संक्षिप्त सारांश
यह वीडियो अष्टावक्र और विभिन्न व्यक्तियों के बीच त्याग की प्रकृति पर हुई बातचीत पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि सच्चा त्याग भौतिक वस्तुओं, ज्ञान, भक्ति, या मोक्ष की इच्छा का नहीं, बल्कि अहंकार और भ्रम का त्याग है। असली त्याग तब होता है जब त्याग करने वाला ही विलीन हो जाए और उसे यह एहसास हो जाए कि त्यागने को कुछ है ही नहीं, क्योंकि सब कुछ उसी का स्वरूप है।
- सच्चा त्याग अहंकार और भ्रम का त्याग है।
- त्याग करने वाले का विलीन होना ही पूर्ण त्याग है।
- यह अहसास कि त्यागने को कुछ नहीं है, मुक्ति का मार्ग है।
राजा जनक ने अष्टावक्र से पूछा कि सब कुछ त्यागने के बाद भी उन्हें शांति क्यों नहीं मिली। अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि राजा ने सब कुछ त्याग दिया, लेकिन 'मैंने त्याग किया' इस भाव का त्याग नहीं किया। असली त्याग तो अहंकार का त्याग है।
एक सन्यासी ने गर्व से कहा कि उसने घर-बार छोड़ दिया है। अष्टावक्र ने उसके वस्त्र की ओर इशारा करते हुए पूछा कि यह वस्त्र किसका है। जब सन्यासी ने कहा कि यह उसका है, तो अष्टावक्र ने बताया कि केवल स्वामित्व बदला है, असली त्याग तो 'मेरा' के भाव का मिट जाना है।
एक पंडित ने कहा कि उसने सभी शास्त्र पढ़ लिए हैं। अष्टावक्र ने उससे पूछा कि जिसने यह सब पढ़ा, वह कौन है। पंडित के 'मैं' कहने पर अष्टावक्र ने पूछा कि क्या उस 'मैं' को भी पढ़ा जा सकता है। पंडित को एहसास हुआ कि ज्ञान का अहंकार सबसे सूक्ष्म बंधन है।
एक भक्त ने कहा कि उसने भगवान को सब कुछ अर्पित कर दिया है। अष्टावक्र ने पूछा कि अर्पण करने वाला कौन है। भक्त के 'मैं' कहने पर अष्टावक्र ने कहा कि उसका 'मैं' अभी भी बचा हुआ है। सच्चा त्याग तो वह है जब अर्पण करने वाला ही विलीन हो जाए।
एक साधक ने कहा कि वह मोक्ष चाहता है। अष्टावक्र ने पूछा कि मोक्ष किससे? साधक के संसार से कहने पर अष्टावक्र ने कहा कि क्या संसार उससे अलग है। जो उसे बांधता है, वह उसकी ही कल्पना है। उसे किसी मोक्ष की आवश्यकता नहीं, बस इस भ्रम का त्याग करना है कि वह बंधा हुआ है।
एक बालक ने पूछा कि अंतिम त्याग क्या है। अष्टावक्र ने उसकी हथेली पर एक पत्ता रखकर उसे त्यागने को कहा। फिर कहा कि अंतिम त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने को कुछ है ही नहीं। जिस क्षण तुम्हें एहसास होगा कि तुम्हारे पास कुछ नहीं है, उसी क्षण तुम्हारी सभी इच्छाएं विलीन हो जाएंगी।
एक साधक ने कठोर तप करते हुए पूछा कि सब कुछ त्यागने के बाद भी मन अशांत क्यों है। अष्टावक्र ने उसके कंठ में बंधी रुद्राक्ष माला को छूकर पूछा कि यह किसने पहनी है। जब साधक ने कहा कि उसने पहनी है, तो अष्टावक्र ने कहा कि उसने वस्तुएं तो छोड़ दीं, पर 'मैं साधक हूं' यह भाव नहीं त्यागा।
