0:00 एजुकेशन मिनिस्टर जजी की एक बहुत बड़ी जीत के तरीके से सेलिब्रेट किया जा रहा है। अब जेजी के लिए कल की सुबह कैसे होने वाली है? हजार सीटों के लिए 12 लाख युवा भागे जा रहे हैं। इन पर इतना दबाव बनाया किसने? शुरुआत वहां से करनी पड़ेगी ना। नहीं तो कल की सुबह कुछ बदलने नहीं वाला। इस्तीफा आ गया। लेकिन उससे कुछ बदलने नहीं वाला। सर ये धारणा मजबूत हो जाएगी कि इसी तरह का प्रोटेस्ट करने से बदलाव आएगा। उसको आपने आंख खोले बिना ही सड़कों पर भेज दिया तो सड़कों पर फिर क्रांतियां नहीं होती। हादसे होते हैं, दुर्घटनाएं होती हैं। युवाओं में अभी थोड़ी मासूमियत बाकी होती है तो थोड़ा भोलापन होता है। वो इन मंजे हुए राजनेताओं के खेल समझते भी नहीं है। दोनों ही ओर अपने-अपने पॉलिटिकल स्वार्थ
0:45 साधे जा रहे हैं और मुझे डर यह है कि इस चक्की में जो हमारा युवा है वो बेचारा पिस जाएगा। ये गाना याद आ रहा है। मुझे लग रहा है कि इस वक्त पर मैं उसको जजी के लिए गा दूं। नजरों में अपनी जब गिरने लगो, अंधेरों में अपने ही जब गिरने लगो, नमस्ते आचार्य जी। मेरा प्रश्न देश में चल रहे पेपर लीक प्रोटेस्ट्स के ऊपर है। तो पिछले कुछ घंटों में एक खबर आई है जिसमें एजुकेशन मिनिस्टर ने अपना इस्तीफा दे दिया है। अब इसको जजी के द्वारा एक बहुत बड़ी जीत के तरीके से सेलिब्रेट किया जा रहा
1:31 है। तो आचार्य जी मेरा प्रश्न यह है अब जेंजी के लिए कल की सुबह कैसे होने वाली है और कल और क्या इस सब के बाद जितना कुछ हुआ कुछ वास्तविक बदलाव एक्सपेक्ट किया जा सकता है क्या तुमने जवाब खुद ही दे दिया मैं इसमें क्या बोलूं सबसे पहले तो बहुत अच्छी बात है आपने आंदोलन करा को लग रहा था कि मंत्री के इस्तीफे से बात बनेगी। आपको इस्तीफा मिल गया। बधाई हो। लेकिन हां अच्छा सवाल है कि अब कल की सुबह अलग कैसे होने वाली है? कल क्या बदल जाने वाला है?
2:19 क्या बदल जाने वाला है? पता नहीं। तुम बताओ क्या बदलेगा कल? मंत्री बदल गया है और क्या बदला है? मंत्री तो बदल गया है। और शायद अच्छा हुआ। मंत्री बदल गया। ठीक है? एजुकेशन सेक्रेटरी को भी बदला गया है। और भी कई अफसर हैं। उनको भी हटाया गया है। कुछ लोग गिरफ्तार भी हुए हैं। उनकी जवाबदेही है। उनको एक जिम्मेदारी दी गई है व्यवस्था चलाने की। वो नहीं चला पाए। उनको हटना पड़ा। वो ठीक है। पर कल क्या-क्या बदला हुआ होगा? मैं जानना चाहता हूं। बैठो बैठो। हां ठीक है। और क्या बदला हुआ होगा? सर यह धारणा मजबूत हो जाएगी कि इसी तरह का प्रोटेस्ट करने से बदलाव आएगा। चलो शुरू से शुरू करें।
3:12 भारत में अभी हाल के वर्षों में प्रतिवर्ष लगभग 15,000 युवा आत्महत्या करते हैं। जजी उनकी बात हो रही है। कितने? 15,000 और पिछले 15 सालों में यह आंकड़ा लगभग दो गुना हो गया है। दो गुना हम क्यों जजी और आत्महत्या के आंकड़ों से बात शुरू कर रहे हैं? क्योंकि एक बड़ी दर्दनाक घटना घटी थी अभी नीट पेपर लीक के साथ हम 10 से अधिक छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी और वही मूल मुद्दा था। वही असली बात थी कि
3:59 हमारे युवा जबरदस्त दबाव में हैं, तनाव में हैं। वही तो असली ह्यूमन ट्रेजडी है ना। हमें उसी का तो समाधान चाहिए ना। तो मैं बात वहीं से शुरू करता हूं। बैठ जाओ। 15,000 युवा प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं। ठीक है? थोड़ा बहुत आंकड़ा ऊपर नीचे होता रहता है हर साल। और ये आंकड़ा 15 साल पहले की अपेक्षा लगभग दो गुना हो गया। 80 90% बढ़ा हुआ है। आशंका यह है कि भविष्य में और बढ़ेगा यह। अब एक और आंकड़ा सुनो। इन 15,000 में से सिर्फ
4:45 1500 होते हैं जिनकी आत्महत्या का कारण होता है फेलियर इन एग्जामिनेशन। जिन्होंने आत्महत्या सिर्फ इसलिए करी थी क्योंकि उनको किसी परीक्षा में सफलता नहीं मिली। चाहे वो बोर्ड एग्जाम हो, चाहे एंट्रेंस एग्जाम हो। ठीक है? 15,000 में से 1500 जिनकी आत्महत्या का संबंध परीक्षाओं से था। और इन 1500 में से भी और बहुत बहुत कम है जिनका जिनका संबंध पेपर लीक की किसी घटना से हो। विशेष घटना से क्योंकि पेपर कोई पहली बार नहीं
5:30 लीक हुआ है। हम जानते हैं पिछले 10 15 सालों में पेपर्स लगातार लीक हुए हैं। दर्जनों बार लीक हुए हैं। दर्जनों बार। ठीक है? तो पेपर लगातार लीक होते रहे हैं और हमने यह पाया है कि 15,000 में से सिर्फ 1500 होते हैं जिनकी आत्महत्या का हम हम युवाओं की बात कर रहे हैं। हम जेंजी की बात कर रहे हैं। जिनकी आत्महत्या का संबंध परीक्षा में उनकी परफॉर्मेंस से होता है। और उन 1500 में से भी और शायद बम मुश्किल 10 से 20 होते हैं जिनका संबंध हम जिनकी दर्दनाक मृत्यु का आत्महत्या का संबंध पेपर लीक से होता है। तो फिर प्रश्न
6:18 ये उठता है कि बाकी सब लगभग बाकी सारे के सारे 14990 वो युवा क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? और उनके लिए कल क्या बदल गया? क्या बदल गया? क्या हम मूल समस्या को समझना भी चाह रहे हैं? मूल समस्या यह है कि भारत अपने बच्चों और अपने युवाओं के साथ जबरदस्त नाइंसाफी करता है। ये है मूल समस्या। और ताज्जुब मुझे इस बात पर होता है कि इस मूल समस्या को स्वयं युवा ही नहीं समझना चाहते। जबकि नाइंसाफी उन्हीं के साथ हो रही है लगातार। मैं इसे नाइंसाफी क्यों बोल रहा हूं? क्योंकि
7:06 जब उनके साथ समाज का व्यवस्था का परिवार का दुर्व्यवहार शुरू होता है तब वो इस हालत में भी नहीं होते हैं कि कोई चुनाव कर सके। देखो मैं आमतौर पर बोलता हूं कि किसी को विक्टिम कार्ड नहीं खेलना चाहिए। मैं आमतौर पर बोलता हूं कि कोई यह ना कहे कि मेरे साथ नाइंसाफी हुई। मेरे साथ गलत हुआ। मैं तो मजबूर था। लेकिन उसमें एक अपवाद होता है बच्चा। चुनाव वह करेगा ना जिसका कम से कम शारीरिक तंत्र इतना विकसित हो। ब्रेन इतना विकसित हो कि वह चुनाव कर पाए। चार साल चार साल तो ज्यादा हो गया। 4 महीने, 2 साल, 4 साल, छ साल, 8 साल, 14 साल का भी बच्चा चुनाव नहीं कर सकता। वो हर तरीके से आश्रित है। उसे कुछ नहीं पता।
7:56 और उसके सामर्थ्य भी कुछ नहीं। और यही वह वर्ग है जिसके साथ समाज व्यवस्था सबसे ज्यादा अन्याय करते हैं। 22 लाख सोचो 22 लाख कैंडिडेट्स हैं। 22 लाख या 24 लाख सीटें कितनी? 25,000 या 5,000 ऐसे ही रहती हैं। गवर्नमेंट की 25,000 सीटें। यूपीएससी कितना? 20 लाख या और ज्यादा? 12 लाख। और सीटें कितनी? हजार मैं पूछ रहा हूं इन बच्चों को इन युवाओं को सबसे पहले ये बताओ ये सिखाया किसने कि
8:43 इन्हीं रास्तों पर भागना जरूरी है। इन पर इतना दबाव बनाया किसने? कि हजार सीटों के लिए 12 लाख युवा भागे जा रहे हैं। शुरुआत वहां से करनी पड़ेगी ना। नहीं तो कल की सुबह कुछ बदलने नहीं वाला। इस्तीफा आ गया लेकिन उससे कुछ बदलने नहीं वाला बल्कि होगा यह कि वो लोग जो खुद उत्तरदाई हैं युवाओं पर पड़ते घोर दबाव के लिए तनाव के लिए वही सेलिब्रेशन की पार्टी में सबसे आगे आगे होंगे। उदाहरण के लिए कोचिंग इंस्टीटशंस युवाओं की जो दुर्गति है उसके बहुत बड़े बेनिफिशरी तो कोचिंग इंस्टीटशंस ही हैं।
9:31 बहुत सारी ये जो एग्जामिनेशन रिलेटेड सुसाइड्स होती हैं ये कोचिंग टाउनंस में होती हैं। पर अभी अब जब उत्सव का माहौल बनेगा कि हां युवा जीत गए तो उसमें बहुत सारे लोग आगे आगे होंगे जिसमें कोचिंग वाले भी आगे आगे होंगे। मां-बाप भी कह रहे होंगे कि हां हां मेरा बच्चा भी गया था वहां पर जंतरमंतर पर प्रदर्शन में तो हमने सरकार को झुकाया देखो मेरे बच्चे ने करके दिखाया। मेरे बच्चे ने तो करके दिखाया पर तुम खुद वो हो जिसने अपने बच्चे पर उम्र भर प्रेशर बनाया। उम्र भर प्रेशर बनाया। वह असली ट्रेजडी है जिसकी बात कोई नहीं करना चाहता। एक समाज के तौर पर, एक शिक्षा व्यवस्था के
