या हम रुक सकते हैं? हां, बुद्ध का उपाय था साक्षी भाव। माइंडफुलनेस। ना लड़ो ना भागो। बस देखो। ध्यान मेडिटेशन ही वह तरीका है जिसे बुद्ध ने स्वयं को जाना।
2:18 न्यूरोसाइंस रिसर्च एमआईटी और हार्व की रिसर्च में पाया गया है कि माइंडफुलनेस प्रैक्टिस करने वाले व्यक्तियों का अमग डाला भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का केंद्र शांत हो जाता है। आज का उदाहरण मान लीजिए किसी ने आपको Instagram पर कुछ बुरा लिख दिया। आपका मन तुरंत प्रतिक्रिया करता है। गुस्सा, दुख, अपमान। लेकिन अगर आपने उस क्षण अपने मन को देखा तो आप पकड़े नहीं गए। आप मुक्त हो गए। यही बुद्ध का मार्ग है। रिएक्शन से रिस्पांस की ओर, स्वचालितता से सजगता की ओर। मॉर्निंग स्कैन। सुबह 5 मिनट। उठते ही अपनी सांस पर ध्यान दें। मन को देखें क्या सोच आ रहा है। नेम द थॉट। विचार को नाम दो। यह चिंता
3:05 है। यह लालच है। यह डर है। नेमिंग टेमिंग। माइंडफुल ब्रीथिंग। हर घंटे 1 मिनट। बस सांस को महसूस करो। जैसे-जैसे सजगता बढ़ेगी, मन की पकड़ ढीली होगी। टेक फास्ट हर हफ्ते एक दिन सोशल मुक्त। यह मन को आराम देने का आधुनिक तरीका है। ऑब्जरवेशन जर्नल रात को लिखो। दिनभर में क्या विचार सबसे अधिक आए। बुद्ध ने कोई धर्म नहीं बनाया। उन्होंने एक दिशा दी। एक मार्ग बताया अपने भीतर देखने का, अपने मन को समझने का। आज भी अगर हम हर दिन 10 मिनट भी साक्षी भाव में बैठे तो हम जान सकते हैं कि हम विचार नहीं हैं। हम वह मौन है
3:50 जिसमें विचार आते हैं। मन को जानो मन से ऊपर उठो। मन को मुक्त करो। यही मुक्ति है। मन के हारे हार है। मन के जीते जीत। कबीर ने सैकड़ों साल पहले कह दिया था मुक्ति कहीं बाहर नहीं। वह तो मन के पार है। आज के इस भागते दौड़ते उलझे हुए दौर में कबीर का यह सूत्र और भी ज्यादा जरूरी हो गया है। हम जानेंगे कबीर के अनुसार मन क्या है? मन को कैसे समझा जाए और आज के आधुनिक युग में कबीर का यह ज्ञान हमें कैसे मुक्त कर सकता है। कबीर का दोहा मन के माने हार है। मन के माने जीत, मन ही शंका, मन ही मीट। कबीर के अनुसार भगवान ना किसी मंदिर में है ना ग्रंथों में ना किसी कर्मकांड
4:38 में। मन ही वह पर्दा है जो परमात्मा और हमारे बीच खड़ा है। वह कहता है मन ना रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा यानी जब तक मन नहीं बदला कपड़े व्रत पूजा सब व्यर्थ। आधुनिक तुलना आज का मन इंटरनेट से जुड़ा हुआ है। स्क्रीन से सोशल मीडिया से जैसे ही अलार्म बजा मन Facebook खोलने को कहता है। फिर WhatsApp फिर रील्स फिर कंपैरिजन और अंततः वही मन उदासी और अशांति देता है। कबीर कहते हैं मन ही देव, मन ही ईश्वर, मन ही जोगी साधु, मन ही कारण बंधन का, मन ही कारण मोह। कबीर का मन कोई मासूम विचार
5:23 नहीं है बल्कि एक चालाक माया से भरा अभिनेता है जो हर क्षण हमें भ्रम में रखता है। उदाहरण आपने किसी को कॉल किया उसने नहीं उठाया। मन तुरंत सोचता है क्या वह मुझसे नाराज है? शायद वह मुझे इग्नोर कर रहा है। अब यह सिर्फ कल्पना है। लेकिन मन इसे सच बना देता है। यही भ्रम है और यही बंधन कबीर का दोहा जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ। मैं बोरी डूबन डरी रही किनारे बैठ। कबीर हमें भीतर की खोज करने को कहते हैं। कहते हैं बाहर के मंदिरों में मत भटको। अपने मन की गहराई में उतरो। कबीर के तीन उपाय सुनना श्रवण सुनता है तो