एक विद्वान ने अपने शास्त्रों के ढेर को दिखाते हुए कहा कि उसने सब कुछ त्याग कर ज्ञान अर्जित किया है। अष्टावक्र ने उससे पूछा कि क्या ज्ञान भी एक संग्रह नहीं है। जिस दिन वह ज्ञान को भी त्याग देगा, उस दिन वास्तविक ज्ञान का उदय होगा।
एक युवती ने कहा कि उसने प्रेम में सब कुछ त्याग दिया है। अष्टावक्र ने पूछा कि प्रेम करने वाला कौन है। जब युवती ने कहा कि 'मैं', तो अष्टावक्र ने कहा कि जब तक 'मैं' है, तब तक प्रेम पूर्ण नहीं हो सकता। सच्चा प्रेम तो वह है जहां प्रेमी और प्रेम में कोई भेद न रहे।
एक कर्मयोगी ने गर्व से कहा कि उसने फल की इच्छा त्याग दी है। अष्टावक्र ने पूछा कि कर्म करने वाला कौन है। जब योगी ने कहा कि 'मैं', तो अष्टावक्र ने कहा कि उसका 'मैं' तो अभी भी कर्मों में उलझा हुआ है। असली त्याग तो वह है जब कर्ता का भाव ही मिट जाए।
एक मुमुक्षु ने कहा कि उसने सब कुछ त्याग कर मोक्ष की खोज की है। अष्टावक्र ने पूछा कि मोक्ष चाहने वाला कौन है। जब मुमुक्षु ने कहा कि 'मैं', तो अष्टावक्र ने कहा कि जब तक 'मैं' है, तब तक मोक्ष कैसा? मुक्ति तो वह है जहां मुक्ति चाहने वाला ही ना रहे।
एक बालक ने पूछा कि अंत में क्या त्यागना होगा। अष्टावक्र ने उसकी हथेली पर एक फूल रखकर कहा कि इसे त्याग दो। फिर कहा कि असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने को कुछ है ही नहीं। तुम जो चाहो त्याग दो, पर जब तक त्यागने वाला है, त्याग अधूरा है।
एक साधक ने अष्टावक्र से अपने स्वप्न की कथा सुनाई कि उसने स्वप्न में सब कुछ त्याग दिया। अष्टावक्र ने पूछा कि क्या उसने स्वप्न देखने वाले को भी त्याग दिया। जब तक देखने वाला बचा हुआ है, त्याग अधूरा है। असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि तुम्हारे पास त्यागने को कुछ था ही नहीं।
एक युवक नदी किनारे बैठकर बोला कि उसने भोग विलास का पूर्ण त्याग कर दिया है। अष्टावक्र ने नदी की ओर इशारा करते हुए कहा कि यह नदी किनारे-किनारे बहती है, पर क्या उसने कभी किनारों को त्यागा है? तुम्हारा त्याग भी सीमाओं के भीतर ही है। असली मुक्ति तो वह है जब तुम जान लो कि तुम ही नदी हो, किनारा हो, बहता जल हो, सब कुछ हो।
एक सन्यासी ने दीपक जलाते हुए कहा कि उसने अंधकार को त्याग दिया। अष्टावक्र ने दीपक बुझा दिया और पूछा कि अब क्या त्यागा? सन्यासी बोला प्रकाश और जिसने यह सब देखा। अष्टावक्र ने पूछा कि क्या उसे भी त्याग सकते हो। जब तक देखने वाला है, त्याग असंभव है।
एक विद्वान ने अष्टावक्र से पूछा कि उसने सभी शास्त्रों का ज्ञान त्याग दिया, अब क्या करे। अष्टावक्र उसकी ओर देखकर मौन रहे। अंतिम त्याग तो वाणी का भी होता है। जब शब्द ही ना रहे, तब शेष क्या रह जाता है।
एक बालक ने अपनी छाया को लात मारते हुए कहा कि वह इस छाया को त्याग देना चाहता है। अष्टावक्र ने उसे धूप में खड़ा कर दिया। त्याग का रहस्य यही है कि जब तुम प्रकाश बन जाओगे, तो छाया स्वयं ही विलीन हो जाएगी। तुम्हें कुछ त्यागने की आवश्यकता नहीं, बस स्वयं को जानने की।
