संक्षिप्त सारांश
यह वीडियो मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक कलंक और वर्जनाओं पर प्रकाश डालता है, जो कामुकता के बारे में व्यापक सांस्कृतिक असहजता से उपजा है। आचार्य प्रशांत बताते हैं कि कैसे लोक धर्म, वास्तविक आध्यात्मिकता से अलग, अक्सर यौन इच्छाओं को दबाता है, जिससे महिलाओं के शरीर के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोण पैदा होता है। वह श्रोताओं को शरीर पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपने बच्चों में आंतरिक मूल्यों और क्षमताओं को विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
- मासिक धर्म के आसपास की वर्जनाएं कामुकता के बारे में गहरी असहजता से उपजी हैं।
- लोक धर्म अक्सर यौन इच्छाओं को दबाता है, जिससे महिलाओं के शरीर के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोण पैदा होता है।
- वास्तविक आध्यात्मिकता आंतरिक मूल्यों और आत्म-जागरूकता पर जोर देती है, जो शरीर पर ध्यान केंद्रित करने से मुक्ति प्रदान करती है।
परिचय
आचार्य प्रशांत लड़कियों से दूरी बनाने या बनाने के लिए कहने वालों को वासना का शिकार बताते हैं। वह पिछले 10 वर्षों से मासिक धर्म स्वच्छता कार्यक्रम पर काम कर रहे हैं और उनका मानना है कि मासिक धर्म स्वच्छता पर बातचीत करना केवल गांवों या पिछड़े इलाकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हर जगह एक सामाजिक कलंक है। मासिक धर्म एक बड़ा मुद्दा है क्योंकि यह सेक्स से संबंधित है और लोक धर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। इसलिए, कई तरह की वर्जनाएं हैं, जैसे कि मासिक धर्म के दौरान रसोई में नहीं जाना, अचार नहीं छूना और मंदिर में नहीं जाना। जागरूकता की कमी के कारण संक्रमण होते हैं, जिससे कई महिलाएं बीमार पड़ती हैं और मर भी जाती हैं। दुनिया की 50% आबादी महिलाएं हैं और मासिक धर्म उनके शरीर की एक महत्वपूर्ण क्रिया है, इसलिए इस पर बात करना जरूरी है। अगर हम सचमुच धार्मिक होते, तो सेक्स से हारे नहीं होते, लेकिन हम हारे हुए लोग हैं और अपनी उस हार को छुपाने के लिए ब्रह्मचर्य की बात करते हैं। लड़कियों को इतना क्यों ढका जा रहा है? आज से 20 साल पहले जितनी महिलाएं घर से बाहर निकल कर काम कर रही थीं, आज उससे कम महिलाएं बाहर निकल कर काम कर रही हैं। अच्छी-अच्छी डिग्रियां लेकर भी लड़कियां नौकरियां नहीं कर रही हैं।
सेक्स पाप है!
एक श्रोता आचार्य प्रशांत से मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में उनकी राय पूछते हैं, क्योंकि यह एक सामाजिक कलंक है जो सदियों से चला आ रहा है। आचार्य प्रशांत का मानना है कि मासिक धर्म को लेकर जो डर और वर्जनाएं हैं, उसका कारण यह नहीं है कि हम मासिक धर्म को लेकर असहज हैं, बल्कि यह है कि हम सेक्स को लेकर सहज नहीं हैं। इंसान एक जानवर है और जानवरों की सारी प्रकृति उसमें बैठी हुई है। मनुष्य के पास जानवरों से थोड़ा अतिरिक्त चेतना है, जिससे वह खुद को देख सकता है, अपने बंधनों को पहचान सकता है और उनसे लड़ सकता है। इसी चीज को धर्म कहा जाता