0:00 अपने आसपास कोई ₹10 का नोट उठाइए, ₹50 का नोट उठाइए या ₹100 का नोट उठाइए और ध्यान से उसे देखिए। आपको उस पर गंधी जी की तस्वीर दिखेगी। कुछ डिजाइन, एक सिग्नेचर और सीरियल नंबर। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि वह नोट असल में होता क्या है? क्या वो आपकी संपत्ति है? या फिर वो एक ऐसा सिस्टम है जिसमें आपको बिना बताए एक इनविज़िबल लोन दे दिया गया है। एक ऐसा लोन जो आप इंटरेस्ट सहित चुकाते रहते हैं। हर दिन। अब जरा सोचिए अगर मैं कहूं कि वो नोट जो आप रोज यूज करते हैं वो असल में आपका पैसा नहीं बल्कि एक प्राइवेट बैंक की लायबिलिटी है। और जिस संस्था ने इस पूरे सिस्टम को डिजाइन किया द फेडरल रिजर्व वो कोई सरकार द्वारा बनाई गई बॉडी नहीं है। बल्कि यह है कुछ चुनिंदा अल्ट्रा रिच
0:47 बैंकर्स का ऐसा प्राइवेट नेटवर्क जिसने 1910 में एक आइसोलेटेड रहस्यमई जगह जेकिल आइलैंड पर मिलकर इसे सीक्रेटली क्रिएट किया। आज हम अनकवर करेंगे उस क्रिएचर की स्टोरी जो दिखता नहीं है। मगर पूरी दुनिया की इकॉनमी को कंट्रोल करता है जो करेंसीज क्रिएट करता है। क्राइसिस बनाता है और उन्हीं क्राइसिस से अरबों कमाता है। सबसे शॉकिंग बात यह सब कुछ हमारे सामने होता है। लेकिन हमें इसका एहसास तब तक नहीं होता जब तक बहुत देर ना हो जाए। नमस्ते दोस्तों। स्वागत है आपका स्मॉल चेंजेस बिग डिफरेंसेस चैनल पर जहां हम लाते हैं किताबों की वो कहानियां जो आपकी सोच और जिंदगी दोनों बदल सकती हैं। आज हम बात करेंगे एक ऐसी आई ओपनिंग किताब की जो ना सिर्फ बैंकिंग सिस्टम पर सवाल उठाती है
1:32 बल्कि पूरी ग्लोबल इकॉनमी के पीछे छिपे पावर गेम को उजागर करती है। द क्रिएचर फ्रॉम जेकिल आइलैंड बाय जी एडवर्ड ग्रिफिन। तो चलिए खोजते हैं एक पावरफुल मनी ट्रुथ जो सबको नहीं पता होता। लेसन वन फेडरल रिजर्व इज नॉट फेडरल। अधिकतर लोग सोचते हैं कि फेडरल रिजर्व एक सरकारी संस्था है क्योंकि इसके नाम में ही फेडरल है। लेकिन यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। असलियत यह है कि फेडरल रिजर्व कोई भी सरकारी संस्था नहीं है। यह एक प्राइवेट बैंकिंग सिस्टम है। जिसे कुछ अमीर और शक्तिशाली बैंकर्स ने डिजाइन किया था ना कि अमेरिकी सरकार ने। इसका मालिकाना स्ट्रक्चर और ऑपरेशंस इस तरह बनाए गए हैं कि यह बाहर से तो गवर्नमेंट इंस्टीट्यूशन जैसा दिखे लेकिन इसके अंदर की सारी पावर प्राइवेट हैंड्स में रहे। इसका मतलब यह है कि जो संस्था अमेरिका की एंटायर मनी सप्लाई को कंट्रोल करती है वो सरकार के