10:18 तौर पर, एक परिवार के तौर पर और व्यक्तियों के तौर पर क्योंकि मां-बाप सबसे पहले व्यक्ति होते हैं, इंसान होते हैं। हम कैसे हैं कि हम अपनी औलादों को अपने अरमान पूरा करने का जरिया बना लेते हैं। इस सवाल पर कोई बहस नहीं हो रही। और जब कोई बहस नहीं हो रही तो मुझे डर है कि कल की सुबह अलग नहीं होने वाली। कल फिर से सुबह ना जाने कितने बच्चों और युवाओं को जबरदस्ती अंधेरे रास्तों पर धकेल दिया जाएगा। अरे हमारे अरमान और हमारी इज्जत के लिए तुम जाओ अब इंजीनियरिंग करो।
11:05 जाओ तुम्हें डॉक्टर बनना ही पड़ेगा। क्योंकि बुआ का लड़का बन गया है ना जाकर डॉक्टर। तो तुम्हें भी डॉक्टर बनना पड़ेगा। नहीं नहीं ये सब तुम क्या कर रहे हो? छोटी मोटी नौकरी नहीं चलेगी। प्राइवेट नहीं चलेगा। आओ घर बैठो यूपीएससी की तैयारी करो। अच्छा तुम्हें दिल्ली जाकर तैयारी करनी है। यूपीएससी की चलो हम देते हैं पैसा। जाओ हमारी इज्जत का सवाल है। तुम हमारे सपने साकार करके दिखाओ। ये सब कल सुबह फिर शुरू हो जाएगा। और ये वो कारण हैं जिन कारणों से युवा टूटता है। आत्महत्याएं होती हैं। ये कारण बरकरार रहने वाले हैं। कोई चर्चा नहीं कर रहा।
11:50 आज जो युवा उत्सव मना रहे हैं। वही कल के अभिभावक हैं। मां-बाप हैं। है ना? और वही कल अपने बच्चों पर फिर से दबाव डालने वाले हैं कि चलो चलो चलो जिंदगी की रेस जीत कर दिखाओ। और जिंदगी है क्या वो जानते नहीं। जिंदगी का कुछ पता नहीं पर जल्दी से मां-बाप बन जाना है और फिर अपने बच्चों को धकेलते जाना है। ये असली ट्रेजडी है जिसकी हम बात कर ही नहीं रहे जिसके बाद कोई धरना कोई प्रोटेस्ट नहीं करता। तुम सोचो तो तुम जा रहे हो। तुम प्रोटेस्ट कर रहे हो। तुम क्या बोल रहे हो? तुम कह रहे हो कि जो परीक्षा है उसका प्रोसेस
12:36 फेयर होना चाहिए। तुम ये भी तो बता दो कि तुमने इस बात की कोई तहकीकात करी कि तुम्हें उस परीक्षा में बैठना भी चाहिए था या नहीं। तुम यह तो बार-बार बोल रहे हो कि द एग्जाम, द एंट्रेंस एग्जाम, द सिलेक्शन प्रोसेस मस्ट बी फेयर एंड ट्रांसपेरेंट। और यह बहुत वाजिब मांग है। मैं सहमत हूं इससे। बिल्कुल सहमत हूं। भाई आप अगर परीक्षा ले रहे हो और वह फेयर नहीं है, ट्रांसपेरेंट नहीं है तो आप परीक्षा ले ही क्यों रहे हो? फिक्स्ड मैच कौन खेलना चाहता है? आपने पहले से ही तय कर रखा है कि कौन सेक्ट होगा, कौन नहीं सेलेक्ट होगा। आप कभी पेपर लीक कर रहे हो, कभी सिलेक्शन बोर्ड का बायस है, कभी इंटरव्यू पैनल का अपना प्रिजुडिस है। आप ये सब नौटंकी अगर करने
13:22 वाले हो तो एग्जाम लो ही मत। मैं भी चाहता हूं कि जब परीक्षा हो तो बिल्कुल फेयर हो, ट्रांसपेरेंट हो, न्याय होना चाहिए। और मैं खुद लाभार्थी रहा हूं ऐसी परीक्षाओं का जो फेयर थी, मेरिट बेस थी। तो होना चाहिए। लेकिन यह तो बता दो कि यह जो इतने सारे लोग उन परीक्षाओं में बैठ रहे हैं उन्हें बैठना भी चाहिए था क्या? परीक्षा तो फेयर होनी चाहिए थी। पर क्या हो अगर पता चले कि तुम उस परीक्षा में नाहक ही बैठे कि तुम एक ऐसी सड़क के गड्ढों को हटाने की
14:07 मांग कर रहे हो जिस सड़क पर तुम्हें कभी चलना ही नहीं चाहिए था। इसको तो फिर वही कहिए ना बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना। तुम कह रहे हो कि यह जो सड़क है सरकार की जिम्मेदारी है कि इसके गड्ढे भर दे। मैं भी मानता हूं भाई सड़क है तो उसके गड्ढे भरे हुए होने चाहिए। पर उससे बिल्कुल हटकर और ज्यादा जरूरी एक दूसरा सवाल है वो ये है कि तुम इस सड़क पे हो क्यों? तुम्हें इस सड़क पर भेज किसने दिया? मैं मानता हूं गड्ढे नहीं होने चाहिए सड़क पे। सरकार भरे और सरकार नहीं भर रही तो सरकार की अकाउंटेबिलिटी सरकार को भरना चाहिए। ठीक? पर तुम ये तो बता दो तुम क्यों हो इस सड़क पर? इतने सारे लोग ये यूपीएससी, जेई, नीट
14:53 क्या ये सचमुच तुम्हारी अपनी मंशा है? या तुम किसी और व्यवस्था के शिकार हो और उस व्यवस्था का तुम नाम भी नहीं ले रहे हो। तुम अपना सारा आक्रोश स्टेट पर निकाल रहे हो और तुम्हारा आक्रोश जायज भी है। स्टेट ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई आक्रोश होना चाहिए। पर इसका आधा भी आक्रोश उन इंस्टीटशंस के प्रति नहीं जिन्होंने तुम्हें अंधी राहों पर धकेल दिया। बोलो तो। और अगर नहीं है तो कल की सुबह फिर यही होने वाला है
15:39 कि बिल्कुल एक अनमना सा बच्चा या नौजवान आप पाओगे कि मां के द्वारा या बाप के द्वारा स्कूल बस पर धकेला जा रहा है। जबरदस्ती धक्का देकर कॉलेज की ओर भेजा जा रहा है। ट्रेन का टिकट कटा करके कोटा की ओर भेजा जा रहा है। जाओ वहां जाओ। तुम्हें भी तो आईआईटीए बनना है। क्यों बनना है? क्यों बनना है? यह बनने का कांसेप्ट क्या है? लाइवलीहुड मैं भी मानता हूं। होनी चाहिए। भूखा किसी को नहीं मरना चाहिए। हम सबके लिए कमाना जरूरी है भाई। पर लाइफ क्या
16:25 सिर्फ लाइवलीहुड होती है या उससे आगे की कोई बात होती है और क्या सचमुच आज के समय में लाइवलीहुड इतनी बिरली चीज है इतनी बड़ी और इतनी महंगी चीज है कि लाइवलीहुड लाइवलीहुड कर कर के तुम उसका बचपन और जवानी दोनों खराब कर दो। यह असली ट्रेजडी है आज के युवा की हमारी जजी की और ज्यादा बड़ी इससे यह ट्रेजडी है कि वह अपनी ही ट्रेजडी से परिचित नहीं है। उसको लग रहा है कि मेरे साथ नाइंसाफी यह हुई है कि पेपर लीक हो गया। मैं कह रहा हूं ऐसा भी तो हो सकता है कि ज्यादा बड़ी नाइंसाफी यह थी कि तुम उस पेपर में बैठे।
17:11 क्योंकि तुम्हें उस पेपर में जबरदस्ती बैठाया गया है। देखो अपनी जिंदगी को और पूछो अपने आप से। क्या सचमुच तुम्हें उस पेपर में बैठना भी था? हर चीज में तो तुम आजादी ही आजादी कहते हो। और जिंदगी अपने बोध, अपने विवेक के अनुसार जीने की, चलने की आजादी उसका कोई अर्थ नहीं। वो कहां है? तो ढाक के तीन पाथ समस्या खून में है।
17:58 तमाम तरह के टॉक्सिंस खून में बह रहे हैं। खून ही गंदा हो गया हमारा। और एक मुहासा फोड़ करके हम पार्टी करना चाहते हैं कि देखो फतह जीत मिल गई। जैसे कि वो मुहासा समस्या था। वो लक्षण था। सिम्टम था बस सिम्टम। मूल समस्या जस की तस है और अब खतरा ये है कि आप मूल समस्या से और ज्यादा बेखबर हो जाएंगे। आप कहेंगे देखो हमने मुहासा फोड़ के समस्या तो हल कर दी ना तो अब कौन सी समस्या बची? जब ऐसा सोचने लग जाओ तो जो असली समस्या है वो और बढ़ जाती है विकराल
18:43 हो जाती है। पेपर लीक भी तुम समझ रहे हो क्या चीज है। इतने सारे लोगों को इतने सारे लोगों को चंद सीटें चाहिए। एक-एक सीट के ऊपर हजार या 10-10,000 कैंडिडेट बैठे हुए हैं। यह एक सजा सजाया बाजार है भाई। पेपर लीक हुआ तो खरीदा किसने था? स्टूडेंट्स ने ही तो खरीदा है खुद।
19:31 तो प्रोटेस्ट फिर किसके खिलाफ हो रहा है? पेपर लीक हुआ। मंत्रालय से लीक हुआ। वहां कोई ऑफिसर बेईमान है। फिर कोई बीच में दलाल आया होगा। और खरीदा किसने है पेपर? स्टूडेंट ने ही तो खरीदा है। तो उन स्टूडेंट्स के खिलाफ कब प्रोटेस्ट होगी जिन्होंने पेपर खरीदा? उन स्टूडेंट्स के खिलाफ कब प्रोटेस्ट होगा जिन्होंने पेपर खरीदा था? और जिन्होंने पेपर खरीदा था उनमें से कितने लोग प्रोटेस्ट करने आए? इतने सारे स्टूडेंट्स आए प्रोटेस्ट करने। उनमें वो कहां है जिन्होंने पेपर खरीदा था। और इतनों की गिरफ्तारियां भी हुई, सब हुआ।
20:20 वो मां-बाप जिनके पैसे से पेपर खरीदा गया उनकी संतानों के लिए। उनका नाम कौन लेगा? हम ऐसा दर्शाना चाहते हैं जैसे समस्या वहां है बाहर कहीं और माफ करिएगा आपको मैं सवाल पूछूंगा असुविधा हो जाएगी आपको बुरा लगेगा गुस्सा आएगा मेरे ऊपर पर कर लीजिए गुस्सा मैं भी पूछना चाहता हूं ऐसा तो नहीं कि ऐसे भी प्रोटेस्टर्स थे जिनको अगर किसी तरह पेपर मिल गया होता और सिलेक्शन हो गया होता तो वह कदा आप भी प्रोटेस्ट में नहीं आते।