है। सबसे बड़ा बंधन हमारी पाश्विक प्रवृत्ति है, जिसमें कामवासना सबसे प्रबल है। धर्म ऐसा होना चाहिए जो आपको कुछ ऐसा दे कि उसके आगे वासना छोटी चीज पड़ जाए। वास्तविक धर्म का उद्देश्य प्रकृति की क्रियाओं को बंद करना नहीं है, बल्कि उन्हें किसी और चीज का अनुगामी बनाना है। असली धर्म आपको नंबर एक वाली चीज देता है, जिससे आप अपने पाश्विक बंधनों से आजाद हो सकते हैं। असली धर्म को हमने मिश्रित कर दिया है, जिससे लोक धर्म बन गया है, जिसका आम आदमी पालन करता है। लोक धर्म का पालन करने वाले लोग अपने आप को धार्मिक बोलते हैं, लेकिन धार्मिकता की पहचान यह है कि आपने अपने बंधन तोड़े होंगे। धार्मिक आदमी अपनी पाश्विकता को लगातार चुनौती देता है और जीतता चलता है। लोक धार्मिक आदमी यह प्रदर्शित करता है कि सेक्स उसके लिए छोटी चीज है, जबकि वास्तविक धार्मिक आदमी के लिए सेक्स और शरीर से संबंधित बाकी बातें सचमुच छोटी हो जाती हैं। लोक धार्मिक आदमी के भीतर तो जानवर अभी गुर्रा ही रहा है, लेकिन ऊपर ऊपर से वह धार्मिक बना हुआ है, इसलिए वह सेक्स का दमन करता है और सेक्सुअलिटी से डरना शुरू कर देता है।
नारी नर्क का द्वार है
महिलाओं के शरीर से जुड़ी एक चीज ऐसी है जिसे छुपा नहीं सकते, इसलिए लोक धार्मिक लोग हमेशा से परेशान रहे हैं। बाबा लोग कहते हैं कि महिलाएं उन्हें छूना मत, क्योंकि उनके लिए महिला बहुत बड़ा मुद्दा है। वास्तविक धार्मिक आदमी कहेगा कि यह तो खाली है, इसमें क्या बड़ी बात है? एक कहानी है कि एक गुरु अपने चेले के साथ जा रहा था, तो उन्हें एक खूबसूरत जवान लड़की मिली जो थक कर बैठ गई थी। गुरु ने उसे उठाया और कंधे पर बैठा लिया। चेले के भीतर से कुत्ते भौंकने लगे। गुरु ने उसे सहजता से बैठा लिया और अपना चलते रहे। चेले के भीतर खलबली मची हुई थी। गुरु ने कहा कि क्या समस्या है? चेले ने कहा कि उसे समझ में नहीं आ रहा है कि गुरु इतने बड़े होकर भी आत्मसंयम नहीं रखते हैं। गुरु ने कहा कि उसने तो उसे कबका उतार दिया, पर चेला उसे अभी भी ढो रहा है। वास्तविक धर्म के लिए यह सब चीजें बहुत महत्व नहीं रखती हैं। लोक धर्म में सबसे बड़ी बात सेक्स है और सबसे पवित्र आत्मा वह है जो कभी सेक्स ना करता हो। बाबा जी बार-बार बोलेंगे कि ब्रह्मचर्य धारण करो और वीर्य रक्षा करो। लोक धर्म के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है। औरत दिखी नहीं कि पगला जाते हैं बिल्कुल। इसलिए वे कहते हैं कि स्त्री की छाया से भी दूर रहो। स्त्री नर्क का द्वार है। यह बात सब समझ में आ रही है ना? यह जरूर एक ऐसा आदमी है जिसके भीतर वासना उबल रही है, लेकिन इसको दिखाना यह है कि मैं तो शांत संयमित आदमी हूं। इसलिए वह एक तरीका निकालता है कि कम से कम सबके सामने पब्लिक में मैं स्त्री का ना तो वर्णन करूंगा ना कोई उसका स्पर्श करूंगा ना उससे बात करूंगा।
माहवारी गंदी बात
