0:04 पृथ्वी हमारे सौरमंडल का खास और इकलौता ग्रह जिसका गहना है जीवन जल थल और आकाश पृथ्वी के कोने-कोने में जीवन थिरक रहा है कहीं पर गहरे समुद्र हैं तो कहीं पर धूल से भरे रेगिस्तान तो कहीं पर आकाश को छूती हुई पर्वत मालाएं बड़ा ही अनोखा है हमारा यह ग्रह लेकिन जितना अनोखा यह ग्रह है उतनी ही अनोखी वह घटनाएं भी थी जिनकी बदौलत आज पृथ्वी ने यह रूप धारण किया अगर हम पृथ्वी के अतीत में झांक कर देखें तो हमें दिखाई देंगी वो घटनाएं जो कि महाप्रलय कारी थी जिन्होंने पृथ्वी को निर्मित किया अगर अतीत में वह चमत्कारी घटनाएं ना घटती तो आज ना हमारा
0:52 सूर्य होता ना पृथ्वी होती और ना ही जीवन का कोई अस्तित्व होता पृथ्वी का अतीत रोमांच से भरा हुआ है कि कैसे हमारे इस ग्रह का निर्माण हुआ वो कौन सी चमत्कारी घटनाएं थी जिन्होंने पृथ्वी के निर्माण में अपनी अहम भूमिकाएं निभाई नमस्कार दोस्तों मैं हूं शाम तंवर स्वागत करता हूं आपका इस वीडियो में आज से 460 करोड़ साल पहले अभी आप अपनी स्क्रीन पर जो तस्वीर देख रहे हो वो एक नेबुला की है नेबुला एक बहुत बड़ा क्लाउड होता है जो कि गैस डस्ट और छोटे-छोटे पार्टिकल से मिलकर बना होता है यह कोई आम क्लाउड नहीं बल्कि कि यह घर है तारों का जो कि हजारों प्रकाश वर्ष में फैला होता है आज हमारा ग्रह पृथ्वी मैं आप और आपके
1:37 आसपास दिखाई देने वाली हर एक भौतिक चीज आज से अरबों साल पहले इसी तरह के एक बहुत बड़े बादल में गैस और धूल के रूप में मौजूद थी आगे चलकर इन गैस और धूल के बादलों से हमारा सूर्य प्लानेट एस्टेरॉइड्स धरती और स्पर थ रकता हुआ जीवन यह सब बनने वाले हैं इस क्लाउड में एक अदृश्य शक्ति छुपी हुई है जो इन गैस और धूल के बादलों को हमारी आज की दुनिया में बदल देगी और उस अदृश्य शक्ति का नाम है गुरुत्वाकर्षण यानी ग्रेविटी वही ग्रेविटी जिसकी वजह से सेब धरती पर गिरता है वही ग्रेविटी जो हमें धरती से बांधे रखती है इसी ग्रेविटी ने हमारी दुनिया का निर्माण किया आप यह बोल सकते हो कि अगर ग्रेविटी
2:23 ना होती तो हमारी दुनिया कभी बनती ही नहीं ग्रेविटी की वजह से गैस और धूल से बना यह सोलर नेबुला सिकुड़ने लगा और यह प्रोसेस अगले 1 करोड़ सालों तक ऐसे ही चलता रहा लेकिन उसी दौरान एक अद्भुत घटना घटती है इस क्लाउड से बहुत दूर मौजूद एक तारे में सुपरनोवा विस्फोट होता है जिसकी शॉक वेव ने इस क्लाउड में एक हलचल पैदा कर दी यह क्लाउड उन शॉक वेव्स की वजह से रोटेट करने लगता है समय के साथ जैसे-जैसे ग्रेविटी की वजह से यह क्लाउड सिकुड़ रहा था वैसे-वैसे इस क्लाउड की रोटेशनल स्पीड और तेज होती जा रही थी तेज रोटेशनल स्पीड की वजह से इस क्लाउड ने एक बहुत बड़ी डिस्क की शेप ले ली इस डिस्क को प्रोटो प्लानेट डिस्क बोला
3:08 जाता है ग्रेविटी की वजह से इस डिस्क में मौजूद ज्यादातर मैटर इसके सेंटर की ओर दबता जा रहा था जिससे इस डिस्क के सेंटर में प्रेशर और टेंपरेचर दोनों ही बढ़ते जा रहे थे और करोड़ों सालों के प्रोसेस के बाद इस डिस्क के सेंटर में एक तारे का जन्म होता है जिसे हम सूर्य बोलते हैं सूर्य के बनने के बाद यह डिस्क अभी भी बहुत तेजी से सूर्य के चारों ओर घूम रही थी अभी से 45 अरब साल पहले हमारी पृथ्वी और सौरमंडल के सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर सिर्फ गैस और धूल के रूप में ही चक्कर लगा रहे थे धीरे-धीरे यह धूल के कण आपस में जुड़ने लगे और अगले लाखों सालों तक यह प्रोसेस ऐसे ही चलता रहा और यह धूल आपस में जुड़कर बड़े-बड़े ऑब्जेक्ट्स में
