⁠सेक्स का हौवा, और स्त्री देह के प्रति पाखंड || आचार्य प्रशांत, NIT भोपाल (2025)

संक्षिप्त सारांश

यह वीडियो मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक कलंक और वर्जनाओं पर प्रकाश डालता है, जो कामुकता के बारे में व्यापक सांस्कृतिक असहजता से उपजा है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे लोक धर्म, वास्तविक आध्यात्मिकता से अलग, अक्सर यौन इच्छाओं को दबाता है, जिससे महिलाओं के शरीर के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोण पैदा होता है। वह श्रोताओं को शरीर पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपने बच्चों में आंतरिक मूल्यों और क्षमताओं को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

  • मासिक धर्म के आसपास की वर्जनाएं कामुकता के बारे में गहरी असहजता से उपजी हैं।
  • लोक धर्म अक्सर यौन इच्छाओं को दबाता है, जिससे महिलाओं के शरीर के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोण पैदा होता है।
  • वास्तविक आध्यात्मिकता आंतरिक मूल्यों और आत्म-जागरूकता पर जोर देती है, जो शरीर पर ध्यान केंद्रित करने से मुक्ति प्रदान करती है।

परिचय

आचार्य प्रशांत लड़कियों से दूरी बनाने या बनाने के लिए कहने वालों को वासना का शिकार बताते हैं। वह पिछले 10 वर्षों से मासिक धर्म स्वच्छता कार्यक्रम पर काम कर रहे हैं और उनका मानना है कि मासिक धर्म स्वच्छता पर बातचीत करना केवल गांवों या पिछड़े इलाकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हर जगह एक सामाजिक कलंक है। मासिक धर्म एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि यह सेक्स से संबंधित है और लोक धर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। इसलिए, कई तरह की वर्जनाएं हैं, जैसे कि मासिक धर्म के दौरान रसोई में नहीं जाना, अचार नहीं छूना और मंदिर में नहीं जाना। जागरूकता की कमी के कारण संक्रमण होते हैं, जिससे कई महिलाएं बीमार पड़ती हैं और मर भी जाती हैं। दुनिया की 50% आबादी महिलाएं हैं और मासिक धर्म उनके शरीर की एक महत्वपूर्ण क्रिया है, इसलिए इस पर बात करना जरूरी है। अगर हम सचमुच धार्मिक होते, तो सेक्स से हारे नहीं होते, लेकिन हम हारे हुए लोग हैं और अपनी उस हार को छुपाने के लिए ब्रह्मचर्य की बात करते हैं। लड़कियों को इतना क्यों ढका जा रहा है? आज से 20 साल पहले जितनी महिलाएं घर से बाहर निकल कर काम कर रही थीं, आज उससे कम महिलाएं बाहर निकल कर काम कर रही हैं। अच्छी-अच्छी डिग्रियां लेकर भी लड़कियां नौकरियां नहीं कर रही हैं।

सेक्स पाप है!

एक श्रोता आचार्य प्रशांत से मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में उनकी राय पूछते हैं, क्योंकि यह एक सामाजिक कलंक है जो सदियों से चला आ रहा है। आचार्य प्रशांत का मानना है कि मासिक धर्म को लेकर जो डर और वर्जनाएं हैं, उसका कारण यह नहीं है कि हम मासिक धर्म को लेकर असहज हैं, बल्कि यह है कि हम सेक्स को लेकर सहज नहीं हैं। इंसान एक जानवर है और जानवरों की सारी प्रकृति उसमें बैठी हुई है। मनुष्य के पास जानवरों से थोड़ा अतिरिक्त चेतना है, जिससे वह खुद को देख सकता है, अपने बंधनों को पहचान सकता है और उनसे लड़ सकता है। इसी चीज को धर्म कहा जाता है। सबसे बड़ा बंधन हमारी पाश्विक प्रवृत्ति है, जिसमें कामवासना सबसे प्रबल है। धर्म ऐसा होना चाहिए जो आपको कुछ ऐसा दे कि उसके आगे वासना छोटी चीज पड़ जाए। वास्तविक धर्म का उद्देश्य प्रकृति की क्रियाओं को बंद करना नहीं है, बल्कि उन्हें किसी और चीज का अनुगामी बनाना है। असली धर्म आपको नंबर एक वाली चीज देता है, जिससे आप अपने पाश्विक बंधनों से आजाद हो सकते हैं। असली धर्म को हमने मिश्रित कर दिया है, जिससे लोक धर्म बन गया है, जिसका आम आदमी पालन करता है। लोक धर्म का पालन करने वाले लोग अपने आप को धार्मिक बोलते हैं, लेकिन धार्मिकता की पहचान यह है कि आपने अपने बंधन तोड़े होंगे। धार्मिक आदमी अपनी पाश्विकता को लगातार चुनौती देता है और जीतता चलता है। लोक धार्मिक आदमी यह प्रदर्शित करता है कि सेक्स उसके लिए छोटी चीज है, जबकि वास्तविक धार्मिक आदमी के लिए सेक्स और शरीर से संबंधित बाकी बातें सचमुच छोटी हो जाती हैं। लोक धार्मिक आदमी के भीतर तो जानवर अभी गुर्रा ही रहा है, लेकिन ऊपर ऊपर से वह धार्मिक बना हुआ है, इसलिए वह सेक्स का दमन करता है और सेक्सुअलिटी से डरना शुरू कर देता है।

नारी नर्क का द्वार है

महिलाओं के शरीर से जुड़ी एक चीज ऐसी है जिसे छुपा नहीं सकते, इसलिए लोक धार्मिक लोग हमेशा से परेशान रहे हैं। बाबा लोग कहते हैं कि महिलाएं उन्हें छूना मत, क्योंकि उनके लिए महिला बहुत बड़ा मुद्दा है। वास्तविक धार्मिक आदमी कहेगा कि यह तो खाली है, इसमें क्या बड़ी बात है? एक कहानी है कि एक गुरु अपने चेले के साथ जा रहा था, तो उन्हें एक खूबसूरत जवान लड़की मिली जो थक कर बैठ गई थी। गुरु ने उसे उठाया और कंधे पर बैठा लिया। चेले के भीतर से कुत्ते भौंकने लगे। गुरु ने उसे सहजता से बैठा लिया और अपना चलते रहे। चेले के भीतर खलबली मची हुई थी। गुरु ने कहा कि क्या समस्या है? चेले ने कहा कि उसे समझ में नहीं आ रहा है कि गुरु इतने बड़े होकर भी आत्मसंयम नहीं रखते हैं। गुरु ने कहा कि उसने तो उसे कबका उतार दिया, पर चेला उसे अभी भी ढो रहा है। वास्तविक धर्म के लिए यह सब चीजें बहुत महत्व नहीं रखती हैं। लोक धर्म में सबसे बड़ी बात सेक्स है और सबसे पवित्र आत्मा वह है जो कभी सेक्स ना करता हो। बाबा जी बार-बार बोलेंगे कि ब्रह्मचर्य धारण करो और वीर्य रक्षा करो। लोक धर्म के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है। औरत दिखी नहीं कि पगला जाते हैं बिल्कुल। इसलिए वे कहते हैं कि स्त्री की छाया से भी दूर रहो। स्त्री नर्क का द्वार है। यह बात सब समझ में आ रही है ना? यह जरूर एक ऐसा आदमी है जिसके भीतर वासना उबल रही है, लेकिन इसको दिखाना यह है कि मैं तो शांत संयमित आदमी हूं। इसलिए वह एक तरीका निकालता है कि कम से कम सबके सामने पब्लिक में मैं स्त्री का ना तो वर्णन करूंगा ना कोई उसका स्पर्श करूंगा ना उससे बात करूंगा।

माहवारी गंदी बात

मासिक धर्म इतना बड़ा मुद्दा इसलिए है क्योंकि यह सेक्स से संबंधित है और लोक धर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। हम बोलते हैं कि वह फलानी फिल्म है, उसे आप फैमिली के साथ बैठ के देख सकते हैं, मतलब उसमें आगे पीछे कहीं भी कोई शरीर की देह की सेक्स इत्यादि की बात नहीं है। यह हमारा लोक धर्म है जिसमें कि पायसनेस का, वर्च्यू का, पुण्य का सबसे बड़ा पैमाना यही है कि तुमने अपने जीवन में देह का विशेषकर सेक्स का दमन कितना करा है। इसलिए फिर तुमने 100 तरह की वर्जनाएं रखी कि अभी अगर साइकिल चल रहा है तो किचन में नहीं जाओगी, अचार नहीं छुओगी, मंदिर में भी नहीं जाओगी। कितनी महिलाएं मर जाती हैं क्योंकि सेक्स इतना बड़ा जबरदस्त मुद्दा है कि उनको बीमारियां होती हैं तो डॉक्टर को जाकर बता नहीं सकती हैं। इंफेक्शंस होते हैं क्योंकि इस बात को लेकर के अवेयरनेस नहीं है। उस इनफेक्शन से ना जाने कितनी महिलाएं बीमार पड़ती हैं, मरती भी हैं। जबकि यह एक बहुत सीधी सहज सी बात है जिसकी चर्चा करने में किसी को कोई आपत्ति होनी नहीं चाहिए। आपत्ति तो यह होनी चाहिए कि दो ही लिंग होते हैं और 50% है दुनिया की आबादी की महिलाएं और उनके शरीर की एक महत्वपूर्ण ये क्रिया होती है। तुम इसकी बात क्यों नहीं करना चाहते हो? तुम पहले यह बताओ तुम पागल हो क्या? तुम हर चीज की बात कर रहे हो, तुम इस चीज की बात नहीं कर रहे हो। ये दुनिया की आधी आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। तुम दुनिया की आधी आबादी की उपेक्षा करके और बातों की बात करना चाहते हो। मैं क्यों करूं दूसरी बातें? तुम यह बात करो। एक सीधी सहज साधारण चीज को जितना दबाओगे ना उसे अपने लिए उतना बड़ा बना लोगे जबकि उसमें दबाने जैसा कुछ है नहीं। उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि उसको कहो कि लेट मी स्वीप इट अंडर द कारपेट छुपा दो। अरे रे रे रे ये कैसी बात कर दी? ये बात क्यों कर रहे हो? तो गंदी बातें होती हैं। गंदी बात क्या होती है? शरीर है। मिट्टी से शरीर उठता है। मिट्टी में मिल जाता है। मिट्टी है। उसमें माने गंदी बात क्या होती है? आप टट्टी पेशाब की भी बात कर सकते हो, पर रक्त की बात नहीं कर सकते। क्या है इसमें? गंदा क्या है? और वो गंदा है तो फिर गर्भाशय ही गंदा है और गर्भाशय गंदा है तो दुनिया की सारी आबादी गंदी है। एक-एक इंसान वहीं से आ रहा है। तो गंदा क्या है? हम सेक्स से बहुत असहज हैं क्योंकि सेक्स ने हमें हराया है और हम अपनी उस हार को छुपाना चाहते हैं। अगर हम सचमुच धार्मिक होते तो सेक्स से हारे नहीं होते, पर हम हारे हुए लोग हैं और अपनी उस हार को छुपाने के लिए हम ब्रह्मचर्य वगैरह की बात करते हैं।