मासिक धर्म इतना बड़ा मुद्दा इसलिए है क्योंकि यह सेक्स से संबंधित है और लोक धर्म में सेक्स की बात करते ही सबके पसीने छूट जाते हैं। हम बोलते हैं कि वह फलानी फिल्म है, उसे आप फैमिली के साथ बैठ के देख सकते हैं, मतलब उसमें आगे पीछे कहीं भी कोई शरीर की देह की सेक्स इत्यादि की बात नहीं है। यह हमारा लोक धर्म है जिसमें कि पायसनेस का, वर्च्यू का, पुण्य का सबसे बड़ा पैमाना यही है कि तुमने अपने जीवन में देह का विशेषकर सेक्स का दमन कितना करा है। इसलिए फिर तुमने 100 तरह की वर्जनाएं रखी कि अभी अगर साइकिल चल रहा है तो किचन में नहीं जाओगी, अचार नहीं छुओगी, मंदिर में भी नहीं जाओगी। कितनी महिलाएं मर जाती हैं क्योंकि सेक्स इतना बड़ा जबरदस्त मुद्दा है कि उनको बीमारियां होती हैं तो डॉक्टर को जाकर बता नहीं सकती हैं। इंफेक्शंस होते हैं क्योंकि इस बात को लेकर के अवेयरनेस नहीं है। उस इनफेक्शन से ना जाने कितनी महिलाएं बीमार पड़ती हैं, मरती भी हैं। जबकि यह एक बहुत सीधी सहज सी बात है जिसकी चर्चा करने में किसी को कोई आपत्ति होनी नहीं चाहिए। आपत्ति तो यह होनी चाहिए कि दो ही लिंग होते हैं और 50% है दुनिया की आबादी की महिलाएं और उनके शरीर की एक महत्वपूर्ण ये क्रिया होती है। तुम इसकी बात क्यों नहीं करना चाहते हो? तुम पहले यह बताओ तुम पागल हो क्या? तुम हर चीज की बात कर रहे हो, तुम इस चीज की बात नहीं कर रहे हो। ये दुनिया की आधी आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। तुम दुनिया की आधी आबादी की उपेक्षा करके और बातों की बात करना चाहते हो। मैं क्यों करूं दूसरी बातें? तुम यह बात करो। एक सीधी सहज साधारण चीज को जितना दबाओगे ना उसे अपने लिए उतना बड़ा बना लोगे जबकि उसमें दबाने जैसा कुछ है नहीं। उसमें ऐसा कुछ नहीं है कि उसको कहो कि लेट मी स्वीप इट अंडर द कारपेट छुपा दो। अरे रे रे रे ये कैसी बात कर दी? ये बात क्यों कर रहे हो? तो गंदी बातें होती हैं। गंदी बात क्या होती है? शरीर है। मिट्टी से शरीर उठता है। मिट्टी में मिल जाता है। मिट्टी है। उसमें माने गंदी बात क्या होती है? आप टट्टी पेशाब की भी बात कर सकते हो, पर रक्त की बात नहीं कर सकते। क्या है इसमें? गंदा क्या है? और वो गंदा है तो फिर गर्भाशय ही गंदा है और गर्भाशय गंदा है तो दुनिया की सारी आबादी गंदी है। एक-एक इंसान वहीं से आ रहा है। तो गंदा क्या है? हम सेक्स से बहुत असहज हैं क्योंकि सेक्स ने हमें हराया है और हम अपनी उस हार को छुपाना चाहते हैं। अगर हम सचमुच धार्मिक होते तो सेक्स से हारे नहीं होते, पर हम हारे हुए लोग हैं और अपनी उस हार को छुपाने के लिए हम ब्रह्मचर्य वगैरह की बात करते हैं।
महिलाओं पर भयावह असर
महिलाओं पर इसका अनिष्टकारी असर पड़ा है और पुरुषों पर भी पड़ा है। पूरा समाज ही बीमार हो गया है। शरीर को इतना बड़ा बना लिया है कि हर आदमी हर समय बस शरीर ही शरीर के बारे में सोच रहा है। विशेषकर महिला का शरीर। पुरुष महिला के शरीर के बारे में सोचे जा रहा है। महिला अपने शरीर के बारे में सोची जा रही है। लड़कियां ज्ञान, कौशल, प्रतिभा, संघर्ष इससे ज्यादा महत्व किसको देने लग जाती हैं फिर? कि मैं सुंदर दिखूं, आकर्षक दिखूं, सेक्सीी दिखूं। क्योंकि सारा महत्व ही उसके शरीर को दिया जा रहा है। वास्तविक धर्म यह नहीं होने देता है। वास्तविक धर्म कहता