India-Pakistan Partition Explained

Nitish Rajput www.youtube.com

संक्षिप्त सारांश

इस वीडियो में भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि और कारणों पर चर्चा की गई है।

  • वीडियो में विभिन्न नेताओं जैसे जिन्ना और महात्मा गांधी की भूमिकाओं का उल्लेख किया गया है।
  • विभाजन के बाद हुई हिंसा और इसके प्रभावों का विश्लेषण किया गया है।

भारत का विभाजन और उसकी पृष्ठभूमि

वीडियो का आरंभ हिंदू आबादी के बहुमत से होता है, जो यह बताता है कि चुनावों में हिंदू ही जीतेगा। जिन्ना का वर्णन करते हुए कहा गया कि उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समाज के सामंजस्य को समाप्त करने की कोशिश की थी। विभाजन के समय मूडी नेताओं की असफलताएँ भी इस चर्चा में शामिल हैं।

जिन्ना और स्वतंत्रता संग्राम

जिन्ना के जीवन और उनके राजनीतिक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करते हुए दिखाया गया है कि कैसे उन्होंने अपने परदादा के हिंदू धर्म से इस्लाम की ओर मुड़ने के बाद अपनी पहचान बनाई। जिन्ना ने यूरोप में लॉ की पढ़ाई की और राष्ट्रवादी राजनीति में अपने करियर की शुरुआत की।

भारतीय राजनीति और कम्युनल टेंशन

1905 में बंगाल के विभाजन और धार्मिक राजनीति के कारण कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच खींचतान बढ़ गई। जिन्ना ने इस समय में कांग्रेसी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मुस्लिमों के अधिकारों की बात की।

हिंदू-मुस्लिम रिश्ते और विभाजन

वीडियो में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच के तनाव को चर्चा में लाया गया है, जो 1920 के दशक में बढ़ी। दोनों समुदायों के बीच की राजनीतिक हलचल ने विभाजन की ओर अग्रसर किया।

महात्मा गांधी की भूमिका

महात्मा गांधी की वापसी और खिलाफत आंदोलन में उनकी भागीदारी को दर्शाते हुए दिखाया गया है कि उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया और स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में रुख किया। गांधी ने मांग की कि मुस्लिमों के साथ एकता बनाई जाए।

1940 और उसके बाद का दौर

1940 में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग की। इस समय की राजनीतिक स्थिति ने देश के विभाजन की आवश्यकता को बढ़ाया।

डायरेक्ट एक्शन डे

डायरेक्ट एक्शन डे जो कि मुस्लिम लीग द्वारा आयोजित किया गया था, के परिणामस्वरूप देशभर में साम्प्रदायिक हिंसा फैली और यह विभाजन की प्रक्रिया को तेज कर दिया।

माउंटबेटन योजना और विभाजन

माउंटबेटन की योजना के अनुसार, 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग आजादी देने का निर्णय लिया गया।

विभाजन के परिणाम

विभाजन के फलस्वरूप लाखों लोगों ने अपनी ज़िंदगियाँ खो दीं और बड़ी संख्या में लोगों को पलायन करना पड़ा। इस समय हुए दंगों और हिंसा को भी दर्शाया गया है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में साम्प्रदायिकता की गहरी जड़ों को उजागर करता है।

विभाजन की निरंतर प्रभाव

आखिर में, वीडियो यह बताता है कि विभाजन के परिणाम आज भी लोगों की स्मृति में ताजे हैं और कैसे यह घटना भारतीय समाज में गहरी छाप छोड़ गई है।

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Transcript

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0:00 मेजॉरिटी में हिंदू हैं। इलेक्शन होगा तो हिंदू जीतेगा। लॉ बनाएगा तो वो भी हिंदू बनाएगा। तो मुस्लिम कहां जाएंगे? जिन्ना ने तो मौलवी और मौलाना का जो पूरा कांसेप्ट था उसको ही क्रिटिसाइज कर दिया। ट्रेनों में लाशें भर के भेजी। बंटवारे में ऑफिस के जो टाइप राइटर और टेबल थे उनको भी नहीं छोड़ा। वो भी आधे-आधे बांट दिए इन लोगों ने। ये इंडियन नेशनल कांग्रेस तो हिंदू पार्टी है। 6% लीडर्स को अगर छोड़ दिया जाए तो सारे हिंदू रखे हैं इन्होंने। जिन्ना तो कह रहे हैं कि हिंदू और मुस्लिम साथ में ही नहीं रह सकते। तो फिर पंजाब और बंगाल के हिंदू क्यों चाहिए? जिन्ना ने कह दिया था कि इंडिया के सारे मुस्लिम्स का जो रिप्रेजेंटेटिव है

0:45 वो मैं हूं। तुम सबके लीडर हो तो हम क्या करें? हम सब जॉब छोड़ दें। और सेम टाइम पे सावरकर ने बुक लिख के हिंदू राष्ट्र की डिमांड कर दी और आरएसएस को भी सारे लीडर ने सेम ईयर में बना दिया। अगर ऐसा है तो कैंडिडेट खड़ा होगा तो मुस्लिम खड़ा होगा। वोट भी खाली मुस्लिम करेगा। हिंदू वोट नहीं कर [संगीत] पाएगा। देखिए इससे पहले हमने बात की थी ईस्ट इंडिया कंपनी की कि कैसे एक मसाले का बिजनेस करने आई छोटी सी कंपनी ने हमारे देश को गुलाम बना लिया था। और फिर क्या-क्या करके हमने उनसे आजादी ली उसके ऊपर भी वीडियो बनाई थी। और आज यह जो वीडियो है इसमें हम बात करेंगे कि जब आजादी मिल गई थी तो फिर ऐसी क्या मजबूरियां बन गई थी उस टाइम पे कि इंडिया का पार्टीशन करना पड़ा और बड़े से बड़े