महिलाओं पर भयावह असर

महिलाओं पर इसका अनिष्टकारी असर पड़ा है और पुरुषों पर भी पड़ा है। पूरा समाज ही बीमार हो गया है। शरीर को इतना बड़ा बना लिया है कि हर आदमी हर समय बस शरीर ही शरीर के बारे में सोच रहा है। विशेषकर महिला का शरीर। पुरुष महिला के शरीर के बारे में सोचे जा रहा है। महिला अपने शरीर के बारे में सोची जा रही है। लड़कियां ज्ञान, कौशल, प्रतिभा, संघर्ष इससे ज्यादा महत्व किसको देने लग जाती हैं फिर? कि मैं सुंदर दिखूं, आकर्षक दिखूं, सेक्सीी दिखूं। क्योंकि सारा महत्व ही उसके शरीर को दिया जा रहा है। वास्तविक धर्म यह नहीं होने देता है। वास्तविक धर्म कहता है कि लड़की हो कि लड़का हो, तुम इंसान हो। एक चेतना हो तुम जिसका दायित्व है और अधिकार है कि वो आसमान की ऊंचाई हासिल करे। लेकिन शरीर शरीर कर करके कर के हमने अपनी बेटियों को अपनी लड़कियों को अपनी महिलाओं को हमने इन सबको बस मांस का पिंड बना दिया है। और हमारी ही नजर महिलाओं ने भी हमसे उधार ले लिए। वह भी अपने आप को इसी तरह से देखने लग गई हैं कि मेरी देह कैसी है। लड़की बहुत आकर्षक ना हो और थोड़ा गाढ़े रंग वगैरह की हो जाए और थोड़ी मोटी हो जाए उसको मानसिक बीमारियां होने लग जाती हैं। उसका पूरा आत्मसम्मान गिर जाता है। वो घर में दुबक के रहने लग जाती है। वो कहती है मेरी हैसियत क्या? मेरी इज्जत क्या? और इसके विपरीत लड़की बिल्कुल ही नालायक हो। कुछ ना हो उसके पास ना बुद्धि है ना ज्ञान है ना संघर्ष है ना ईमान है कुछ नहीं है उसके पास लेकिन अगर उसके पास आकर्षक देह है तो वो बड़े आत्मविश्वास से भरी रहती है वो कहती है बढ़िया है ना मेरे पास देह है मुझे कोई ना कोई मिल जाएगा इस देह को चाहने वाला मेरा काम चल जाएगा। हमने दोनों ही वर्गों स्त्री पुरुष दोनों को ही बर्बाद कर दिया है यह बॉडी बॉडी रट रट के रट रट के रट रट के और लड़कियों का तो जो मानसिक पतन करा है उसकी तो कोई इंतहा ही नहीं। फिर हम पूछते हैं कि महिलाओं के पास उनके नाम पर इतनी कम संपत्ति क्यों होती है? फिर हम पूछते हैं उन्हें इतने कम नोबेल प्राइज क्यों मिलते हैं? फिर हम पूछते हैं संसद में इतनी कम महिलाएं क्यों हैं? फिर हम पूछते हैं कि कॉर्पोरेट बॉडीज में स्टेक होल्डर्स के तौर पर या जो सीएक्सओ पोजीशंस होती हैं उन पर इतनी कम महिलाएं क्यों हैं? तुमने उसके भीतर कूट-कूट करके यह भर दिया है कि यू आर अ बॉडी। तो हर समय बस वो अपनी बॉडी का ही ख्याल कर रही होती है। और ऐसे काम तो बिल्कुल भी नहीं करती जिसमें बॉडी की उपेक्षा करनी पड़े। एकदम ही गरीब हो जाए तो अलग बात है। फिर तो वह एक मजदूर भी बन लेगी। अगर पर वह गरीब नहीं हो रही है तो वह धूल और धूप से बचने की भरसक कोशिश करती है। क्योंकि कहती है अरे कुछ कमाने के लिए अगर मैंने धूल धूप खा के अपना रूप रंग खराब कर लिया तो ये ज्यादा बड़ा नुकसान है। फीमेल लेबर पार्टिसिपेशन रेट पिछले 20 साल में भारत में यह गिर गया है। आज से 20 साल पहले जितनी महिलाएं घर से बाहर निकल कर के काम कर रही थी आज उससे कम महिलाएं बाहर निकल कर के काम कर रही हैं। क्योंकि घर में पैसा आ गया है। 20 साल के पहले की अपेक्षा आज घर में पैसा ज्यादा है। तो पहले तो फिर भी महिला बाहर मजबूरी में निकल कर काम कर लेती थी। अब घर में पैसा आ गया है तो खुद भी ऐसा सोचती है और उसके आसपास वाले भी उसे यही बोलते हैं कि अब तू बाहर क्यों जा रही है? तू घर का ख्याल रखना और तू बाहर जाती है काली हो जाती है। धूप में लिखना ना करो रूप की रानी गोरा रंग काला ना हो जाए। अच्छी-अच्छी डिग्रियां लेकर भी लड़कियां नौकरियां नहीं कर रही हैं। वो ट्रॉफी वाइफ बनके सजवर के बन ठन के घर में बैठना पसंद कर रही हैं। यह है वह बॉडी सेंट्रिसिटी जो पॉपुलर कल्चर ने लोक संस्कृति ने महिलाओं के मन में डाल दी है। तुम और कुछ बाद में हो फर्स्ट एंड फोरमोस्ट यू आर अ बॉडी। तो तुम्हारी सेल्फ वर्थ भी किससे जुड़ी हुई है? तुम्हारी बॉडी से। नहीं। आपकी सेल्फ वर्थ जुड़ी होती है आपकी सत्य निष्ठा से, आपके प्रेम की गहराई से, आपके ज्ञान से आप कितने संघर्ष जीवन में स्वीकार कर रही हैं। चेहरा लीपपोत करके दूसरों को लुभाने से कोई श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।

अपने बच्चों को बचा लो

महिलाओं के साथ जो हुआ सो हुआ, लेकिन कम से कम अपने बच्चों में बॉडी सेंट्रिसिटी मत डालिए। उनको मेकअप मत सिखाइए। बहुत छोटी-छोटी लड़कियां लिपस्टिक लगाकर घूम रही हैं, नेल पेंट कर रही हैं। यह बहुत गलत कर रहे हो तुम उनके साथ। यह बिल्कुल ठीक नहीं है। नाखून को रंगने का क्या मतलब है? कोई होंठ क्यों रंग रहा है? होंठ तो वैसे ही लाल होते हैं। उसको और रंग काहे के ले रहे हो? क्यों घिस रहे हो? और ये तो खाने की जगह है। तो या तो वो खाने की चीज होती है जो यहां लगाई है कि भीतर ही चली जाए। ऐसी जगह जहां से खाओगे, पियोगे वहां तुमने कुछ लगा लिया है। असुविधा नहीं होती। शरीर अगर स्वस्थ है तो होठ अपने आप लाल रहते हैं या जो भी उनका रंग है प्राकृतिक वैसा रहेगा। तो शरीर को स्वस्थ रखो बेहतर ये है ना जाओ दौड़ो जिमिंग करो स्पोर्ट्स करो। अपने आप शरीर बढ़िया रहेगा तो होठ भी बढ़िया रहेंगे। बाहर से लीपापोती करके क्या मिलेगा? अगर आप एक महिला हैं या आप एक अभिभावक हैं और आपके घर में बच्चा है छोटा या आपकी बहन है कोई है या आपके आसपोस में भी कोई है तो इतना करिए कि उनको उनकी देह ही मत बन जाने दीजिए। इतना उन पर एहसान कर दीजिएगा। छोटे बच्चों में अभी तो बहुत छोटी है। उसके छोटे बच्चों में लड़के और लड़की कपड़ों में अंतर क्यों करते हो भाई? अभी तो दोनों का शरीर एक जैसा ही है ना। 8-10 साल तक एक ही जैसा रहता है। तो उनके कपड़ों में अंतर क्यों करते हो? एक से कपड़े पहनाओ। बच्ची अभी छोटी है। अभी से उसके बाल बढ़ाने क्यों शुरू कर दिए भाई? क्यों उसको जता रहे हो कि तू नारी है। नारी है। क्योंकि वो फिर वही नारी बन जाएगी जैसी हमें चारों ओर दिखाई देती है। अबला नारी। क्यों उसको नारी बनाए दे रहे हो? उसको इंसान बनाओ। नारी नहीं। अभी चार दिन पहले मैं खिलौने खरीदने गया तो उसने पूछा कितने साल का बच्चा है? मैंने उम्र बता दी। फिर मुझसे पूछ रहा है गर्ल और बॉय मैंने ऐसे देखा। मतलब 6 साल का बच्चा है यह तेरे लिए पर्याप्त नहीं है। तू यह क्यों पूछ रहा है गर्ल और बॉय? क्योंकि गर्ल सेक्शन अलग है। उसमें बारबीज और यह सब रखे हुए हैं। मैंने कहा मुझे जाना ही नहीं उधर। है तो गर्ल पर बॉय वाले दिखा। तुम क्यों अभी से उसको 12वीं बनने की ट्रेनिंग दे रहे हो? तुम उसके लिए साइंस के गेम्स क्यों नहीं ला सकते? मैथ्स की पजल्स क्यों नहीं ला सकते? एक से एक सजी धजी डॉल्स रखी हुई हैं और सारी डॉल्स ने क्या लगा रखी है? और जितने तरीके के आभूषण हो सकते हैं वो सब उन डॉल्स ने पहन रखे हैं। अब वो छोटी सी बच्ची है। तुम उसके हाथ में वो दे रहे हो। तुम क्या कर रहे हो? जहर दे रहे हो तुम उसको।

असली ब्रह्मचर्य क्या है?