2:18 नहीं बल्कि कुछ चुनिंदा अमीरों के कंट्रोल में है। और इसी से शुरू होती है एक ऐसी इनविज़िबल फाइनेंसियल मैनपुलेशन जो ना सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की इकॉनमी को अफेक्ट करती है। यह सिस्टम ट्रांसपेरेंसी या डेमोक्रेसी पर नहीं बल्कि सीक्रेसी और कंट्रोल पर बेस्ड है। साल था 1910 सर्दियों की एक ठंडी और धुंधली रात जेकिल आइलैंड जॉर्जिया के एक प्राइवेट रिसोर्ट में एक बेहद सीक्रेट मीटिंग रखी गई। इस मीटिंग में शामिल थे उस समय के सबसे अमीर, इन्फ्लुएंशियल और पावरफुल लोग। जेपी मॉ्गन के ट्रस्टेड एसोसिएट्स, रॉकीफेलर ग्रुप के प्रतिनिधि और नेशनल सिटी बैंक के टॉप एग्जीक्यूटिव्स। यह लोग अपने असली नामों से यात्रा नहीं कर रहे थे बल्कि नकली पहचान और गुप्त टिकटों के साथ आए थे ताकि किसी को जरा सा भी शक ना हो। उनका मिशन था
3:06 एक ऐसा बैंकिंग सिस्टम तैयार करना जो दिखने में पब्लिक इंटरेस्ट के लिए लगे। लेकिन असल में उन्हें मॉनिटरी कंट्रोल, असीमित प्रॉफिट और इकॉनमी पर पकड़ दे सके। यहीं इसी आइसोलेटेड आइलैंड पर उन्होंने द फेडरल रिजर्व सिस्टम की नींव रखी। एक ऐसा सिस्टम जो आने वाले दशकों में अमेरिका की करेंसी सप्लाई, इंटरेस्ट रेट्स और क्रेडिट पॉलिसीज को कंट्रोल करेगा। मगर बिना किसी पब्लिक अकाउंटेबिलिटी के। और सबसे चौंकाने वाली बात एक सेंचुरी से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद आज भी अधिकतर लोग मानते हैं कि फेडरल रिजर्व एक सरकारी संस्था है। जबकि इसकी जड़े एक सीक्रेट प्राइवेट डील और बंद दरवाजों के पीछे लिए गए फैसलों में छुपी हैं जो सिर्फ चुनिंदा लोगों के हित में थे। लेसन टू इनफ्लेशन इज अ हिडन टैक्स। जब भी आप सुनते
3:52 हैं कि महंगाई बढ़ रही है तो ज्यादातर लोग सोचते हैं कि चीजें महंगी हो रही हैं। लेकिन असल में महंगाई यानी इनफ्लेशन एक छुपा हुआ टैक्स है जो आपकी जेब से पैसे निकालता है बिना आपको बताए बिना कोई ऑफिशियल टैक्स लगाए। जब गवर्नमेंट और सेंट्रल बैंक्स जरूरत से ज्यादा मनी प्रिंट करते हैं तो बाजार में पैसों की सप्लाई बढ़ जाती है। इससे हर नोट की वैल्यू गिर जाती है। ग्रिफिन इसे कहते हैं लीगलाइज थेफ्ट। यानी सरकारें और बैंक्स अपने कर्ज चुकाने या सिस्टम को चलाने के लिए पैसे छापते हैं। लेकिन उसका असली नुकसान जनता उठाती है। आपकी सैलरी वही रहती है पर सब कुछ महंगा हो जाता है। यानी आपकी परचेसिंग पावर कम हो जाती है और आपको एहसास भी नहीं होता कि आपकी वेल्थ साइलेंटली वैनिश हो रही है। इनफ्लेशन ऐसा
4:39 इनविज़िबल एनिमी है जो आपकी फाइनेंसियल फ्रीडम को धीरे-धीरे खा जाता है। 2010 के दशक में वेनेजुएला एक ऑयल रिच देश था। जहां के तेल के भंडार दुनिया में सबसे बड़े माने जाते थे। लेकिन जब वहां की गवर्नमेंट ने अनकंट्रोल्ड तरीके से पैसे छापना शुरू किया अपने बढ़ते खर्च और पॉलिटिकल प्रॉमिससेस पूरे करने के लिए तो इकोनमी में एक खतरनाक चेन रिएक्शन शुरू हो गया। हाइपर इनफ्लेशन ने कुछ ही सालों में हालात ऐसे बना दिए कि ब्रेड खरीदने के लिए लोगों को बैग भरकर करेंसी नोट्स ले जाने पड़ते थे। एक लोफ ऑफ ब्रेड जो कभी ₹50 के बराबर होता था। उसकी कीमत ₹5 लाख तक पहुंच गई। लोगों की लाइफ सेविंग्स रातोंरात वर्थलेस हो गई। मेडिकल सप्लाई, खाना, पेट्रोल सब स्केर्स हो गए और ब्लैक मार्केट में कई गुना दामों पर बिकने लगे।