1:30 दिग्गज जो थे वो इस चीज को रोक क्यों नहीं पाए। आज 77 साल हो चुके हैं इस पार्टीशन को लेकिन आज भी आपको लोग बहस करते हुए दिख जाएंगे कि ये जो पार्टीशन हुआ ये सही हुआ या गलत हुआ। क्या सच में ऐसी कोई चीज हो सकती थी जो इस पार्टीशन को रोक देती। एक्चुअल में इसका जिम्मेदार कौन है? और देखिए जब भी हमारे देश के पार्टीशन की बात होती है तो हमारे इमोशंस जो हैं वो बहुत ज्यादा हाई रहते हैं। जिस तरीके से हमारे लिए जिन्ना विलन है वैसे ही आप पाकिस्तान में जाके बात करोगे तो वहां पे नेहरू और गांधी जी को गलत बताया जाता है। और कुछ का यह भी मानना है कि अगर सरदार वल्लभ भाई पटेल या फिर सुभाष चंद्र बोस जी होते तो ये जो मैटर था ये वहीं पे सॉल्व हो गया होता। आप अगर इस मुद्दे पर कभी किसी से बात करोगे तो हर कोई कहता है कि यह नहीं होना चाहिए था। हम तो चाहते ही नहीं थे कि ऐसा हो। सब लोग आपस में प्यार से रहते थे। यह तो नेताओं ने मजबूरी बना दी थी। लेकिन जब उस टाइम पर एक दूसरे को मारने काटने की बात आई तो कोई भी पीछे नहीं हटा। नफरत ऐसी

2:16 थी कि 15 से 20 लाख लोगों को काट दिया गया था। देखिए इस पार्टीशन के बाद कई लोग सड़क पे आ गए थे। अपना घर, जमीन, काम छोड़ के उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ी थी। वैसे तो वो टाइम एकदम अलग था लेकिन आज भी फाइनेंसियल सिक्योरिटी की वही वैल्यू है। फ्यूचर सिक्योर करने के लिए अब लोग अलग-अलग तरह के इन्वेस्टमेंट्स करते हैं। जिसमें से स्टॉक मार्केट एक है। अब देखिए स्टॉक मार्केट के अंदर फायदे की गारंटी तो कोई नहीं ले सकता। लेकिन आप करेक्ट नॉलेज से अपने फायदे की प्रोबेबिलिटी जरूर बढ़ा सकते हैं। जैसे पिछले 1 साल में बोंडा इंजीनियरिंग का स्टॉक 20 टाइम्स इनक्रीस हुआ है। क्योंकि इनको 1700 करोड़ के ऑर्डर्स मिले थे। ऐसे ही आदित्य विज़न के कई स्टेट्स में स्टॉक एक्सपेंशन करने के बाद उनका स्टॉक प्राइस 100 टाइम्स बढ़ा और ऐसे ही KPI ग्रीन को जब बड़े ऑर्डर्स मिले तो उनका स्टॉक प्राइस बढ़ा। तो इससे आप समझ

3:02 सकते हैं कि इन कंपनीज़ के प्राइस बढ़ने में लॉजिक था। तो अगर आपके पास कंपनी के ऑर्डर्स, एक्सपेंशन, सेल्स और प्रॉफिट जैसी इंपॉर्टेंट इंफॉर्मेशन है तो आप लॉजिकली बेटर डिसीजन ले पाओगे। लेकिन इस तरीके की इंफॉर्मेशन निकालने के लिए आपका बहुत ज्यादा टाइम जाएगा। और इसका सॉल्यूशन दिया है सोवरन ने। ये बहुत इजी है विद इन फ्यू क्लिक्स आप देख सकते हैं किस कंपनी को बड़े ऑर्डर्स मिले, किसका एक्सपेंशन हुआ, कंपनी का प्रॉफिट क्या है? और ऐसे और भी बहुत सारे इंपॉर्टेंट डाटा। और सोवरन की जो इंफॉर्मेशन है यह कोई प्रेडिक्शन नहीं है बल्कि एनएससी और बीएसई से सोर्स्ड एक्यूरेट इंफॉर्मेशन है। सोवरन आपके टाइम की रिस्पेक्ट करता है और सिर्फ इंपॉर्टेंट इंफॉर्मेशन देता है और इसके साथ-साथ सोवरन अपने नए यूज़र्स को 45 डेज का फ्री ट्रायल देता है और आप यहां पे फेमस इन्वेस्टर आदित्य जोशी से इन्वेस्टिंग भी सीख सकते

3:49 हैं। वो भी बिल्कुल फ्री में। तो आज ही सोवरन ऐप को डाउनलोड करें। लिंक इज इन द डिस्क्रिप्शन। तो टॉपिक पे वापस आते हैं। तो एक्चुअल में उस टाइम पे ऐसी क्या सिचुएशनंस बन गई थी और मजबूरी ऐसी क्या फंसी थी कि बड़े से बड़े भारतीय जो थे उनकी भी स्ट्रेटजीस फेल हो रही थी और इस पार्टीशन के पीछे जिम्मेदार कौन है? गलती किसकी है? एक-एक डिटेल मैं आपके सामने रखूंगा ताकि अगली बार जब आपके सामने कोई पार्टीशन की बात करे तो आपको एक्चुअल डिटेल पता हो। तो देखिए ये है कराची और कराची के इस खरादर डिस्ट्रिक्ट के इस घर में उस टाइम पे ये ब्रिटिश इंडिया का पार्ट था। तो इस घर में एक जिन्ना बाई पूंजा नाम से एक बिजनेसमैन रहता था। और इस बिजनेसमैन के यहां पे 25th ऑफ दिसंबर 1876 को एक लड़के का जन्म होता है जिसका नाम पड़ता है मोहम्मद अली जिन्ना जो इस पूरी सिचुएशन का सबसे मेन कररेक्टर है। जिन्ना

4:34 के जो दादा थे वो पहले हिंदू थे लेकिन बाद में इन्होंने मुस्लिम रिलीजन को अपना लिया था। इनके दादा पहले खोजा कास्ट से थे। खोजा कास्ट के लोग पहले हिंदू हुआ करते थे। फिर बाद में इन्होंने इस्लाम रिलीजन अपना लिया था। और फिर आगे जिन्ना जो थे उन्होंने भी मुस्लिम रिलिजन को ही फॉलो किया। अब जैसे-जैसे जिन्ना बड़े होने लगे तो जिन्ना ने कराची के क्रिश्चियन मिशनरी सोसाइटी हाई स्कूल से अपनी स्कूलिंग पूरी की और फिर इसके बाद ये लंदन चले गए और वहां जाके अपनी लॉ की पढ़ाई करने लगे। अब काफी टाइम तक जिन्ना लंदन में रहने के बाद वहां पे अपनी पढ़ाई करने के बाद वकीलों के बीच में रहने के बाद जिन्ना ईयर 1896 में कराची वापस आ जाते हैं। लेकिन जिस दिन ये कराची पहुंचते हैं उसी दिन इनकी फैमिली से इनको पता चलता है कि इनके जो फादर हैं जो बिजनेसमैन थे उनको पैसे का भारी नुकसान हो गया और इनके ऊपर बहुत सारा लोन हो गया। तो ये सारी चीजें जब पहुंचने के बाद इनको पता चलती हैं तो जिन्ना जो थे वो अपना कमाने