6:12 सुन ना सुनता तो अंधा हर विचार को बाहर से सुनो जैसे वह तुम्हारा ना हो साक्षी भाव बैठो मन को देखो वह बोलेगा तू कुछ कर पर कबीर कहते हैं जो घट भीतर देखे ता को कहूं फकीर नाम जप नाम यानी सजगता का मंत्र लगातार अपने भीतर की स्मृति जगाए रखो आधुनिक अभ्यास जबजब तुम्हारा मन किसी भाव में डूब जाए जैसे गुस्सा डर चिंता तुरंत रुक जाओ पूछो यह विचार कौन देख रहा है मॉडर्न साइंस इनसाइट कबीर कहे जो चुप है वही सही है पर न्यूरो साइंस कहता है जब व्यक्ति सजग होता
7:00 है चुप होता है तो उसका प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है जो निर्णय संतुलन और जागरूक ता का केंद्र है। आज का परिप्रेक्ष्य सोशल मीडिया का हर लायक डोपामिन का इंजेक्शन है। कबीर कहते हैं यह सब बाहर की लतें हैं। असली स्वाद तो भीतर है। कबीर का अंतिम संदेश मन तू पार उतर जा रे। मन को पकड़ मत। उसे पहचान देख और उससे पार हो जा। कबीर कहते हैं जिस दिन तुमने मन को देख लिया उसी दिन मुक्ति शुरू हो जाती है। मुक्ति कोई मरने के बाद नहीं मिलती। मुक्ति यही अभी जब तुम मन के पार जाते हो। तुम शरीर नहीं हो। तुम मन नहीं हो। तुम शुद्ध चेतना हो। यह वाणी उस ऋषि
7:47 की है जो जन्म से टेढ़े-मेढ़े शरीर में था। पर जिसकी दृष्टि सीधी थी। ऋषि अष्टावक्र अष्टावक्र कहते हैं मन को जानना पहचानना और उससे पार होना ही मुक्ति है। मन को जीतना नहीं है। मन से अलग खड़े हो जाना है। आज के इस अशांत और बेचैन समय में क्या अष्टावक्र का यह शुद्ध सत्य हमारे लिए भी उपयोगी है। हम अष्टावक्र गीता के अद्भुत ज्ञान को आधुनिक तर्क और उदाहरणों के साथ समझते हैं। अष्टावक्र गीता श्लोक यदि देहम प्रथक कृत चित विश्राम यतिषस अधु खमसहिष्णस्त्वम सुखी शांत पंडित भावार्थ यदि तू शरीर और मन से अलग होकर स्वयं में विश्राम करता है
8:34 तो तू ही ज्ञानी है शांत है और मुक्त है। अष्टावक्र मन को कोई महान अस्तित्व नहीं मानते बल्कि एक स्वप्न की तरह जो आता है जाता है चलता रहता है वह कहते हैं मन और शरीर केवल दृश्य है तुम दृष्टा हो श्लोक मनो धर्मान नित्यत्वान नते संगोस्तिक नचित असंगो से निराकारो विश्व साक्ष सुखी भव भावार्थ मन की अवस्थाएं क्षणिक है इनसे कोई संबंध मत जोड़ो तुम निराकार हो साक्षी हो बस वही पहचानो। अष्टावक्र मन के साथ लड़ने को नहीं कहते बल्कि मन को देखो। जैसे कोई फिल्म चल रही हो। मत प्रतिक्रिया करो। बस साक्षी बनो। आधुनिक उदाहरण जब
9:21 आपको गुस्सा आता है। आप सोचते हैं मैं गुस्से में हूं। पर अष्टावक्र कहते हैं गलत। गुस्सा आया है। तुम नहीं आए। गुस्सा जाएगा तुम रह जाओगे। यह भेद जान लेना ही मुक्ति है। मॉडर्न न्यूरो साइंस मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे विचारों की 90% गतिविधियां स्वचालित होती हैं। हम सोचते हैं हम सोच रहे हैं। पर दरअसल सोच अपने आप हो रही है। माइंडफुलनेस के प्रयोग जब व्यक्ति साक्षी भाव में जाता है। उसके ब्रेन का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क डीएमए धीमा हो जाता है। यानी वह विचारों की भीड़ से अलग हो जाता है। अष्टावक्र पहले ही कह चुके हैं विचारों की पहचान ही अज्ञान है।