3:53 बदलने लगी जैसे-जैसे यह ऑब्जेक्ट्स बड़े होते जा रहे थे वैसे-वैसे इनकी ग्रेविटी भी बढ़ती जा रही थी जिससे यह आकाशीय पिंड और तेजी से डिस्क में मौजूद गैस और धूल को अपने अंदर खींचते जा रहे थे आप यह बोल सकते हो कि यह पिंड एक वैक्यूम क्लीनर की तरह सूर्य के चारों ओर घूम रही गैस और धूल को अपने अंदर खींचते जा रहे थे यह पिंड धीरे-धीरे ग्रहों का रूप लेते जा रहे थे और करीब 30 लाख साल लगे इस प्रोटो प्लेनेटरी डिस्क से प्लानेट बनने में लेकिन अभी भी यह प्लानेट बहुत छोटे थे वैज्ञानिक मानते हैं कि की शुरुआत में हमारे सौरमंडल में करीब 100 से भी ज्यादा छोटे-छोटे ग्रहों का निर्माण हुआ था इन्हें वैज्ञानिक प्रोटो पलेनेस बोलते हैं लेकिन अब हमारा सौरमंडल एक भयानक रूप लेने
4:41 वाला था सौरमंडल के शुरुआती दौर में जितने भी प्रोटो पलेनेस बने थे वो सभी सूर्य के चारों ओर बहुत तेजी से घूम रहे थे और उन सभी प्रोटो प्लानेट का ऑर्बिट अनस्टेबल था इस वजह से ये प्रोटो ये आपस में टकराने लगते हैं आपस में टकराने की वजह से इन प्लानेट का साइज बड़ा होता जा रहा था और समय के साथ आपस में टकरा टकरा कर अब सौरमंडल में सिर्फ गिने-चुने ही प्लानेट बचे थे अभी तक पृथ्वी से कई प्रोटो प्लानेट टकराए इन टकराव की वजह से इतनी हीट पैदा हुई कि हमारी पृथ्वी पूरी तरह से धधक हुए एक लावे की गेंद बन चुकी थी लेकिन अब पृथ्वी पर एक और भयानक घटना घटने वाली थी तकरीबन मंगल
5:29 ग्रह के आकार का एक ग्रह जिसे वैज्ञानिकों ने थिया नाम दिया है यह पृथ्वी की ओर बहुत तेजी से आता है और पृथ्वी से टकरा जाता है वैज्ञानिकों ने इस घटना को जॉइंट इंपैक्ट नाम दिया यह टकराव इतना भीषण था कि जैसे ही यह प्लानेट पृथ्वी से टकराया तो भारी मात्रा में पृथ्वी का पिघला हुआ लावा अंतरिक्ष में छिटक गया और पृथ्वी के चारों ओर एक रिंग के रूप में फैल गया और समय के साथ वो रिंग एक ऑब्जेक्ट में बदलने लगी जिस से आज हम चंद्रमा बोलते हैं दोस्तों चंद्रमा के बनने के बारे में वैज्ञानिक अलग-अलग थ्योरी देते हैं जैसे कि कैप्चर थ्योरी के अनुसार ऐसा माना जाता है कि चांद कोई प्रोटो प्लानेट था जो कि पृथ्वी की ग्रेविटी की वजह से इसके ऑर्बिट में आकर फंस गया वहीं एक थ्योरी यह कहती है कि
6:17 जब पृथ्वी का निर्माण हो रहा था तब साथ ही साथ पृथ्वी के ऑर्बिट में चंद्रमा का भी निर्माण हो गया लेकिन जब साल 1969 में इंसान पहली बार चांद पर गए तब अपोलो 11 के एस्ट्रोनॉट्स चांद की मिट्टी अपने साथ लेकर आए जब चांद से लाई गई उस मिट्टी पर परीक्षण किया गया तो वैज्ञानिकों ने पाया कि चांद की मिट्टी की संरचना भी पृथ्वी की मिट्टी से मेल खाती है जो यह साबित करती है कि अतीत में चंद्रमा पृथ्वी का ही हिस्सा रहा होगा तो वैज्ञानिक चांद के बनने के बारे में जाइंट इंपैक्ट थ्योरी को ही सटीक मानते हैं उस सोलर नेबुला से पृथ्वी के बनने में अभी तक 5 करोड़ साल बीत चुके थे चांद का जन्म हो चुका था लेकिन पृथ्वी का चंद्रमा आज की तरह बिल्कुल भी नहीं था उस समय पृथ्वी का