एक वृद्ध साधु ने अंतिम प्रश्न पूछा कि क्या उसे त्याग का भाव भी त्याग देना चाहिए। जब तक कोई प्रश्न है, तब तक त्याग अधूरा है। सच्चा त्याग तो वह है जब प्रश्नकर्ता ही शेष ना रहे।
एक कुम्हार ने अपने बनाए घड़ों को देखकर कहा कि उसने इन्हें बनाने की सारी कला सीख ली है। अष्टावक्र ने एक घड़ा उठाकर जमीन पर पटक दिया। केवल एक अस्थाई आकार टूटा है, मिट्टी तो वही की वही है। तुम्हारा ज्ञान भी ऐसा ही है, रूप बदलता रहता है, पर सार वही रहता है।
एक किसान ने विशाल वृक्ष को देखकर कहा कि वह इसकी शाखाओं की तरह फैलना चाहता है। अष्टावक्र ने उसे वृक्ष की जड़े दिखाई। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप भी इसी तरह सब में समाया हुआ है। तुम्हें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं, बस उसी में विश्राम करो जो पहले से ही तुम्हारा आधार है।
एक युवा ने आकाश की ओर देखकर कहा कि वह इन बादलों की तरह मुक्त होना चाहता है। तुम्हारा सच्चा स्वरूप इस आकाश की तरह है, जिसमें बादलों के आने जाने से कोई अंतर नहीं पड़ता। तुम्हें मुक्त होने का प्रयास नहीं करना है, बस यह जानना है कि तुम पहले से ही मुक्त हो।
एक नाविक ने कहा कि वह इस नदी के प्रवाह के साथ बहना चाहता है। तुम्हें प्रवाह का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि तुम स्वयं ही प्रवाह हो। जब यह बोध हो जाएगा, तो अनुसरण करने वाला और जिसका अनुसरण किया जा रहा है, यह भेद ही मिट जाएगा।
एक साधु ने दीपक जलाते हुए कहा कि वह अंधकार को दूर करना चाहता है। तुम्हारा सच्चा स्वरूप कभी नहीं जाता, वह केवल तुम्हारे भ्रम के कारण छिपा हुआ प्रतीत होता है।
एक बालक ने अंतिम प्रश्न पूछा कि वह सब कुछ कैसे त्याग दे। असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने को कुछ है ही नहीं। जिस क्षण तुम्हें एहसास होगा कि तुम्हारे पास है ही कुछ नहीं, उसी क्षण सभी बंधन टूट जाएंगे।
एक विद्वान ने घंटों तक अष्टावक्र के सामने शास्त्रार्थ किया। जब वह थक गया, तो अष्टावक्र ने केवल मुस्कुराकर पूछा कि जो कह रहा था, वह अब कहां है? त्याग का यही रहस्य है कि जब तक शब्द हैं, तब तक अज्ञान है। सच्चा ज्ञान तो वहां शुरू होता है जहां शब्द समाप्त हो जाते हैं।
एक योगी नदी किनारे ध्यान करते हुए बोला कि उसने संसार का त्याग कर दिया। असली मुक्ति तो वह है जब तुम जान लो कि तुम ही नदी हो, तुम ही तट हो, कोई भेद नहीं।
एक सन्यासी ने दीपक की लौ को देखकर कहा कि उसने अज्ञान के अंधकार को दूर कर दिया। त्याग का यही भ्रम है कि तुम जिसे त्याग समझते हो, वह केवल एक परछाई है। असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने वाला और त्यागी जाने वाला दोनों ही माया है।