जीवन की गाड़ी अस्तित्व के दोनों पहियों पर चलती है। एक को कमजोर कर दोगे तो दूसरे पर ज्यादा बोझ आ जाएगा। एक पहिया खराब है तो दूसरा भी जल्दी ही खराब हो जाएगा। जो मैं बात बोल रहा हूं पुरुषों के लिए भी है। महिला को अगर सिर्फ देह मानोगे तो बहुत कमजोर हो जाएगी और महिला कमजोर हो गई तो तुम्हारी ताकत भी चली जाएगी। तो अपनी खातिर ही सही लेकिन उसको इंसान समझना शुरू करो। बॉडी बॉडी मत कर दो। रिश्ता दोस्ती का रखो। सुख चाहिए और सुख देह से मिल जाता है, लेकिन दोस्ती का भी अपना एक अलग आनंद होता है। और लड़कियां बहुत अच्छी दोस्त भी बन सकती हैं। बस भौंकना मत शुरू कर देना। दो इंसान बैठे हैं, आपस में बात कर रहे हैं, घूम फिर रहे हैं। जो भी कर रहे हैं। उसका भी अपना अच्छा ऊंचा आनंद है। यही आनंद थोड़ी है कि आई लुक एट हर एज अ बॉडी। यह सब बातें मैं बोल रहा हूं ऐसे ही नहीं जाती। यही सब बातें सिखाना असली धर्म का दायित्व होता है। और उसी के लिए गीता कार्यक्रम है जो इतनी मेहनत से हम चला रहे हैं। पूरी संस्था उसी को समर्पित है और इतने इतने हजार लोग उसमें जुड़ चुके हैं। वो इसीलिए है जब असली धर्म आता है जिंदगी में हां कृष्ण वाला धर्म बाबा जी वाला धर्म नहीं भगवत गीता वाला धर्म जब असली धर्म जिंदगी में आता है तो बहुत सारे समझ लो कि फल फूल लगते हैं। असली धर्म ऐसा है जैसे जड़ फिर बहुत तरीके के फल फूल लगते हैं। जिसमें से एक फल यह भी होता है कि ना आप स्वयं को देह मानते हो, ना महिला की देह को बहुत महत्व देते हो। ये एक फल है और 100 तरह के फल लगते हैं। पर वो सब के सब फल आते एक साझी जड़ से हैं जिसका नाम है अध्यात्म। और आध्यात्मिक नहीं हो आप तो ऊपर ऊपर से कितना भी दिखा दो कि हम तो ब्रह्मचारी हैं कि संयमी हैं। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कबीर साहब क्या बोला करते हैं? कामी कुत्ता तीन रोज अनतर रहे उदास। कामी नर कुत्ता सदा छह ऋतु 12 मास। हम भी जंगल से ही आए हैं। कोई पशु पक्षी उतना कामी नहीं होता जितना मनुष्य है। कुत्ता भी कुछ समय के लिए काम वासना में पड़ता है। बाकी समय उसे फर्क नहीं पड़ता। पर आदमी अकेला है जो 12 मास सेक्स में डूबा रहता है। क्योंकि आदमी अकेला है जिसने सेक्स को दबाया है, दमन करा है, सप्रेस करा है और क्योंकि तुमने उसका इतना सप्रेशन करा है इसीलिए वो उछल करके तुम्हारे पूरे जीवन पर छा गया है। मनोविज्ञान की पिछली शताब्दी की यह बड़ी क्रांतिकारी खोज थी। फ्रायड से शुरू हुई थी। फ्राइड से पहले जो लोक धर्म चलता था खासकर जो यूरोप में चलता था उसमें दमन का बड़ा महत्व था कि नो नो नो नो बैड थॉट्स गंदे विचार मत आने देना गंदे विचार मत आने देना वहां पर भी जो चर्च था पादरी प्रीस्ट ये सब ऐसे ही कहा करें नहीं बैड थॉट्स अवॉइड बैड थॉट्स अवॉइड बैड थॉट्स तो बैड थॉट से क्या करना है बैड थॉट आए तो बोलो दबा दो रॉयड ने कहा जिस चीज को दबाते हो वो 100 गुना बढ़ जाती है जिस चीज को दबाते ते हो 100 गुना बढ़ जाती है। मत दबाओ। मत दबाओ। हां। इतना कर दो कि उसको कभी एक नंबर का स्थान नहीं देंगे। जीवन में जो कुछ भी है सब नंबर दो तीन चार पांच से शुरू होगा। एक नंबर का स्थान तो उसको ही देंगे जिसको वेदांत सत्य बोलता है। सत्य आत्मा ब्रह्म जो भी बोल लो। तुम्हारे लिए उसका जो भी अर्थ होता हो। सच्चाई मुक्ति आनंद जो भी कहना चाहो पहले नंबर की जगह उसको दे देंगे। बाकी पीछे अपना पूंछ की तरह लगे रहेंगे। में फर्क नहीं पड़ता। दबाने से तो मामला और बिगड़ना ही बिगड़ना है। हम अब आप कह दे नहीं कई ऐसे होते हैं। वो सिनेमा हॉल में उनके बगल में अच्छा क्या हो गया? पिक्चर देखने गया था। पूछ रहा हूं क्या कहानी थी? बता काहे नहीं रहा है? बोल रहा बगल में एक हॉट लड़की बैठ गई थी। बोले एक पिक्चर वहां चल रही थी स्क्रीन पे। एक यहां चल रही थी। और ऊपर से एक दो बार कोहनी छू गई। बोले ऐसा झटका लगा। 440 वोल्ट। यह दिखा ऐसे रहे हैं जैसे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर इनके दिमाग में लगातार यही यही चल रहा है। लड़की लड़की लड़की देह दे देह दे देह सेक्स। जिस चीज का दमन करोगे वो जीवन पे छा जाएगी। दमन की जरूरत नहीं है। समझने की जरूरत है। दबाओ नहीं समझो। जानो जानो। उसी जानने का नाम वेदांत है। जानना है मुझे। बोधो अहम बोध ही मैं हूं। ना सिर्फ मेरा स्वभाव है बोध। मैं बोध मात्र हूं। बोधोम मैं जानूंगा। मैं दबाऊंगा नहीं मैं जानूंगा। उसके बाद जो होना होगा अपने आप होगा। और जानने से यह पता चलता है कि जिसको पहला स्थान देना है वह कौन है। मैंने अभी कहा था कि उसको ब्रह्म भी कहा जाता है। तो जानने से जब आप जान जाते हो कि पहला स्थान किसका है? तो उसको कहते हैं वास्तविक ब्रह्मचर्य। एक प्रकार के आचरण को ब्रह्मचर्य नहीं कहा जाता कि सदाचारी बनो, अच्छे-अच्छे काम करो। ये सब दो कौड़ी की बातें हैं और इनसे बहुत दुख पैदा होता है।

Testimonial

एक महिला ने आचार्य प्रशांत के विचारों से सहमति व्यक्त की और कहा कि काले कपड़े पहनने वाले समुदाय को निशाना बनाने का उनका इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में भी ऐसे लोग हैं जो पूरे साड़ी में ढके रहते हैं और उनकी भी वैसी ही मानसिकता होती है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि वह डांटने में भेदभाव नहीं करेंगे और जब उन्हें बाबा जी को और हिंदू धर्म में बुराइयां दिखती हैं तो उन्हें बोलने का हक है, तो अगर उनके श्रोताओं में दूसरे समुदायों से भी लोग बैठे हैं तो उन्हें डांटने का भी हक है। देवदत्ता नामक एक व्यक्ति ने कहा कि वह आचार्य जी को ढाई साल से सुन रहा है और उन्हें सुनने के बाद उसने बहुत सारी आदतें छोड़ीं, उसे स्पष्टता आई, डर कम हुआ और सीखने की चाहत फिर से आई।

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Transcript

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0:00 [संगीत] जो लड़कियों से जितनी ज्यादा दूरी बनाए या बनाने को कहे वो उतना ज्यादा वासना का शिकार आदमी है। पिछले 10 वर्षों से मैं देश के अलग-अलग क्षेत्रों में यात्रा कर रहा हूं। जिसमें मैं महावारी स्वच्छता प्रोग्राम को ले काम करता हूं। मेंस्ट्रेशन हजीन को लेके ये जो सामाजिक एक कलंक है मेंस्ट्रेशन हजीन पर बातचीत करना यह केवल गांव या कुछ पिछड़े इलाकों तक ही सीमित है। कुछ सॉल्यूशन है इसका। क्या हम इस सामाजिक कलंक से दूर जा पाएंगे? मेंुअल साइकिल इतना बड़ा मुद्दा क्यों है? क्योंकि वो सेक्स से संबंधित है और लोक धर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। तो इसलिए फिर तुमने 100 तरह की वर्जनाएं रखी कि अभी अगर साइकिल चल रहा है तो किचन में नहीं जाओगी। अचार नहीं छुओगी। मंदिर में भी नहीं जाओगी। इंफेक्शंस होते हैं क्योंकि इस बात

0:47 को लेकर के अवेयरनेस नहीं है। उस इंफेक्शन से ना जाने कितनी महिलाएं बीमार पड़ती हैं, मरती भी हैं। 50% हैं दुनिया की आबादी की महिलाएं और उनके शरीर की एक महत्वपूर्ण यह क्रिया होती है। तुम इसकी बात क्यों नहीं करना चाहते हो? तुम पहले यह बताओ, तुम पागल हो क्या? अगर हम सचमुच धार्मिक होते, तो सेक्स से हारे नहीं होते। पर हम हारे हुए लोग हैं और अपनी उस हार को छुपाने के लिए हम ब्रह्मचर्य वगैरह की बात करते हैं। आपको इतना क्या डर लगता है लड़की की देह से कि पूरा ढके दे रहे हो उसको? आज से 20 साल पहले जितनी महिलाएं घर से बाहर निकल कर के काम कर रही थी आज उससे कम महिलाएं बाहर निकल कर के काम कर रही हैं। बताइए क्यों? अच्छी-अच्छी डिग्रियां लेकर भी लड़कियां नौकरियां नहीं कर रही हैं। बताइए क्यों?