5:20 का इंतजाम जो है वो शुरू कर देते हैं और ईयर 1900 आते-आते बॉम्बे में जाके अपनी लीगल प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। और इस टाइम पे ये जो आजादी की लड़ाई वगैरह चल रही थी इससे बिल्कुल दूर थे और गांधी जी जो थे वो भी उस टाइम पे साउथ अफ्रीका में थे। तो कहने का मतलब है कि जिन्ना और गांधीजी उस टाइम पे अंग्रेजों के खिलाफ जो आजादी की स्ट्रगल चल रही थी उससे बिल्कुल दूर थे। और उस टाइम पे किसी ने नहीं सोचा था कि ये जो दोनों हैं आगे चलके कितना बड़ा काम करने वाले हैं। देखिए उस टाइम पे ब्रिटिश इंडिया का जो मैप था वो ये था। ये जो आप ब्लू में देख रहे हैं ये प्रिंसली स्टेट्स थे जिनको ब्रिटिशर्स इनडायरेक्टली रूल करते थे। और बाकी ये जो पूरा येलो एरिया है इसको ब्रिटिशर्स डायरेक्टली रूल करते थे। और ये जो येलो एरिया है आगे चलके इसी एरिया का पार्टीशन होना था। बाकी प्रिंसली स्टेट क्या है? डायरेक्टली और इनडायरेक्टली कैसे रूल करते हैं? ये सब हमने ऑलरेडी डिस्कस कर लिया। इस वीडियो

6:05 में हम सिर्फ और सिर्फ पार्टीशन की बात करेंगे। उस टाइम पर करीब टोटल पापुलेशन 38 करोड़ थी। जिसमें से 65% हिंदू थे और 27% मुस्लिम थे। और इसमें से भी ब्रिटिश इंडिया का ये जो आप नॉर्थ वेस्ट और नॉर्थ ईस्ट का एरिया देख रहे हो इसमें जो थी वो मुस्लिम पॉपुलेशन जो थी वो मेजॉरिटी में थी। जैसे खबर पख्तून में 94% बलूचिस्तान में 87% सिंध में 71% पंजाब में 57% बंगाल में 55% मुस्लिम थे और बाकी जितनी जगह थी वहां पे हिंदू मेजॉरिटी में थे। ये जो सारी डिटेल मैं आपको बता रहा हूं, ये इसलिए बता रहा हूं क्योंकि यही सेंसस का जो डाटा था यही इस पार्टीशन की आगे चलके जड़ बनता है। अब देखिए काफी टाइम तक ये सारी चीजें चलती है। इसके बाद ईयर आता है 1903 और फ्रीडम फाइटर्स जो थे इन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। हिंदू मुस्लिम सारी कम्युनिटी जो थी वो एक साथ

6:50 मिलके अंग्रेजों को परेशान कर रही थी और इसमें भी सबसे ज्यादा दिक्कत जो ब्रिटिशर्स के सामने आ रही थी वो बंगाल से आ रही थी। उस टाइम का बंगाल प्रोविंस जो था वो बहुत ही बड़ा था। आज का वेस्ट बंगाल बिहार आसाम छत्तीसगढ़ झारखंड बांग्लादेश यह सब आता था उसमें। जितने भी फेमस पॉलिटिशियंस थे, लॉयर्स, इंटेलेक्चुअल्स बंगाल से ही ब्रिटिशर्स को निशाना बनाते थे। तो कहने का मतलब है कि उस टाइम पे बंगाल जो था वो रिवोल्यूशनरी एक्टिविटीज का हब बन चुका था। और इस वजह से ब्रिटिशर्स जो थे इस पूरे जगह से बहुत ज्यादा गुस्सा रहते थे। अब होता क्या है कि जब ये सारी एक्टिविटीज बहुत ज्यादा बढ़ने लगती हैं तो इसके 2 साल बाद यानी कि ईयर 1905 में वाइस लॉर्ड कर्जन बंगाल से डील करने के लिए एक प्लान बनाते हैं। उनको वहां पे रहते-रहते एक चीज समझ में आ गई थी कि इंडियंस को रिलीजन के नाम पे बांटा जा

7:37 सकता है। और अगर ये किसी तरीके से इनकी यूनिटी ब्रेक कर देते हैं तो इनको मैनेज करना बहुत आसान हो जाएगा। और यह जो नेशनलिज्म की फीलिंग भरी हुई है सारे इंडियंस में यह रिलीजियस हेट्रेट में कन्वर्ट हो जाएगी। तो इसके लिए लॉर्ड कर्ज़न जो थे वो जुलाई 1905 को एक अनाउंसमेंट करते हैं। इसमें ये कहते हैं कि बंगाल जो है ये बहुत ही ज्यादा इसका एरिया बड़ा है। इसकी वजह से एडमिनिस्ट्रेशन में बहुत दिक्कत आ रही है। तो बंगाल का पार्टीशन करना पड़ेगा। और बंगाल जो था एज अ होल पूरे बंगाल के अंदर हिंदू जो थे वो मेजॉरिटी में थे। लेकिन बंगाल का जो ईस्ट साइड था वहां पे मुस्लिम पापुलेशन ज्यादा थी। तो लॉर्ड कर्ज़न ने क्या किया? एक प्लंड तरीके से बंगाल को डिवाइड किया। उसने जो बंगाल का ईस्ट एरिया था जहां पे मुस्लिम मेजॉरिटी ज्यादा थी उसको ईस्ट बंगाल बना दिया। आज की डेट में वह बांग्लादेश है और बाकी जो बचा बंगाल था उसको वेस्ट बंगाल बना दिया। अब जब