5:25 मिडिल क्लास फैमिलीज जो कभी आराम से जी रही थी, गरीबी की रेखा से नीचे धकेल दी गई। क्राइम रेट एक्सप्ललोड हो गया। लोग सर्वाइवल के लिए डेस्पिरेट क्राइम्स करने लगे। ग्रिफिन चेतावनी देते हैं कि अगर किसी भी देश में करेंसी की वैल्यू आर्टिफिशियली गिराई जाती रही तो कोई भी इकॉनमी वेनेजुएला जैसी कोलैप्स हो सकती है। इनफ्लेशन सिर्फ एक ड्राई इकोनॉमिक टर्म नहीं है। यह एक इनविज़िबल आग है जो लोगों की मेहनत, उम्मीदें और आने वाली पीढ़ियों के सपनों को राख कर देती है। लेसन थ्री द रिच टेक रिस्क, द पोर पे द प्राइस। जब भी आप सुनते हैं कि किसी बड़े बैंक या कंपनी को सरकार ने बचाया यानी बेल आउट दिया तो असल में उस मदद की कीमत कौन चुकाता है? जवाब है हम सब। ग्रिफिन बताते
6:11 हैं कि फाइनेंसियल सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि रिच और पावरफुल लोग बड़े-बड़े रिस्क लें। और जब वे फेल हो तो सरकार यानी टैक्स पेयर्स के पैसे से उन्हें बेल आउट देती है। यानी मुनाफा उनका और नुकसान आम जनता का। इन बेल आउट्स को दिखाया तो जाता है कि यह इकोनमी को बचाने के लिए हैं। लेकिन असल में यह एक तरीका है जिससे कॉर्पोरेट ग्रीड को प्रोटेक्ट किया जाता है और मेहनतकश लोगों की बचत से उसकी भरपाई होती है। यह एक ऐसा सिस्टम है जिसमें लोगों की गाढ़ी कमाई से उन लोगों की गलतियों को ठीक किया जाता है जो पहले से ही करोड़ों अरबों में खेल रहे हैं। साल था 2008। पूरी दुनिया एक गहरे आर्थिक संकट से जूझ रही थी। स्टॉक मार्केट्स गिर रहे थे। बैंक दिवालियां होने की कगार पर थे और लोगों की नौकरियां घर और बचत खतरे
6:57 में थे। लेमन ब्रदर्स, एआईजी और सिटी बैंक जैसे दिग्गज इंस्टीटशंस अपने ही लालच, गलतियों और हाई रिस्क इन्वेस्टमेंट्स के कारण धराशाई होने वाले थे। लेकिन हुआ क्या? गिरने देने की बजाय सरकार ने अरबों डॉलर देकर इन्हें बचा लिया। बेल आउट दिया गया। वो भी जनता के टैक्स के पैसों से। ग्रिफिन इस घटना को प्लंड एक्सप्लॉयटेशन कहते हैं। उनके अनुसार यह एक हेड्स आई विन टेल्स यू लूज सिस्टम है। जहां मुनाफा होने पर अमीर और पावरफुल लोग उसे एंजॉय करते हैं और नुकसान होने पर उसका बोझ टैक्स पेयर्स यानी आप और हम उठाते हैं। फाइनेंसियल फ्रीडम के नाम पर बनाया गया यह सिस्टम असल में एक फाइनेंसियल ट्रैप है। ऐसा ट्रैप जो ऑर्डिनरी सिटीजंस को कर्ज, महंगाई और असुरक्षा में फंसाए रखता है। इस खेल में नियम ऐसे बनाए गए हैं कि जीत