10:06 विचारों से अलग खड़ा होना ही आत्मज्ञान है। श्लोक कृता कृते च द्वंद्वंतव मन्य नोपपद्यते निर्द्वंद्वो ही महायोगी समद्रक सर्वगो भव भावार्थ कर्म अकर्म अच्छे बुरे शुभ अशुभ इन सब का द्वंद्व केवल मन में है। जब तुम इनसे ऊपर उठते हो, तभी तुम मुक्त होते हो। अष्टावक्र का उपाय साक्षी भाव में टिकना जो हो रहा है उसे बाहर से देखो। भाव से मुक्त होना। जो कुछ भी हो रहा है वह मन में हो रहा है। लेकिन मैं उसमें नहीं हूं। तटस्थता, इक्वनिमिटी। ना सुख में फंसो ना दुख में डूबो। आज की
10:52 भाषा में कोई रील देखकर कंपैरिजन आया। मन ने कहा मैं अच्छा नहीं हूं। बस वही क्षण है जहां आप मन को पकड़ सकते हैं और कह सकते हैं मैं नहीं हूं यह विचार। अष्टावक्र कहते हैं तुम जन्म से मुक्त हो। पर तुमने मन की कल्पनाओं को सच मान लिया और उसी ने तुम्हें बांध रखा है। श्लोक न त्व वेता न कर्तात्वा न त्वभोक्ता सुखाधिकम साक्षी मात्रों से सर्वत्र मुक्त सनेव शाश्वतः भावार्थ तू ना जानने वाला है ना करने वाला है ना भोगने वाला तू तो केवल साक्षी है सदा से मुक्त इसलिए मन को मत सुधारो उसे पहचानो मन से मत लड़ो उसे पार
11:38 देखो यही है अष्टावक्र की मुक्ति जब पूरा भारत आत्मा पुनर्ज जन्म मोक्ष और वैराग्य की बात कर रहा था। तब एक आवाज उठी रण कृत्वा घृतम पिबेत यानी चाहे कर्ज लेकर क्यों ना हो घी पियो जीवन का आनंद लो। यह था चारवाक का विद्रोही दर्शन जहां मन को सुधारने या समझने की बात नहीं बल्कि मन को यथार्थ में जीने की छूट थी। तो क्या चारवाक मुक्ति की बात नहीं करता था या वह मुक्ति को ही भ्रम मानता था। अब हम जानेंगे चारवाक की दृष्टि से मन क्या है और उसका दृष्टिकोण आज के आधुनिक युग में कितना प्रासंगिक है। चारवाक सूत्र यावत जीवेत सुखम जीवेत रणम कृत्वाघ्रतम पिवत भस्मभूतस्य देहस्य पुनरागमनम कुतः चारवाक
12:27 का स्पष्ट मत था जो दिखता नहीं वह मिथ्या है। आत्मा पुनर्जन्म स्वर्ग नरक मोक्ष यह सब कपोल कल्पनाएं हैं। जो कुछ भी है वह शरीर और मन का अनुभव है। और जब शरीर भस्म हो गया फिर वापसी कैसी? चार वाक्य सिद्धांत चार मूल विचार केवल प्रत्यक्ष परसेप्शन ही प्रमाण है। आत्मा, ईश्वर और पुनर्जन्म की कोई जरूरत नहीं। मनुष्य को सुख के लिए जीना चाहिए। नैतिकता समाज की सुविधा है। चारवाक मन को दिव्य तत्व की तरह नहीं मानते बल्कि उसे शरीर की एक जैविक प्रक्रिया कहते हैं जो इंद्रियों और अनुभवों से बनती है। तुलना करें आधुनिक न्यूरोसाइन से। आज का विज्ञान कहता है मन
13:13 मस्तिष्क का उत्पाद है थॉट्स, न्यूरल सिग्नल्स, इमोशंस, केमिकल रिस्पांसेस। आधुनिक उदाहरण जब आप Instagram पर स्क्रॉल करते हैं, मन आनंद लेता है। चारवाक कहता है, बस यही जीवन है। तर्क से जियो और सुख में जियो। मन को साक्षी बनने की जरूरत नहीं। मन को समझकर उसकी जरूरतों को पूरी करना ही यथार्थ है। चारवाक को अक्सर भोगवादी हिडनिस्ट कहा जाता है। पर क्या वह केवल इंद्रिय सुख के पीछे था? नहीं। वह मूल्यहीन नहीं था। वह यथार्थवादी था। उसका कहना था अगर दुख से बचा जा सकता है तो बचो। अगर मन का सुख मिल सकता है तो नैतिकता के नाम पर उसे कुचलो मत। चारवाक
14:00 कहता है जो सामने है वही सत्य है। जो कल्पना में है वह धोखा है। बुद्ध अष्टावक्र कबीर कहते हैं मन को समझो। उससे ऊपर उठो। यही मुक्ति है। पर चारवा कहता है मुक्ति किससे? क्या तुम कहीं बंधे हो? क्या तुम्हारे पास कोई आत्मा है जो कैद है? चारवाक का जवाब था, मनुष्य स्वतंत्र है इस जीवन में। यह शरीर ही चेतना का स्रोत है और चेतना का लक्ष्य है सुख। आज के युग में जब लोग ए्जायटी और डिप्रेशन से घिरे हैं। चारवाक कहता है उलझो मत जो जैसा हो वैसा स्वीकार कर। इंद्रियों से भागो मत। उनका सम्मान करो।