1:32 प्रणाम आचार्य जी। आपके चिर परिचित अंदाज को दर्शन देने के लिए भोपाल में बहुत-बहुत धन्यवाद। जो आपके प्रश्नों के उत्तर होते हैं, उसी शैली और उसी अंदाज से प्रेरित होकर मेरा यह प्रश्न था। पिछले 10 वर्षों से मैं देश के अलग-अलग क्षेत्रों में यात्रा कर रहा हूं। जिसमें मैं महावारी स्वच्छता प्रोग्राम को ले काम करता हूं। मेंसुरेशन हजीन को लेके जिसमें मैं अवेयरनेस कैंपेन करता हूं। एक लोकोस्ट सेनेरी नैपकिन मेकिंग मशीन हमने बनाई है। उसका इंस्टॉलेशन करते हैं, ट्रेनिंग करते हैं। शुरुआत में जब मैं काम करता था तो मुझे यह महसूस होता था कि यह जो सोशल एक टैबू है, ये जो सामाजिक एक कलंक है, मेंस्ट्रेशन हजीन पर बातचीत करना यह केवल गांव या कुछ पिछड़े इलाकों तक ही सीमित है। जब मैं शहरों में गया, महानगरों में

2:19 गया, विदेशों की भी यात्रा की है कुछ जगह इसी काम को लेके तो लगा यह लगभग कॉमन है। हर जगह वही स्थिति है लगभग इस पर बातचीत नहीं होती है। तो मैं पूछना चाह रहा था कि क्या आपकी फिलॉसफी के हिसाब से, अपनी एजुकेशन सिस्टम के हिसाब से कुछ सॉल्यूशन है इसका? क्या हम इस सामाजिक कल से दूर जा पाएंगे? जो कि सदियों से चला आ रहा है और कितने वर्ष लगभग लगेंगे या कितने दशक तक हमें इंतजार करना पड़ेगा कि हम कभी मेंसुरेशन हजीन को लेके नॉर्मल हो पाएंगे। थैंक यू। ठीक है। बैठिए। मेंस्ट्रुएशन को लेकर के

3:09 जो बड़ा हव है उसको जो एक टेबू की तरह हम देखते हैं उसका कारण यह नहीं है कि हम मेंस्टुएशन को लेकर के अनकंफर्टेबल रहते हैं। उसका कारण यह नहीं है कि हमें अजीब लगता है, असंगत लगता है कि यह मेंसुरेशन क्या चीज होती है। उसका कारण थोड़ा उससे आगे का है। एक कदम हम सेक्स को लेकर ही अभी तक सहज नहीं हो

3:55 पाए हैं। हमारी असहजता मेंस्टुएशन मासिक चक्र से नहीं है उतनी। हमारी असहजता सीधे-सीधे सेक्स से है। और उसके पीछे बड़ा गहरा कारण है जो अगर हम समझेंगे तो जीवन को ही समग्रता से समझने में मदद मिलेगी। देखिए इंसान है तो जंगल से निकला हुआ जानवर ही और जानवरों की सारी प्रकृति उसमें बैठी हुई है। बस जानवरों के पास जो कुछ है उससे थोड़ा अतिरिक्त है मनुष्य के पास।

4:42 लेकिन मनुष्य वह सब भी लेकर चल रहा है जो जानवरों के पास है। थोड़ा सा अतिरिक्त क्या है हमारे पास? चेतना। हम सोच समझ सकते हैं। हम स्वयं को देख सकते हैं। अपनी हालत का अवलोकन कर सकते हैं। जो कि पशु नहीं कर सकते। पशुओं के पास बस वृत्तियां होती हैं और वृत्त जनित कामनाएं होती हैं। मनुष्य के पास चेतना भी होती है। इतना ही सा अंतर है। तो मनुष्य वह है जो खुद को देख पाए। मनुष्य वह है जो अपने बंधनों को पहचान पाए और उनसे लड़ पाए। है ना? और इसी चीज को वास्तव में धर्म कहा जाता है।

5:28 खुद को जान समझ पाना, अपने बंधनों को देख पाना और उनसे लड़ पाना। अब जब बंधनों की बात आती है तो जो सबसे बड़ा बंधन है हमारा वह हमारी पाश्विक प्रवृत्ति है। पाश्विक प्रवृत्ति क्योंकि जंगल से ही आए हैं तो पशुओं वाली जो प्रवृत्तियां है वो तो हमें मौजूद ही है। और पाश्विक प्रवृत्ति में भी जो सबसे ज्यादा बल रखती है जो एकदम प्रचंड आग की तरह होती है वह होती है कामवासना और पशु में भी वह उतना ही बल रखती है वो प्रकृति की सबसे चहेती वृत्ति है क्योंकि उसी से प्रकृति

6:14 का चक्र आगे बढ़ता है। कोई जीव हो उसमें और कोई वृत्ति हो ना हो काम वासना जरूर होती है क्योंकि काम वासना नहीं रहेगी तो प्रकृति जो चाहती है कि तुम्हारा काम समय में आगे बढ़ता रहे तुम मर जाओगे अगली पीढ़ी आती रहे वो काम होगा नहीं ना बाकी सब वृत्तियों पर वासना भारी पड़ जाती है ऋषि भ्रत प्रहरी थे एक जगह पर वह कहते हैं कि एक कुत्ता देखो उदाहरण के तौर पर कहते हैं कुत्ता देखो वो बिल्कुल सूख करके दो हड्डी हो चुका है और 10 जगह उसके घाव है और वो लंगड़ा

7:02 लंगड़ा के चल रहा है और उसके घाव से मवाद बह रहा है खून बह रहा है लेकिन फिर भी वो वासना से ही आतुर है जा वो किसी कुतिया के पीछे ही रहा है। थोड़ी देर में वहां तक जाके हो सकता है वो मर भी जाए। पर उसे अपनी जिंदगी की अपने खानेपीने की भी उतनी परवाह नहीं है जितनी उसको वासना चाहिए। तो अब इंसान बनना है तो इंसान बनना है तो भाई स्वयं को जीतना पड़ेगा। अपने बंधन तोड़ने पड़ेंगे। और बंधनों में बंधन माने यही कि जिधर शरीर ने नचाया उधर को नाच दिए और बंधनों में एक बड़ा बंधन होता है

7:50 कामवासना तो कायदे से धर्म ऐसा होना चाहिए था जो आपको कुछ ऐसा देता कि उसके आगे वासना छोटी चीज पड़ जाती धर्म का यह काम होना चाहिए था कि धर्म ने आपको कुछ ऐसा दिखा खा दिया कुछ ऐसा समझा दिया कि उससे वासना मिट तो नहीं गई लेकिन नंबर दो की चीज हो गई। नंबर एक पर कोई और आ गया। यह धर्म की सफलता होती और वास्तविक धर्म का यही उद्देश्य होता है। वो यह नहीं कहता कि प्रकृति की जो तुम्हारी क्रियाएं हैं वह सब बंद कर दो। वो कहता है वह सब चलती रहेंगी अपनी जगह। लेकिन मैं उन सबको किसी और चीज का अनुगामी

8:37 बना दूंगा। मैं तुम्हें कुछ ऐसा दे दूंगा बाकी सब चीजें जिसके पीछे पीछे चलने लगे बाकी सब चीजें भी चलती रहेंगी लेकिन वो अब आगेआगे नहीं चलेंगी वो पीछे पीछे चलेंगी यह असली धर्म का काम होता है तो धर्म का काम तो यह था कि वो आपको नंबर एक वाली चीज दे दे और असली धर्म जहां कहीं भी वो पनपा उसने वो चीज दी भी और सबसे सशक्त रूप में तो भारत ने ने दी। उसने वो चीज दी है। निसंदेह दी है। षड दर्शन है। आप वहां पर जाएं। आप वेदांत के पास जाएं, उपनिषदों के पास जाएं। आप पष्टावक्र के पास जाएं, आप भगवत गीता

9:23 के पास जाएं। वहां आपको वो मिलता है जो जीवन में प्रथम स्थान का अधिकारी है। वो नंबर एक की जो चीज है ना वह वहां मिल जाती है। तो असली धर्म वह चीज देता है जिसके बाद आप अपने पार्श्विक बंधनों से आजाद हो सकते हैं। वह असली धर्म देता है। पर असली धर्म को हमने बड़ा मिश्रित कर दिया। खूब उसमें गोलमाल, घपला मिलावट कर दी। तो उससे बन गया लोक धर्म। लोक धर्म माने वह धर्म जिसका आम आदमी पालन करता है। आम आदमी कहता है अपने आप को भले धार्मिक हो पर वह पालन लोक धर्म का करता है। असली धर्म से वो कोसों दूर है।

10:09 अब आप लोक धर्म का भले पालन कर रहे हो लेकिन आप उसको बोल क्या रहे हो? यही तो बोल रहे हो मैं धार्मिक हूं। अब अगर आप धार्मिक हो तो धार्मिकता की तो पहचान यह है कि आपने अपने बंधन तोड़े होंगे। आप मेरे साथ-साथ चल रहे हैं। आप पालन कर रहे हो लोक धर्म का। लेकिन आपका दावा तो यही है ना झूठा दावा। क्या कि हम धार्मिक हैं। आप कोई भी व्यक्ति अपने आप को लोक धार्मिक थोड़ी बोलता है। वो क्या बोलता है? मैं एक धार्मिक इंसान हूं। मैं आस्तिक हूं भाई। मैं आस्तिक हूं। कोई यह नहीं बोलता कि मैं लोक आस्तिक हूं। मेरी आस्तिकता भी बहुत सामाजिक किस्म की है। मैं लोक धार्मिक हूं। अच्छा ठीक है आप हो तो लोग धार्मिक पर अपने आपको आपने यहां पर लेबल क्या लगा दिया है धार्मिक अब अगर

10:56 धार्मिक हो तो पहचान इससे होगी कि धार्मिक आदमी तो अपनी पार्श्विकता को लगातार चुनौती देता चलता है धार्मिक आदमी की पहचान ही यही है कि वो अपनी पाश्विकता को लगातार जीतता चलता है। पाश्विकता समझ रहे हो जो भीतर एनिमल नेचर बैठा हुआ है। जो भीतर एनिमल नेचर बैठा हुआ है। धार्मिक आदमी की पहचान यह है कि उसको जीतता चलता है। हम वह विजय रहता है। वह योद्धा है। वह संघर्ष करता है और कम से कम भीतर तो लगातार जीतता है। यही धार्मिकता है। लेकिन अब हम असली धार्मिक है या नहीं। हम क्या हैं? लोक धार्मिक। लोक धार्मिक हो पर दिखाना तो यही पड़ेगा कि तुम भी जीत रहे हो। नहीं तो पोल खुल जाएगी। पोल खुल जाएगी ना। लोक धार्मिक हो पर