7:44 हमेशा उनके पास जाती है और आम आदमी सिर्फ हारने के लिए खेलता है। लेसन चार पैसा कर्ज से बनता है। क्या आप जानते हैं कि आज की दुनिया में जितना भी पैसा चलता है वह असल में एकिस्ट ही नहीं करता जब तक कोई लोन ना ले। ग्रिफिन बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति या कंपनी बैंक से लोन लेती है तो बैंक उस समय नया पैसा क्रिएट करता है। लिटरली सिर्फ एक कीबोर्ड की की स्ट्रोक से। बैंक के पास वो पैसे फिजिकली मौजूद नहीं होते। वो बस एक डिजिटल एंट्री होती है जो आपकी लाइफ पर रियल इंपैक्ट डालती है। इसका मतलब यह हुआ कि आज की इकॉनमी में जितना पैसा है उसका ऑलमोस्ट हर हिस्सा किसी ना किसी के कर्ज से जुड़ा है। यानी डे इज मनी और जब पूरा सिस्टम डे पर टिका हो तो स्टेबिलिटी इंपॉसिबल होती है। यह
8:29 सिस्टम इस तरह डिजाइन किया गया है कि हमेशा और ज्यादा लोन लेना पड़े ताकि सिस्टम कोलैप्स ना हो। एक एंडलेस ट्रैप जिसमें गवर्नमेंट्स, बिजनेसेस और आम लोग फंसे हुए हैं। एलन मस्क दुनिया के सबसे अमीर और एंबिशियस इंसानों में से एक ने एक इंटरव्यू में कहा था कैश इज नॉट किंग डेट इज। जब उन्होंने टेस्ला और स्पेस एक्स को ग्रो करना शुरू किया तब उन्होंने बार-बार स्ट्रेटेजिक तरीके से लोंस और इन्वेस्टर फंडिंग उठाई। फर्क यह था कि मस्क ने जो डेप्ट लिया उसका इस्तेमाल सिर्फ सर्वाइवल के लिए नहीं बल्कि वैल्यू क्रिएशन के लिए किया। ब्रेक थ्रू इनोवेशंस, रेिवोल्यूशनरी प्रोडक्ट्स और पूरी इंडस्ट्रीज को डिसरप्ट करने के लिए। अब सोचिए एक विजनरी के हाथ में डे एक पावरफुल टूल बन जाता है जो भविष्य को बदल
9:15 सकता है। लेकिन अगर यही पावर रेकलेस बैंक्स और करप्ट सिस्टम्स के पास हो जो पैसा बिना किसी रियल प्रोडक्शन के सिर्फ नंबर्स की तरह क्रिएट करते हो तो नतीजा क्या होगा? ग्रिफिन बताते हैं कि आज का फाइनेंसियल सिस्टम वैल्यू क्रिएशन के बजाय डेप्ट क्रिएशन पर टिका है। हर नया लोन एक नया पैसा बनाता है और हर नया पैसा पुराने लोन को चुकाने का बस एक इल्लुजन पैदा करता है। जैसे रेत पर महल बनाना जो कभी भी ढह सकता है। फ्रेंड्स अगर यह बातें आपको चौंका रही हैं तो यकीन मानो क्रिएचर फ्रॉम जेकेल आइलैंड में इससे भी कई गुना ज्यादा खुलासे हैं। 10 से 15 मिनट की वीडियो में पूरी किताब समझाना मुमकिन नहीं है। डिस्क्रिप्शन में दिए गए लिंक से यह किताब जरूर खरीदें क्योंकि यह आपकी सोच, समझ और फाइनेंशियल नजरिया बदल सकती है। लेसन पांच, युद्ध एक लाभदायक व्यवसाय है। जब भी
10:04 हम युद्ध के बारे में सोचते हैं तो हमारे सामने आते हैं खून, तबाही और इंसानी त्रासदी। लेकिन ग्रिफिन बताते हैं कि कुछ लोगों के लिए युद्ध सिर्फ विनाश नहीं बल्कि एक सुनहरा बिजनेस मौका होता है। वर्ल्ड वॉर वन और बाइन जैसे बड़े युद्धों के पीछे बैंक्स और फाइनेंसियल इंस्टीटशंस की बहुत बड़ी भूमिका रही है। उन्होंने ही दोनों पक्षों को फंड किया। उन्हें वेपंस बेचे और बाद में उससे इंटरेस्ट सहित रीपेमेंट भी वसूला। वॉर को जितना लंबा खींचा गया उतना ज्यादा प्रॉफिट हुआ। हर गोली, हर टैंक, हर यूनिफार्म पैसे लेकर सप्लाई किया गया। ग्रिफिन कहते हैं कि यह सिस्टम इस तरह से बना है कि एक सोल्जर के लिए जो युद्ध मौत है वही बैंकर के लिए पैसा बन जाता है। वॉर इज नो लगर अबाउट नेशंस। इट्स अबाउट ट्रांजैक्शंस, इंटरेस्ट