है कि लड़की हो कि लड़का हो, तुम इंसान हो। एक चेतना हो तुम जिसका दायित्व है और अधिकार है कि वो आसमान की ऊंचाई हासिल करे। लेकिन शरीर शरीर कर करके कर के हमने अपनी बेटियों को अपनी लड़कियों को अपनी महिलाओं को हमने इन सबको बस मांस का पिंड बना दिया है। और हमारी ही नजर महिलाओं ने भी हमसे उधार ले लिए। वह भी अपने आप को इसी तरह से देखने लग गई हैं कि मेरी देह कैसी है। लड़की बहुत आकर्षक ना हो और थोड़ा गाढ़े रंग वगैरह की हो जाए और थोड़ी मोटी हो जाए उसको मानसिक बीमारियां होने लग जाती हैं। उसका पूरा आत्मसम्मान गिर जाता है। वो घर में दुबक के रहने लग जाती है। वो कहती है मेरी हैसियत क्या? मेरी इज्जत क्या? और इसके विपरीत लड़की बिल्कुल ही नालायक हो। कुछ ना हो उसके पास ना बुद्धि है ना ज्ञान है ना संघर्ष है ना ईमान है कुछ नहीं है उसके पास लेकिन अगर उसके पास आकर्षक देह है तो वो बड़े आत्मविश्वास से भरी रहती है वो कहती है बढ़िया है ना मेरे पास देह है मुझे कोई ना कोई मिल जाएगा इस देह को चाहने वाला मेरा काम चल जाएगा। हमने दोनों ही वर्गों स्त्री पुरुष दोनों को ही बर्बाद कर दिया है यह बॉडी बॉडी रट रट के रट रट के रट रट के और लड़कियों का तो जो मानसिक पतन करा है उसकी तो कोई इंतहा ही नहीं। फिर हम पूछते हैं कि महिलाओं के पास उनके नाम पर इतनी कम संपत्ति क्यों होती है? फिर हम पूछते हैं उन्हें इतने कम नोबेल प्राइज क्यों मिलते हैं? फिर हम पूछते हैं संसद में इतनी कम महिलाएं क्यों हैं? फिर हम पूछते हैं कि कॉर्पोरेट बॉडीज में स्टेक होल्डर्स के तौर पर या जो सीएक्सओ पोजीशंस होती हैं उन पर इतनी कम महिलाएं क्यों हैं? तुमने उसके भीतर कूट-कूट करके यह भर दिया है कि यू आर अ बॉडी। तो हर समय बस वो अपनी बॉडी का ही ख्याल कर रही होती है। और ऐसे काम तो बिल्कुल भी नहीं करती जिसमें बॉडी की उपेक्षा करनी पड़े। एकदम ही गरीब हो जाए तो अलग बात है। फिर तो वह एक मजदूर भी बन लेगी। अगर पर वह गरीब नहीं हो रही है तो वह धूल और धूप से बचने की भरसक कोशिश करती है। क्योंकि कहती है अरे कुछ कमाने के लिए अगर मैंने धूल धूप खा के अपना रूप रंग खराब कर लिया तो ये ज्यादा बड़ा नुकसान है। फीमेल लेबर पार्टिसिपेशन रेट पिछले 20 साल में भारत में यह गिर गया है। आज से 20 साल पहले जितनी महिलाएं घर से बाहर निकल कर के काम कर रही थी आज उससे कम महिलाएं बाहर निकल कर के काम कर रही हैं। क्योंकि घर में पैसा आ गया है। 20 साल के पहले की अपेक्षा आज घर में पैसा ज्यादा है। तो पहले तो फिर भी महिला बाहर मजबूरी में निकल कर काम कर लेती थी। अब घर में पैसा आ गया है तो खुद भी ऐसा सोचती है और उसके आसपास वाले भी उसे यही बोलते हैं कि अब तू बाहर क्यों जा रही है? तू घर का ख्याल रखना और तू बाहर जाती है काली हो जाती है। धूप में लिखना ना करो रूप की रानी गोरा रंग काला ना हो जाए। अच्छी-अच्छी डिग्रियां लेकर भी लड़कियां नौकरियां नहीं कर रही हैं। वो ट्रॉफी वाइफ बनके सजवर के बन ठन के घर में बैठना पसंद कर रही हैं। यह है वह बॉडी सेंट्रिसिटी जो पॉपुलर कल्चर ने लोक संस्कृति ने महिलाओं के मन में डाल दी है। तुम और कुछ बाद में हो फर्स्ट एंड फोरमोस्ट यू आर अ बॉडी। तो तुम्हारी सेल्फ वर्थ भी किससे जुड़ी हुई है? तुम्हारी बॉडी से। नहीं। आपकी सेल्फ वर्थ जुड़ी होती है आपकी सत्य निष्ठा से, आपके प्रेम की गहराई से, आपके ज्ञान से आप कितने संघर्ष जीवन में स्वीकार कर रही हैं। चेहरा लीपपोत करके दूसरों को लुभाने से कोई श्रेष्ठ नहीं कहा जा सकता।