14:46 चारवाक का दर्शन कोई आत्मज्ञान की खोज नहीं था बल्कि जीवन के यथार्थ का सीधा सामना था। वह कहता था मन को मोक्ष का साधन मत बनाओ। मन को समझो ताकि वह तुम्हारा सेवक बन सके। स्वामी नहीं। संक्षेप में मन कोई दिव्य वस्तु नहीं। यह जैविक और सामाजिक है। मुक्ति, मोक्ष जैसी बातें केवल कल्पना है। अगर मन समझ में आ जाए तो आप यथार्थ में जी सकते हैं। मन को ना दबाओ, ना भगाओ, सुख पूर्वक प्रयोग करो। मन को जीतना नहीं, मन को समझना है। मन से लड़ना नहीं, उसे देखना है और जो देख लेता है, वह मुक्त हो जाता है। ओशो कहते हैं, मन तुम्हारा दुश्मन नहीं है। बस तुम उसे
15:32 नहीं जानते। जब तक तुम मन को पहचानते नहीं तुम उसी की बनाई जेल में बंद रहते हो। अब हम ओशो के शब्दों में जानेंगे मन क्या है? मुक्ति क्या है? और कैसे ध्यान से मन को समझा जा सकता है? आज के आधुनिक जीवन में। ओशो कहते हैं मन तुम्हारे भीतर की एक प्रोग्रामिंग है। यह तुम्हारा नहीं है। यह तुम्हारे माता-पिता, समाज, शिक्षक, धर्म, संस्कृति की रिकॉर्डिंग है। ओशो की वाणी मन बीते हुए कल का परिणाम है और मुक्ति इसी क्षण में घटती है जब तुम मन से बाहर निकल आते हो। आधुनिक उदाहरण आपने सुना असफलता बुरी होती है। अब मन हर बार डराता है। अगर फेल हो गए तो ओशो कहते हैं यह
16:19 तुम्हारी आवाज नहीं है। यह समाज की रिकॉर्डिंग है। मन एक मशीन है और तुम मशीन नहीं हो। ओशो चेतावनी देते हैं। मन से लड़ना शुरू करोगे तो हार निश्चित है क्योंकि जो भी तुमने दबाया वह और गहराई से छिप जाता है। ओशो की वाणी मन से लड़ने वाले लोग सन्यासी नहीं होते। वे बड़े अहंकारी होते हैं। सच्चा सन्यास मन को देखने वाला होता है। नहीं कि उसे बदलने वाला। आधुनिक विज्ञान भी कहता है जैसे ही आप विचार से लड़ते हो वह सक्रिय हो जाता है। रेजिस्टेंस क्रिएट्स पर्सिस्टेंस। ओशो कहते हैं बस बैठो। और देखो विचार आते हैं आने दो। जैसे ट्रेनें स्टेशन से गुजरती
17:04 हैं, वैसे ही तुम बस बैठकर देखो। तुम प्लेटफार्म हो, ट्रेन नहीं। ओशो ने ध्यान को मन की मृत्यु की चाबी कहा है। उन्होंने पारंपरिक ध्यान नहीं बल्कि क्रांतिकारी ध्यान की विधियां दी। जहां शरीर, भावनाएं और मन सब की सफाई होती है। ओशो की विधियां डायनेमिक मेडिटेशन। पहले फेज में ऊर्जावान सांसे फिर भावनाओं को बाहर निकालना। फिर ह ध्वनि से केंद्र पर जाना। फिर मौन। कुंडलिनी ध्यान कंपन, नृत्य, मौन और समर्पण। इसका लक्ष्य क्या है? मन को खत्म करना नहीं मन को पार देख लेना। ओशो कहते हैं जैसे ही तुम मन को बाहर से देख पाते हो, मन की सत्ता समाप्त हो जाती है। वह अब
17:49 मालिक नहीं रहता बस एक उपकरण बन जाता है। आज का मन सबसे ज्यादा विचलित। Instagram रील्स डोपामिन, सोशल मीडिया कंपैरिजन लाइक अप्रूवल एडिक्शन। ओशो के अनुसार यह मन भीख मांगता है। ध्यान नहीं करता। लोग मुझे अच्छा कहें मैं सफल दिखूं। मेरे पास ज्यादा लायक हूं। यह सब मन की भूख है। ओशो पूछते हैं क्या तुम यह सब देख पा रहे हो? अगर हां तो बस वहीं से क्रांति शुरू होती है। ओशो कहते हैं तुम कुछ भी नहीं हो। बस शुद्ध दृष्टा हो। तुम विचार नहीं हो। मन नहीं हो, शरीर नहीं हो। तुम मौन हो, शांति हो, साक्षी हो, मन को समझना मुक्ति। मन से