10:49 एंड पावर। वर्ल्ड वॉर वन के दौरान जेपी मॉ्गन एंड कंपनी ने अमेरिकी सरकार से पहले ही स्पेशल परमिशन ले ली थी कि वो एलाइड नेशंस जैसे ब्रिटेन और फ्रांस को वेपंस और क्रिटिकल सप्लाई बेच सकें। मगर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। उन्होंने सिर्फ आर्म सप्लाई नहीं की बल्कि उन देशों को लोंस भी दिए ताकि वह पैसे लेकर फिर मॉ्गन से ही वेपंस खरीदें। यानी एक हाथ से पैसा दिया और दूसरे हाथ से इंटरेस्ट सहित वापस लिया। ग्रिफिन लिखते हैं कि 1915 तक मॉ्गन ने लगभग 500 करोड़ का मटेरियल बेचा और उस समय के हिसाब से अनइमेजनेबल प्रॉफिट कमाया। और जब युद्ध खत्म हुआ तब भी खेल जारी रहा। वही बैंक्स जिनके डील्स ने युद्ध को लंबा खींचा। अब उन देशों से लोन रिपेमेंट्स और ब्याज की वसूली कर रहे थे। पब्लिक ने अपनी जाने दी। सोल्जर्स ने बलिदान किया,
11:36 फैमिलीज टूट गई। लेकिन असली जीत उन्हीं की हुई जो बैंक के बोर्डरूम में बैठे थे। जहां एक भी गोली नहीं चली। सिर्फ नंबर्स और कॉन्ट्रैक्ट्स ने साम्राज्य खड़े कर दिए। वॉर में ब्रेक नेशंस बट इट क्वाइटली बिल्ड्स एंपायर्स। लाइन बाय लाइन इनंबैलेंस शीट्स। लेसन सिक्स, कंट्रोल द मनी, कंट्रोल द वर्ल्ड। ग्रिफिन का मानना है कि आज की ग्लोबल इकॉनमी का सबसे बड़ा सच यह है जिसके पास पैसे की सप्लाई का कंट्रोल है उसके पास पूरी दुनिया का कंट्रोल है। फेडरल रिजर्व, आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाएं सिर्फ फाइनेंशियल सपोर्ट देने का दिखावा करती हैं। लेकिन असल में यह एक इनविज़िबल एंपायर का हिस्सा है जो धीरे-धीरे पूरी दुनिया को कंट्रोल कर रही है। यह छोटे और गरीब देशों को लोंस देते हैं और फिर उन लोंस के बहाने
12:22 पॉलिसीज इंपोज करते हैं। जैसे कि पब्लिक सेक्टर बेचो, हेल्थ केयर प्राइवेटाइज करो या विदेशी कंपनियों को सस्ते में घुसने दो। ग्रिफिन इसे कहते हैं मॉडर्न कॉलोनियलिज्म। एक ऐसा राज जो बंदूक से नहीं ब्याज की दर से चलता है। कंट्री भले ही आजाद दिखे लेकिन उसके डिसीजंस एक इनविज़िबल हाथ चला रहा होता है और वही हाथ दुनिया के सबसे बड़े फाइनेंसियल इंस्टीटशंस के पीछे छुपा होता है। 1970 में जमेका के प्राइम मिनिस्टर माइकल मैनली एक बोल्ड विज़न लेकर आए। गरीबों के लिए यूनिवर्सल हेल्थ केयर, फ्री एजुकेशन और सोशल जस्टिस के एंबिशियस प्रोग्राम्स। शुरुआत में लोग इसे एक नए युग की शुरुआत मानते थे। लेकिन विकास के इस रास्ते पर चलते-चलते जमेका को फॉरेन करेंसी और बड़े कैपिटल की जरूरत पड़ी। मदद के लिए दरवाजा