अपने बच्चों को बचा लो
महिलाओं के साथ जो हुआ सो हुआ, लेकिन कम से कम अपने बच्चों में बॉडी सेंट्रिसिटी मत डालिए। उनको मेकअप मत सिखाइए। बहुत छोटी-छोटी लड़कियां लिपस्टिक लगाकर घूम रही हैं, नेल पेंट कर रही हैं। यह बहुत गलत कर रहे हो तुम उनके साथ। यह बिल्कुल ठीक नहीं है। नाखून को रंगने का क्या मतलब है? कोई होंठ क्यों रंग रहा है? होंठ तो वैसे ही लाल होते हैं। उसको और रंग काहे के ले रहे हो? क्यों घिस रहे हो? और ये तो खाने की जगह है। तो या तो वो खाने की चीज होती है जो यहां लगाई है कि भीतर ही चली जाए। ऐसी जगह जहां से खाओगे, पियोगे वहां तुमने कुछ लगा लिया है। असुविधा नहीं होती। शरीर अगर स्वस्थ है तो होठ अपने आप लाल रहते हैं या जो भी उनका रंग है प्राकृतिक वैसा रहेगा। तो शरीर को स्वस्थ रखो बेहतर ये है ना जाओ दौड़ो जिमिंग करो स्पोर्ट्स करो। अपने आप शरीर बढ़िया रहेगा तो होठ भी बढ़िया रहेंगे। बाहर से लीपापोती करके क्या मिलेगा? अगर आप एक महिला हैं या आप एक अभिभावक हैं और आपके घर में बच्चा है छोटा या आपकी बहन है कोई है या आपके आसपोस में भी कोई है तो इतना करिए कि उनको उनकी देह ही मत बन जाने दीजिए। इतना उन पर एहसान कर दीजिएगा। छोटे बच्चों में अभी तो बहुत छोटी है। उसके छोटे बच्चों में लड़के और लड़की कपड़ों में अंतर क्यों करते हो भाई? अभी तो दोनों का शरीर एक जैसा ही है ना। 8-10 साल तक एक ही जैसा रहता है। तो उनके कपड़ों में अंतर क्यों करते हो? एक से कपड़े पहनाओ। बच्ची अभी छोटी है। अभी से उसके बाल बढ़ाने क्यों शुरू कर दिए भाई? क्यों उसको जता रहे हो कि तू नारी है। नारी है। क्योंकि वो फिर वही नारी बन जाएगी जैसी हमें चारों ओर दिखाई देती है। अबला नारी। क्यों उसको नारी बनाए दे रहे हो? उसको इंसान बनाओ। नारी नहीं। अभी चार दिन पहले मैं खिलौने खरीदने गया तो उसने पूछा कितने साल का बच्चा है? मैंने उम्र बता दी। फिर मुझसे पूछ रहा है गर्ल और बॉय मैंने ऐसे देखा। मतलब 6 साल का बच्चा है यह तेरे लिए पर्याप्त नहीं है। तू यह क्यों पूछ रहा है गर्ल और बॉय? क्योंकि गर्ल सेक्शन अलग है। उसमें बारबीज और यह सब रखे हुए हैं। मैंने कहा मुझे जाना ही नहीं उधर। है तो गर्ल पर बॉय वाले दिखा। तुम क्यों अभी से उसको 12वीं बनने की ट्रेनिंग दे रहे हो? तुम उसके लिए साइंस के गेम्स क्यों नहीं ला सकते? मैथ्स की पजल्स क्यों नहीं ला सकते? एक से एक सजी धजी डॉल्स रखी हुई हैं और सारी डॉल्स ने क्या लगा रखी है? और जितने तरीके के आभूषण हो सकते हैं वो सब उन डॉल्स ने पहन रखे हैं। अब वो छोटी सी बच्ची है। तुम उसके हाथ में वो दे रहे हो। तुम क्या कर रहे हो? जहर दे रहे हो तुम उसको।
असली ब्रह्मचर्य क्या है?