11:44 प्रदर्शित तो यही कर रहे हो कि धार्मिक हो। तो धार्मिकता के लक्षण भी दिखाने पड़ेंगे। भले ही नकली लक्षण और धार्मिकता का बड़े से बड़ा लक्षण यह होता है कि वृत्तियां अपने ऊपर हावी नहीं होती। तो लोक धार्मिक आदमी फिर यह प्रदर्शित करता है कि सेक्स उसके लिए छोटी चीज है। धार्मिक आदमी के लिए सेक्स और दैहिक क्रियाएं जिनमें मासिक धर्म भी शामिल है। वास्तविक धार्मिक आदमी के लिए सेक्स और शरीर से संबंधित बाकी बातें सचमुच छोटी हो जाती हैं। छोटी माने मूल्य में छोटी स्थान में छोटी। धार्मिक आदमी के लिए वह सारी चीजें सचमुच छोटी हो जाती हैं। लोक धार्मिक आदमी के लिए छोटी बिल्कुल हुई नहीं है। पर उसको जताना है, दिखाना है

12:30 जैसे छोटी हो गई है। एज इफ दोज़ थिंग्स हैव बिकम इमटेरियल और इनकॉन्सिक्वशियल। वो अभी छोटी हुई है नहीं। पर उसको ऐसे दिखाना है। झूठ-मूठ नाटक फरेब। तो धार्मिक आदमी की पहचान ये होगी कि वो सेक्स के मुद्दे को बहुत सहजता से लेगा। उसके लिए हवा नहीं है। उसके लिए बड़ी बात नहीं है। क्यों? क्योंकि उसको वो मिल गया है। जो जो सबसे ऊंची चीज है। अब उसके आगे सेक्स वैसे ही कुछ नहीं है। ₹2 की बात है। है तो है नहीं है तो नहीं है। उसकी उपस्थिति बहुत मायने नहीं रखती। उसकी अनुपस्थिति भी बहुत मायने नहीं रखती है।

13:16 यह धार्मिक आदमी की पहचान है। पर जो लोक धार्मिक आदमी होगा उसके भीतर तो जानवर अभी गुर्रा ही रहा है, भौक ही रहा है। भीतर जानवर गुर्रा रहा है और ऊपर ऊपर वो क्या बन के बैठा है? धार्मिक। तो फिर वो सेक्स का दमन करता है। वो फिर सेक्सुअलिटी से डरना शुरू कर देता है। क्योंकि भीतर तो उसके सेक्सुअल जानवर हावी होकर बैठा ही हुआ है। पर ऊपर ऊपर से उसको बनना क्या है? धार्मिक मैं तो साहब देह को जीता हुआ आदमी हूं पर भीतर देह भौक रही है। भीतर जानवर गुर्रा रहा है तो वो ऊपर ऊपर से सेक्स का ही दमन करता है। वो सेक्स को सप्रेस करता है। अब बाकी बातें तो सप्रेस कर भी दो। किसी को पता ना लगे।

14:03 पर जो हमारी प्रजाति है और प्रजाति हमारी जो महिलाएं हैं उनके शरीर से एक चीज ऐसी जुड़ी हुई है हर महीने की जिसको तुम छुपा नहीं सकते। तो उस चीज को लेकर के जो लोक धार्मिक रहे हैं सदा से शताब्दियों से उनको बड़ी असुविधा रही है। वो बहुत परेशान रहे हैं। बड़े असहज रहे हैं। बोल रहे हम तो इस सेक्स के मुद्दे को आंख के सामने ले आना चाहते थे क्योंकि आंख के सामने आता है तो हमारी पोल खुल जाती है। बाबा लोगों को देखते नहीं हो। वो अब कहेंगे कुछ भी कर लेना मतलब महिलाएं आएंगी। हमें छूना मत। हमें छूना मत। हमें छूना मत। काहे क्या हो जाएगा? विस्फोट हो जाएगा। क्या हो जाएगा? महिला छू लेगी तो क्या हो जाएगा?

14:48 क्योंकि उनके लिए महिला बहुत बड़ा मुद्दा है अभी। और जो वास्तविक धार्म धार्मिक आदमी है वो कहेगा खाली तो है। स्त्री की है, पुरुष की है, खाली तो है, हाथी ही तो है। स्पर्श कर लिया तो क्या हो गया? कुछ नहीं हो गया। इसमें ऐसी क्या बड़ी बात है कि मैं बोलूं छूना मत, छूना मत। उज्जैन कहानी है आप में से कई लोगों ने पहले भी सुनी होगी कि गुरु था वह धार्मिक था चेला कच्चा था अभी अनाड़ी तो उस गुरु की नकल करे वो लोक धार्मिक चेला उसके भीतर धर्म नहीं है असली पर उसको प्रदर्शित ऐसे करना है कि मैं भी धार्मिक हूं तो गुरु चेला चले जा रहे हैं गुरु चेला दोनों चले जा रहे हैं तो एक खूबसूरत जवान लड़की उनको मिली वो उसी रास्ते पर थक के कहीं किनारे बैठ गई थी उसके चोटवोट भी लग गई थी पांव में

15:34 और सामने नदी वगैरह रही होगी कुछ कुछ मान लो मतलब वैसे ही जो मूल बात है वह समझो तो उसके चोट लगी हुई है और हमने मान लिया नदी है कुछ है तो वहां पड़ी हुई है और एकदम आकर्षक है तो गुरु ने उसको देखा बोल क्या है यहां क्यों बैठी है बोली वहीं जाना है जिधर को आप जा रहे हैं लेकिन थक भी गई है और ये खून बह रहा है हम मासिक धर्म की बात कर रहे हैं ठीक तो वो गुरु बोलता है अच्छा तेरे खून बह रहा है तू चल नहीं सकती तुझे जाना भी है तो उसने उसको उठा लिया कंधे पे ही बैठा लिया और पीछे चेले के भीतर से कुत्ते भौंकने लगे बोला गुरु जी छान गए मलाई आज

16:23 [प्रशंसा] और गुरु ने उसको ऐसे सहजता से बैठा लिया है और अपना चलते आ रहे हैं चलते जा रहे हैं नदी वदी आई होगी जो भी पार करा दिया उसको जहां जाना उतार दिया अपना चलते गए। अब वो चलते जा रहे हैं। दो घंटा तीन घंटा बीत गया। काफी समय बीत गया। गुरु जी अपना सहज चलते जा रहे हैं। चेले के भीतर खलबली मची हुई है। उथलपुथल वो पगलाया जा रहा है। उसे चला भी ना जाए इधर-उधर गिरे कुछ करे। तो गुरु ने कहा कि क्या क्या समस्या है? कुछ अजीब लग रहा है। बोला हमें समझ में नहीं आ रहा है आप इतने बड़े गुरु हैं और आपके भीतर इतना आत्मसंयम नहीं है। खूबसूरत लड़की दिखी और आपने सीधे उसको शरीर से अपने लगा लिया। तो गुरु बोलते हैं मैंने तो उसे कबका उतार

17:09 दिया। पर तुम उसे अभी भी ढो रहे हो। वास्तविक धर्म के लिए यह सब चीजें बहुत महत्व नहीं रखती हैं। सेक्स वगैरह पर नारी को स्पर्श ना कर देना। पर पुरुष की छाया से भी दूर रहना। वास्तविक धर्म में इन चीजों के लिए कोई स्थान नहीं है। पर लोक धर्म माने यही सब कुछ। यही सब कुछ सबसे बड़ी बात लोकधर्म में क्या है? सेक्स। सेक्स और सबसे पवित्र आत्मा कौन है जो कभी सेक्स ना करता हो। तो बाबा जी के पास जाओगे वो बस एक ही चीज बार-बार बोलेंगे बेटा ब्रह्मचर्य धारण करो और वीर्य रक्षा करो। अरे भाई बहुत चीजें हैं

17:58 रक्षा करने के वनों की रक्षा करनी है। नदियों की रक्षा करनी है। पेड़ पौषों की रक्षा करनी है। समाज के दुर्बल वर्ग हैं। सताए हुए वर्ग हैं। मुझे उनकी रक्षा करनी है। और बाबा जी कह रहे हैं नहीं तुम बस नाड़ा बांधो वीर की रक्षा करो। क्योंकि लोक धर्म के लिए बहुत बड़ी बात होती है। वो बहुत परेशान हो जाते हैं। औरत दिखी नहीं कि पगला जाते हैं बिल्कुल। तो इसीलिए वो कहते हैं स्त्री की छाया से भी दूर रहो। सुना होगा स्त्री नर्क का द्वार है। यह बात सब समझ में आ रही है ना? कोई असली आदमी कभी क्यों कहेगा कि स्त्री नर्क का द्वार है? यह जरूर एक ऐसा आदमी है जिसके भीतर वासना उबल रही है। लेकिन इसको दिखाना यह है कि मैं तो शांत संयमित आदमी हूं। तो यह एक तरीका निकालता है कि कम से

18:45 कम सबके सामने पब्लिक में मैं स्त्री का ना तो वर्णन करूंगा ना कोई उसका स्पर्श करूंगा ना उससे बात करूंगा। यह वो तरीके निकालता है। हां, अपने एकांत में फिर वह क्या करता है वह अलग बात है। वो बिल्कुल दूसरा मुद्दा है। समझ में आ रही है बात? ये अब दिखाई पड़ रहा है कि में्रुअल साइकिल इतना बड़ा मुद्दा क्यों है? क्योंकि वो सेक्स से संबंधित है और लोक धर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। सबके पसीने छूट जाते हैं। हम बोलते हैं वो फलानी फिल्म है। उसे आप फैमिली के साथ बैठ के देख सकते हैं। अच्छा। तो जरूर उसमें कोई बहुत ऊंचे सामाजिक मुद्दे पर बात हुई होगी। जरूर उसमें कोई

19:31 बहुत क्रांतिकारी बात की गई होगी। जरूर उसमें कुछ ऐसा होगा कि जितने लोग हैं परिवार के सब एक दूसरे से बात करें और कह देखो यह बात करने से हमारे तुम्हारे जीवन में प्रकाश आता है। नहीं फैमिली के साथ बैठ के देख सकते हैं। मतलब बस एक होता है कि उसमें आगे पीछे कहीं भी कोई शरीर की देह की सेक्स इत्यादि की बात नहीं है। यह हमारा लोक धर्म है जिसमें कि पायसनेस का, वर्च्यू का, पुण्य का सबसे बड़ा पैमाना यही है कि तुमने अपने जीवन में देह का विशेषकर सेक्स का दमन कितना करा है। बात आ रही है समझ में? तो इसलिए फिर तुमने 100 तरह की वर्जनाएं रखी कि अभी अगर साइकिल चल रहा है तो किचन में नहीं जाओगी।