8:22 अंग्रेजों ने बंगाल का पार्टीशन किया तो ईस्ट बंगाल के अंदर जो मुस्लिम्स थे वो पहले बंगाल के अंदर माइनॉरिटी थे लेकिन अब ईस्ट बंगाल बनते ही मेजॉरिटी में आ गए थे और हिंदू जो पहले मेजॉरिटी में थे वो माइनॉरिटी बन गए थे ईस्ट बंगाल के अंदर और बाकी जो वेस्ट बंगाल के लोग थे वहां एज सच ज्यादा कोई दिक्कत नहीं थी। वहां जैसे पहले था वैसे ही रहा। लेकिन वेस्ट बंगाल के लोग भी गुस्सा हो गए थे क्योंकि उनके हाथ से आधा बंगाल चला गया था। इंडिपेंडेंस नॉट पीस हिंदू एंड मुस्लिम सेफ्टी एंड पीस हैविंग पीपल। अब ये जो बंगाल का पार्टीशन हुआ था इस चीज को लेके इंडियन नेशनल कांग्रेस ने सबको इकट्ठा किया। आंदोलन करना स्टार्ट किया कि बंगाल का जो पार्टीशन है यह गलत है। लेकिन कहीं ना कहीं ईस्ट बंगाल के जो मुस्लिम्स

9:08 थे उनको इस पार्टीशन से उतनी ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। जैसे पहले एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाती थी। धरने दिए जाते थे। इस बार ये जो बंगाल का पार्टीशन हुआ था इसको लेके जो धरने वगैरह दिए जा रहे थे। ईस्ट बंगाल के जो मुस्लिम्स थे एक सेगमेंट था मुस्लिम्स का वो इसमें एक्टिवली पार्टिसिपेट नहीं कर रहे थे। और यह पहली बार एक ऐसी सिचुएशन बनी थी जहां पे एक साथ आंदोलन करने की बजाय यह डिस्कशन स्टार्ट हो गया था कि यह जो इंडियन नेशनल कांग्रेस है यह हिंदुओं की पार्टी है। पूरी पॉपुलेशन के 26% मुस्लिम्स हैं। लेकिन कांग्रेस ने अपनी पार्टी में सिर्फ 6.59% मुस्लिम डेलीगेट्स रखे हैं। और डिस्कशन यह था कि कल को अगर अंग्रेज चले भी गए कि लड़ाई तो सब लोग लड़ रहे हैं। लेकिन मुस्लिम्स जो हैं उनकी तो फिर भी नहीं चलेगी क्योंकि कांग्रेस तो हिंदुओं की पार्टी है। इलेक्शंस भी होंगे तो हिंदू ही जीतेंगे। तो आजादी के बाद भी हमारी

9:53 उतनी नहीं चलेगी। लेकिन इंडियन नेशनल कांग्रेस ने इस चीज को भांप लिया था। उनको समझ में आ गया था कि यह जो रिलीजियस एंगल उठने लगा है ये इस पूरे मूवमेंट को खराब कर देगा। तो उन्होंने अपने हर स्टेप में एक ही स्टांस रखा। वो स्टांस ये था कि उन्होंने यह कहा कि देखिए रिलीजन जो है वो आपका एक प्राइवेट मैटर है। रिलीजन के बेस पर पॉलिटिक्स करना बहुत ही डेंजरस हो सकता है और उन्होंने हर कम्युनिटी को जाके यही चीज समझाई कि हम अंग्रेजों के खिलाफ जिस आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं उसमें हम एक सेकुलर इंडिया को देखते हैं जिसमें हर धर्म हर कम्युनिटी के लिए जगह होगी। आपको कोई भी डरने की बात नहीं है। कांग्रेस ने यही मैसेज कन्व किया कि नेशनलिज्म और देश जो है वो किसी भी धर्म या कम्युनिटी से बड़ा होता है। इनफैक्ट जो उस टाइम पे धर्म की बात करते थे उनको कांग्रेस वाले कम्युनल बोलते थे। लेकिन ये जो बंगाल का पार्टीशन हुआ था इसमें हिंदू मुस्लिम के

10:39 बीच में एक दरार पड़ चुकी थी और अंग्रेजों का जो प्लान था वो काम करने लगा था। और यह जो टाइम चल रहा था इसी बीच में जिन्ना की भी एंट्री होती है पॉलिटिक्स में। ईयर 1906 में कांग्रेस कोलकाता के अंदर एक सेशन कर रही थी। इसी में जिन्ना आए थे और जिन्ना ने कांग्रेस को ज्वाइन कर लिया था। देखिए थोड़ा सा जिन्ना के बारे में मैं बता देता हूं आपको। जिन्ना की जो आज इमेज है उस टाइम पे जिन्ना के जो पर्सनल बिलीफ थे वो बिल्कुल अलग थे। उस टाइम पे जो जिन्ना थे वो सेकुलरिज्म की बहुत ज्यादा बात करते थे। कांग्रेस की सेकुलर आईडियोलॉजी से बहुत ज्यादा इंप्रेस थे और जिन्ना जो थे वो मौलाना मौलवी को बहुत क्रिटिसाइज करते थे। जिन्ना का जो लाइफस्टाइल था वो ट्रेडिशनल इस्लामिक प्रैक्टिससेस से बहुत ही अलग था। सरोजनी नायडू जी ने ऑन रिकॉर्ड जिन्ना को एंबेसडर ऑफ हिंदू मुस्लिम यूनिटी तक का टैग दिया था। लेकिन आगे चलके सारी चीजें घूमेंगी। अभी आप थोड़ा सा वेट करिए बस। तो अब अंग्रेजों ने बंगाल का पार्टीशन तो कर

11:25 दिया था। इसको लेके पूरा जो इंडियन नेशनल कांग्रेस था वो धरने वगैरह दे रहे थे, प्रोटेस्ट कर रहे थे। सेम टाइम पे जिन्ना की भी एंट्री हो गई थी। उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर लिया था। और इसी टाइम पे एक चीज और हो जाती है। होता क्या है कि जब ये सारी चीजें चल रही थी तो सेम ईयर 1906 में ईस्ट बंगाल जो अभी-अभी डिवाइड हो के नया स्टेट बना था। जहां पे मुस्लिम मेजॉरिटी में थे। वहां पे ढाका शहर के अंदर अभी तो बांग्लादेश हो गया वो। वहां पे मुस्लिम्स की एक मोहम्मदन एजुकेशनल कॉन्फ्रेंस चलती थी। ये हर साल वहां पे होती थी। लेकिन अब क्या था कि डिवाइड हो गया था तो ईस्ट बंगाल के अंदर हो रही थी। इसमें मुस्लिम कौम की जो ग्रोथ वगैरह है इन सारी चीजों पर डिस्कशन होता था। तो इस बार जो ढाका के अंदर ये सेशन हुआ ये थोड़ा सा अलग था। यहां के सेशन में डिस्कशन ये हुआ कि ये जो इंडियन नेशनल कांग्रेस है जो इंडियन