7:03 चंद्रमा पृथ्वी के इतने करीब था कि यह आज की तुलना में करीब 15 गुना से भी ज्यादा बड़ा दिखाई देता था और शुरुआत में चंद्रमा भी धधक हुए लावे की एक गेंद की तरह था अतीत में थिया प्लानेट का पृथ्वी से टकराना पृथ्वी के लिए एक भयानक घटना थी लेकिन अगर उस घटना को इंसानों के नजरिए से देखा जाए तो वह वास्तव में एक वरदान ही था क्योंकि उस टकराव की वजह से पृथ्वी अपनी एक्सिस पर 23.5 ° से झुक गई जिसका आगे चलकर पृथ्वी पर बहुत फायदा मिलने वाला था आज हम अपनी पृथ्वी पर अलग-अलग ऋतुओं को अनुभव करते हैं जैसे सर्दी गर्मी और बरसात पृथ्वी पर यह ऋतुएं पृथ्वी के अपनी एक्सेस पर इस टिल्ट की वजह से ही बदल पाती हैं और
7:48 पृथ्वी के इस टिल्ट को चंद्रमा स्थिर रखे हुए हैं अभी पृथ्वी रहने लायक तो बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन अब पृथ्वी पर एक ऐसी घटना घटने वाली थी जिसकी वजह से आगे चलकर धरती पर जीवन संभव हो पाया दरअसल पृथ्वी के अंदर मौजूद हल्के एलिमेंट्स सतह की ओर ऊपर उठने लगे और भारी एलिमेंट्स जैसे कि लोहा और अन्य धातुएं पृथ्वी के केंद्र में जमा होने लगी जैसे-जैसे पृथ्वी की कोर का निर्माण होता जा रहा था वैसे-वैसे पृथ्वी की एक अदृश्य ढाल बनती जा रही थी जिसे हम मैग्नेटिक फील्ड बोलते हैं दोस्तों अगर पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड ना होता तो आज पृथ्वी पर जीवन का नामो निशान भी ना होता क्योंकि सूर्य से लगातार सोलर तूफान निकलते रहते हैं जिनमें मौजूद चार्ज
8:34 पार्टिकल्स पृथ्वी की ओर गोली से भी तेज रफ्तार से आते हैं लेकिन पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड इन चार्ज पार्टिकल्स को धरती पर आने से रोकता है अगर पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड ना होता तो यह सौर हवाएं पृथ्वी के वायुमंडल को खत्म कर देती पृथ्वी पर मौजूद समुद्रों को सुखा देती तो आप सोच कर देखिए कि बिना मैग्नेटिक फील्ड के क्या धरती पर जीवन संभव हो पाता धरती धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थी और इसकी अलग-अलग लेयर्स बनती जा रही थी पृथ्वी की क्रस्ट का निर्माण होने लगा था दोस्तों पृथ्वी के बनने के इस प्रोसेस में अभी तक पृथ्वी का मैग्नेटिक फील्ड बन चुका था और पृथ्वी का चंद्रमा भी जन्म ले चुका था लेकिन अभी भी पृथ्वी पर एक जरूरी चीज की कमी थी पानी अभी तक पूरी पृथ्वी एकदम बंजर
9:23 और वीरान थी जिस पर समुद्र तो मौजूद थे लेकिन तकते हुए लावे से भरे हुए पृथ्वी अपनी धुरी पर इतनी तेजी से घूम रही थी कि उस समय पृथ्वी के दिन और रात महज 6 घंटे के होते जहां 3 घंटे का दिन तो तीन ही घंटे की रात होती जहां इनर सोलर सिस्टम में रॉकी प्लानेट का निर्माण हो रहा था तो वहीं आउटर सोलर सिस्टम में बड़े-बड़े गैस जॉइंट्स का निर्माण हो रहा था साथ ही निर्माण हो रहा था कोमेट्स और एस्टेरॉइड्स का और इन कोमेट्स और एस्टेरॉइड्स में मौजूद थे मिनरल्स और पानी लेकिन यह कोमेट्स पृथ्वी से बहुत दूर एस्टेरॉइड बेल्ट में में मौजूद थे जो कि सूर्य की परिक्रमा कर रहे थे इस समय तक हमारे सौरमंडल के सबसे बड़े गैस जाइंट जुपिटर का भी निर्माण हो चुका था जुपिटर की ग्रेविटी