एक बालक ने अष्टावक्र से पूछा कि उसे क्या त्यागना चाहिए। अष्टावक्र ने उसकी ओर देखकर केवल मुस्कुरा दिया। सच्चा त्याग बिना प्रयास के होता है, जैसे बचपन की मासूम मुस्कान जिसमें ना कोई प्रयास होता है ना कोई अपेक्षा।
एक वृद्ध साधु ने अंतिम प्रश्न पूछा कि क्या उसे त्याग का विचार भी त्याग देना चाहिए। अंतिम त्याग तो वह है जब प्रश्नकर्ता ही शेष ना रहे।
Transcript
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0:00 एक शाम राजा जनक ने अष्टावक्र के चरणों में बैठकर पूछा गुरुदेव मैंने सब कुछ त्याग दिया राजपाट धन वैभव फिर भी मन में शांति नहीं क्या मैंने कुछ भूल किया अष्टावक्र ने राजा के सिंहासन की ओर देखा और मुस्कुराए राजन तुमने सब कुछ त्याग दिया पर मैंने त्याग किया यह भाव क्यों नहीं त्यागा राजा की आंखों में एक नई ज्योति जगी उसने पहली बार महसूस किया कि असली त्याग तो अहंकार का होना था। पहला दीपक भौतिक त्याग की सीमा एक सन्यासी ने गर्व से कहा मैंने घर बार छोड़ दिया। अष्टावक्र ने उसकी काषाय वस्त्र की ओर इशारा करते हुए पूछा यह वस्त्र किसका है?
0:48 सन्यासी बोला मेरा। फिर त्याग क्या हुआ? अष्टावक्र ने पूछा केवल स्वामित्व बदला है। असली त्याग तो वह है जब मेरा का भाव ही मिट जाए। सन्यासी के हाथ से कमंडलु गिर पड़ा। उसे एहसास हुआ कि वह अभी भी अपने सन्यासी होने के अहंकार में फंसा था। दूसरा दीपक ज्ञान का भ्रम एक पंडित ने कहा। मैंने सभी शास्त्र पढ़ लिए। अष्टावक्र ने उससे पूछा जिसने यह सब पढ़ा वह कौन है? पंडित बोला मैंने और यह मैं अष्टावक्र ने पूछा क्या वह भी पढ़ा जा सकता है? पंडित स्तब्ध रह गया। उसने अपने
1:35 सारे ग्रंथ फेंक दिए। उसे समझ आया कि ज्ञान का अहंकार सबसे सूक्ष्म बंधन है। तीसरा दीपक भक्ति का पर्दा एक भक्त ने कहा मैंने भगवान को सब कुछ अर्पित कर दिया। अष्टावक्र ने पूछा अर्पण करने वाला कौन है? भक्त बोला मैं हूं। तो फिर अष्टावक्र ने कहा तुम्हारा मैं अभी भी बचा हुआ है। सच्चा त्याग तो वह है जब अर्पण करने वाला ही विलीन हो जाए। भक्त की आंखों से आंसू बह निकले। उसे एहसास हुआ कि वह भक्ति के माध्यम से भी अपने अह को पोषित कर रहा था। चौथा दीपक मोक्ष की इच्छा एक साधक बोला
2:20 मैं मोक्ष चाहता हूं। अष्टावक्र ने पूछा मोक्ष किससे? साधक ने कहा इस संसार से और यह संसार अष्टावक्र ने कहा क्या तुमसे अलग है? जो तुम्हें बांधता है वह तुम्हारी ही कल्पना है। तुम्हें किसी मोक्ष की आवश्यकता नहीं। बस इस भ्रम का त्याग करो कि तुम बंधे हो। साधक के माथे पर बनी सुख की रेखाएं उभर आई। उसने पहली बार महसूस किया कि वह पहले से ही मुक्त था। अंतिम त्याग एक बालक ने पूछा गुरुदेव अंतिम त्याग क्या है? अष्टावक्र ने उसकी हथेली पर एक पत्ता रखा और पूछा इसे त्याग सकते