21:11 बोलिए तो हम प्रोटेस्ट कर किसके खिलाफ रहे हैं? इस बात के खिलाफ कि उसने फायदा उठा लिया लीक का। फिर तो प्रोटेस्ट इस बात के खिलाफ है कि लीक हुआ पेपर और फायदा उसने उठा लिया। क्योंकि ये सवाल चुभता है और मुझे मालूम है इस सवाल को सुनकर बहुतों को गुस्सा आएगा लेकिन फिर भी सवाल तो सवाल है और आप जवान लोग हैं। आप भी इतने सवाल करते हैं तो आपको बुरा नहीं लगना चाहिए। कि मैं भी अगर आपसे कुछ सवाल करूं तो बहुत बार तो ऐसा भी हुआ होगा ना बताना कि
21:58 पेपर चुपचाप लीक हो गया किसी को पता ही नहीं चला। ऐसा भी तो होता होगा। हमें तो बस वो किस्से पता चलते हैं जहां पेपर लीक हुआ और यह बात भी लीक हो गई कि लीक हुआ। तो हमें तो डबल लीक पता चलती है। दो घटनाएं हैं। एक है पेपर का लीक होना और दूसरा इस बात का लीक होना कि पेपर लीक हो गया। इनमें ऐसा भी तो होता होगा ना बहुत सारे राज्यों में, बहुत सारे सालों में, बहुत सारे एग्जाम्स में कि पेपर लीक हुआ और चुपचाप लीक भी हो गया। जिन्हें खरीदना था उन्होंने खरीद भी लिया। वो सेलेक्ट भी हो गए। वो डॉक्टर, इंजीनियर उन्हें जो बनना था वो बन भी गए। ये सब जो बन गए डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस जो भी बन गए इन्हें तो हमने कभी प्रोटेस्ट करते नहीं देखा। इन्हें तो नहीं देखा ना? तो कुल मिलाकर बात यह है कि
22:44 मेरा हित सध जाए। मेरा हित सध जाए और यही जो बात है यह कल की सुबह को बदलने नहीं देगी। ऊर्जा और आक्रोश खूब है युवाओं के पास। लेकिन विवेक के बिना आक्रोश अंधा हो जाता है। अंधे आक्रोश से अंधी ऊर्जा से कुछ नहीं होगा। राजनेता बहुत खाए खेले लोग होते हैं।
23:33 आप जब हंस रहे होंगे पार्टी कर रहे होंगे कि देखो हम जीत गए। वहां पर पांच पॉलिटिशियंस बैठे होंगे। वह स्क्रीन पर आपको पार्टी करते देख रहे होंगे और वह आपस में मुस्कुराएंगे और कहेंगे कि यह सोचते हैं कि ये जीत गए। युवा है। युवाओं में अभी थोड़ी मासूमियत बाकी होती है। तो थोड़ा भोलापन होता है। वह इन मंजे हुए राजनेताओं के खेल समझते भी नहीं है। चाहे वो राजनेता अपोजिशन का हो जो इनके समर्थन में आ गया है। और चाहे वो राजनेता रूलिंग पार्टी का हो जिसके खिलाफ यह नारे लगा रहे हैं। दोनों ही ओर अपनेपने पॉलिटिकल स्वार्थ साधे जा रहे हैं और मुझे डर यह है कि इस चक्की में जो हमारा युवा
24:20 है वो बेचारा पिस जाएगा। उसको पता भी नहीं चलेगा कि दोनों ही ओर के पॉलिटिशियंस उसका फायदा उठा ले गए। कुछ बदला नहीं। हम बस म्यूजिक चेयर्स चल रही हैं पिटिकल कुर्सियों पर। सोशल मीडिया पर जजीस के थ्रू बहुत सारी चीजें पता चली थी कि प्रोटेस्ट के बारे में और ऐसे कॉल टू एकशंस भी थे कि आप भी आइए और जुड़िए हमारे साथ क्योंकि मैं भी जजी हूं तो मुझे भी कुछ ना कुछ करना था मेरी जनरेशन के लिए जिनके साथ इतना नाइंसाफी हो रहा था और यह कंफ्यूजन भी था कि उधर वायलेंस भी है और आपको सुन के उतना
25:05 समझा भी कि वो जो भी है इवन दो जस्टिफाइड है बट शैलोनेस से आ रहा है। पूरी समझ पूरी समझ से नहीं आ रहा कि क्या एक्चुअल प्रॉब्लम है। तो फिर अगर मेरे जैसे कोई एजेंसीज होंगे जिनको यही कंफ्यूजन है कि जाए और ना जाए तो फिर कैसे हेल्प कर सकते हैं यही प्रॉब्लम को सॉल्व करने में। देखो जाओ बेशक जाओ। ठीक है? पर जैसे हो ऐसे रहते हुए मत जाओ। गीता इसमें सबसे सुंदर उदाहरण है। देखो कृष्ण क्या कर रहे हैं। अर्जुन के पास दो
25:51 त्वरित विकल्प हैं। इमीडिएट ऑप्शंस। पहला युद्ध छोड़ कर के चला जाऊं। यह हुआ ना जाना। कि कहीं कुछ हो रहा है। मैं उस संघर्ष से पीछे हट गया। कृष्ण ने कहा नहीं तुम्हें लड़ना पड़ेगा। लेकिन कृष्ण ने ये नहीं कहा जैसे हो वैसे ही लड़ जाओ। कृष्ण ने कहा पहले गीता सुनो पूरी फिर लड़ना। ये कह रहा हूं। और गीता सुने बिना अगर लड़ोगे तो गड़बड़ हो जाएगी। बहुत गड़बड़ हो जाएगी। अब आपके तर्क यह उठेगा तो क्या हम ज्ञानी और विद्वान होने का इंतजार करते रहे लड़े
26:39 नहीं और क्या कभी भी ऐसा हो सकता है कि सबको पूरा ज्ञान हो जाए उसके बाद ही क्या हम निकलेंगे प्रोटेस्ट करने नहीं तुम मेरी बात नहीं समझ रहे हो पहली बात कृष्ण ने सबको नहीं कहा कि आओ आओ आओ आओ गीता सुनो और गीता एग्जाम पास करो तभी लड़ोगे यही ये क्राइटेरिया है। एंट्रेंस क्राइटेरिया है। नहीं उन्होंने कहा कि जो सर्वश्रेष्ठ है और जो नेतृत्व करने वाला है मैं उससे बात करूंगा। और उसके ऊपर एक क्वालिफाइंग क्राइटेरिया लगाया। बोले ऐसे नहीं तू एक भी तीर चला सकता। पहले गीता सुन। कृष्ण ने यह बात
27:27 सारे कौरवों और सारे पांडवों को लेकर नहीं कही। पूरी सेनाओं को इतने अक्षोहणी वहां पर सेनाएं खड़ी हुई थी सबको ले नहीं कहीं सारे पांडवों को ले भी नहीं कहीं यह भी नहीं कहा कि अरे कम से कम युधिष्ठिर आप धर्मराज हैं आप भी आइए बैठिए गीता चल रही है लेकिन जो सबसे अग्रणी था लड़ने में जो सबसे ज्यादा कह रहा था कि मैं तो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हूं युद्ध किस तरफ को जाएगा ये मुझ पर निर्भर करता है। कृष्ण ने कहा तुम तुम तुम नहीं लड़ सकते जब तक कि तुम गीता से गुजरे नहीं हो। और मैं तुम्हें भागने भी नहीं दूंगा। लड़ना तो तुम्हें पड़ेगा युद्धस्व लड़ो पर जैसे तुम हो ऐसे नहीं लड़ सकते। ऐसे नहीं।
28:18 जिस भीड़ की आंख नहीं खुली है उसको आपने आंख खोले बिना ही सड़कों पर भेज दिया तो सड़कों पर फिर क्रांतियां नहीं होती। हादसे होते हैं, दुर्घटनाएं होती हैं। जिन्हें खासकर सड़क पे उतरना है उनके लिए और जरूरी हो जाता है कि उनकी आंखें खुली हुई हो। मैं तुमसे कह रहा हूं आंखें खोलो पहले। फिर उतरो सड़क पे। बिल्कुल उतरो। फिर मैं भी उतरूंगा तुम्हारे साथ। पर आंखें बंद करके नहीं। ऐसे नहीं चलेगा। सवाल का एक हिस्सा अभी भी शेष रह जाता है। तो आंख खोलने में तो पता नहीं कितना वक्त लग जाएगा। कितना वक्त लगा था। अर्जुन से बात कर रहे हैं कृष्ण। कितना वक्त लग गया था। 12 साल दोनों तरफ दोनों तरफ सेनाएं
29:07 सजी हुई थी। इतना तो वक्त है ही नहीं कि बहुत वक्त नहीं लगता भाई। अर्जुन को लेकर नहीं गए थे कि चलो पहले मेरे साथ 12 साल की रिट्रीट पर और जब पूर्ण ज्ञानी बन जाओगे सिर्फ तभी तुम आकर के युद्ध करोगे। हम बहुत अच्छे से जानते हैं कि गीता के 700 श्लोकों के बाद भी अर्जुन पूर्ण ज्ञानी नहीं बन गए थे। हम जानते हैं गीता के बाद फिर महाभारत के युद्ध के बाद अर्जुन को पुनः गीता के उपदेशों की जरूरत पड़ी थी और तब अर्जुन की बात शुरू ही यहां से होती है कि पहले आपने जो गीता का उपदेश दिया था वो मैं भूल गया हूं तो पुनः बताएं तो पूर्ण ज्ञान का इंतजार करने को आपको नहीं कह रहा हूं बाबा कि जब पूरे तरीके से तुम लिबरेटेड हो जाओ या रियलाइज्ड हो जाओ सिर्फ तब लड़ने जाना है। मैं कह रहा हूं
29:52 कम से कम अर्जुन जैसे तो हो जाओ एक न्यूनतम तल की स्पष्टता तो आ जाए जीवन में। तब लड़ो और तब तुम ऐसे लड़ोगे कि तुम्हें कोई रोक नहीं पाएगा। जैसे अर्जुन को कोई रोक नहीं पाया। और अर्जुन को रोक कोई इसीलिए नहीं पाया। क्योंकि अर्जुन अपने न तो 100 कौरव भाइयों के साथ थे। और ना चार पांडव भाइयों के साथ थे। अर्जुन कृष्ण के साथ थे। तुम चाहते हो कि तुम्हारा युद्ध ऐसा हो कि तुम रोके ही ना जा सको तो तुम्हें कृष्ण और कृष्ण से मेरा आशय आप
30:39 जानते ही हैं। किसी व्यक्ति से नहीं है। एक दिशा से है। स्पष्टता की ही दिशा को आंतरिक स्पष्टता की दिशा को कृष्णत्व कहते हैं। 12 साल इंतजार करने को नहीं कह रहा हूं। 18 दिन का युद्ध था। गीता के भी 18 अध्याय अरे थोड़ा समय तो दो ना अपने आप को दिन का एक घंटा दे सकते हो कि नहीं दे सकते हो? और यह दोनों प्रक्रियाएं साथ चल सकती हैं। आइदर और नहीं है। अफसोस मुझे यह होता है कि सिर्फ एक प्रक्रिया चल रही है बाहर वाली। चलो बाहर की ओर चलते हैं और नारा लगाते हैं और भीतर की ओर कौन चलेगा?