10:09 इतनी ज्यादा थी कि इसने सौरमंडल में खलबली मचा दी जिसका असर हमारी पृथ्वी पर भी होना था और पृथ्वी को एक बहुत बड़ी महाप्रलय से गुजरना था दरअसल जुपिटर की ग्रेविटी की वजह से जो बड़े-बड़े एस्टेरॉइड्स और कोमेट्स सूर्य के चारों ओर एक सर्कुलर पाथ में परिक्रमा कर रहे थे उन सभी बड़े-बड़े एस्टेरॉइड और कोमेट्स ने जुपिटर की ग्रेविटी से प्रभावित होकर अपने सर्कुलर पाथ को छोड़कर अब एलिप्टिकल पाथ में सूर्य की परिक्रमा करना शुरू कर दिया और जब एलिप्टिकल ऑर्बिट में घूमते हुए वो बड़े-बड़े एस्टेरॉइड्स और कोमेट्स पृथ्वी के पास से होते हुए गुजरे तो पृथ्वी की ग्रेविटी ने उन्हें अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया और पृथ्वी पर होती है एक भयंकर एस्टेरॉइड्स और कोमेट्स की बारिश
10:54 एस्टेरॉइड्स और कोमेट्स की यह बारिश लाखों करोड़ों सालों तक ऐसे ही चलती रही कोमेट्स आते और यह अपने साथ मिनरल्स और भरपूर मात्रा में पानी लाते जिससे पृथ्वी पर समुद्रों का निर्माण होने लगा और अब हमारा ग्रह जीवन को धारण करने योग्य बनता जा रहा था दोस्तों आप जब भी पानी पियो तो आप एक बार यह जरूर सोचना कि आप जिस पानी को पी रहे हो उसकी एक-एक बूंद पृथ्वी से लाखों करोड़ों किलोमीटर दूर कोमेट्स के अंदर बनी थी और आपको एक बार बृहस्पति ग्रह का धन्यवाद जरूर करना चाहिए कि उस की ग्रेविटी की वजह से वो पानी पृथ्वी तक पहुंच पाया जिसकी वजह से आप और मैं इस दुनिया में आ पाए क्योंकि बिना पानी के पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं हो पाता अभी तक
11:41 उस सोलर नेबुला से पृथ्वी के बनने के इस प्रोसेस में लगभग 150 करोड़ साल गुजर चुके थे पृथ्वी की ऊपरी सतह ठंडी होकर ठोस होने लगी थी जिससे खोलता हुआ लावा और उसमें मौजूद अन्य गैसें पृथ्वी की सतह के नीचे ट्रैप हो चुकी थी जिससे लावा पृथ्वी पृथ्वी की कष्ट को तोड़कर ऊपर आने लगा और जो पृथ्वी पानी से ढकी थी उसमें जगह-जगह ज्वालामुखी फटने लगे और उनसे छोटे-छोटे आइलैंड्स बनने लगे लाखों सालों तक ज्वालामुखी ऐसे ही फटते रहे और पृथ्वी का वायुमंडल पूरी तरह से जहरीला था लेकिन पानी के अंदर एक चमत्कारी घटना घट चुकी थी पानी के अंदर एक अनमोल चीज का जन्म हो चुका था सिंगल सेल के रूप में जीवन पानी
12:26 के अंदर फल फूलने लगा और आज से करीब 250 करोड़ साल पहले पानी के अंदर ऐसे सूक्ष्म जीवों का निर्माण हुआ जो एक गजब का वेस्ट प्रोडक्ट छोड़ने लगे वो जीने के लिए सूर्य का प्रकाश और पानी में मौजूद मिनरल्स का उपयोग करते और ऑक्सीजन को छोड़ते समुद्र के अंदर तादाद में ये माइक्रो बैक्टीरिया मौजूद थे जो लाखों करोड़ों सालों तक ऐसे ही ऑक्सीजन को प्रोड्यूस करते रहे और धीरे-धीरे पृथ्वी का जहरीला वातावरण ऑक्सीजन से लबालब होने लगा और पृथ्वी का वायुमंडल बनने लगा अभी से करीब 150 करोड़ साल पहले पृथ्वी के दिन और रात अब 16 घंटे के हो चुके थे अभी तक पृथ्वी के बनने के इस सफर में करीब 300 करोड़ साल गुजर चुके