3:05 हो। बालक ने पत्ता फेंक दिया। नहीं अष्टावक्र मुस्कुराए। अंतिम त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने को कुछ है ही नहीं। जिस क्षण तुम्हें एहसास होगा कि तुम्हारे पास है ही कुछ नहीं। उसी क्षण तुम्हारी सभी इच्छाएं विलीन हो जाएंगी। बालक ने आंखें बंद की। जब उसने आंखें खोली तो अष्टावक्र कहीं नहीं थे या शायद सर्वत्र थे। उसने महसूस किया कि सच्चा त्याग किसी वस्तु का नहीं बल्कि भ्रम का होता है। और जब भ्रम ही ना रहे तो त्याग की बात ही कहां रह जाती है। साधना का द्वंद्व एक साधक ने कठोर तप करते
3:52 हुए पूछा मैंने सब कुछ त्याग दिया। फिर भी मन अशांत क्यों है? अष्टावक्र ने उसके कंठ में बंधी रुद्राक्ष माला को छूकर पूछा यह किसने पहनी है? साधक बोला मैंने। तो फिर त्याग क्या हुआ? अष्टावक्र ने कहा, तुमने वस्तुएं तो छोड़ दी पर मैं साधक हूं। यह भाव क्यों नहीं त्यागा? साधक की माला टूट कर बिखर गई। उसे एहसास हुआ कि साधना के नाम पर वह अपने अहंकार को ही पाल रहा था। ज्ञान का भार एक विद्वान ने अपने शास्त्रों के ढेर को दिखाते हुए कहा, मैंने सब कुछ त्याग कर ज्ञान अर्जित किया। अष्टावक्र ने उससे पूछा क्या ज्ञान भी एक संग्रह नहीं है? विद्वान स्तब्ध रह गया।
4:38 जिस दिन तुम ज्ञान को भी त्याग दोगे अष्टावक्र ने कहा उस दिन वास्तविक ज्ञान का उदय होगा। विद्वान ने अपने सारे ग्रंथ दान कर दिए। उसे समझ आया कि ज्ञान का बोझ भी अज्ञान ही है। प्रेम का पाठ एक युवती ने कहा मैंने प्रेम में सब कुछ त्याग दिया। अष्टावक्र ने पूछा प्रेम करने वाला कौन है? युवती बोली मैं जब तक मैं है अष्टावक्र ने कहा तब तक प्रेम पूर्ण नहीं हो सकता। सच्चा प्रेम तो वह है जहां प्रेमी और प्रेम में कोई भेद न रहे। युवती की आंखों से आंसू बह निकले। उसे एहसास हुआ कि वह प्रेम के माध्यम से भी स्वयं को ही
5:24 खोज रही थी। कर्म का भ्रम एक कर्म योगी ने गर्व से कहा मैंने फल की इच्छा त्याग दी अष्टावक्र ने पूछा कर्म करने वाला कौन है योगी बोला मैं तो फिर अष्टावक्र ने कहा तुम्हारा मैं तो अभी भी कर्मों में उलझा हुआ है। असली त्याग तो वह है जब कर्ता का भाव ही मिट जाए। कर्मयोगी के हाथ से फावड़ा गिर पड़ा। उसे समझ आया कि निष्काम कर्म की अवधारणा भी एक सूक्ष्म आसक्ति थी। मुक्ति की आसक्ति एक मुमुक्षु ने कहा मैंने सब कुछ त्याग कर मोक्ष की खोज की। अष्टावक्र ने पूछा मोक्ष चाहने वाला कौन है? मुमुक्षु बोला मैं जब तक मैं है
6:11 अष्टावक्र ने कहा तब तक मोक्ष कैसा? मुक्ति तो वह है जहां मुक्ति चाहने वाला ही ना रहे। मुमुक्षु ने अपनी काषाय वस्त्र उतार फेंके। उसे एहसास हुआ कि मोक्ष की इच्छा भी एक बंधन थी। त्याग का अंत एक बालक ने पूछा गुरुदेव अंत में क्या त्यागना होगा? अष्टावक्र ने उसकी हथेली पर एक फूल रखा और कहा इसे त्याग दो। बालक ने फूल गिरा दिया। नहीं अष्टावक्र मुस्कुराए। असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने को कुछ है ही नहीं। तुम जो चाहो त्याग दो पर जब तक त्यागने वाला है त्याग अधूरा है। बालक ने आंखें बंद की। जब खोली