31:24 भीतर की ओर कौन चलेगा? इतना समय तुम व्यर्थ के सोशल मीडिया पर लगाते हो। एक घंटा विज़डम लिटरेचर पर भी प्रतिदिन लगा लिया करो। तुम ज्यादा अच्छे क्रांतिकारी बनोगे। तुम्हारी क्रांति में ज्यादा जान होगी। और फिर कोई पॉलिटिशियन तुम्हें ठग नहीं पाएगा। भूलिएगा नहीं। अर्जुन को न तो यह कहा कि तुम युद्ध नहीं लड़ोगे और ना ही यह अनुमति दी कि अपने अंधेरे और अज्ञान के साथ ही तुम बस लड़ जाओ। उन्होंने कहा लड़ेंगे तो जरूर पर पहले पूरी बात को समझेंगे फिर लड़ेंगे। ज्ञान के बिना लड़ाई लड़ना आत्मघातक हो जाएगा। यह क्या ज्यादा बड़ी मांग है? बस यही आपको
32:11 सलाह दे रहा हूं। जाओ जाओ पर अंधे गुस्से के साथ नहीं पहले समझो कि समस्या शुरू कहां से हो रही है। पहले समझो कि जिनके पीछे पीछे चल रहे हो उनके मंसूबे इरादे क्या हैं और पहले समझो कि तुम कौन हो और तुम्हें अपनी जिंदगी में सचमुच चाहिए क्या है? इस समझ के साथ फिर जब क्रांति सड़क पर भी उतरती है तो फिर वह सभी दिशाओं को जीत लेती है। कोई एक सड़क ही नहीं। समझ रहे हो बात को? हम नमस्ते आचार्य जी।
32:58 आप कहते हैं कि डेमोक्रेसी में इलेक्शंस होना एक बहुत बड़ा रेवोल्यूशन है। तो ये रेवोल्यूशन में लोग तो रहेंगे बट स्टूडेंट्स जो 17 और 18 इयर्स के हैं अभी जो प्रोटेस्ट कर रहे हैं अपने राइट्स के लिए वो तो राइट टू वोट में आते नहीं है और चारप साल के बाद हर साल मतलब बदलती रहती है सरकारें तो क्या कर सकते हैं छात्र इसमें ज्यादातर जो लोग कभी प्रोटेस्ट कर रहे हैं वो आते हैं वोट देने की उम्र में कम से कम उसमें 70 80% ऐसे हैं हां जो अब 18 साल कि जो थ्रेशहोल्ड है उसको पार कर चुके हैं। मैं कह रहा हूं आप बदलाव चाहते हो अगर
33:46 तो यह लोकतंत्र है। यह कहना कि देखो फ्रेंच रिवॉल्यूशन में और रूसी क्रांति में हम भी तो बदलाव तभी आया था जब हम सारे के सारे सड़कों पर उतरे थे क्योंकि इस तरह के तर्क आ रहे हैं। और और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का भी नाम लिया जा रहा है। कह रहे देखो अंग्रेज को भी तो भगाने के लिए हमें सड़कों पर उतरना पड़ा था ना। उतरना पड़ा था ना? और चीन में भी उतरना पड़ा था। रूस में उतरना पड़ा था। यूरोप के लगभग सभी देशों में किसी न किसी स्तर की क्रांतियां हुई है। ब्रिटेन में भी हुई है। फ्रांस तो हम जानते ही हैं। स्पेन में भी हुई है। अमेरिका हम जानते ही
34:34 हैं। बाकायदा सिविल वॉर ही हुआ था वहां तो। बोल रहे हैं ये सब। अरे बाबा आप जहां का नाम ले रहे हैं वहां सब में जो शासक था वह जबरदस्ती बैठा हुआ था। उनकी तुलना आज के भारत से करना बिल्कुल बिल्कुल अनुचित है। फ्रांस में जिस राजा के खिलाफ क्रांति हो रही है उसको लोगों ने थोड़ी चुना था। चीन में जिसके खिलाफ क्रांति हो रही है फिर रूस में जिसके खिलाफ क्रांति हो रही है वो जार वह कोई डेमोक्रेटिक प्रोसेस से थोड़ी आया था। अब यहां हम कह रहे हैं कि मुझे उसके खिलाफ क्रांति करनी है जिसको मैंने ही वोट दिया है। तो तुम बताओ किसके खिलाफ करना चाहते
35:21 हो? किसके खिलाफ करना चाहते हो? अभी जिन मंत्री महोदय ने इस्तीफा दिया है, मैंने पढ़ा कि 30-40 साल पहले वह खुद एक स्टूडेंट प्रोटेस्ट का हिस्सा थे। पेपर लीक के ही खिलाफ और वहीं से उनकी राजनीति सुदृढ़ हुई थी। एक के बाद एक क्रांतियां होती रहती हैं। 75 की क्रांति हुई। इंदिरा गांधी के खिलाफ इमरजेंसी जनता ने ही क्रांति करी और क्रांति के ही 5 साल के अंदर-अंदर जनता ने ही जितने क्रांतिकारी थे उनको सबको भगा दिया। इलेक्शन हुआ उसमें इंदिरा गांधी
36:06 बिल्कुल बहुमत लेकर के वापस आ गई। तुम क्रांति कर किसके खिलाफ रहे हो? पहले तय कर लो। तुम्हें क्या चाहिए? अभी जब यह इंडिया अगेंस्ट करप्शन वाला चला था। 12 साल पहले तो तुम जिनको लेकर के आए आज तुम उनको बिल्कुल पसंद नहीं करते। तुम ही ने उनको भगा दिया। तुम किसके खिलाफ क्रांति कर रहे हो? तुम अपने ही वोट के खिलाफ क्रांति कर रहे हो। ये डेमोक्रेसी है भाई। यहां पर कोई वाइसॉय नहीं है। यहां पर कोई बाहर से भेजा हुआ लॉर्ड नहीं तुम्हारे ऊपर राज कर रहा है। तुम जिसके खिलाफ क्रांति कर रहे हो उसको तुमने ही चुना है अपना वोट देकर के। तो तुम जवाब दो पहले कि ऐशो को तुम लगातार चुन क्यों रहे
36:52 हो? यह जवाब मांगना कुछ गलत हो गया क्या? तो यह जवाब कोई दे ही नहीं रहा। तो क्रांति करनी है। जल्दी-जल्दी करनी है। इधर वोट दोगे किसी को? और फिर उधर जाकर उसी के खिलाफ क्रांति करोगे। फिर वापस आओगे। फिर किसी को वोट दोगे। फिर उधर जाकर उसके खिलाफ क्रांति करोगे। तुम एक आदमी बताओ जिसको तुम ना करते हो और उसको तुमने चुना नहीं है खुद ही। तो सबसे ज्यादा नापसंद तो तुम्हें खुद को ही करना चाहिए। फिर कि तुम बार-बार ऐसों को चुनते हो जिनको तुम ही नापसंद करते हो। हमें वोटर को ही बदलना पड़ेगा। हमें वोटर को ही बदलना पड़ेगा। और अगर वोटर को बदल दिया तो हर तीन महीने में
37:39 किसी ना किसी बड़े राज्य में चुनाव होते हैं। क्रांति अपने आप हो गई ना? हो गई ना? वोटर को बदल दिया। वोटर खुद ही सरकार गिरा देगा। 5 साल क्या इंतजार करना है? 5 साल क्या इंतजार करना है? आ तो रहे हैं। एक के बाद एक भारत इतना बड़ा देश है। हर तीसरे छठे महीने कहीं ना कहीं चुनाव होते रहते हैं। वोटर खुद ही एक-एक करके सरकार को गिराता चलेगा। लो हो गई क्रांति। जनतंत्र में क्रांति इनबिल्ट होती है। कैलेंडर पर शेड्यूल्ड होती है कि लो ये इलेक्शन आ रहा है। क्रांति करके सरकार गिरा दो। पर आप वोटर को बदले पे ना अगर सरकार को गिराना चाहते हो तो आप बताओ यह क्या हो रहा है फिर? वो बिल्कुल सरकार बदलनी चाहिए। इतनी सारी सरकारें हम जानते हैं निकम्मी रही है, भ्रष्ट रही हैं। अपवाद तो मिलते ही नहीं।
38:29 अगर आप वोटर को बदले बिना सरकार को गिरा रहे हो तो आप यह कह रहे हो कि साहब लोग तो बेवकूफ हैं। बेवकूफ ही रहेंगे। हम मुट्ठी भर लोग हैं। मान लो हम सब क्रांतिकारी यहां बैठे हैं। 500 जने क्रांतिकारी दिए। हम ज्यादा होशियार हैं। और बहुमत ने जिस सरकार को चुन करके गद्दी पर बैठाया है वो बहुमत बेवकूफ है। तो हम सब क्रांति करके जो बहुमत की इच्छा है उसको पलट देंगे। ये तो सिनिसिज्म हो गया ना। ये तो आप कह रहे हो कि जो बहुमत है, जो मासेस हैं उनको सुधारा ही नहीं जा सकता। इसीलिए एक छोटी सी जो अवेकेंड पापुलेशन है वो जाएगी क्रांति करेगी सरकार को बदल देगी मिनिस्टर को बदल देगी ये तो जो आप बात बोल रहे हो वो तो अलोकतांत्रिक भी हो गई कि नहीं हो गई बोलो
39:16 भाई उस मिनिस्टर को वहां पर लोगों ने ही बैठाया है लोगों ने ही बैठाया है ना तो उन लोगों को हम बदल देते हैं ना ताकि इस तरह के मिनिस्टर्स आगे कभी आए ही ना वो ज्यादा सही तरीका होगा ना और एक एक और खतरा बता रहा हूं। वो जो एक बड़ा विशाल बहुमत है जो सरकारों को चुन चुन कर लाता है गद्दी पर। अगर वो भी सड़कों पर उतर आया तो अब बताओ तुम्हें रिवॉल्यूशन मिलेगा या एनआरकी मिलेगी? एक वर्ग तो सड़कों पर उतरा हुआ है। अच्छी बात है। पर एक वर्ग वह भी है ना जो सत्ता पक्ष का समर्थन करता है। है ना देश में? अगर वो भी कहे कि यही तरीका है मामले
40:04 सुलटाने का। हम भी उतरते हैं सड़कों पर। वो भी उतर आए तो फिर तो गृह युद्ध होगा। सिविल वॉर होगा बस। सिविल वॉर होगा। वो कहेंगे तुम उतर सकते हो सड़कों पर। अपनी मांग के लिए तो हम भी उतरेंगे अपनी मांग के लिए। आओ फिर सड़कों पर ही फैसला कर लेते हैं। फिर तो बस सिविल वॉर होगा। एनआरकी इन सबसे कहीं अच्छा है ना कि मैं वोटर को ही बदल दूं। हां आपकी संस्था वही काम कर रही है। जो क्रांति युवा बाहर बाहर करना चाहता है वो बिना जड़ की क्रांति है। हम क्रांति का गहरी जड़ों वाला वटवृक्ष ही बड़ा कर रहे हैं।