18:35 चिपके रहना बंधन, मन को देख लेना स्वतंत्रता। ओशो हमें ध्यान की तरफ नहीं खींचते। वह कहते हैं बस देखना शुरू करो। ध्यान घटने लगेगा। मन से परे जो है वही तुम हो। शंकराचार्य कहते हैं मन बंधन का कारण है और मन से ऊपर उठ जाना ही मोक्ष है। जब दुनिया इंद्रिय सुख और कर्मकांडों में उलझी थी। शंकराचार्य ने कहा तत्व मसे तू ही वह ब्रह्म है। आज के इस उलझे तेज और तकनीकी जीवन में क्या शंकराचार्य का यह ज्ञान आज भी उतना ही उपयोगी है। अब हम समझते हैं शंकराचार्य के अनुसार मन क्या है? मुक्ति क्या है? और कैसे मन को जानकर
19:21 हम आत्मज्ञान को पा सकते हैं। शंकराचार्य का सूत्र मनोबुद्धि अहंकार चितानि नाहम नच श्रोत्र जेवे नच घण नेत्रे निर्वाण षटकम शंकराचार्य कहते हैं मैं मन नहीं हूं बुद्धि नहीं हूं अहंकार नहीं हूं। मैं ना शरीर हूं ना इंद्रियां हूं। मैं शुद्ध चैतन्य हूं। ब्रह्म स्वरूप हूं। मतलब मन एक उपाधि है जो आत्मा को सीमित और भ्रमित करता है। जैसे बादल सूर्य को ढंगते हैं वैसे ही विचार आत्मा को ढंगते हैं। आधुनिक तुलना जैसे फोन की स्क्रीन पर नोटिफिकेशन आ जाते हैं और आप स्क्रीन को नहीं नोटिफिकेशन को देखने लगते हैं। वैसे ही मन
20:08 आत्मा पर पर्दा डाल देता है। शंकराचार्य कहते हैं, माया कल्पित देश कालकलना वैचित्र्य चित्रीकृतम। माया ही संसार है और उसका केंद्र है मन। मन ही माया का द्वार है। जब तुम मन के विचारों को सत्य मानते हो तब तुम माया में फंसते हो। विचार सत्य विचार बदलते हैं। अनुभव बदलते हैं। पर तुम जो इन्हें देख रहे हो नहीं बदलते। आज के युग में मान लीजिए आपने Instagram पर किसी को देखा। मन बोला मैं उससे कम हूं। अब वह विचार आपकी आत्मा नहीं है। वह बस मन का भ्रम है। शंकराचार्य कहते हैं इन भ्रमों को पहचानो और उस साक्षी में टिको जो अपरिवर्तित है।
20:53 शंकराचार्य का निष्कर्ष ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मव ना परह यह अद्वैत वेदांत का मूल है। ब्रह्म ही सत्य है। यह संसार मन सहित एक मिथ्या अनुभव है। और जीव तुम वास्तव में ब्रह्म ही हो। तो मुक्ति क्या है? मुक्ति किसी और लोक में जाने का नाम नहीं बल्कि अज्ञान अविद्या के नाश का नाम है। जैसे ही तुम जान जाते हो कि मैं मन नहीं हूं। मैं शरीर नहीं हूं। मैं यह संसार नहीं हूं। मुक्ति उसी क्षण घट जाती है। शंकराचार्य का साधन विवेक डिस्क्रिमिनेशन। सत्य और असत्य में भेद। वैराग्य डिस्पैशन जो बदलता है उससे मोह
21:38 त्याग दो। श्रम और दमन और इंद्रियों का संयम श्रवण मनन निदि्यासन सुनो विचार करो और ध्यान करो आधुनिक अभ्यास जब मन कहे तू असफल है आप पूछो कौन यह कह रहा है जब मन कंपैरिजन करे आप पहचानो यह विचार है मैं नहीं जिस क्षण तुम मन को बाहर से देख लेते हो तुम साक्षी बन जाते हो और साक्षी कभी बंधता नहीं शंकराचार्य का संदेश सीधा है। मन को सुधारो मत। देखो मन को पकड़ो मत। छोड़ो। मन के पार जाओ। वहीं आत्मा है। वहीं ब्रह्म है। निर्वाण षटकम में शंकराचार्य बार-बार कहते हैं चिदानंद रूप
22:25 शिवोह शिवोहम। मैं चेतना और आनंद हूं। मैं शिव हूं। यही मुक्ति है। मन की सीमाओं से ऊपर उठकर अपने स्वरूप को जान लेना। हमारा मन ही समस्या है और जब मन को आप पूरी तरह समझ लेते हैं तब हर समस्या अपने आप मिट जाती है। जी कृष्णमूर्ति कहते हैं मन को बदलना नहीं है। मन को केवल देखना है। समझना है बिना किसी निर्णय बिना किसी हस्तक्षेप के। अब हम जानेंगे कृष्णमूर्ति के अनुसार मन क्या है? उसकी जड़ में समस्या क्यों है? और कैसे मन को देखना ही हमें मुक्ति की ओर ले जाता है। कृष्णमूर्ति कहते हैं मन एक संग्रह है यादों का, अनुभवों का, डर का, अपेक्षाओं का। कृष्णमूर्ति की वाणी। द