20:19 अचार नहीं छुओगी। मंदिर में भी नहीं जाओगी। अभी नहीं नहीं नहीं वो मेंसुरेटिंग वूमन है। वो यह नहीं करेगी वह नहीं करेगी। कितनी महिलाएं मर जाती हैं क्योंकि सेक्स इतना बड़ा जबरदस्त मुद्दा है कि उनको बीमारियां होती हैं तो डॉक्टर को जाकर बता नहीं सकती हैं। में्रुअल हाइजीन को लेकर के प्रश्न था। इंफेक्शंस होते हैं क्योंकि इस बात को लेकर के अवेयरनेस नहीं है। उस इनफेक्शन से ना जाने कितनी महिलाएं बीमार पड़ती हैं, मरती भी हैं। जबकि यह एक बहुत सीधी सहज सी बात है जिसकी चर्चा करने में किसी को कोई आपत्ति होनी नहीं चाहिए। आपत्ति तो यह होनी चाहिए कि दो ही लिंग होते हैं और 50% है दुनिया की

21:08 आबादी की महिलाएं और उनके शरीर की एक महत्वपूर्ण ये क्रिया होती है। तुम इसकी बात क्यों नहीं करना चाहते हो? तुम पहले यह बताओ तुम पागल हो क्या? तुम हर चीज की बात कर रहे हो। तुम इस चीज की बात नहीं कर रहे हो। ये दुनिया की आधी आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। तुम दुनिया की आधी आबादी की उपेक्षा करके और बातों की बात करना चाहते हो। मैं क्यों करूं दूसरी बातें? तुम यह बात करो। पर आप जाइए और बाबा जी की शक्ल देखिए। आप बाबा जी से बस ये पूछ लीजिए। बाबा जी मेरा मासिक चक्र ना अनियमित चल रहा है। और फिर बाबा जी की शक्ल देखिएगा। ये बाबा जी मुझे तनाव बहुत रहता है और उस कारण मेरी रिप्रोडक्टिव लाइफ सफर कर रही है। बाबा जी की शक्ल देखिएगा और वही चीज जो उधर से चलती है वो घर-घर

21:54 में आकर के हर घर की संस्कृति बन जाती है। और ये अच्छे से समझ लो। एक सीधी सहज साधारण चीज को जितना दबाओगे ना उसे अपने लिए उतना बड़ा बना लोगे जबकि उसमें दबाने जैसा कुछ है नहीं। उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि उसको कहो कि लेट मी स्वीप इट अंडर द कारपेट छुपा दो। अरे रे रे रे ये कैसी बात कर दी? ये बात क्यों कर रहे हो? तो गंदी बातें होती हैं। गंदी बात क्या होती है? शरीर है। मिट्टी से शरीर उठता है। मिट्टी में मिल जाता है। मिट्टी है। उसमें माने गंदी बात क्या होती है? आप टट्टी पेशाब की भी बात कर सकते हो। पर रक्त की बात नहीं कर सकते। क्या है इसमें? गंदा

22:39 क्या है? और वो गंदा है तो फिर गर्भाशय ही गंदा है। और गर्भाशय गंदा है तो दुनिया की सारी आबादी गंदी है। एक-एक इंसान वहीं से आ रहा है। तो गंदा क्या है? पर जो उसका मनोवैज्ञानिक कारण समझ में आ रहा है ना वी आर हाईली अनकंफर्टेबल वि सेक्स इटसेल्फ व्हाई बिकॉज़ सेक्स हैज़ कास्टेंटली डिफिटेड अस और हम अपनी उस हार को छुपाना चाहते हैं। अगर हम सचमुच धार्मिक होते तो सेक्स से हारे नहीं होते। पर हम हारे हुए लोग हैं। और अपनी उस हार को छुपाने के लिए हम ब्रह्मचर्य वगैरह की बात करते हैं। हरे हुए आदमी हो।

23:30 आ रही है बात समझ में? जिन लोगों को देखो उदाहरण के लिए कॉलेज में भी ऐसे होते हैं कैंपसेस में भोपाल में थोड़े ज्यादा ही होंगे। कि लड़कियों से बात ज्यादा नहीं करते हैं। और कहते हैं जो लड़के लड़कियों से बात कर रहे हैं ना ये तो ये जिनको देखो कि वो दूरी वगैरह बना करके रखते हैं। और कहते हैं नहीं नहीं हम संस्कारी बालक हैं। हम थोड़ी घुलेंगे मिलेंगे लड़कियों से। उनको अपनी बैचमेट नहीं दिखाई देती। उनको अपनी कलीग नहीं दिखाई देती। उनको बस एक लड़की दिखाई दे रही है। वो एक लड़की है। उसकी देह है लड़की। जिनको देखोगे ऐसे हैं। यह लड़कियां हैं। इनसे हमारी ज्यादा बातचीत नहीं है। इन्हीं को जान लेना क्या कि इनके भीतर कुत्ते

24:16 भौकते हैं। [संगीत] जो लड़कियों से जितनी ज्यादा दूरी बनाए या बनाने को कहे वह उतना ज्यादा वासना का शिकार आदमी है। धर्म तो आपको सहज बना देता है। धर्म को क्या मतलब कि शरीर में क्या हो रहा है? क्या नहीं हो रहा है? हो रहा होगा कुछ भाई। जीवन की बातें हैं। प्रकृति के खेल हैं। बहुत कुछ होता रहता है। इसमें इतना हवा क्या है? इसमें ऐसी क्या बात है? एक और कहानी है। मैंने भी कई बार कही है।

25:01 आपने भी सुनी होगी। अब पता नहीं यह हुआ था कि नहीं हुआ था यह सब लेकिन बोध कथाएं हैं कथा कथा कथा माने जो कथन के तौर पर अब चली आ रही है कि बुद्ध कहीं पर बैठे हुए थे बुद्ध कहीं पर बैठे हुए थे जंगल में और जंगल ऐसी जगह होती है जहां पर ऋषि भी पाए जाते हैं और चोर डाकू लुटेरे भी खूब तो चारप थे वह कहीं से किसी लड़की को उठा लाए थे अपहरण वगैरह कुछ किया होगा और लड़की उनसे किसी तरह जान छुड़ाकर कर भागी और बुद्ध बैठे थे वो भाग गई उनके सामने से और लड़की को उठा के लाए थे आकर्षक रही होगी रूप रंग यौवन जो भाग गई उसके कुछ देर बाद यह सब आए और

25:47 बुद्ध से कह रहे हैं कि बताओ लड़की कहां छुपाई है वो बुद्ध बोले मैं यहां बैठा हुआ हूं बस मैं नहीं जानता बोले अच्छा यह तो बताओ कि यहां से कोई लड़की भागी थी। तो जो उनका जवाब बताया जाता है वो समझिएगा। वो बोले हां कोई भागा था। कोई भागा था। अब लड़की थी कि लड़का था जवान था कि बूढ़ा था यह हमें पता नहीं चलता। इस पे हमारी नजर नहीं है। हमारे लिए एक है। एक सहजता की स्थिति है यह। वो लड़की भाग रही है। उसके कपड़े भी अस्त-व्यस्त रहे होंगे।

26:36 है तो है प्रकृति की बात है। भाई इसमें क्या कहें कि कोई बहुत भारी चीज हो गई। लेकिन जितनी वासना भीतर होती है स्त्री का शरीर आपके लिए उतनी भारी चीज हो जाती है। फिर आप कहते हो ढक के रखो, ढक के रखो। कहते हो संस्कार की बात है ढक के रखो। और कुछ संस्कृतियों में तो पूरा ऊपर से नीचे तक ढक देते हैं काला। ढक के रखो। यह वासना का सबूत है। यह वासना का सबूत है। आपको इतना क्या डर लगता है लड़की की देह से कि पूरा ढके दे रहे हो उसको। तुम तो बड़े कमजोर आदमी हो यार। कहते कुछ नहीं दिखना चाहिए। एकदम जरा भी कुछ नहीं दिखना चाहिए। कुछ दिख जाएगा तो हम गिर जाएंगे।

27:23 तुम गिर जाओगे क्या? तुम पहले ही झड़े हुए आदमी हो। माएं बेटियों को ऐसे जा रही है तू तेरा देख तेरी तेरी पीठ दिख गई तेरी तो पीठ ही तो है सबके होती है आपकी नहीं है कोई बिरली चीज मिली है मुझे पीठ पीठ में क्या होता है पीठ तो कुछ नहीं गधे की भी पीठ होती है फलानी बदन दिखाती घूमती ये गंदे चरित्र की है। अच्छा तो तुमने कपड़ों से उसका चरित्र भी निकाल लिया। बहुत बढ़िया। मैं पहुंच रहा हूं आप तक या

28:10 दूर की या बहुत इधर-उधर की बात कर रहा हूं आपसे। वास्तविक धर्म ना सेक्स को प्रोत्साहित करता है और ना ही उसे बुरा बताता है। कहता है यह ना अच्छी चीज है ना बुरी चीज है। यह तो बस छोटी चीज है। यह इतनी बड़ी चीज नहीं है कि इस पर इतना विचार करो और इतने पहरे लगाओ और इतनी वर्जनाएं और इतने नियम कायदे इतनी कहानियां छोटी चीज है। फिर कह रहा हूं ना अच्छी चीज है ना बुरी चीज है। छोटी चीज है। वो इतनी बड़ी चीज है ही नहीं कि उसके बारे में लगातार सोचते रहो। जिंदगी उसके पीछे लगा

28:56 दो। कह दो कि यही पाना है। मेरी जिंदगी का तो उद्देश्य है फलाने का हुस्न हासिल करना। बहुत छोटी चीज के पीछे तुम जिंदगी लगा रहे हो। किसी की देह को हासिल करने के लिए तुम मरे जा रहे हो। तो तुम मरे ही हुए हो पहले से। महिलाओं पर तो जो इसका अनिष्टकारी असर पड़ा है तो पड़ा ही है। पुरुषों पर भी पड़ा है। पूरा समाज ही बीमार हो गया है। शरीर को इतना बड़ा बना लिया है कि हर आदमी हर समय बस शरीर ही शरीर के बारे में सोच रहा है। और विशेषकर महिला का शरीर

29:41 पुरुष महिला के शरीर के बारे में सोचे जा रहा है। महिला अपने शरीर के बारे में सोची जा रही है। तो लड़कियां ज्ञान, कौशल, प्रतिभा, संघर्ष इससे ज्यादा महत्व किसको देने लग जाती हैं फिर? कि मैं सुंदर दिखूं, आकर्षक दिखूं, सेक्सीी दिखूं। क्योंकि सारा महत्व ही उसके शरीर को दिया जा रहा है। वास्तविक धर्म यह नहीं होने देता है। वास्तविक धर्म कहता है कि लड़की हो कि लड़का हो, तुम इंसान हो। एक चेतना हो तुम जिसका दायित्व है और अधिकार है कि वो आसमान की ऊंचाई हासिल करे। लेकिन शरीर शरीर कर करके कर के हमने अपनी बेटियों को अपनी लड़कियों को अपनी महिलाओं