13:11 थे लेकिन अभी भी जीवन पानी के अंदर केवल सिंगल सेल के रूप में ही पनप रहा था समय गुजरता जा रहा था लेकिन पृथ्वी के अंदर एक उथल-पुथल मची हुई थी जिस वजह से पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में खिसकने लगी जिससे पृथ्वी में बहुत बड़ी-बड़ी रार हो गई और यह घटना लाखों सालों तक ऐसे ही चलती रही जिससे पृथ्वी के अंदर मौजूद लावा खुले में उबलता रहा साथ ही साथ पृथ्वी पर जगह-जगह वोल्केनो भी फट रहे थे जिससे पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही थी जिससे पृथ्वी पर एसिड रेन शुरू हो जाती है और यह लंबे समय तक चलती रहती है लगातार एसिड रेन की वजह से तापमान इतना कम हो गया कि पृथ्वी पर मौजूद पानी जमने लगा और पूरी पृथ्वी पर
13:59 बर्फ जम जाती है और पृथ्वी आइस एज में चली जाती है और लाखों सालों तक पूरी पृथ्वी ऐसे ही बर्फ से ढकी रहती है लेकिन ज्वालामुखी पृथ्वी पर शांत होने का नाम ही नहीं ले रहे थे ज्वालामुखी हों से निकलने वाली गर्मी ने पृथ्वी पर जमी बर्फ को फिर से पिघला या धीरे-धीरे जीवन एक जटिल रूप धारण करता जा रहा था और पृथ्वी का वातावरण इस जीवन को धरा पर सजो लायक होता जा रहा था एक तरफ जीवन समय के साथ अपने आप को इवॉल्व करता जा रहा था तो वहीं दूसरी ओर पृथ्वी नए-नए बदलावों से गुजरते हुए आज का रूप लेती जा रही थी दोस्तों समय के साथ पृथ्वी का केवल बाहरी आवरण ही नहीं बदल रहा था बल्कि पृथ्वी का इनर स्ट्रक्चर भी बदलता जा रहा था और पृथ्वी की अलग-अलग लेयर्स बनती जा रही थी ऊपरी लेयर बनी
14:46 क्रस्ट जो कि 8 से 40 किमी तक मोटी है आपको बता दूं कि पृथ्वी की क्रस्ट की मोटाई कॉन्टिनेंट्स पर ज्यादा होती है और समुद्र में रिलेटिवली कम होती है पृथ्वी की क्रस्ट के नीचे जो लेयर बनी उसे उसे मेंटल बोला जाता है जो कि करीब 2900 किमी तक मोटी है मेंटल के नीचे मौजूद है पृथ्वी की कोर और पृथ्वी की कोर भी दो भागों से मिलकर बनी है आउटर कोर और इनर कोर जहां आउटर कोर लिक्विड फॉर्म में है और इनर कोर ठोस अवस्था में है आपको बता दूं कि पृथ्वी की कोर का तापमान लगभग सूर्य की सतह के बराबर है जो कि 6000 डिग्री सेल्सियस है इस टेंपरेचर पर पृथ्वी की इनर कोर में मौजूद आयरन और निकल को पिघल जाना चाहिए था लेकिन पृथ्वी की ग्रेविटी की वजह से इसके केंद्र में इतना दबाव है कि 6000 डिी
15:34 सेल्सियस तापमान होने के बावजूद भी इनर कोर ठोस अवस्था में है वास्तव में अतीत में पृथ्वी पर ऐसी चमत्कारी घटनाएं घटी जिनकी बदौलत आज हम इस धरा पर श्वास ले पा रहे हैं जिस तरह से पृथ्वी ने धूल और गैस के बादलों से निर्मित होकर समय के साथ इवॉल्व होते हुए आज की शक्ल ली उसी तरह पृथ्वी पर मौजूद जीवन भी सिंगल सेल से इवॉल्व होते हुए एक जटिल रूप धारण करता गया जीवन का इवोल्यूशन पृथ्वी पर अलग-अलग शाखाओं में इस प्रकार इवॉल्व हुआ कि भिन्न-भिन्न प्रजातियों ने पृथ्वी को जीवन से सजो दिया और आज हम इंसान भी पृथ्वी पर मौजूद करोड़ों प्रजातियों में से एक हैं हम इंसानों का इवोल्यूशन भी एक चमत्कारी घटना है कि कैसे हम इंसान सिंगल सेल से
16:21 इवॉल्व होते हुए आज के इंसान बने वो कौन-कौन सी चमत्कारी घटनाएं थी अगर वह ना घटती तो आज हम इंसान का इस धरती पर वर्चस्व ना होता दोस्तों इंसानों के इवोल्यूशन को आप स्क्रीन पर दिखाई दे रही इस वीडियो पर क्लिक करके देख सकते हो मैं आपको वहीं मिलता हूं