6:59 तो उसे समझ आया कि सच्चा त्याग तो स्वयं को जानने में है। जहां ना त्यागने वाला रहता है। ना त्यागी जाने वाली कोई वस्तु। स्वप्न का सत्य एक दिन एक साधक ने अष्टावक्र से अपने स्वप्न की कथा सुनाई। मैंने स्वप्न में सब कुछ त्याग दिया। अष्टावक्र ने धीरे से पूछा, क्या तुमने स्वप्न देखने वाले को भी त्याग दिया? साधक स्तब्ध रह गया। जब तक देखने वाला बचा हुआ है। अष्टावक्र ने कहा, त्याग अधूरा है। असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि तुम्हारे पास त्यागने को कुछ था ही नहीं।" नदी का संदेश एक युवक नदी किनारे बैठकर बोला मैंने भोग विलास का पूर्ण त्याग कर दिया। अष्टावक्र ने नदी की ओर इशारा करते
7:47 हुए कहा यह नदी किनारे-किनारे बहती है। पर क्या उसने कभी किनारों को त्यागा है? युवक ने सोचा नहीं। ठीक वैसे ही अष्टावक्र ने कहा, तुम्हारा त्याग भी सीमाओं के भीतर ही है। असली मुक्ति तो वह है जब तुम जान लो कि तुम ही नदी हो, किनारा हो, बहता जल हो, सब कुछ हो। दीपक की लौ एक सन्यासी ने दीपक जलाते हुए कहा, मैंने अंधकार को त्याग दिया। अष्टावक्र ने दीपक बुझा दिया। अब क्या त्यागा? उन्होंने पूछा सन्यासी बोला प्रकाश और जिसने यह सब देखा अष्टावक्र ने पूछा क्या उसे भी त्याग सकते हो सन्यासी की सांसे रुक गई उसे एहसास हुआ कि जब तक
8:36 देखने वाला है त्याग असंभव है। सच्चा त्याग तो स्वयं को जानने में है। मौन की भाषा एक विद्वान ने अष्टावक्र से पूछा मैंने सभी शास्त्रों का ज्ञान त्याग दिया। अब क्या करूं? अष्टावक्र ने उसकी ओर देखा और मौन रहे। विद्वान ने फिर पूछा गुरुदेव उत्तर दीजिए। अष्टावक्र फिर चुप रहे। अचानक विद्वान के चेहरे पर प्रकाश फैल गया। उसने समझ लिया कि अंतिम त्याग तो वाणी का भी होता है। जब शब्द ही ना रहे तब शेष क्या रह जाता है। छाया का रहस्य एक बालक ने अपनी छाया को लात मारते हुए कहा। मैं इस छाया को त्याग देना चाहता हूं। अष्टावक्र ने उसे
9:23 धूप में खड़ा कर दिया। कहां है तुम्हारी छाया? उन्होंने पूछा। बालक ने देखा छाया गायब थी। त्याग का रहस्य यही है। अष्टावक्र ने कहा जब तुम प्रकाश बन जाओगे तो छाया स्वयं ही विलीन हो जाएगी। तुम्हें कुछ त्यागने की आवश्यकता नहीं बस स्वयं को जानने की। अंतिम प्रश्न एक वृद्ध साधु ने अंतिम प्रश्न पूछा। गुरुदेव क्या मुझे त्याग का भाव भी त्याग देना चाहिए। अष्टावक्र ने उसकी ओर देखा और मुस्कुराए। साधु की आंखों में आंसू आ गए। उसे समझ आया कि जब तक कोई प्रश्न है तब तक त्याग अधूरा है। सच्चा त्याग तो वह है जब प्रश्नकर्ता