23:13 माइंड इज द रिजल्ट ऑफ टाइम। इट इज द पास्ट। मन समय की उपज है। वह अतीत है। यानी जो कुछ आपने देखा, सीखा, झेला वह सब मिलकर मन बन गया है। और अब वही मन हर बात को पुराने ढांचे से देखता है। आधुनिक उदाहरण मान लीजिए आपने किसी से प्यार किया और धोखा मिला। अब मन कहेगा सभी लोग धोखेबाज होते हैं। यही अतीत की जेल है जिससे हर नई चीज को पुराने चश्मे से देखा जाता है। कृष्णमूर्ति कहते हैं वेयर देयर इज कॉन्फ्लिक्ट देयर इज द सेल्फ एंड वेयर देयर इज सेल्फ देयर इज सफरिंग। मन में स्व की भावना मैं ही दुख का मूल है। मैं सही हूं। मुझे चोट लगी। मुझे चाहिए। यही
24:01 संघर्ष है। कृष्णमूर्ति कहते हैं, हम हर समय कुछ बनना चाहते हैं और यह बनने की प्रक्रिया हमें भय, ईर्ष्या, हीनता, लोभ से भर देती है। आज की भाषा में मैं ज्यादा सक्सेसफुल बनूं। मुझे सब नोटिस करें। अगर मैं फेल हुआ तो यह सब मन का विकार है। समाधान है पूरी तरह देखना। मन को कैसे समझें? कृष्णमूर्ति का सूत्र। ऑब्जरवेशन विदाउट इवैल्यूएटर इज द हाईएस्ट इंटेलिजेंस। मतलब जब आप अपने मन को बिना जज किए देखते हैं बिना अच्छा बुरा कहे तभी वह खुलता है। कैसे करें? चुपचाप देखो। गुस्सा आया बस उसे देखो। मत कहो। यह बुरा
24:47 है या मुझे शांत रहना चाहिए। बस देखो। टिके रहो। मन भागेगा। उसे रोको मत, खींचो मत। बस देखते जाओ। कोई लक्ष्य मत रखो। ध्यान करने का लक्ष्य नहीं। बस जागरूकता। उदाहरण किसी ने अपमान कर दिया। मन कहता है वो गलत था। मुझे जवाब देना चाहिए। कृष्णमूर्ति कहते हैं रुक जाओ। पूरी स्थिति को देखो। तुम क्या महसूस कर रहे हो? कौन देख रहा है? वह दृष्टा ही मुक्ति है। कृष्णमूर्ति कहते हैं, मेडिटेशन इज नॉट अ प्रैक्टिस। इट इज द फ्लावरिंग ऑफ अंडरस्टैंडिंग। कृष्णमूर्ति ध्यान को किसी तकनीक या विधि नहीं मानते। उनके अनुसार ध्यान पूर्ण जागरूकता हर क्षण में, हर
25:33 विचार में, हर प्रतिक्रिया में 5:00 बजे बैठकर ध्यान करो। यह नहीं हर समय सजग रहो। यही ध्यान यानी ध्यान जीवन में मौन, सजगता और पवित्रता लाना। बिना किसी आत्म केंद्रित इच्छा के। कृष्णमूर्ति हमें कोई गुरु मत बनो, भक्त मत बनो का संदेश देते हैं। वे कहते हैं अपने अनुभव से जानो। अपने मन को देखो। अपने भीतर उतर जाओ और देखो हर परत को मुक्ति क्या है? जब मन शांत नहीं बल्कि जागरूक होता है। जब विचार आते हैं लेकिन पकड़ते नहीं जब डर, ईर्ष्या, द्वेष सबको साक्षी भाव से देखा जाता है। कृष्णमूर्ति कहते हैं फ्रीडम इज
26:20 नॉट एट द एंड। फ्रीडम इज इन द फर्स्ट स्टेप। इन द सीइंग इटसेल्फ। क्या मन ही हमारी दुनिया का निर्माण करता है? क्या मुक्ति आत्मा की नहीं बल्कि सोचने के ढंग की होती है? 18वीं शताब्दी के महान जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांट कहते हैं। मन केवल दुनिया को देखता नहीं वह उसे आकार भी देता है और जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारा ज्ञान, नैतिकता और अनुभव मन की रचना है, तभी हम वास्तविक मुक्ति की ओर बढ़ते हैं। अब हम जानेंगे कांट के अनुसार मन क्या है? अनुभव, ज्ञान और नैतिकता में मन की क्या भूमिका है और कैसे इस समझ से मिलती है सच्ची आजादी?