12:11 मुस्लिम्स और हिंदू दोनों को रिप्रेजेंटेटिव बनने का दावा कर रही है। ये तो एक हिंदू पार्टी है। पूरे देश में मेजॉरिटी में हिंदू हैं। इलेक्शन होंगे तो हिंदू ही जीतेंगे। सरकार आएगी तो हिंदुओं की आएगी और फिर जो लॉ है वो भी हिंदू ही बनाएंगे। तो हमारे रिप्रेजेंटेशन का क्या? तो इस मीटिंग के अंदर इन्होंने डिसाइड किया कि जैसे इंडियन नेशनल कांग्रेस है इसमें हिंदू ज्यादा हैं। ऐसे ही हम एक मुस्लिम पॉलिटिकल पार्टी बनाएंगे जो मुस्लिम्स की बात को आगे रखेगी और इंडिया के जितने भी मुस्लिम्स हैं उनका रिप्रेजेंटेशन करेगी। और यही वो टाइम था जब 30th ऑफ दिसंबर 1906 को इन्होंने मिलके ऑल इंडिया मुस्लिम लीग नाम से एक पार्टी बना दी। इसका ऐम ये था कि जो मुस्लिम्स की बातें हैं उनको आगे रखा जाएगा और मुस्लिम्स को ज्यादा से ज्यादा रिप्रेजेंटेशन मिले इसको लेके अपनी बात

12:57 आगे रखेंगे और ऐसा नहीं था कि ऐसे ही बस इन्होंने पार्टी बना दी थी। एक प्लंड तरीके से ब्रिटिशर्स के सामने इन्होंने सेपरेट इलेक्टोरेट की डिमांड रखी। पहले क्या होता था कि इंडियन नेशनल कांग्रेस जो थी वो इंडिया के हिंदू और मुस्लिम्स किसी की भी बात हो सारी बातें ब्रिटिशर्स के सामने इंडियन नेशनल कांग्रेस ही रखती थी। लेकिन ये पहली बार हुआ था कि इंडियन नेशनल कांग्रेस के पैरेलल में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग आके खड़ी हो गई थी और अंग्रेजों के सामने अलग से डिमांड रखती थी। तो मुस्लिम लीग जब बनी तो इन्होंने अंग्रेजों के सामने ये डिमांड रखी कि मुस्लिम्स को अब सेपरेट इलेक्टोरेट चाहिए। अब आपका क्वेश्चन ये होगा कि ये सेपरेट इलेक्टोरेट क्या है? और इसकी डिमांड क्यों रख रहे थे मुस्लिम लीग वाले? देखिए जब नॉर्मल इलेक्शन होते हैं तो कोई भी खड़ा हो सकता है। जिसको ज्यादा वोट मिलेंगे वह जीत जाता है। अब इसमें दिक्कत यह होती है कि जो कम्युनिटी नंबर्स में ज्यादा होती है जिसको वो चाहते हैं वही इलेक्शन बार-बार

13:44 जीतता है। और ऐसे में जो माइनॉरिटी होती है जिसके लोग कम होते हैं उसके चुने हुए लोग कभी पावर में आ ही नहीं सकते। क्योंकि अल्टीमेटली तो वोट ही काउंट होंगे। तो मुस्लिम लीग ने ये जो सेपरेट इलेक्टोरेट की डिमांड रखी थी इसमें ये कहा इन्होंने कुछ जगह पे हमें सेपरेट इलेक्टोरेट दे दो। इसमें होगा यह कि वहां पे सिर्फ मुस्लिम कैंडिडेट्स ही खड़े होंगे और जो वोट करेंगे वह भी सिर्फ मुस्लिम्स ही होंगे। बाकी कोई और नहीं करेगा। मान लो एक एरिया है वहां पे 100 लोग रहते हैं जिसमें से 60 मुस्लिम्स हैं और 40 जो हैं वो बाकी की कम्युनिटी हैं। और अगर सेपरेट इलेक्टोरेट का सिस्टम होगा तो ये जो 60 मुस्लिम्स हैं सिर्फ यही वोट करेंगे। बाकी के जो 40 लोग हैं वो वोट नहीं करेंगे। और जो कैंडिडेट्स खड़े होंगे वो भी मुस्लिम्स ही खड़े होंगे। इससे होगा ये कि माइनॉरिटी के जो लोग हैं वो भी पावर में आएंगे और अंग्रेज ऐसी ही सिचुएशन चाहते थे जिसमें इंडियन

14:31 कम्युनिटी पावर के चक्कर में आपस में उलझे रहे। अब आपका एक क्वेश्चन इसमें ये भी हो सकता है कि क्या उस समय पे इलेक्शंस होते भी थे क्योंकि पावर में तो ब्रिटिशर्स थे। तो देखिए उस टाइम पे लिमिटेड रिप्रेजेंटेशन के साथ इनडायरेक्ट इलेक्शंस होते थे। हर कोई वोट नहीं कर सकता था। बस कुछ सिलेक्टेड प्रॉपर्टी ओनर, टैक्स पेयर्स और एजुकेटेड इंडिविजुअल्स जो थे वही वोट कर पाते थे। मेनली अमीर लोग ही वोट कर पाते थे जिनको ब्रिटिशर्स चाहते थे। यह मुस्लिम लीग जो बनी थी इसके प्रेसिडेंट उस समय मोहम्मद शाह थे और जिन्ना जो थे वो उस समय कांग्रेस में थे और वो इस चीज को क्रिटिसाइज करते थे कि ये जो मुस्लिम लीग अलग से सेपरेट इलेक्ट्रोरेट मांग रही है इससे डिवाइड हो गए लोग। तो ये चीज को वो क्रिटिसाइज करते थे। लेकिन आगे चलके सिचुएशन ऐसे चेंज होगी कि जिन्ना खुद ही इस सेपरेट इलेक्ट्रोरेट के लिए अपना दमखम लगा के लड़ेंगे। और ये जो मुस्लिम लीग उस समय बनी थी तो इसमें