13:07 खटखटाया गया आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक का। आईएमएफ ने लोन तो दिया लेकिन ऐसी शर्तों के साथ जो सुनने में रिफॉर्म लगती थी, मगर असल में जाल थी। सब्सिडीज हटाओ, पब्लिक स्पेंडिंग ड्रास्टिकली घटाओ और फॉरेन कॉरपोरेशंस के लिए मार्केट वाइड ओपन करो। जैसे ही जमेका ने यह कंडीशन स्वीकार की, लोकल इंडस्ट्रीज कोलैप्स होने लगी, अनइंप्लॉयमेंट रिकॉर्ड लेवल पर पहुंचा और पूरा देश एक नेवर एंडिंग डे ट्रैप में फंस गया। जहां हर नया लोन सिर्फ पुराने इंटरेस्ट को भरने के लिए लिया जा रहा था। ग्रिफिन बताते हैं, यह केवल जमेका की कहानी नहीं। यह आईएमएफ की डिकेड्स ओल्ड स्टैंडर्ड प्लेबुक है। लोंस दो, फिर कंट्रोल लो और रिसोर्सेज सफन करो। यह मॉडर्न स्लेवरी है जहां जंजीरें लोहे की नहीं कॉन्ट्रैक्ट्स और बैलेंस शीट्स की
13:53 होती हैं। मगर उनकी पकड़ सबसे ज्यादा कसने वाली होती है। लेसन सात अर्थव्यवस्था है रिग्ड। क्या आपने कभी नोटिस किया है कि हर कुछ सालों में एक बड़ा फाइनेंशियल क्राइसिस आता है। कभी स्टॉक मार्केट क्रैश, कभी हाउसिंग बबल फटता है? कभी रिसेशन। ग्रिफिन बताते हैं कि यह सब इवेंट्स नेचुरल नहीं है बल्कि डेलीबेटली डिजाइन किए गए पैटर्न्स हैं जिन्हें ब्यूम और बस्ट साइकिल्स कहते हैं। बड़े फाइनेंसियल इंस्टीटशंस और इंसाइडर्स पहले मार्केट में सस्ती लिक्विडिटी और ऑप्टिमिज्म फैलाते हैं। मीडिया से हाइप क्रिएट करवाई जाती है। लोग इन्वेस्ट करने लगते हैं, घर खरीदते हैं, लोन लेते हैं। लेकिन जब मार्केट एक पीक पर पहुंचता है, यह इंसाइडर साइलेंटली एग्जिट कर जाते हैं। फिर आता है क्रैश जिसकी कीमत चुकाते हैं मिडिल क्लास लोग। नौकरी जाती है, घर बिकते
14:40 हैं, सपने टूटते हैं। ग्रिफिन कहते हैं, यह एक इंजीनियर्ड सिस्टम है जिसमें वेल्थ नीचे से ऊपर खींची जाती है। प्रॉफिट अमीरों को और नुकसान जनता को। 2008 में अमेरिका की हाउसिंग मार्केट में एक हिस्टोरिक बूम चल रहा था। बैंक्स ने अग्रेसिवली और बिना प्रॉपर चेकक्स के लोनस दिए। लो इनकम फैमिलीज तक को बड़े घर के सपने बेच दिए गए। इस रिस्की लेंडिंग को पीछे से फ्यूल कर रहे थे वॉल स्ट्रीट बैंक्स और क्रेडिट रेटिंग एजेंसीज जो पूरी तरह जानते थे कि यह लोंस हाई रिस्क हैं। लेकिन फिर भी उन्हें एए जैसी सेफ रेटिंग दी गई ताकि इन्वेस्टर्स भी फंस जाएं। ग्रिफिन कहते हैं यह कोई नाइव मिस्टेक नहीं थी बल्कि एक प्रीप्लांड फाइनेंसियल ट्रैप था। जैसे ही मिलियंस ऑफ लोग अपने हार्ड अर्न पैसे से घर खरीदने और मॉर्गेज
15:27 में हेवीली इन्वेस्ट करने लगे। अचानक मार्केट का ताश का महल गिर गया। हाउसिंग प्राइसेस फ्री फॉल में आ गई। फोरक्लोज़र की लहर ने लाखों फैमिलीज को बेघर कर दिया और काउंटलेस अमेरिकनंस की लाइफटाइम सेविंग्स मिट्टी में मिल गई। आइरोनिकली वही बैंक्स जो इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड थे उन्हें सरकार ने टैक्स पेयर्स के पैसों से मैसिव बेल आउट्स दिए। इनाइडर्स ने टॉप पर सेल ऑफ कर दिया। प्रॉफिट पॉकेट कर लिया और नीचे खड़े आम लोग पूरी तरह बर्बाद हो गए। यह कोई रैंडम एक्सीडेंट नहीं था। यह एक स्क्रिप्टेड हाइस थी जिसमें मिडिल क्लास को सिर्फ हारने के लिए बैठाया गया था। लेसन एट ओनली अवेयरनेस कैन सेट यू फ्री। ग्रिफिन कहते हैं कि इस पूरी किताब का मकसद किसी को डराना नहीं बल्कि जागृत करना है। आज की दुनिया में फाइनशियल सिस्टम इतना कॉम्प्लेक्स और हिडन है कि आम इंसान