27:05 कांट की मूल अवधारणा। माइंड इज नॉट अ पैसिव रिसीवर। इट इज एन एक्टिव शेपर ऑफ एक्सपीरियंस। कांट मानते हैं कि मन केवल इंद्रियों के अनुभवों को स्वीकार नहीं करता बल्कि वह उन्हें एक विशेष रूप देता है। जैसे चश्मा आंखों को दुनिया दिखाता है वैसे ही मन, समय, स्थान और कारण कॉज इफेक्ट के फ्रेमवर्क बनाकर हर अनुभव को व्यवस्थित करता है। मतलब आप जो अनुभव करते हैं, वह असल में जैसा है वैसा नहीं बल्कि जैसा आपका मन उसे ढालता है, वैसा होता है। आधुनिक उदाहरण एक ही घटना एक व्यक्ति को डर लग सकता है। दूसरे को प्रेरणा, तीसरे
27:51 को क्रोध, घटना वही है। प्रतिक्रिया मन की बनावट पर निर्भर है। कांट की कैटेगोरिकल इंपरेटिव। एक्ट ओनली अकॉर्डिंग टू दैट मैक्सिमम वेयर बाय यू कैन एट द सेम टाइम विल दैट इट शुड बिकम अ यूनिवर्सल लॉ। कांट मानते हैं कि नैतिकता मन में जन्म लेती है। पर वह इच्छाओं से नहीं बल्कि तर्क और विवेक से आती है। सच्चा नैतिक मन वही है जो केवल लाभ नहीं देखता बल्कि यह देखता है। अगर सभी ऐसा करें तो क्या होगा? उदाहरण मनी आप झूठ बोलते हैं। अगर सभी ऐसा करने लगे तो क्या होगा? समाज ढह जाएगा। इसलिए झूठ नैतिक नहीं है। भले ही फायदा हो। कांट के अनुसार जब मन यह समझ जाता है कि नैतिकता
28:38 भीतर से आती है और कोई भगवान से नहीं जुड़ी तो वही नैतिक मुक्ति है। कांट की प्रसिद्ध पंक्ति सापेरे ऑडे डेयर टू नो। कांट की दृष्टि में मुक्ति का अर्थ है आत्मनिर्भर सोचना। अंधविश्वास से मुक्त होना। सामाजिक दबाव से मुक्त होना, धार्मिक भय से मुक्त होना, मुक्ति, रीजन ऑटोनोमी। आपका मन स्वतंत्र रूप से सोच सके बिना किसी बाहरी संस्था या डर के। आज के उदाहरण जब आप सोचते हैं लोग क्या कहेंगे। तब आप बंधे हैं। जब आप कहते हैं मेरे विवेक से जो सही है वही करूंगा। तब आप मुक्त हैं। कांट किसी ध्यान या योग की बात नहीं करते।
29:26 वे एक बौद्धिक मुक्ति की बात करते हैं। उनका कहना है अनुभव सीमित है पर तर्क और नैतिक विवेक असीम हो सकते हैं। वह मानते हैं आपका मन जितना स्पष्ट जितना मुक्त पूर्व ग्रहों से उतना ही आप स्वतंत्र और जिम्मेदार बनते हैं। कांठ हमें ध्यान की नहीं तर्क और आत्म जवाबदेही की साधना सिखाते हैं। उनकी मुक्ति की परिभाषा है। जो व्यक्ति सोच सकता है, नैतिक निर्णय ले सकता है और अपने विवेक के आधार पर खड़ा हो सकता है, वही मुक्त है। इसलिए मन को समझो कि वह कैसे अनुभवों को आकार देता है। कैसे तुम्हें नैतिक रास्ता दिखाता है और कैसे तुम्हें आत्मनिर्भर बना सकता है। मुक्ति आत्मा की नहीं। मुक्ति उस मूल्य विहीन सोच
30:12 से है जो दूसरों के गुलाम बनी हुई है। क्या मन से भागकर मुक्ति मिलती है? या मन को मारकर या मन को समझकर। इस प्रश्न के उत्तर में हमने सुने बुद्ध की दृष्टि, कबीर की गूंज, अष्टावक्र की गहराई, चारवाक की तर्क बुद्धि, ओशो की क्रांति, कृष्णमूर्ति का निरीक्षण, शंकराचार्य का अद्वैत और कांट की विवेकशीलता। अब समय है निष्कर्ष का। एक ऐसा निष्कर्ष जो इन सबके दर्शन को समेटे और हमारे जीवन को दिशा दे। मन एक दर्पण है लेकिन उस पर धूल जमी है। बुद्ध कहते हैं ध्यान से उस धूल को साफ करो। कबीर कहते हैं झूठे मन को पहचानो और भीतर के राम को देखो। अष्टावक्र कहते हैं