15:16 ऐसा नहीं था कि सारे के सारे मुस्लिम्स का सपोर्ट आ गया था। बस कुछ अमीर मुस्लिम्स जो लैंड लॉर्ड थे उनका ही सपोर्ट था मुस्लिम लीग को। बाकी जो सपोर्ट था मुस्लिम्स का वो कांग्रेस को ज्यादा था। और यही रीज़न था कि इंडियन नेशनल कांग्रेस जो थी वह कहती थी कि यह जो मुस्लिम लीग है यह जो कह रही है कि इंडिया के जो सारे के सारे मुस्लिम्स हैं उनके हम रिप्रेजेंटेटिव हैं। तो ऐसा कुछ भी नहीं है। इंडिया के जो हिंदू और मुस्लिम जितनी भी कम्युनिटी है सबके रिप्रेजेंटेटिव हम हैं। यानी कि इंडियन नेशनल कांग्रेस है। लेकिन आगे चलके ब्रिटिशर्स ने मुस्लिम लीग को एक अलग तरीके से सपोर्ट करा ताकि वो उनके लॉयल बने रहे और कांग्रेस चाहती थी कि पैरेलल में आकर मुस्लिम लीग खड़ी हो क्योंकि तभी वह मैनेज हो पाएंगे। तो अब इसके कुछ टाइम बाद यानी कि ईयर 1909 में मुस्लिम लीग वाले क्या करते हैं? यह जो उनकी सेपरेट इलेक्टोरेट की डिमांड थी इसको लेके मुस्लिम लीग वाले शिमला पहुंचते हैं

16:03 और लॉर्ड मिंटो और लॉर्ड मोरले से जाकर मिलते हैं। उनके सामने अपनी सारी डिमांड रखते हैं कि उनको कैसे भी करके सेपरेट इलेक्ट्रोरेट चाहिए। और अंग्रेज जो थे वो बड़े आराम से इस डिमांड को मान लेते हैं। तो उस टाइम पे यूनाइटेड प्रोविंस बंगाल, पंजाब, बॉम्बे प्रेसिडेंसी, मद्रास प्रेसिडेंसी, सेंट्रल प्रोविंस यहां पे अंग्रेज कह देते हैं कि अब यहां पे मुस्लिम्स के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट होंगे। और इसके साथ-साथ सेंट्रल लेजिसलेटिव काउंसिल में भी मुस्लिम्स के लिए सीट जो थी वो रिजर्व कर दी गई। यह जो ईयर 1909 के मोरले मिंटो रिफॉर्म्स थे, इसके आने के बाद मुस्लिम लीग बहुत ज्यादा खुश हो जाती है। इनफैक्ट इंडिया की जो पूरी मुस्लिम पॉपुलेशन थी, उसके अंदर भी मुस्लिम लीग बहुत ज्यादा पॉपुलर होने लगती। और ये जो मुस्लिम लीग ने सेपरेट इलेक्टोरेट दिलवाया था मुस्लिम्स को इस एक इंसिडेंट की वजह से बहुत ही कम टाइम में

16:49 मुस्लिम लीग जो थी वो इंडियन नेशनल कांग्रेस के पैरेलल में आकर खड़ी हो गई थी। और अब जब मुस्लिम लीग की पॉपुलैरिटी बढ़ती है तो जिन्ना जो कि कांग्रेस में थे उन्होंने ईयर 1913 में मुस्लिम लीग को ज्वाइन कर लिया। मतलब कि कांग्रेस को छोड़ा नहीं उन्होंने एक साथ कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों को ज्वाइन किया। उस टाइम पे जिन्ना का ये कहना था कि ऐसा करके ये हिंदू मुस्लिम यूनिटी को मेंटेन कर पाएंगे और मुस्लिम लीग और कांग्रेस जो ये जो अलग-अलग रास्ते पे चल रही है। इससे काफी दिक्कतें आएंगी आजादी में। तो एक रास्ता बनाया जाएगा जिससे मुस्लिम लीग और कांग्रेस जो है वो एक साथ आके अपने मेन गोल को अचीव करें। ब्रिटिशर्स से आजादी ना कि आपस में लड़े और इस चीज से कांग्रेस जो थी वह भी खुश थी क्योंकि कांग्रेस कुछ भी करके मुस्लिम लीग को अपने साथ ही रखना चाहती थी। वो और डिवाइड नहीं करना चाहती थी और मुस्लिम लीग ज्वाइन करने के बाद जिन्ना जो थे वो इन दोनों की मीटिंग

17:35 करवाते हैं लखनऊ के अंदर जिसको लखनऊ पैक्ट के नाम से भी जाना जाता है। तो इस मीटिंग के अंदर मुस्लिम लीग जो है वो कुछ डिमांड रखती है अपनी। मुस्लिम लीग कांग्रेस से कहती है कि हम आपके साथ तभी आएंगे जब आप हमें जो सेपरेट इलेक्टोरेट जो हमें मिला है उसका खुल के सपोर्ट करो और पंजाब और बंगाल के अंदर जो मुस्लिम कैंडिडेट्स की सीट्स हैं उनको थोड़ा सा बढ़ा दो आप। अब वैसे तो कांग्रेस जो थी वो रिलीजन के बेसिस पे सीट्स मिलना इन सब चीजों के खिलाफ थी। लेकिन कांग्रेस जैसे तैसे करके इस चीज को मान लेती है और कहती है कि आजादी की ये जो लड़ाई चल रही है ब्रिटिशर्स के अगेंस्ट इसमें आप हमारे साथ आकर खड़े हो जाओ। तो इस लखनऊ पैक्ट के अंदर कांग्रेस और मुस्लिम लीग जो हैं वह एक एग्रीमेंट पे आ जाते हैं। इस टाइम पे कांग्रेस के अंदर भी कई हिंदू नेशनलिस्ट लीडर थे जैसे लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालविया ये इन सारी चीजों से ज्यादा खुश नहीं हो रहे थे। तो उन्होंने एक काम किया

18:21 कि जैसे मुस्लिम्स के लिए मुस्लिम लीग है तो उन्होंने भी ईयर 1915 में हिंदू महासभा बना दी थी ताकि हिंदुओं की भी बात आगे रखी जा सके। और अभी तक ये जितनी भी चीजें चल रही थी इंडिया के अंदर गांधी जी इससे थोड़ा दूर थे। लेकिन इस टाइम पर एंट्री होती है गांधी जी की। [संगीत] इसी टाइम पे गांधी जी साउथ अफ्रीका से इंडिया वापस आ जाते हैं और यहां से कांग्रेस जो बैकफुट पे जा रही थी हर चीजें माननी पड़ रही थी उसकी सिचुएशन जो है वो बदल जाती है। गांधी जी जब आए थे तो उन्होंने क्या-क्या किया था? कांग्रेस किस तरीके से ज्वाइन की थी वो सारी चीजें हमने ऑलरेडी डिस्कस कर रखी है। तो मैं वो सारी चीजें नहीं डिस्कस करूंगा। सिर्फ पार्टीशन पे ही फोकस रखूंगा। अब गांधी जी के आने के कुछ टाइम बाद एक सिचुएशन बनती है। उस टाइम दुनिया के अंदर फर्स्ट वर्ल्ड वॉर जो थी वह खत्म हुई थी और एलाइड पावर जो थी