40:50 इससे बड़ी क्रांति दूसरी नहीं है जो हम यहां रोज कर रहे हैं। आप मुझसे पूछ रहे थे आचार्य जी क्या आप इन प्रोटेस्ट्स के समर्थन में हैं? मैंने कहा मैं समर्थन क्या करूंगा? मैं तो प्राइमरी प्रोटेस्टर हूं। जब ये प्रोटेस्टर्स पैदा भी नहीं हुए थे। मैं तो तब से बहुत गहरी से गहरी प्रोटेस्ट कर रहा हूं। पर तुम्हें पता भी नहीं है। तुम्हें पता भी नहीं है कि वास्तविक प्रोटेस्ट कहते किसको है। तुम्हारी प्रोटेस्ट कल परसों खत्म हो जाएगी। मेरी तब तक चलेगी जब तक मेरी सांस है। ये अंतर है।
41:38 तुम मिनिस्टर को बदलने से संतुष्ट हो जाते हो। मैं तब तक संतुष्ट नहीं होऊंगा जब तक पूरा हिंदुस्तान नहीं बदल जाता। अब बदल जाएगा हिंदुस्तान तो फिर किसी मिनिस्टर को बदलने की जरूरत रह जाएगी क्या? हम क्यों ये साधारण सा सवाल पूछने से बचते हैं कि ऐसे मिनिस्टर्स को सत्ता में लाता कौन है? अगर आपको मिनिस्टर से इतनी समस्या है तो पूछिए कि फिर उसे सत्ता में लाया कौन था? और आपको तो सबसे ही समस्या है क्योंकि पेपर लीक भी इतने राज्यों में हो रहा है और एक नहीं 100 तरह के भ्रष्टाचार हर राज्य में हो रहे हैं। हर सरकार में हो रहे हैं। हर साल हो रहे हैं। तो ले दे के आप अगर जंजी से पूछोगे तो वो यही कहेंगे कि सारे ही पॉलिटिशियंस
42:24 भ्रष्ट हैं। तो मजेदार सवाल हो गया। अगर सारे ही पॉलिटिशियंस भ्रष्ट हैं तो इनको वोट किसने दिया था? वोट किसने दिया था? और उस वोटर को नहीं बदल रहे हो तो जो अगला आएगा वह भी तो भ्रष्ट ही होगा। पर नहीं सड़क पर उतरना मैं कदर करता हूं तो सड़क पर उतरे लाठियां खाई उनकी। लेकिन देखो वो दो-चार दिन का काम है। युद्ध में आप उतर रहे हो तो आपको एड्रिनलीन चाहिए है। आप कहीं कुछ जीत रहे हो तो उससे आपको डोपामिन मिल रहा है। अच्छा है। मोटिवेशन बढ़ता है। वह अच्छी बात है। लेकिन अगर आप देश को ही बदलना चाहो तो फिर उसके लिए डोपामिन नहीं डिवोशन चाहिए होता है और लॉन्ग टर्म डिवोशन चाहिए होता है।
43:17 वो काम हम कर रहे हैं। और जो लोग आकर के कह रहे हैं ना कि संस्था के लोग क्यों नहीं गए प्रोटेस्ट्स में हम असली प्रोटेस्टर्स हैं। हमारी प्रोटेस्ट लॉन्ग लास्टिंग है और साइलेंट है और यह क्रांति किसी एक मंत्री को नहीं बदलती। यह क्रांति यहां से शुरू होती है। इंसान को बदलती है, परिवार को बदलती है, समाज को बदलती है, सत्ता को बदलती है। पूरे संसार को बदल देती है। हम वो क्रांति कर रहे हैं।
44:03 मैं आग्रह करता हूं सनिकल ना बने। यह ना कहें कि लोग तो बेवकूफ ही हैं। इनको नहीं बदला जा सकता। कोई बेवकूफ नहीं है। इंटेलेक्ट ऊपर नीचे होती रहती है। दिल की तड़प सभी के पास है। इंटेलेक्ट हाई आईक्यू हो सकता है किसी किसी के ही पास हो। पर यहां दर्द जो है ना वह सभी के पास है। सब बदलना चाहते हैं। जैसी हालत है भीतर की और बाहर की पसंद किसी को नहीं है। सब बदलना चाहते हैं। यह मत कहो कि हम पढ़े लिखे हैं। हम युवा हैं। तो सिर्फ हमारे ऊपर क्रांति का दारोमदार है। हर एक इंसान चाहता है कि यह मंजर बदले।
44:50 उनको डिस्काउंट मत करो। यह मत कहो कि लोग तो बेवकूफ हैं। वह तो जाकर के अंधविश्वास के आधार पर या जाति या धर्म के आधार पर या पैसों के आधार पर या फ्रीबीस के आधार पर ही वोट दे देंगे। ऐसा जरूरी नहीं है। हर इंसान एक आधारभूत गरिमा रखता है। हर इंसान फंडामेंटली अपनी डिग्निटी चाहता है। तुम जाओ तुम उनसे बात करो। वह तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं। असली क्रांति अब शुरू होती है। दिल्ली की सड़कों को छोड़ो। आओ एक-एक शहर गांव देहात की सड़क पर उतरो और लोगों से
45:37 बात करो। उनको जगाओ। और जगाने से मेरा आशय यह नहीं कि वो बाहर निकले और नारेबाजी करें और कहे कि मंत्री गया। अब सरपंच भी जाएगा। जगाने से मेरा आशय वो जो यहां हो रहा है यह करो। इसको एक-एक गांव एक-एक घर तक पहुंचाओ। आ रही है बात समझ में? तुम्हें जो करना था दिल्ली में तुमने कर लिया। अब आग्रह कर रहा हूं। आओ मेरा साथ दो। यहां बैठो सामने। मुझे बहुत जरूरत है युवाओं की।
46:27 मैं तुम्हें स्पेक्टिकल नहीं दे पाऊंगा। ये जो हो रहा है ये बड़ा एक साधारण सा दृश्य लगता है। इसमें बहुत अच्छी इंस्टा रील्स नहीं बनती। कैसे दिखाऊं कि कैसे अपने घर की चार दीवारी में किसी की जिंदगी बदल गई है। कैसे दिखाऊं कि जो किचन में है वह महिला बदल चुकी है। कैसे दिखाऊं कि एक छोटी सी दुकान में जो बैठा हुआ है उसकी जिंदगी बदल चुकी है। पर वहां जो बदलाव हो रहा है वो असली है। उसमें साथ दो मेरा। हम जो काम कर रहे हैं वो कैमरा फ्रेंडली नहीं है। पर बुनियादी है।
47:13 बात आ रही है समझ में? नहीं होना चाहिए कि किसी के भी शरीर पर लाठियों के जख्म पड़े। बिल्कुल नहीं होना चाहिए। लेकिन लाठियों के जख्म के साथ यह गनीमत रहती है कि तुम उसकी फोटो खींच सकते हो और डाल सकते हो और लोग देखेंगे और नीचे कमेंट करेंगे और वो फोटो और ये वीडियो वायरल भी हो जाएगा। पर मैं चाहता हूं कि तुम यह भी देखो कि हिंदुस्तान का एक-एक आदमी एक-एक औरत सिर्फ शरीर पर नहीं यहां दिल पर जख्म खाए हुए बैठा है और उसकी फोटो नहीं खींची जा सकती। हमें उन जख्मों का इलाज करना है।
48:02 यह काम चुप्पी का है। साइलेंट है। यह काम संयम मांगता है। पर ऐसा भी नहीं है कि यह काम अनंत है। कभी खत्म नहीं होगा और असंभव है। नहीं ऐसा नहीं है। यह काम हो सकता है। हम कर रहे हैं। जिंदगियां बदल रही हैं। और जिंदगियां अगर बदल रही हैं तो भारत भी बदल रहा है। चुपचाप बदल रहा है। किसी को पता भी नहीं चल रहा। हम भारत को चुपचाप बदल रहे हैं रोज। हर सत्र में भारत थोड़ा और बदल जाता है।
48:57 बस आप यहां बैठे हो। इसका श्रेय आपको नहीं मिलने वाला। क्योंकि आप किसी फोटो में, वीडियो में या किसी ग्राफ में यह प्रमाणित नहीं कर पाओगे कि कुछ बदल गया। बाहर जब परिवर्तन आता है तो उसका प्रमाण उपलब्ध होता है। आपकी जिंदगी जैसे बदल रही है, आप इसका प्रमाण नहीं दे सकते। तो जिनको सनिकल रहना है, जिन्हें संशय करते ही रहना है, वह अपना संशय रखे रह जाएंगे। आग्रह कर रहा हूं उनसे इतना संशय है तुम्हें अगर हमारे काम की इफेक्टिवनेस के बारे में तो आओ ना बैठो साथ में जांचो परखो
49:42 यही तो एक जवान आदमी का तरीका होना चाहिए ना अंधविश्वासी तुम्हें थोड़ी ही बनना है। आओ परखो कि सचमुच जो हम काम कर रहे हैं वो इफेक्टिव है कि नहीं है। और ना लगे इफेक्टिव तो छोड़ देना। 15,000 आत्महत्याएं 365 दिन में प्रतिदिन कितनी बैठी? लगभग कितनी बैठी? रोज की कितनी बैठी? 45 50 से कम। 40 मान लो। 40 हर घंटे कितनी बैठी? डेढ़ मान लो। हमें बात करते इस मुद्दे पर हो गया होगा ना घंटा हो गया होगा अभी तक
50:29 बात करते इतनी देर में हमारे एक युवा ने आत्महत्या कर ली है एक लाश गिर गई है इसी दरमियान बोलो उस लाश के लिए कल की सुबह कैसे बदली बोलो मिल तो गया इस्तीफा और ठीक अभी पिछले एक घंटे में एक युवा ने आत्महत्या करी है एजेंसी नहीं करी है स्ट्रक्चरल रीजंस हैं। इस बिल्डिंग का नक्शा ही खराब है। इसकी बुनियाद ही गड़बड़ है। और तुम एक छोटे से कमरे का पेंट बदल रहे हो बस। मैं तुम्हारे जज्बात की कदर करता हूं।
51:14 लेकिन तुम्हें बताना चाहता हूं कि तुम जो काम कर रहे हो वो फंडामेंटल नहीं है। दूर तक नहीं जाएगा। और तुम भी पाओगे कि तुम्हें निराश होना पड़ रहा है। तुम भी कहोगे यार हमने इतनी क्रांतिकारी निकला क्या? स्थितियां तो वैसी की वैसी रह गई। और याद रखना ये ये जो ये जो हमारे अभी जवान लड़के या लड़की की लाश गिरी है पिछले 1 घंटे में। उसका पेपर लीक से कोई ताल्लुक नहीं है। पर उसके ऊपर दबाव डालने वाली ताकतें वही थी। जिन ताकतों ने हम सबको