जीवन की गाड़ी अस्तित्व के दोनों पहियों पर चलती है। एक को कमजोर कर दोगे तो दूसरे पर ज्यादा बोझ आ जाएगा। एक पहिया खराब है तो दूसरा भी जल्दी ही खराब हो जाएगा। जो मैं बात बोल रहा हूं पुरुषों के लिए भी है। महिला को अगर सिर्फ देह मानोगे तो बहुत कमजोर हो जाएगी और महिला कमजोर हो गई तो तुम्हारी ताकत भी चली जाएगी। तो अपनी खातिर ही सही लेकिन उसको इंसान समझना शुरू करो। बॉडी बॉडी मत कर दो। रिश्ता दोस्ती का रखो। सुख चाहिए और सुख देह से मिल जाता है, लेकिन दोस्ती का भी अपना एक अलग आनंद होता है। और लड़कियां बहुत अच्छी दोस्त भी बन सकती हैं। बस भौंकना मत शुरू कर देना। दो इंसान बैठे हैं, आपस में बात कर रहे हैं, घूम फिर रहे हैं। जो भी कर रहे हैं। उसका भी अपना अच्छा ऊंचा आनंद है। यही आनंद थोड़ी है कि आई लुक एट हर एज अ बॉडी। यह सब बातें मैं बोल रहा हूं ऐसे ही नहीं जाती। यही सब बातें सिखाना असली धर्म का दायित्व होता है। और उसी के लिए गीता कार्यक्रम है जो इतनी मेहनत से हम चला रहे हैं। पूरी संस्था उसी को समर्पित है और इतने इतने हजार लोग उसमें जुड़ चुके हैं। वो इसीलिए है जब असली धर्म आता है जिंदगी में हां कृष्ण वाला धर्म बाबा जी वाला धर्म नहीं भगवत गीता वाला धर्म जब असली धर्म जिंदगी में आता है तो बहुत सारे समझ लो कि फल फूल लगते हैं। असली धर्म ऐसा है जैसे जड़ फिर बहुत तरीके के फल फूल लगते हैं। जिसमें से एक फल यह भी होता है कि ना आप स्वयं को देह मानते हो, ना महिला की देह को बहुत महत्व देते हो। ये एक फल है और 100 तरह के फल लगते हैं। पर वो सब के सब फल आते एक साझी जड़ से हैं जिसका नाम है अध्यात्म। और आध्यात्मिक नहीं हो आप तो ऊपर ऊपर से कितना भी दिखा दो कि हम तो ब्रह्मचारी हैं कि संयमी हैं। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कबीर साहब क्या बोला करते हैं? कामी कुत्ता तीन रोज अनतर रहे उदास। कामी नर कुत्ता सदा छह ऋतु 12 मास। हम भी जंगल से ही आए हैं। कोई पशु पक्षी उतना कामी नहीं होता जितना मनुष्य है। कुत्ता भी कुछ समय के लिए काम वासना में पड़ता है। बाकी समय उसे फर्क नहीं पड़ता। पर आदमी अकेला है जो 12 मास सेक्स में डूबा रहता है। क्योंकि आदमी अकेला है जिसने सेक्स को दबाया है, दमन करा है, सप्रेस करा है और क्योंकि तुमने उसका इतना सप्रेशन करा है इसीलिए वो उछल करके तुम्हारे पूरे जीवन पर छा गया है। मनोविज्ञान की पिछली शताब्दी की यह बड़ी क्रांतिकारी खोज थी। फ्रायड से शुरू हुई थी। फ्राइड से पहले जो लोक धर्म चलता था खासकर जो यूरोप में चलता था उसमें दमन का बड़ा महत्व था कि नो नो नो नो बैड थॉट्स गंदे विचार मत आने देना गंदे विचार मत आने देना वहां पर भी जो चर्च था पादरी प्रीस्ट ये सब ऐसे ही कहा करें नहीं बैड थॉट्स अवॉइड बैड थॉट्स अवॉइड बैड थॉट्स तो बैड थॉट से क्या करना है बैड थॉट