10:09 ही शेष ना रहे। उसने आंखें बंद की और जब खोली तो पाया कि अष्टावक्र कहीं नहीं है या शायद सर्वत्र हैं। उसने महसूस किया कि जिस क्षण त्याग और त्यागी का भाव मिट जाता है उसी क्षण सच्ची स्वतंत्रता का आगमन होता है। मिट्टी के घड़े का सबक एक कुम्हार ने अपने बनाए घड़ों को देखकर कहा मैंने इन्हें बनाने की सारी कला सीख ली है। अष्टावक्र ने एक घड़ा उठाकर जमीन पर पटक दिया। टूटे हुए घड़े को देखकर कुम्हार व्यथित हो उठा। क्या टूटा? अष्टावक्र ने पूछा, "मेरा घड़ा? कुम्हार बोला, नहीं।
10:55 अष्टावक्र ने मिट्टी के टुकड़ों को उठाते हुए कहा केवल एक अस्थाई आकार टूटा है। मिट्टी तो वही की वही है। तुम्हारा ज्ञान भी ऐसा ही है। रूप बदलता रहता है। पर सार वही रहता है। वृक्ष की जड़ों का संदेश एक किसान ने विशाल वृक्ष को देखकर कहा। मैं इसकी शाखाओं की तरह फैलना चाहता हूं। अष्टावक्र ने उसे वृक्ष की जड़े दिखाई। यह जड़े क्या कर रही हैं? उन्होंने पूछा, मिट्टी में समाई हुई है। किसान बोला, ठीक वैसे ही अष्टावक्र ने कहा, तुम्हारा वास्तविक स्वरूप भी इसी तरह सब में समाया हुआ है। तुम्हें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। बस
11:42 उसी में विश्राम करो जो पहले से ही तुम्हारा आधार है। आकाश और बादल एक युवा ने आकाश की ओर देखकर कहा मैं इन बादलों की तरह मुक्त होना चाहता हूं। अष्टावक्र ने पूछा क्या बादल आकाश से अलग हो सकते हैं? युवा चुप रहा। तुम्हारा सच्चा स्वरूप इस आकाश की तरह है। अष्टावक्र ने कहा जिसमें बादलों के आने जाने से कोई अंतर नहीं पड़ता। तुम्हें मुक्त होने का प्रयास नहीं करना है। बस यह जानना है कि तुम पहले से ही मुक्त हो। नदी का प्रवाह एक नाविक ने कहा मैं इस नदी के प्रवाह के साथ बहना चाहता हूं। अष्टावक्र ने पूछा, क्या नदी अपने प्रवाह को जानती है? नाविक ने सोचा,
12:29 नहीं। तुम भी उसी तरह हो। अष्टावक्र ने कहा, तुम्हें प्रवाह का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि तुम स्वयं ही प्रवाह हो। जब यह बोध हो जाएगा तो अनुसरण करने वाला और जिसका अनुसरण किया जा रहा है यह भेद ही मिट जाएगा। दीपक का प्रकाश एक साधु ने दीपक जलाते हुए कहा मैं अंधकार को दूर करना चाहता हूं। अष्टावक्र ने दीपक बुझा दिया। अब क्या हुआ? उन्होंने पूछा। साधु बोला अंधकार हो गया। क्या प्रकाश कहीं गया? अष्टावक्र ने पूछा। साधु ने कहा नहीं केवल छिप गया। ठीक वैसे ही अष्टावक्र ने कहा तुम्हारा
13:15 सच्चा स्वरूप कभी नहीं जाता। वह केवल तुम्हारे भ्रम के कारण छिपा हुआ प्रतीत होता है। एक बालक ने अंतिम प्रश्न पूछा। गुरुदेव मैं सब कुछ कैसे त्याग दूं? अष्टावक्र ने उसकी हथेली पर एक पत्ता रखा और कहा इसे त्याग दो। बालक ने पत्ता गिरा दिया। नहीं अष्टावक्र मुस्कुराए असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने को कुछ है ही नहीं। जिस क्षण तुम्हें एहसास होगा कि तुम्हारे पास है ही कुछ नहीं उसी क्षण सभी बंधन टूट जाएंगे। बालक ने आंखें बंद की। जब उसने आंखें खोली तो अष्टावक्र कहीं नहीं थे या शायद सर्वत्र थे। उसने महसूस