52:02 प्रोफेशनलली और पर्सनली व्यर्थ के रास्तों पर धकेला है। आपका कुछ ऐसा थोड़ी है कि सिर्फ प्रोफेशनल डिसीजन ही इन्फ्लुएंस्ड होता है। आपके पर्सनल डिसीजंस भी तो बहुत अंधी जगहों से आते हैं। आपको नहीं पता होता कि क्यों आप कोई व्यक्तिगत फैसला ले रहे हो। और वह सारे के सारे अंधे फैसले जिस अंधी जगह से आ रहे हैं, वह अंधकार एक है। हम उस अंधकार को चुनौती दे रहे हैं। भाई एक अंधी गुफा है उसमें से हर तरह के विषैले सांप, बिच्छू और न जाने कितने तरह के जंतु निकल रहे हैं।
52:49 तुमने उसमे से निकलने वाले किसी एक सांप बिच्छू कीड़े-कड़े को गिरगिट को पकड़ लिया है और खुश हो रहे हो हम कह रहे हैं हमें यह अंधेरा ही मिटाना है तमसो मा ज्योतिर गमय ना रहेगी यह गुफा और ना इसमें से निकलेंगे इतने विषैले जंतु आओ उस गुफा में साज प्रवेश करते हैं डरो मत बात समझ रहे हो? आचार्य ऋषि मैं अपना थोड़ा एक्सपीरियंस बताना चाहूंगी। मैं कोटा से ही हूं और आपने जो एक्सपेक्टेशंस की बात करी मतलब
53:38 फैमिली एक्सपेक्टेशंस वगैरह की बात करी आपने जैसे तो मुझे जबरदस्ती जैसे 12th के बाद एक साल ड्रॉप करवा के प्रीमेडिकल की उस टाइम पे पीएमटी होता था। प्रीमेडिकल की एंट्रेंस के लिए बिठाया गया था। और मैंने मना कर दिया था साफ उस टाइम पे कि मतलब यहां कोचिंग इंस्टट्यूट्स में माहौल अच्छा नहीं है। टॉक्सिक है बच्चों के लिए क्योंकि मैंने देखा था वहां पर बच्चे रोज गिर रहे थे। स्ट्रेस के मारे वहां पर ड्रिप्स चल रही थी बच्चों को। लिटरली क्लास में से उनको उठा के लेकर जाया मतलब जाया जाता था। हॉस्पिटल्स वहां पर जैसे कोचिंग इंस्टट्यूट बढ़ा वहां पर हॉस्पिटल्स बहुत सारे खुल गए हैं और मतलब अब तो खैर आई थिंक 6 से 10,000 करोड़ का सालाना वहां पर बिजनेस होता है और
54:25 रियलस्टेट भी उसके साथ-साथ ही वहां पर एस्टैब्लिश हो गया है बहुत ज्यादा बट उस टाइम पे भी मतलब जो मेंटल स्ट्रेस मैंने झेला और मैंने आसपास अपने देखा उस हिसाब से मैं डिसकरेज करती थी सबको कि आप मत करिए क्योंकि ये माहौल अच्छा नहीं है। तो मुझे अपने पेरेंट्स से या रिलेटिव से हमेशा ये सुनने के लिए मिलता था कि अंगूर खट्टे हैं। इंसान भीतर से ही थोड़ा कम वायलेंट हो जाए। हमें वो चाहिए। हां दैट रिवोल्यूशन। और उसका रिश्ता इससे है कि मां-बाप का बेटी का संबंध कैसा होगा? और इससे भी है कि इंसान और पृथ्वी का संबंध कैसा होगा। इतनी यह दो अलग-अलग बातें लगती हैं। पर आ
55:12 एक ही रूट से रही हैं। और उस रूट को आप संबोधित नहीं कर रहे हैं तो आप बस यह कह रहे हैं कि मैं जिस डाल पर बैठा हूं वो डाल हरी रहे चाहे जड़े सूख जाए। आप जो चाह रहे हैं वो कभी नहीं हो पाएगा। ऐसा हो सकता है कि आप कहें कि एक डाल है उस पर मेरा घोंसला है। उस पर मेरे अरमान है। वह डाल तो हरी रहनी चाहिए। और जड़ों से मुझे कोई मतलब नहीं जड़े चाहे सूख जाए। और अगर हमने जड़ों का ख्याल कर लिया तो सारी डालें खुद ब खुद हरी हो जाएंगी। हरे आएंगे पत्ते और खूब खिलेंगे फूल। हमें जड़ों पर काम करना है।
55:58 नमस्ते चाचा जी। अभी मैं फिलहाल एक एचआर कंसलटेंसी में काम कर रहा हूं टेंपरेरीली। वहां पर मैंने देखा है कि ऐसे रिक्रूटमेंट्स के लिए कुछ बड़ी कंपनीज़ हैं। वो लोगों के जब क्वालिफिकेशंस के ऊपर ध्यान देती हैं। तो जैसे कोई एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का पोजीशन आया 14 साल का एक्सपीरियंस चाहिए। ठीक है? और एक बंदा हमें मिला है जो कि उसी सब कुछ ठीक है। उसका एक्सपीरियंस लेवल जो उसको स्किल चाहिए सब ठीक है। पर उसने शुरुआत में बीटेक ना करके बीकॉम किया है तो अब उसको हम नहीं लेंगे। और ऐसे लोग जो लोग हर दो साल में एक साल में अपनी कंपनीज बदल रहे हैं उनको उनके काम से लगाव नहीं है बट वो सैलरी पैकेजेस के लिए बदल रहे हैं। यार एक बात बताओ ऐसी जिंदगी चाहिए क्या
56:44 जिसमें जैसे आज तक चलते आया है वैसे ही तुमने शादी कर ली। हां। अभी यह जो इतना जबरदस्त एस्ट्रो वगैरह का मार्केट है। इनके प्राइमरी ग्राहक जजी ही हैं और वह वहां पर जाकर के दो ही चीजें पूछ रहे हैं। एक नौकरी कब मिलेगी? एक शादी कब होगी? जैसे पुराना अंधेरा बहता चला आ रहा है। तुमने उसी तरह से शादीवादी कर ली। तुमने उसी तरह से नौकरी पकड़ ली। तुमने वैसे ही बच्चा पैदा कर लिया। और तुमने उसी तरीके से जैसे तुम कंडीशन रहे हो बच्चे को भी कर दिया। और तुम्हें कुल जिंदगी की एक पटरी बता दी
57:32 गई है कि जॉब करो किस सेक्टर में जो सेक्टर बता दिया गया है कि अभी अभी सनराइज सेक्टर है ब्लूमिंग सेक्टर है उसमें घुस जाओ वो कोई भी हो सकता है कल को लेदर टेक्नोलॉजी बढ़ जाए तुम लेदर टेक्नोलॉजी में घुस जाओ परसों रियलस्टेट बढ़ जाए उसमें घुस जाओ फिर रिटेल आ जाए तुम उसमें घुस जाओ फिर कुछ और आ जाए तुम उसमें चले जाओ दिल कहां है और जिस सेक्टर में भी चले गए हो वहां एक के बाद एक दूसरी कंपनी में थोड़े-थोड़े पैसों के लिए 2000 के लिए 4% की ह के लिए जंप लेते रहो। ये सब में दिल कहां है? जिंदगी कहां है? जवान आदमी हो भाई तुम। बताओ ना दिल कहां है इसमें? और तुम इसी सिस्टम में रहने के लिए यह कह
58:19 रहे हो कि मैं एक और एंट्रेंस एग्जाम दूंगा। उसको क्लियर कर लूंगा तो मुझे एक हाई पेइंग जॉब लग जाएगी। यही तो कर रहे हो ना? तो तुम्हारी सारी जो मांगे हैं वो सिस्टम के अंदर बने रहने के लिए हैं। तुम सिस्टम को तोड़ना नहीं चाह रहे हो। एक तरह से कहे तो तुम कोई क्रांति कर ही नहीं रहे हो। तुम बस ये कह रहे हो कि सिस्टम के भीतर ही भीतर इंसाफ कर दो। और मैं तुमसे पूछ रहा हूं कि तुम्हें ये सिस्टम चाहिए भी है क्या? क्या यह सिस्टम यह व्यवस्था पूरी इस लायक है कि इसको रखा जाए? नहीं है। इस लायक नहीं है। कारण क्या है? कारण यह है कि यह जो पूरा सिस्टम है ये इंसान के अंधेरे से उपजा है। हमें मालूम ही नहीं हम कौन हैं? ये जिंदगी क्या चीज है। इसमें हमें करना क्या है? जब हमें
59:06 कुछ नहीं मालूम तो पीछे से जो चला आ रहा है हम उसी को आगे चलाते रहते हैं। हम बस यह कर रहे हैं। ऐसे समझो कि एक ट्रेन है। एक ट्रेन है। और वो खचाखच भरी हुई है। और वह एक ऐसी दिशा में जा रही है जिसको कोई नहीं जानता कि क्या है। कोई उस मंजिल से परिचित नहीं है। ठीक है? पर वो ट्रेन खचाखच भरी हुई है क्योंकि वह ट्रेन सदा से चलती आई है और जिस दिशा में जा रही है उधर को ही जाती रही है। खचाखच भरी हुई है। खचाखच भरी हुई है। अंधी ट्रेन है, अंधे लोग हैं। अंधी दिशा, अंधी मंजिल। लेकिन एक डब्बे में क्या होता है कि कुछ लोग जिनके पास टिकट नहीं था या
59:53 रिजर्वेशन नहीं था वो जाकर के कुछ सीटों पर कब्जा कर लेते हैं। उन्होंने क्या करा? उन्होंने बेईमानी करके कुछ सीटें हड़प ली। तो वहां जो मुसाफिर थे उन्होंने बहुत जोर से नारे लगाए। उन्होंने तगड़ा वहां विद्रोह किया। बोला हम विरोध कर रहे हैं। विरोध कर रहे हैं। ये नहीं चलेगा। ये नहीं चलेगा। यह गलत लोग आकर सीटों पर बैठ गए हैं। टिकट हमारे पास है। बैठ ये गए हैं। इनके पास टिकट नहीं है। हमारा रिजर्वेशन था हम बैठेंगे। यह सब है। चलो ठीक है। तुमने वहां पर इंसाफ पा भी लिया। रेलवे पुलिस आई। जो लोग गलत बैठ गए थे उनको हटा दिया। जिनके पास टिकट था उनको बैठा दिया। तो भी इससे क्या ट्रेन बदल गई? वह अभी भी एक अंधी ट्रेन है जो एक अंधी