19:08 जिसमें ब्रिटिश एंपायर था उसने ऑटोमन अंपायर को हरा दिया था। और उस टाइम पे ऑटोमन एंपायर के जो हेड होते थे उनको कैलिफ यानी खलीफा कहा जाता था और पूरे वर्ल्ड के जो मुस्लिम्स थे वो इनको अपना स्पिरिचुअल और रिलीजियस लीडर मानते हैं। क्योंकि ये हजरत प्रॉफिट मोहम्मद के सक्सेसर थे। तो उस टाइम पर हुआ यह था कि वॉर जीतने के बाद एलाइट पावर जिसमें ब्रिटिश एंपायर भी था। इन्होंने ऑटोमन अंपायर को बांटना शुरू कर दिया था और अपने अंडर में लेना शुरू कर दिया था और ऐसे एरियाज जिसमें मुस्लिम्स के होली प्लेसेस थे जिनके ऊपर कैलिफ यानी खलीफा का कंट्रोल था वो सारे एरिया भी ये अपने अंडर लेने लगे थे और इस पर्टिकुलर चीज से पूरे वर्ल्ड के जो मुस्लिम्स थे वो बहुत ज्यादा गुस्सा थे पूरी दुनिया में प्रोटेस्ट हो रहे थे तो इंडिया के अंदर भी प्रोटेस्ट स्टार्ट हुए उसको खिलाफत मूवमेंट भी बोला जाता है इंडिपेंडेंस नॉट पीस रिजॉइसिंग

19:53 टर्न क्विकली हर एंड [संगीत] मॉर्निंग एंड मुस्लिम सेफ्टी एंड पीपल और अली ब्रदर जो थे उन्होंने इस खिलाफत मूवमेंट को इंडिया के अंदर स्टार्ट किया था। अब गांधी जी ने इसको हिंदू मुस्लिम यूनिटी के लिए एक ओपोरर्चुनिटी की तरह देखा। तो गांधीजी खिलाफत मूवमेंट्स के जो अली ब्रदर्स थे इनसे जाकर मिलते हैं कि हम ये जो आपकी खिलाफत मूवमेंट है इसमें आपका पूरा सपोर्ट करेंगे अंग्रेजों के खिलाफ। हिंदू मुस्लिम सब मिलके अंग्रेजों के खिलाफ आएंगे। और इस चीज को लेके गांधी जी ने एक-एक हिंदू से अपील की कि खिलाफत मूवमेंट के सपोर्ट में आए। कई सारी कांफ्रेंस भी की। उसी टाइम पे कांग्रेस का नागपुर में सेशन चल रहा था। गांधी जी ने उसके अंदर भी मुस्लिम्स के साथ-साथ हिंदुओं को भी जोड़ के खिलाफत इशू को डिस्कस किया था। अब इससे हुआ ये कि इंडिया के जो मुस्लिम्स थे वो कन्विंस हुए और

20:39 कांग्रेस के सपोर्ट में आए। कांग्रेस जो कहती थी कि हम इंडिया के अंदर हिंदू और मुस्लिम्स दोनों के रिप्रेजेंटेटिव हैं। ये चीज और स्ट्रांग हो गई और कांग्रेस की जो सेकुलर अप्रोच थी जिसमें कहा गया था कि इंडिया एक सेकुलर देश होगा। हिंदू मुस्लिम सब एक साथ रहेंगे। ये चीज और स्ट्रांग हो गई थी। कहने का मतलब है कि कांग्रेस जो है वो स्ट्रांग हो गई थी और इस टाइम पे मुस्लिम लीग जो थी वो ट्वीट डाउन पड़ी थी। वो जो दावा कर रही थी कि इंडिया के सारे मुस्लिम्स की वो रिप्रेजेंटेटिव है। उसका ये दावा थोड़ा हल्का पड़ गया था। अब इसके बाद एक और बहुत ही सरप्राइजिंग चीज होती है। जिन्ना जो थे वो कांग्रेस और मुस्लिम लीग से रिजाइन मार देते हैं। एक तो वो कहते हैं कि जब से गांधी जी आए हैं और जिन तरीकों का यूज़ करके वो नॉन-कोपरेशन मूवमेंट और सिविल डिसओबिडियंस मूवमेंट चला रहे हैं उससे जिन्ना बिल्कुल भी खुश नहीं है। दूसरी चीज जिन्ना का ये कहना था कि ये कांग्रेस जो है और ये जो मुस्लिम लीग है ये रिलीजियस पॉलिटिक्स कर रहे हैं जिसके

21:26 वो खिलाफ थे। तो यही सारे रीज़न बता के जिन्ना जो थे वो रिजाइन मार के लंदन चले जाते हैं। लेकिन इसमें यह भी कहा जाता है कि जिन्ना इसलिए चले गए थे क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों में उनको कोई पूछ नहीं रहा था। कांग्रेस के अंदर गांधी जी की चल रही थी और मुस्लिम लीग में मुख्तार अहमद अंसारी जो थे वो अपनी चला रहे थे। तो इस वजह से जिन्ना जो थे वो गुस्से में गांधी को तानाशाह बोल के पॉलिटिक्स वगैरह छोड़ के सीधे लंदन चले गए थे। तो अब इसके काफी टाइम तक हिंदू मुस्लिम जो हैं वो साथ में मिलकर काम करते हैं। ब्रिटिशर्स के अगेंस्ट में अपनी बातें रखते हैं। लेकिन ईयर 1923 में ब्रिटिशर्स क्या करते हैं? पंजाब के अंदर एक मुस्लिम मेजॉरिटी वाला एरिया था। तो वहां पे ब्रिटिशर्स क्या करते हैं? एक म्युनिसिपल अमेंडमेंट एक्ट 1923 लेके आ जाते हैं। और ये जो एरिया था जहां पे मुस्लिम मेजॉरिटी में थे पहले जितनी मुस्लिम्स की सीट थी उससे ज्यादा सीट