30:58 तुम मन नहीं हो। मन माया है तुम साक्षी हो। चारवाक उल्टा पूछते हैं क्यों झूठे मुक्ति के पीछे भाग रहे हो? मन को दबाओ मत जियो। ओशो कहते हैं मन को ना सुधारो ना भागो उसे सिर्फ देखो। कृष्णमूर्ति कहते हैं जो देखता है वह बदल जाता है। मन को समझना ही बदलाव है। शंकराचार्य कहते हैं मन ही माया है। तुम ब्रह्म हो। देखो और मुक्त हो जाओ। कांड कहते हैं तर्क और विवेक से सोचो। यही आंतरिक स्वतंत्रता है। सबकी दिशा अलग है। भाषा अलग है। मार्ग अलग है। लेकिन सभी कहते हैं मन को देखो। समझो साक्षी बनो। मुक्ति कोई स्वर्ग नहीं। कोई भविष्य नहीं। कोई चमत्कार नहीं। मुक्ति है
31:43 जब तुम मन की पहचान को छोड़ते हो। जब तुम खुद को विचारों से अलग देख पाते हो। जब तुम तयशुदा संस्कारों से बाहर निकलते हो। यही बात अलग-अलग दार्शनिकों ने अपने ढंग से कही। बुद्ध तुम्हारे दुख का कारण है तुम्हारा चिपकाव। देखो और छोड़ दो। कबीर मन के माया जाल को काटो और भीतर उतर जाओ। अष्टावक्र तुम्हारा स्वरूप शुद्ध चैतन्य है जानो और मुक्त हो। चार वाक मुक्ति नहीं जीवन ही प्राथमिक है। जियो तर्क से ओशो ध्यान ही मुक्ति है क्योंकि वही मन को खोलता है। कृष्णमूर्ति देखो बिना लक्ष्य बिना प्रयास के और वही मुक्त करता है। शंकराचार्य जब ब्रह्म और
32:32 आत्मा एक अनुभव होते हैं। वही मुक्ति है। कांड जब तुम विवेक पूर्ण होकर खुद निर्णय लेते हो तब तुम स्वतंत्र होते हो। सभी की मंजिल एक है। मन के अंधकार से बाहर निकलकर चेतना के प्रकाश में आना। आज का मन सूचना से भरा है। कंपैरिजन से टूटा हुआ है। सोशल मीडिया से झूठी पहचान बनाता है और भीतर खोखला होता जा रहा है। तो क्या करें? देखें निर्णय किए बिना। हर विचार को पकड़े नहीं गुजर जाने दें। भीतर के सन्नाटे से भागे नहीं उसे स्वीकारें। विचारों के परे उस साक्षी को पहचाने जो देख रहा है। यही आधुनिक मुक्ति है। बाहर नहीं भीतर से। मन को समझना ही मुक्ति है। यह कोई शाब्दिक
33:19 सत्य नहीं बल्कि एक आंतरिक अनुभव है। जब तुम मन से नहीं बल्कि साक्षी से जीते हो तो तुम स्वतंत्र होते हो। कोई धर्म नहीं चाहिए। कोई पूजा नहीं चाहिए। कोई गुरु नहीं चाहिए। केवल सजग देखना चाहिए। यही वह धरातल है। जहां बुद्ध मौन होते हैं, कबीर मुस्कुराते हैं, अष्टावक्र शांत रहते हैं, चारवाक हंसते हैं, ओशो नृत्य करते हैं, कृष्ण मूर्ति देखते हैं। शंकराचार्य ब्रह्म में लीन होते हैं और कांठ प्रश्न करते हैं। हर शब्द एक दरवाजा है और हर किताब, एक नई दुनिया। कहानियां हो या कविताएं, दर्शन हो या जीवन की कोई गूंज। अगर आपको भी अपने मन की गहराइयों में
34:04 उतरना है तो कम विद अन्यू के इस सफर में हमारे साथ चलते रहिए। अगर आज की बात में आपके दिल को छुआ तो वीडियो को लाइक करें। मन में कोई विचार जागा हो तो कमेंट जरूर कीजिए। और हां अगली कहानी, अगली किताब और अगली खोज के लिए चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए। क्योंकि यहां हम सिर्फ सुनते नहीं महसूस करते हैं, जीते हैं। कम विद अनु आवाजों के उस रास्ते पर जहां हर शब्द आपको थोड़ा और आप बना देता है। शब्दों के साथ फिर मिलेंगे तब तक अपने मन को सुनते रहिए। तो मिलते हैं अगले वीडियो में। तब तक के लिए धन्यवाद।