आए तो बोलो दबा दो रॉयड ने कहा जिस चीज को दबाते हो वो 100 गुना बढ़ जाती है जिस चीज को दबाते ते हो 100 गुना बढ़ जाती है। मत दबाओ। मत दबाओ। हां। इतना कर दो कि उसको कभी एक नंबर का स्थान नहीं देंगे। जीवन में जो कुछ भी है सब नंबर दो तीन चार पांच से शुरू होगा। एक नंबर का स्थान तो उसको ही देंगे जिसको वेदांत सत्य बोलता है। सत्य आत्मा ब्रह्म जो भी बोल लो। तुम्हारे लिए उसका जो भी अर्थ होता हो। सच्चाई मुक्ति आनंद जो भी कहना चाहो पहले नंबर की जगह उसको दे देंगे। बाकी पीछे अपना पूंछ की तरह लगे रहेंगे। में फर्क नहीं पड़ता। दबाने से तो मामला और बिगड़ना ही बिगड़ना है। हम अब आप कह दे नहीं कई ऐसे होते हैं। वो सिनेमा हॉल में उनके बगल में अच्छा क्या हो गया? पिक्चर देखने गया था। पूछ रहा हूं क्या कहानी थी? बता काहे नहीं रहा है? बोल रहा बगल में एक हॉट लड़की बैठ गई थी। बोले एक पिक्चर वहां चल रही थी स्क्रीन पे। एक यहां चल रही थी। और ऊपर से एक दो बार कोहनी छू गई। बोले ऐसा झटका लगा। 440 वोल्ट। यह दिखा ऐसे रहे हैं जैसे इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर इनके दिमाग में लगातार यही यही चल रहा है। लड़की लड़की लड़की देह दे देह दे देह सेक्स। जिस चीज का दमन करोगे वो जीवन पे छा जाएगी। दमन की जरूरत नहीं है। समझने की जरूरत है। दबाओ नहीं समझो। जानो जानो। उसी जानने का नाम वेदांत है। जानना है मुझे। बोधो अहम बोध ही मैं हूं। ना सिर्फ मेरा स्वभाव है बोध। मैं बोध मात्र हूं। बोधोम मैं जानूंगा। मैं दबाऊंगा नहीं मैं जानूंगा। उसके बाद जो होना होगा अपने आप होगा। और जानने से यह पता चलता है कि जिसको पहला स्थान देना है वह कौन है। मैंने अभी कहा था कि उसको ब्रह्म भी कहा जाता है। तो जानने से जब आप जान जाते हो कि पहला स्थान किसका है? तो उसको कहते हैं वास्तविक ब्रह्मचर्य। एक प्रकार के आचरण को ब्रह्मचर्य नहीं कहा जाता कि सदाचारी बनो, अच्छे-अच्छे काम करो। ये सब दो कौड़ी की बातें हैं और इनसे बहुत दुख पैदा होता है।
Testimonial
एक महिला ने आचार्य प्रशांत के विचारों से सहमति व्यक्त की और कहा कि काले कपड़े पहनने वाले समुदाय को निशाना बनाने का उनका इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म में भी ऐसे लोग हैं जो पूरे साड़ी में ढके रहते हैं और उनकी भी वैसी ही मानसिकता होती है। आचार्य प्रशांत ने कहा कि वह डांटने में भेदभाव नहीं करेंगे और जब उन्हें बाबा जी को और हिंदू धर्म में बुराइयां दिखती हैं तो उन्हें बोलने का हक है, तो अगर उनके श्रोताओं में दूसरे समुदायों से भी लोग बैठे हैं तो उन्हें डांटने का भी हक है। देवदत्ता नामक एक व्यक्ति ने कहा कि वह आचार्य जी को ढाई साल से सुन रहा है और उन्हें सुनने के बाद उसने बहुत सारी आदतें छोड़ीं, उसे स्पष्टता आई, डर कम हुआ और सीखने की चाहत फिर से आई।