1:00:39 पटरी पर एक अंधी दिशा में एक अंधी मंजिल की ओर जा रही है। खचाखच भरी हुई। हम उस ट्रेन को उस पटरी को ही बदल देना चाहते हैं। हम नहीं चाहते कि तुम जिंदगी भर एक अंधी यात्रा करो। यह हमारा काम है। बात समझ में आ रही है? हां, मैं मानता हूं कि अगर आप ट्रेन में हो, आपने टिकट लिया है, तो आपको आपकी सीट मिलनी चाहिए। बिल्कुल मिलनी चाहिए। बट दैट इज अ वेरी स्माल एस्पेक्ट ऑफ जस्टिस। इट इज लेजिटमेट बट स्मॉल। याद रखो मैं उसको गलत नहीं बोल रहा। मैं उसको सिर्फ स्मॉल बोल रहा हूं। मैं कह रहा हूं ज्यादा बड़ी बात यह है कि तुम पूछो कि मैं इस ट्रेन में आ कहां से गया? मुझे नहीं बैठना इस ट्रेन में। और वह
1:01:27 ट्रेन हम फिर कह रहे हैं खचाखच भरी हुई है। हर आदमी एक ही ट्रेन में चढ़ना चाहता है क्योंकि सबको डर है कि मैं अकेली यात्रा करूं तो कहीं मेरा कुछ अहित ना हो जाए। हम चाहते हैं कि तुम्हारे भीतर वो ताकत जगे कि तुम अकेली यात्राएं कर पाओ। तुम्हें कोई जरूरत नहीं है इन ट्रेनों पर चढ़ने की। चाहे वह प्रोफेशनल ट्रेंस हो, चाहे वह पर्सनल ट्रेंस हो, बात आ रही है। नहीं तो ऐसी ही कहानियां सुनने को मिलेंगी। मैं एचआर अभी कंसलटेंसी में हूं, फिर ये हुआ, फिर वो हुआ। अभी मैं Lindin पर वीडियो देख रहा था किसी फन फ्राइडे का। कंपनियों ने आज के लिए शुरू करा है। पता है कि उनका जो काम है वो
1:02:13 ज्यादातर तो जान सोख लेता है, खून पी लेता है। तो फन फ्राइडे होता है। उसमें वो जितने भी एंप्लाइजज़ थे उनको नचाया गया था। वो नाच रहे थे और किसी ने वीडियो बनाया वो ऐसे नाच रहे हैं। अब नौकरी के लिए सैलरी के लिए नाचना भी पड़ता है। पर मुंह पर लिखा हुआ है कि दुर्दशा है। ऐसे जीना चाहते हो क्या? ऐसे जीना चाहते हो? पर तुम एंट्रेंस एग्जाम इसीलिए तो क्लियर कर रहे हो कि तुम्हें उस कंपनी में जॉब मिल जाए। तुम्हारा ही तो सारा एंट्रेंस का खेल है। यह इसीलिए तो है कि तुम्हें उस कंपनी में जॉब मिल जाए जहां तुम्हारा मुंह ऐसे रहेगा जीवन भर। जंजीर खींचो और उतर के भागो। किधर को भी भागो पर इस ट्रेन से उतरो।
1:03:02 आचार्य जी आपका जो स्यूशन था वो बहुत ही इंस्पायरिंग है और मेरे एक्चुअली जब आप डिस्क्राइब कर रहे थे जो बच्चों के ऊपर प्रेशर होता है तो मेरा ऑलमोस्ट रोना आ गया मेरे को क्योंकि ये काफी दबाव होता है बच्चों के ऊपर पर अभी मेरा जो जो मन में प्रश्न उठा अब थोड़ा मेरे को सिली भी लग रहा है पर वो ऐसे लग रहा है कि जैसे दो लेवल पे जैसे अंधकार है जिससे हम फाइट करने की आप बात कर रहे हैं वो बहुत बड़ा है। वो पूरे देश में फैला हुआ है। पूरे समाज में फैला हुआ है। बहुत डीप तक फैला हुआ है। और एक तो जैसे जैसे हम गीता कम्युनिटी में हैं या और भी जो संस्थाएं होएंगे जो सिमिलर काम कर रहे हैं उनका आकार
1:03:47 मेरी समझ के हिसाब से जैसे छोटा है। जैसे आप बहुत बड़े शत्रु से लड़ रहे हैं और आप छोटे हैं। और दूसरा दूसरा लेवल यह है कि इवन विद इन गीतग हम लोग जैसे मैं भी अगर अध्यात्म के मार्ग पर चला हूं तो ऐसा नहीं कि मैं पूरा सुधर गया हूं। मेरी भी रोज अपने से फाइट होती है। मेरे को भी हर रोज जैसे देखना पड़ता है खुद को कि मेरा जॉब सही है। तो जो सॉल्यूशन है आपका सही है। वही सॉल्यूशन है। पर मैं इसलिए अपने क्वेश्चन को सिरली कह रहा हूं क्योंकि आप सीधा सा आंसर ये हो सकता है कि हां मतलब मुश्किल है पर करना ही है। पर जस्ट ऑन द लॉजिस्टिक साइड कि इट इज हमारा जो एनिमी है जो अंधकार है, जो
1:04:32 अहंकार है बेसिकली उसे पूरी सोसाइटी के लेवल पे हैं। यहां पे जो लोग बैठे हैं एटलीस्ट उनका कुछ इंटरेस्ट बन गया है और डिफरेंट तरीके से लोग जुड़े हैं YouTube से या फ्रेंड ने इनवाइट किए हैं या उनका खुद का झुकाव था पर इस चीज को करोड़ों लोगों तक पहन पहुंचाना जिससे कि असली देश में यू नो बदलाव आएगा उसका लॉजिस्टिक्स मेरे मानने में कि कैसे हो पाएगा इट्स लाइक सच करना है ऐसे होगा और कोई नहीं करेगा आप ही तो करोगे और कौन करेगा और यही बात आप आप मान नहीं नहीं रहे हो ना? मैं तो जो कर सकता हूं कर रहा हूं। शान से खड़ा हूं। हर रात मुझे यह पता होता है कि इससे ज्यादा मैं कुछ कर नहीं सकता था।
1:05:19 आपको करना है। और आप क्यों कह रहे हो कि लॉजिस्टिक्स बहुत बड़ा एक मुद्दा है। अभी प्रोटेस्ट हुई तो उसमें हम देख रहे हैं दुनिया भर से लोग खाना भिजवा रहे हैं, आ रहे हैं। अचानक से सब कुछ वाइल्ड फायर की तरह फैल गया। आप चाहो तो सब कुछ हो सकता है। सब कुछ हो सकता है। अभी महीने भर पहले कुछ नहीं था। अभी महीने भर में इतना फैल गया। वो एक आदमी ने थोड़ी फैला दिया था। वो बाकी सब ने फैला दिया था ना। लेकिन वही बात कि ट्रेन में मेरी बोगी में मेरी सीट छीन ली गई। इसके लिए लड़ना हमें आसान लगता है। पर मैं हूं ही क्यों? एक अंधी ट्रेन की
1:06:04 अंधी भीड़ का हिस्सा इसके लिए हम लड़ना नहीं चाह रहे। मैं क्या करूं इसमें? बात इसकी नहीं है कि मैं छोटा हूं। बात इसकी है कि आप फैसला नहीं कर रहे। आप मेरी ओर देख रहे हो जैसे मेरी जिम्मेदारी हो। हां मेरी जिम्मेदारी है पर ठीक उतनी है जितनी आपकी है। कुछ छोटा नहीं है। ये इंटरनेट एज है भाई। आग रातोंरात फैल सकती है। सब हो सकता है। द बॉल इज इन योर कोर्ट। नॉट माइन। मैं तो
1:06:57 आप तो चलिए आप आप कम्युनिटी हैं। आप आप छात्र हैं मेरे। मैं तो संस्था से कहा करता हूं कि तुम मेरे काम के व्हीकल नहीं हो। तुम दुश्मन हो मेरे। मुझे दुनिया तक पहुंचना पड़ता है संस्था से भी लड़ के। आप खुद डरे हुए हो कि कहीं आपका कोई अहित ना हो जाए। इसी तरह संस्था में भी जो अंदर लोग रहते हैं वो भी अपने आप को बचा बचा कर चल रहे हैं। बचा बचा कर चल रहे हैं। क्योंकि क्योंकि फेथ की कमी है क्योंकि सबने अपने स्टेक्स किसी दूसरी जगह
1:07:43 भी रखे हुए हैं क्योंकि सब बटे हुए हैं। क्योंकि सब सेफ खेलना चाहते हैं। और क्योंकि सब में गरिमा की कमी है। जहां दूसरी जगह आप स्टेक्स रख के आए हो वही जगह हैं। जहां आप पिटते हो, जहां आपकी गरिमा का हनन होता है। पर फिर भी आप वहां जाकर झुकना चाहते हो। आप तब भी वहां पर जाकर के संबंधित रहना चाहते हो। इसीलिए आप यहां आते भी हो तो आधे अधूरे आधे बटे आप आ तो जाते हो मेरे सामने पर पूरे थोड़ी होते हो
1:08:32 संस्था में भी अब इतने लोग हो गए हजार लोग हो रहे हैं पर जिनके दम पर चल रही है वो उंगलियों पे गिने जा सकते हैं बाकी तो सब ऐसे हैं कि भाई देखभाल के चलो जब तक यहां ठीक चल रहा है यू नो जस्ट कीप एन आई। वॉच आउट, वॉच आउट। किसी दिन कुछ गड़बड़ हो तो जल्दी से भाग लो। सो, द क्वेश्चन जस्ट टर्न्स बैक। यू हैव टू आंसर इट। मैं इसमें क्या कर सकता हूं? प्रणाम आचार्य जी। अगर सवाल में कोई गलती हो तो माफ कर देना। पर मुझे बोलना ही था। माफी इसमें भी आपने
1:09:20 बोला ट्रेन जैसी भी है मतलब ट्रेन जैसी भी नहीं है। कुछ भी हो जैसा भी हो ट्रेन से उतरो। सबसे पहले तो ट्रेन से उतर गए और बहुत मार पड़ रही थी। इसीलिए ही उतरे। लेकिन अब धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा है कि अब बात ट्रेन की नहीं है। ट्रेन की जब बात थी तुमने छोड़ दी। अब बात बेटा भीतर की भी आ गई है। तो ये बिल्कुल वैसा ही है कि मान लीजिए बाहर से कुछ बदलना था तो किसी को कोई करियर चेंज करना था या कोई बहुत फिजिकल चेंज था वो तो कर लिया लेकिन अब जैसे-जैसे ये चीजें दिख रही हैं इट्स गेटिंग मोर टफर। मैं कुछ चाहता था तुम्हें एक खबर सुनाता हूं। जी तुम अभी भी ट्रेन पर हो। तुमने बस बोगी बदलकर विंडो सीट ले ली है