16:12 को कभी असली रूल्स समझ ही नहीं आते। और जब आप रूल्स नहीं जानते तो आप गेम नहीं जीत सकते। ग्रिफिन का मैसेज साफ है। नॉलेज इज योर ओनली डिफेंस। जब तक लोग यह नहीं समझते कि पैसे की वैल्यू कैसे बनती है, लोन कैसे ट्रैप करता है, इनफ्लेशन कैसे चुपचाप लूटता है, तब तक वह फाइनेंसियल गुलामी से बाहर नहीं निकल सकते। इसलिए अवेयरनेस ही पहला कदम है। फाइनेंसियल एजुकेशन कोई लग्जरी नहीं है। यह सर्वाइवल की बेसिक नीड बन चुकी है। और यह किताब क्रिएचर फ्रॉम जेकिल आइलैंड एक हथियार है जो आपको इस अदृश्य जाल से बाहर निकाल सकता है। रघाव एक टिपिकल मिडिल क्लास नौकरी पेशा इंसान है। हर महीने की फिक्स्ड सैलरी उस पर भारी ईएमआई, क्रेडिट कार्ड बिल्स और बढ़ती हुई इनफ्लेशन। उसकी लाइफ एक एंडलेस साइकिल में
16:58 फंसी हुई थी। सैलरी आती, ईएमआई जाती, कार्ड का पेमेंट होता और महीने के आखिर में बचता ऑलमोस्ट नथिंग। स्ट्रेस उसका कांस्टेंट साथी बन चुका था और फ्यूचर के सपने धीरे-धीरे फेड हो रहे थे। एक दिन लेट नाइट YouTube स्क्रोल करते हुए उसे द क्रचर फ्रॉम जेकिल आइलैंड की समरी मिलती है। पहली बार उसे क्लियर होता है कि यह फाइनेंसियल सिस्टम कैसे डिजाइन किया गया है और कैसे वो अननोइंगली एक इनविज़िबल ट्रैप का हिस्सा है। रघव ने उस दिन डिसाइड किया कि अब वो अपनी फाइनेंसियल डेस्टिनी खुद कंट्रोल करेगा। उसने बेसिक फाइनेंसियल लिटरेसी से शुरुआत की। अननेसेसरी खर्च काटे, डेप्ट रीपेमेंट प्लान बनाया और धीरे-धीरे पूरी तरह डे फ्री हो गया। फिर उसने इमरजेंसी फंड बनाया, स्मार्ट इन्वेस्टिंग सीखी और पैसिव
17:44 इनकम सोर्सेस डेवलप किए। आज राघव सिर्फ वित्तीय रूप से सुरक्षित नहीं है। वो दूसरों को भी एजुकेट करता है ताकि वह भी इस इनविज़िबल स्लेवरी से निकल सकें। जैसा ग्रिफिन कहते हैं, सिस्टम के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार अवेयरनेस है। अगर रघाव जैसे लाखों लोग जागरूक हो जाए, तो कोई भी हिडन पावर उन्हें गुलाम नहीं बना सकती। आपने आज जाना कि द क्रिएचर फ्रॉम जैकेल आइलैंड सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि एक ऐसा रहस्य है जो दिखाता है कि कैसे कुछ गिनेचुने लोग पूरी दुनिया की इकॉनमी को अपने इशारों पर चलाते हैं। ऐसी ही माइंड ओपनिंग किताबों को हम रोज डिकोड करते हैं सिर्फ स्मॉल चेंजेस बिग डिफरेंसेस पर। और हां, हम हर सुबह 10:00 बजे लेकर आते हैं एक नई किताब की नई सोच। मिलते हैं कल एक और पावरफुल वीडियो के साथ।
18:31 धन्यवाद देखने के