30:29 को हमने इन सबको बस मांस का पिंड बना दिया है। मांस है मांस है। और हमारी ही नजर महिलाओं ने भी हमसे उधार ले लिए। वह भी अपने आप को इसी तरह से देखने लग गई हैं कि मेरी देह कैसी है। लड़की बहुत आकर्षक ना हो और थोड़ा गाढ़े रंग वगैरह की हो जाए और थोड़ी मोटी हो जाए उसको मानसिक बीमारियां होने लग जाती हैं। उसका पूरा आत्मसम्मान गिर जाता है। वो घर में दुबक के रहने लग जाती है। वो कहती है मेरी हैसियत क्या? मेरी इज्जत क्या? और इसके विपरीत लड़की बिल्कुल ही नालायक हो। कुछ ना हो उसके पास ना बुद्धि है ना ज्ञान है ना संघर्ष है ना ईमान है कुछ

31:18 नहीं है उसके पास लेकिन अगर उसके पास आकर्षक देह है तो वो बड़े आत्मविश्वास से भरी रहती है वो कहती है बढ़िया है ना मेरे पास देह है मुझे कोई ना कोई मिल जाएगा इस देह को चाहने वाला मेरा काम चल जाएगा हमने दोनों ही वर्गों स्त्री पुरुष दोनों को ही बर्बाद कर दिया है यह बॉडी बॉडी रट रट के रट रट के रट रट के और लड़कियों का तो जो मानसिक पतन करा है उसकी तो कोई इंतहा ही नहीं। फिर हम पूछते हैं कि महिलाओं के पास उनके नाम पर इतनी कम संपत्ति क्यों होती है? फिर हम पूछते हैं उन्हें इतने कम नोबेल

32:03 प्राइज क्यों मिलते हैं? फिर हम पूछते हैं संसद में इतनी कम महिलाएं क्यों हैं? फिर हम पूछते हैं कि कॉर्पोरेट बॉडीज में स्टेक होल्डर्स के तौर पर या जो सीएक्सओ पोजीशंस होती हैं उन पर इतनी कम महिलाएं क्यों हैं? बात समझ रहे हो ना? तुमने उसके भीतर कूट-कूट करके यह भर दिया है कि यू आर अ बॉडी। तो हर समय बस वो अपनी बॉडी का ही ख्याल कर रही होती है। और ऐसे काम तो बिल्कुल भी नहीं करती जिसमें बॉडी की उपेक्षा करनी पड़े। एकदम ही गरीब हो जाए तो अलग बात है। फिर तो वह एक मजदूर भी बन लेगी। अगर पर वह गरीब नहीं हो रही है तो वह धूल और धूप से बचने की भरसक कोशिश करती है। क्योंकि कहती है अरे कुछ000 कमाने के लिए अगर मैंने धूल

32:49 धूप खा के अपना रूप रंग खराब कर लिया तो ये ज्यादा बड़ा नुकसान है। एफएलपीआर आप जानते हैं क्या होता है? फीमेल लेबर पार्टिसिपेशन रेट। पिछले 20 साल में भारत में यह गिर गया है। माने आज से 20 साल पहले जितनी महिलाएं घर से बाहर निकल कर के काम कर रही थी आज उससे कम महिलाएं बाहर निकल कर के काम कर रही हैं। बताइए क्यों? क्योंकि घर में पैसा आ गया है। 20 साल के पहले की अपेक्षा आज घर में पैसा ज्यादा है। तो पहले तो फिर भी महिला बाहर मजबूरी में निकल कर काम कर लेती थी। अब घर में पैसा आ गया है तो खुद भी ऐसा सोचती है और उसके आसपास वाले भी उसे यही बोलते हैं कि अब तू बाहर क्यों जा रही है? तू घर का ख्याल रखना और तू बाहर जाती है

33:35 काली हो जाती है। धूप में लिखना ना करो रूप की रानी गोरा रंग काला ना हो जाए। अच्छी-अच्छी डिग्रियां लेकर भी लड़कियां नौकरियां नहीं कर रही हैं। वो ट्रॉफी वाइफ बनके सजवर के बन ठन के घर में बैठना पसंद कर रही हैं। यह है वह बॉडी सेंट्रिसिटी जो पॉपुलर कल्चर ने लोक संस्कृति ने महिलाओं के मन में डाल दी है। तुम और कुछ बाद में हो फर्स्ट एंड फोरमोस्ट यू आर अ बॉडी। तो तुम्हारी सेल्फ वर्थ भी किससे जुड़ी हुई है? तुम्हारी बॉडी से। नहीं। आपकी सेल्फ वर्थ जुड़ी होती है। आपकी सत्य निष्ठा से। आपके प्रेम की गहराई

34:22 से। आपके ज्ञान से आप कितने संघर्ष जीवन में स्वीकार कर रही हैं। इससे चेहरा लीपपोत करके दूसरों को लुभाने से कोई श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता। अपने बच्चों में अब जो हुआ सो हुआ महिलाओं के साथ कम से कम अपने बच्चों में बॉडी सेंट्रिसिटी कम से कम डालिए। उसको मेकअप मत सिखाइए। मैं देख रहा हूं बहुत छोटी-छोटी लड़कियां हैं। वो लिपस्टिक लगाकर घूम रही हैं। वो नेल पेंट कर रही हैं। यह बहुत गलत कर रहे हो तुम उनके साथ।

35:08 बिल्कुल ठीक नहीं है यह। यह तो नाखून है ना। नाखून को रंगने का क्या मतलब है भाई? नाखून कोई क्यों रंग रहा है? मुझे तो आज तक नहीं समझ में आया कोई होंठ क्यों रंगता है? हंठ तो वैसे ही लाल होते हैं। उसको और रंग काहे के ले रहे हो? क्यों घिस रहे हो? और ये तो खाने की जगह है। तो या तो वो खाने की चीज होती है जो यहां लगाई है कि भीतर ही चली जाए। मतलब ऐसी जगह जहां से खाओगे, पियोगे वहां तुमने कुछ लगा लिया है। असुविधा नहीं होती। शरीर अगर स्वस्थ है तो होठ अपने आप लाल रहते हैं या जो भी उनका रंग है प्राकृतिक वैसा रहेगा। तो शरीर को स्वस्थ रखो बेहतर ये है ना जाओ दौड़ो जिमिंग करो स्पोर्ट्स करो। अपने आप शरीर बढ़िया रहेगा तो होठ भी

35:56 बढ़िया रहेंगे। बाहर से लीपापोती करके क्या मिलेगा? नहीं चम नहीं रही बात। अगर आप एक महिला हैं या आप एक अभिभावक हैं और आपके घर में बच्चा है छोटा या आपकी बहन है कोई है या आपके आसपोस में भी कोई है तो इतना करिए कि उनको उनकी देह ही मत बन जाने दीजिए। इतना उन पर एहसान कर दीजिएगा। छोटे बच्चों में अभी तो बहुत छोटी है। उसके छोटे बच्चों में लड़के और लड़की

36:41 कपड़ों में अंतर क्यों करते हो भाई? अभी तो दोनों का शरीर एक जैसा ही है ना। 8-10 साल तक एक ही जैसा रहता है। तो उनके कपड़ों में अंतर क्यों करते हो? एक से कपड़े पहनाओ। बच्ची अभी छोटी है। अभी से उसके बाल बढ़ाने क्यों शुरू कर दिए भाई? क्यों उसको जता रहे हो कि तू नारी है। नारी है। क्योंकि वो फिर वही नारी बन जाएगी जैसी हमें चारों ओर दिखाई देती है। अबला नारी। क्यों उसको नारी बनाए दे रहे हो? उसको इंसान बनाओ। नारी नहीं। अभी चार दिन पहले मैं खिलौने खरीदने गया तो उसने पूछा कितने साल का बच्चा है? मैंने उम्र बता दी। फिर मुझसे पूछ रहा है गर्ल और बॉय मैंने ऐसे देखा। मतलब 6 साल का बच्चा है यह तेरे

37:30 लिए पर्याप्त नहीं है। तू यह क्यों पूछ रहा है गर्ल और बॉय? क्योंकि गर्ल सेक्शन अलग है। उसमें बारबीज और यह सब रखे हुए हैं। मैंने कहा मुझे जाना ही नहीं उधर। है तो गर्ल पर बॉय वाले दिखा। तुम क्यों अभी से उसको 12वीं बनने की ट्रेनिंग दे रहे हो? तुम उसके लिए साइंस के गेम्स क्यों नहीं ला सकते? मैथ्स की पजल्स क्यों नहीं ला सकते? एक से एक सजी धजी डॉल्स रखी हुई हैं। और सारी डॉल्स ने क्या लगा रखी है? और जितने तरीके के आभूषण हो सकते हैं वो सब उन डॉल्स ने पहन रखे हैं। अब वो छोटी सी बच्ची है। तुम उसके हाथ में वो दे रहे हो। तुम क्या कर

38:15 रहे हो? जहर दे रहे हो तुम उसको। देखो जीवन की गाड़ी ना अस्तित्व की गाड़ी ही इन दोनों पहियों पर चलती है। एक को कमजोर कर दोगे तो दूसरे पर ज्यादा बोझ आ जाएगा। एक पहिया खराब है तो दूसरा भी जल्दी ही खराब हो जाएगा। तो जो मैं बात बोल रहा हूं पुरुषों के लिए भी है। महिला को अगर सिर्फ देह मानोगे तो बहुत कमजोर हो जाएगी और महिला कमजोर हो गई तो तुम्हारी ताकत भी चली जाएगी। तो अपनी खातिर ही सही लेकिन उसको इंसान समझना शुरू करो। बॉडी बॉडी मत कर दो। रिश्ता दोस्ती का रखो। ठीक है? सुख चाहिए

39:02 और सुख देह से मिल जाता है। लेकिन दोस्ती का भी अपना एक अलग आनंद होता है। और लड़कियां बहुत अच्छी दोस्त भी बन सकती हैं। बस भौंकना मत शुरू कर देना। ऐसे कहो कि दो इंसान बैठे हैं। आपस में बात कर रहे हैं, घूम फिर रहे हैं। जो भी कर रहे हैं। उसका भी अपना अच्छा ऊंचा आनंद है। यही आनंद थोड़ी है कि आई लुक एट हर एज अ बॉडी।