14:03 किया कि सच्चा त्याग किसी वस्तु का नहीं बल्कि भ्रम का होता है। और जब भ्रम ही ना रहे तो त्याग की बात ही कहां रह जाती है। उसने देखा कि जो कुछ भी वह खोज रहा था वह पहले से ही उसके भीतर विद्यमान था। शुद्ध, निर्मल और अनंत। मौन की गूंज एक विद्वान ने घंटों तक अष्टावक्र के सामने शास्त्रार्थ किया। जब वह थक गया तो अष्टावक्र ने केवल मुस्कुराकर पूछा जो कह रहा था वह अब कहां है? विद्वान ने महसूस किया कि उसके सभी शब्द मौन में विलीन हो गए। त्याग का यही रहस्य है। अष्टावक्र ने कहा जब तक शब्द हैं तब तक अज्ञान है।
14:49 सच्चा ज्ञान तो वहां शुरू होता है जहां शब्द समाप्त हो जाते हैं। नदी और तट का नृत्य एक योगी नदी किनारे ध्यान करते हुए बोला मैंने संसार का त्याग कर दिया। अष्टावक्र ने नदी की ओर इशारा करते हुए पूछा क्या नदी ने कभी तटों को त्यागा है? योगी ने कहा नहीं। तो फिर अष्टावक्र ने समझाया तुम्हारा त्याग भी सीमाओं के भीतर ही है। असली मुक्ति तो वह है जब तुम जान लो कि तुम ही नदी हो। तुम ही तट हो कोई भेद नहीं। दीपक की परछाई एक सन्यासी ने दीपक की लौ को देखकर कहा, मैंने अज्ञान के अंधकार को दूर कर दिया। अष्टावक्र ने दीपक
15:34 को दीवार के पास ले जाकर उसकी परछाई दिखाई। क्या यह प्रकाश है या अंधकार? उन्होंने पूछा। सन्यासी सोच में पड़ गया। त्याग का यही भ्रम है। अष्टावक्र ने कहा, तुम जिसे त्याग समझते हो, वह केवल एक परछाई है। असली त्याग तो वह है जब तुम जान लो कि त्यागने वाला और त्यागी जाने वाला दोनों ही माया है।" बालक की मुस्कान एक दिन एक बालक ने अष्टावक्र से पूछा, "मुझे क्या त्यागना चाहिए?" अष्टावक्र ने उसकी ओर देखकर केवल मुस्कुरा दिया। बालक भी मुस्कुरा दिया। उस क्षण बिना किसी शब्द के बालक ने समझ लिया कि सच्चा त्याग बिना प्रयास के होता है।
16:21 जैसे बचपन की मासूम मुस्कान जिसमें ना कोई प्रयास होता है ना कोई अपेक्षा। त्याग का अंत एक वृद्ध साधु ने अंतिम प्रश्न पूछा। गुरुदेव क्या मुझे त्याग का विचार भी त्याग देना चाहिए। अष्टावक्र ने उसकी ओर देखा और मौन रहे। साधु की आंखों में आंसू आ गए। उस क्षण उसे एहसास हुआ कि जब तक कोई प्रश्न है तब तक त्याग अधूरा है। अंतिम त्याग तो वह है जब प्रश्नकर्ता ही शेष ना रहे। उसने आंखें बंद की और जब खोली तो पाया कि अष्टावक्र कहीं नहीं है या शायद सर्वत्र है। उसने महसूस किया कि जिस क्षण त्याग और त्यागी का भाव मिट जाता है, उसी क्षण वह
17:08 स्वयं ही शेष रह जाता है। निर्विकल्प, निराकार, अनंत। तो दोस्तों, यह था आज का वीडियो। अगर आपको यह जानकारी पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक और शेयर जरूर करें और हां चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें। अगले वीडियो तक के लिए नमस्ते। धन्यवाद।