1:10:08 और उस विंडो सीट से बाहर झांक कर तुम मुझे देख रहे हो। तुम मेरे साथ नहीं हो। तुम उसी ट्रेन पर हो। जो मेरे साथ होते हैं ना उनको ट्रेन का ख्याल आना बंद हो जाता है। उन्हें वक्त ही नहीं मिलता याद करने का कि कौन सी ट्रेन कहां कब कहां। हां बिल्कुल तुमसे मेरा रिश्ता है। दृश्य और दृष्टा का है। तुम्हें मैं पसंद हूं तो तुमने किनारे वाली सीट ले ली है और खिड़की से मुझे देखते रहते हो। तुमने ट्रेन छोड़ने ही दी है। सीट बदल ली है अपनी।
1:11:00 जिन्होंने ट्रेन छोड़ दी होती है ना उनका एक मैं लक्षण बता देता हूं उनके लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि जितने ज्यादा लोगों को हो सके ट्रेन से उतारें। जिसको यह जरूरी नहीं लग रहा है कि और जितने ज्यादा लोगों को हो सके उतारूं। वह खुद अभी ट्रेन में ही बैठे हुए हैं। यह तो छोड़ दो कि उन्हें यह कसक उठती है कि काश मैं भी ट्रेन में होता। दो चार पल के लिए इसी पर ट्रेन वापस मिल जाए। ऐसी कसक का उठना तो छोड़ दो। उनके भीतर आग लग जाती है कि इस ट्रेन से जितने ज्यादा लोगों को हो सके मुझे उतारना है। यह लक्षण होता है उतरने वाले का और जिसको वो आग
1:11:45 नहीं लग रही उसने बस अपना बोगी कंपार्टमेंट सीट बर्थ ये सब बदल लिया होगा और कुछ नहीं किया उसने। उस पर दावा यह है कि आचार्य जी हम तो उतर गए आपके साथ हैं। हम मैं मैं प्रोटेस्टर्स से छात्रों से जैन जी से कहना चाहता हूं यह सब जो तुम्हारे सपोर्ट में खड़े हो गए थे इनको जरा ठोक बजा के देख लेना यह तुम्हारे शुभचिंतक नहीं है। यह कौन है? कुछ अपोजिशन पार्टी वाले हैं जिनको अपना उल्लू सीधा करना है।
1:12:32 कुछ तो कोचिंग इंस्टट्यूट वाले ही हैं। वह भी आ गए हैं कि नई-नई रील बना रहे हैं, वीडियो बना रहे हैं। प्रोटेस्ट के समर्थन में खड़े हो के आ रहे हैं। और ये ठीक वही लोग हैं जिनके स्टेक्स हैं। इकोनॉमिक फाइनेंशियल स्टेक्स हैं जिनके स्टूडेंट्स को और ज्यादा प्रेशराइज करने में पर वो बंदा एक वीडियो बना देगा आपके लिए तो आपको लगेगा यह तो मेरे सपोर्ट में खड़ा हुआ है। आप यह देख ही नहीं पाते कि वह जो आपके सपोर्ट में खड़ा हुआ है जो कह रहा है कि मैं आपके सपोर्ट में खड़ा हुआ हूं। उसके स्टेक्स हैं उसका स्वार्थ है। बिल्कुल उसी सिस्टम में जिस सिस्टम ने आपको अप्रेस कर रखा है। ये कितनी अजीब बात है। यह कितनी अजीब बात है। पर कोई आकर के प्यारा-प्यारा
1:13:18 मीठा-मीठा बोल देता है। चाहे पर्सनल लाइफ में, चाहे प्रोफेशनल लाइफ में। हमें लग जाता है यह आदमी तो अच्छा ही है ना। इसने मुझे सपोर्ट किया। देखो इसने मुझे सपोर्ट किया। यूर्स हैं, Instagramर्स और यह सब हैं। यह आकर के सब खड़े हो रहे हैं। हम सपोर्ट करते हैं। हम सपोर्ट करते हैं। अरे उन्हें तुमने हजारों घंटे का कंटेंट दे दिया। उनकी चांदी हो गई है। उनको विंड फॉल गेन हो रहा है व्यूज का। और उसी से उनकी कमाई चलती है। तुम्हें दिख नहीं रहा? कि वो तुम्हारी इस हालत से कितना मुनाफा बना रहे हैं। पर तुम्हें अच्छा लगता है कि ये सब तो
1:14:03 हमें सपोर्ट कर रहे हैं ना। और अब मेरी बात आती है तो कहते हैं आपने तो हमें ऐसे कोई खुल के सपोर्ट किया नहीं। इतने सारे थे जो हमें सपोर्ट करने आए। चलो छोड़ो मुझे। यह जो तुम्हें सपोर्ट करने आए जरा इनको परख लेना और देख लेना यह कैसे हैं। और इन्हीं को मैं कह रहा हूं यही वो लोग हैं जो ट्रेन के भीतर हैं। आप उतरना भी चाहते हो तो ये आपके हाथ रोक लेते हैं। और आपको लगता है कि यह तो मेरे अपने हैं ना। मेरे दोस्त हैं, मेरे वेल विशर्स हैं। ये वेलविशर्स नहीं हैं। ये बस मधुर हैं। यह बस प्यारी बातें करना जानते हैं। और यह खुद भी विक्टिम्स हैं। यह खुद भी ऑप्रेस्ड है। उस ट्रेन में जो कोई है वो शिकार ही
1:14:48 है। और यह ऐसा शिकार है जिसको फिर शिकारी भी बनना है। उस ट्रेन में इक्वेशन ही यही होती है। या तो आप शिकार हैं या आप शिकारी है और आज जो शिकार है वह कल का शिकारी बनेगा। वहां और कोई रिश्ता बनता ही नहीं। वहां पर कोई भी दो लोग हैं उनके बीच में यही रिश्ता बनता है। आपके सामने बहुत सारी पुरानी कसमें और वादे और बहुत सारे बंधन खड़े हो जाते हैं कि दिख तो गया है पर अब मान कैसे लें? दिख तो गया है कि ये जो मेरी वर्क प्लेस है ये बिल्कुल पापियों से ही भरी हुई है। पर अब ऐसे अगर मान लिया तो फिर झंझट खड़ा
1:15:35 हो जाएगा इसे कैसे मान ले। दिख तो गया है कि मैं यहां पर सिर्फ अपनी गरिमा बेच रही हूं। पर अगर अब बोल दूंगी तो फिर बाहर निकल कर के कमाना भी तो पड़ेगा। अभी यहां घर बैठी हूं। ठीक है। गरिमा का मेरी सौदा होता है। लेकिन उससे समाज में इज्जत मिल जाती है। घर में पैसे मिल जाते हैं। सुख सुविधा है, बिस्तर है, टीवी है, बढ़िया है। यह है। और फिर यह लोग इतने भी बुरे नहीं है। और फिर यह लोग इतने भी बुरे नहीं हैं। मैं आपसे कह रहा हूं, यह बात उनके व्यक्तिगत अच्छे या बुरे होने की नहीं है। जो भी इंसान अंधेरे का शिकार है,
1:16:24 वो बुराई है। वो और क्या करेगा? और इसमें उसकी कोई व्यक्तिगत गलती भी नहीं है। वो शिकार ही हुआ है। आप उसके साथ भी इंसाफ करना चाहते हो तो खुद भी ट्रेन से उतरो। उसको भी उतारो। नहीं उतरना है। नहीं उतरना है। क्यों? अब हम हमें जब हमें जरूरत पड़ी थी तब तो उन्होंने ही हमारा सपोर्ट करा ना। जब हमें जरूरत पड़ी थी तब तो उन्होंने ही हमें सपोर्ट करा। ये आचार्य जी थोड़ी हमारा कोई सपोर्ट करने आए थे। ठीक है भाई। तुम्हें तुम देख ही नहीं पा रहे हो कि यह कैसे लोग हैं जो जिनको तुम अपना यार समझते हो, हितैषी समझते हो।
1:17:16 यह गाना याद आ रहा है। आप गंभीर हो गए इतना आपको गाना सुनाना जरूरी है। वो मूवी थी मनोज कुमार ने गाया था। मुझे लग रहा है कि इस वक्त पर मैं उसको जजी के लिए गा दूं। क्योंकि अभी तो यही है कि यह बातें करते थे पर हमारे समर्थन में तो आए नहीं और अभी हमें समर्थन करने वाले इतने मिले हुए हैं और हमने जंग भी जीत ली है और सब मिलकर हिपेप फुर्रे कर रहे हैं। गाना पता है ना क्या है? कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे तड़पता हुआ फिर तुम्हें छोड़ दे तब तुम
1:18:03 मेरे पास आना प्रिय मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए दर्पण तुम्हें जब डराने लगे दर्पण तुम्हें जब डराने लगे जवानी भी दामन छुड़ाने लगे तब तुम मेरे पास आना प्रिय मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए जैन जी को संदेश है क्योंकि उन्हें ही बड़ी आपत्ति है नजरों में अपनी जब गिरने लगो अंधेरों में अपने
1:18:52 ही जब गिरने लगो तब तुम मेरे पास आना प्रिय यह दीपक जला है जला ही रहेगा तुम्हारे लिए हम्म कहिए हां आपसे गीता सत्रों से जुड़ने के बाद बहुत सारे रिश्ते हैं वो सही जगह पे आ रहे हैं। तो यह काम कर रहा है धीरे-धीरे चल रहा है प्रोसेस। थैंक यू। जल्दी करवा लीजिए। नहीं किसके पास कितना वक्त है। हम तो जल्दी कर लीजिए।
1:19:40 हां, चलिए आप लोग घर पहुंचिए। कल सुबह मिलते हैं। आपको खुशी होगी इस नाते जो हमारी अपनी ऐप है जिसमें हमारे गीता और बाकी सब कार्यक्रम चलते हैं। यहां पर बुद्ध हैं, गीता है, उपनिषद है, अष्टावक्र हैं। यह मुझे मिले मेरी जिंदगी बदली। यह तुम्हें मिलेंगे तुम्हारी जिंदगी भी बदलेगी। सच पूछिए तो मतलब लाखों नहीं तो कम से कम हजारों जिंदगियां तो हैं जो बिल्कुल बदली हैं। 2 लाख से अधिक गीता प्रतिभागियों के साथ जुड़े आचार्य प्रशांत ऐप पर। पहला महीना बिल्कुल फ्री गीता मिशन का पूरा एक्सेस। ऐप पर आपको मिलेंगे नियमित लाइव सत्र। हर दिन आचार्य प्रशांत के विशेष संवाद। गीता कम्युनिटी का एक्सेस, गीता परीक्षा, चयनित
1:20:27 समाचार, ऑडियो बुक्स, कोर्ट्स और भी बहुत कुछ। Google Play स्टोर या Apple ऐप स्टोर पर आचार्य प्रशांत सर्च करें और अभी डाउनलोड करें।