39:50 यह सब बातें मैं बोल रहा हूं ऐसे ही नहीं जाती। यही सब बातें सिखाना असली धर्म का दायित्व होता है। और उसी के लिए गीता कार्यक्रम है जो इतनी मेहनत से हम चला रहे हैं। पूरी संस्था उसी को समर्पित है और इतने इतने हजार लोग उसमें जुड़ चुके हैं। वो इसीलिए है जब असली धर्म जब असली धर्म आता है ना जिंदगी में हां कृष्ण वाला धर्म बाबा जी वाला धर्म नहीं भगवत गीता वाला धर्म जब असली धर्म जिंदगी में आता है तो बहुत सारे समझ लो कि फल फूल लगते हैं।

40:39 असली धर्म ऐसा है जैसे जड़ फिर बहुत तरीके के फल फूल लगते हैं। जिसमें से एक फल यह भी होता है कि ना आप स्वयं को देह मानते हो, ना महिला की देह को बहुत महत्व देते हो। ये एक फल है और 100 तरह के फल लगते हैं। पर वो सब के सब फल आते एक साझी जड़ से हैं जिसका नाम है अध्यात्म। और आध्यात्मिक नहीं हो आप तो ऊपर ऊपर से कितना भी दिखा दो कि हम तो ब्रह्मचारी हैं कि संयमी हैं। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कबीर साहब हम मेरे पूज्य क्या बोला करते हैं? बोलते हैं कामी कुत्ता बोलो बोलो

41:25 कामी कुत्ता तीन चार जो भी बोलना है बोल लो माने कम कामी कुत्ता तीन रोज अनतर रहे उदास उदास से मतलब है उदासीन उदासीन मतलब इग्नोर करता है उपेक्षा करता है उदास माने उदास वैसा उदास नहीं बोल रहे हैं कि कुत्ते की भी ऋतु आती है सिर्फ तभी उस पर वासना हावी होती है कुत्ते की भी प्राकृतिक एक ऋतु आती है हीट की सिर्फ तभी वह जाकर के जोड़ा बनाते हैं कुत्ते कुतिया ये हम जानते हैं ऐसा है सभी पक्षी सभी पशु ऐसे ही करते हैं उनका जब मेटिंग सीजन आता है सिर्फ तब उनमें वासना उठती है वरना नहीं उठती तो बोलते हैं कामी कुत्ता तीन दिन अनतर माने बाकी दिनों में अनतर रहे उदास बाकी दिनों में वो सेक्स की उपेक्षा करता है सिर्फ तीन दिन तीन दिन माने कम अवधि में सिर्फ कुछ दिनों के लिए वो

42:10 सेक्सुअली स्टिमुलेट होता है बाकी उसको फर्क नहीं पर कामी नर कुत्ता सदा छ ऋतु 12 मास कामी कुत्ता तीन दिन अनंतर रहे उदास और कामी नर कुत्ता सदा छह ऋतु 12 मास यह क्यों हुआ? हम भी जंगल से ही आए हैं। कोई पशु पक्षी उतना कामी नहीं होता जितना मनुष्य है। तो तुलना करके बता रहे हैं कि कुत्ता भी कुछ समय के लिए काम वासना में पड़ता है। बाकी समय उसे फर्क नहीं पड़ता। पर आदमी अकेला है जो 12 मास सेक्स में डूबा रहता है। क्यों? क्योंकि आदमी अकेला है जिसने सेक्स को दबाया है, दमन करा है, सप्रेस करा है और क्योंकि तुमने उसका इतना सप्रेशन करा है इसीलिए वो उछल करके तुम्हारे पूरे जीवन

42:57 पर छा गया है। मनोविज्ञान की पिछली शताब्दी की यह बड़ी क्रांतिकारी खोज थी। फ्रायड से शुरू हुई थी। क्योंकि फ्राइड से पहले जो लोक धर्म चलता था खासकर जो यूरोप में चलता था उसमें दमन का बड़ा महत्व था कि नो नो नो नो बैड थॉट्स गंदे विचार मत आने देना गंदे विचार मत आने देना वहां पर भी जो चर्च था पादरी प्रीस्ट ये सब ऐसे ही कहा करें नहीं बैड थॉट्स अवॉइड बैड थॉट्स अवॉइड बैड थॉट्स तो बैड थॉट से क्या करना है बैड थॉट आए तो बोलो दबा दो रॉयड ने कहा जिस चीज को दबाते हो वो 100 गुना बढ़ जाती है जिस चीज को दबाते ते हो 100 गुना बढ़ जाती है। मत दबाओ। मत दबाओ। हां। इतना कर दो कि उसको

43:44 कभी एक नंबर का स्थान नहीं देंगे। जीवन में जो कुछ भी है सब नंबर दो तीन चार पांच से शुरू होगा। एक नंबर का स्थान तो उसको ही देंगे जिसको वेदांत सत्य बोलता है। सत्य आत्मा ब्रह्म जो भी बोल लो। तुम्हारे लिए उसका जो भी अर्थ होता हो। सच्चाई मुक्ति आनंद जो भी कहना चाहो पहले नंबर की जगह उसको दे देंगे। बाकी पीछे अपना पूंछ की तरह लगे रहेंगे। में फर्क नहीं पड़ता। दबाने से तो मामला और बिगड़ना ही बिगड़ना है। हम अब आप कह दे नहीं कई ऐसे होते हैं। वो सिनेमा हॉल में उनके बगल में अच्छा क्या हो गया? पिक्चर देखने गया था। पूछ रहा हूं क्या कहानी थी? बता काहे नहीं रहा है? बोल रहा बगल में एक हॉट लड़की बैठ गई थी। बोले

44:29 एक पिक्चर वहां चल रही थी स्क्रीन पे। एक यहां चल रही थी। और ऊपर से एक दो बार कोहनी छू गई। बोले ऐसा झटका लगा। 440 वोल्ट यह दिखा ऐसे रहे हैं जैसे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर इनके दिमाग में लगातार यही यही चल रहा है। लड़की लड़की लड़की देह दे देह दे देह सेक्स। जिस चीज का दमन करोगे वो जीवन पे छा जाएगी। दमन की जरूरत नहीं है। समझने की जरूरत है। दबाओ नहीं समझो। जानो जानो। उसी जानने का नाम वेदांत है। जानना है मुझे। बोधो अहम बोध ही मैं हूं। ना सिर्फ मेरा स्वभाव है बोध। मैं बोध मात्र हूं। बोधोम मैं जानूंगा। मैं दबाऊंगा नहीं मैं जानूंगा। उसके बाद जो होना होगा अपने आप होगा। और जानने से यह पता चलता है कि

45:18 जिसको पहला स्थान देना है वह कौन है। मैंने अभी कहा था कि उसको ब्रह्म भी कहा जाता है। तो जानने से जब आप जान जाते हो कि पहला स्थान किसका है? तो उसको कहते हैं वास्तविक ब्रह्मचर्य। [प्रशंसा] एक प्रकार के आचरण को ब्रह्मचर्य नहीं कहा जाता कि सदाचारी बनो, अच्छे-अच्छे काम करो। ये सब दो कौड़ी की बातें हैं और इनसे बहुत दुख पैदा होता है। कुछ कहना चाह बहुत कुछ जस्ट लास्ट आई एम सॉरी बहुत आप टाइम के

46:06 बाद मुझे लगा कि मुझे कह देना चाहिए। दरअसल मैं आचार्य प्रशांत को बहुत लंबे समय से सुन भी रही हूं और आज जो एक बात कही सर ने तो मुझे लगा कि मुझे बोलना चाहिए वो इसलिए बोल रही हूं। वरना कुछ भी नहीं है। आपने जो जो कहा वो मैं उससे पूरी सहमत रहती हूं हमेशा। यह जो आपने कहा कि कुछ लोग ऐसे हैं जो पूरा काले कपड़े में। तो भोपाल में क्योंकि एक कम्युनिटी है मुस्लिम जो पूरे काले कपड़े में रहती है और मुझे पता है कि उनका बिल्कुल भी उस तरह निशानी करने निशाना करने की वो नहीं थी उनका। लेकिन हमारे यहां जितने भी लोग हैं वो अलग धर्म के भी हैं। तो काला कपड़ा अगर एक कोई पहना है तो कोई ऐसा भी है जो पूरा साड़ी में ढकते हैं। है ना? तो वो भी ऐसी

46:53 ही उनकी भी वैसी ही मानसिकता होती है। तो ऐसा नहीं है कि मुस्लिम कम्युनिटी वाले ज्यादा उसको गलत समझते हैं। हिंदू भी उतना ही बराबर तो हिंदू मुस्लिम का कोई फर्क मत देखिएगा प्लीज। क्रिश्चियन वाइट में रहते हैं। तो कोई भी जात है जात से मत लीजिएगा इसको क्योंकि उनका कोई मंशा ये नहीं मेरे को ऐसा लगता है। बहुत क्लेरिफिकेशन आपने उनके बिहाफ पे दिया। मुझे जो कहना होता है ना वो मैं खुद ही समझा लेता हूं आमतौर पे और जब मैं सबकी बात कर रहा हूं जब मुझे सुनने वाले सब हैं तो डांटूंगा भी मैं सबको ही मैं डांटने में फिर भेदभाव नहीं करूंगा कि मैं एक समुदाय को ही क्यों डांटू और दूसरे

47:40 को क्यों ना डांटूं। तो जब मैं इतनी बार बाबा जी को बोलता हूं और हिंदू धर्म में जो तो जब मुझे बाबा जी को और हिंदू धर्म में जितनी मुझे बुराइयां दिखती हैं उनको बोलने का हक है तो अगर मेरे श्रोताओं में दूसरे समुदायों से भी लोग बैठे हैं मुस्लिम भी बैठे हैं तो मुझे उन्हें डांटने का भी हक है तो बस ठीक है और मुझे जो समझाना है वो ठीक है। [प्रशंसा] थैंक यू सो मच आचार्य प्रशांत सर फॉर शेयरिंग योर प्रोफाउंड विडम विद अस टुडे। वी आर ट्रूली ब्लेस्ड। मेरा नाम है देवदत्ता है और मैं आचार्य जी

48:25 को मतलब लगभग ढाई साल से सुन रहा हूं। दो साल से कम्युनिटी से जुड़ा हुआ हूं। उनको सुनने के बाद बहुत सारे जो हैबिट्स थे वो ड्रॉप किए। क्लेरिटी आई, डर कम हुआ। जो सीखने की एक चाहत रहती है या फिर क्यूरोसिटी जो रहती है वो फिर से आई है जीने के लिए। इसीलिए मैं चाहता हूं कि आप सभी लोग इस यात्रा में जुड़े और एक नया जीवन पाए।

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