22:12 रिजर्व कर देते हैं मुस्लिम्स के लिए। और जो हिंदू पॉपुलेशन थी उनकी सीट एकदम से कम हो जाती है। अब इस इंसिडेंट की वजह से जो हिंदू थे वहां के वो भड़क जाते हैं कि सेपरेट इलेक्ट्रोरेट भी दिया जा रहा है मुस्लिम्स को। सेंट्रल लेजिसलेटिव काउंसिल में भी अलग से सीटें रिजर्व की जा रही हैं और यहां पे भी हमारी सीट कम कर दी गई हैं। तो इसकी वजह से इस पूरे एरिया में हिंदू मुस्लिम जो टेंशन फी वो दोबारा से बढ़ने लग गई थी। और इस चीज का इंपैक्ट जो था वो इंडिया के बाकी पार्ट में भी पड़ा। तो हिंदू महासभा ने भी कहा कि अगर ऐसी बात है तो हिंदू जो हैं उनको भी रिलीजन के नाम पे ज्यादा सीटें दो। और सेम टाइम पे वीर सावरकर जो कि अंडमान के सेलुलर जेल में बंद थे उन्होंने हिंदुत्व हु इज अ हिंदू इस नाम से एक बुक भी लिख दी थी जिसमें हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र बनाने की बातें कही गई थी। इसको अंग्रेजों ने उसी टाइम पे बैन कर दिया था। ये सारी चीजें एक ही साथ हो रही थी। और उसी टाइम पे पंजाब और यूपी

22:59 में आर्य समाज ने शुद्धि कैंपेन ल्च कर दिया था। और फिर इसका इंपैक्ट धीरे-धीरे इतना बढ़ा कि 2 साल बाद हिंदू कम्युनिटी के कई लीडर्स ने मिलके आरएसएस का भी फॉर्मेशन कर दिया था। तो कहने का मतलब यह है कि अब ये वो सिचुएशन थी जहां पे हिंदू मुस्लिम कम्युनल टेंशन जो थी वो डे बाय डे बढ़ती जा रही थी और ये जो सिचुएशन थी ये अंग्रेजों को बहुत ज्यादा सूट कर रही थी। जब भी कोई एकजुट होने की कोशिश करता था अंग्रेज क्या करते थे? किसी एक कम्युनिटी को पकड़ के उसको बेनिफिट दे देते थे। फिर दोनों कम्युनिटी लड़ने लगती थी। और यह जो ईयर 1925 था, यह कांग्रेस के लिए वैसे ही बहुत टेंशन भरा रहा था। कांग्रेस जो एक यूनाइटेड सेकुलर भारत बनाने के लिए मुस्लिम पॉपुलेशन को अपने साथ जोड़ रही थी और उनकी बातों को कहीं ना कहीं एक मिडिल ग्राउंड पे आकर डिस्कस कर रही थी तो उसके पैरेलल में

23:45 हिंदू महासभा और आरएसएस जैसी ऑर्गेनाइजेशन भी खड़ी होती जा रही थी जो कांग्रेस के ऊपर हिंदुओं को लेके भी प्रेशर बना रही थी। तो कांग्रेस अगर मुस्लिम के सपोर्ट के लिए कुछ करती थी तो हिंदू कम्युनिटी बुरा मानती थी और कांग्रेस एक हिंदू पार्टी है। इसका टैग तो ऑलरेडी कांग्रेस के ऊपर था ही। तो कांग्रेस कुल मिला के बीच में फंसी पड़ी थी और इस चीज का पूरा का पूरा फायदा जो हुआ वो मुस्लिम लीग को हुआ। उसने इस मौके का फायदा उठा के ज्यादा से ज्यादा इंडिया के जो मुस्लिम्स थे वो अपनी तरफ जोड़े। हिंदू महासभा हो गई, आरएसएस हो गई। इन्होंने बहुत ज्यादा प्रेशर बनाया कांग्रेस के ऊपर। इस तरह का प्रेशर था कि अगले साल यानी कि 1926 में कांग्रेस ने बंगाल और पंजाब एरिया में जितने भी कैंडिडेट उतारे सब के सब हिंदू उतारे और इसकी वजह से मुस्लिम पॉपुलेशन जो थी वो कांग्रेस से नाराज हो गई थी। तो अब ऐसा टाइम आ चुका था कि जो मुस्लिम लीग थी उसको इंडियन मुस्लिम्स का सपोर्ट मिलने लगा था।

24:31 और इसी को ध्यान में रखते हुए ईयर 1930 में मुस्लिम लीग जो है वो अपना नेक्स्ट स्टेप लेती है। मुस्लिम लीग के प्रेसिडेंट मोहम्मद इकबाल ने अपने इलाहाबाद सेशन में अनाउंस कर दिया कि देखिए अब ऐसा नहीं चलेगा। हमें हमारा हक चाहिए। ये जो पंजाब नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस जिसे खैबर पख्तून भी कहते हैं। सिंध और बलूचिस्तान इन सबको जोड़ के एक स्टेट बना दो। यह पहली बार था जब मुस्लिम लीग ने एक सेपरेट स्टेट की डिमांड करी थी। यह याद रखिएगा कि सेपरेट स्टेट की डिमांड की है। सेपरेट कंट्री की डिमांड नहीं की है। सेपरेट कंट्री की डिमांड अभी थोड़ी देर में आएगी आगे। और यह जो पाकिस्तान वर्ल्ड था पहली बार ये वर्ड जो था वो भी इसी टाइम पे निकला था। कैमब्रिज यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट चौधरी रहमत अली ने एक प्लेट बनाया था जिसका टाइटल था नाउ और

25:16 नेवर। और इसी प्लेट में पहली बार इन्होंने पाकिस्तान नाम डिक्लेअर किया था। पाकिस्तान से आई गायब था। पाकिस्तान नाम से टाइटल दिया था इसको। यह पहली बार था जब यह वर्ड लोगों के सामने आया था। तो इधर यह सारी चीजें चल रही थी और इसके कुछ टाइम बाद ईयर 1933 में लियाकत अली खान जो जिन्ना के बहुत ही खास थे। ये लंदन में जाते हैं। ये जाके वहां पे जिन्ना से जाकर मिलते हैं और कहा जाता है कि इसी पर्टिकुलर टाइम पे लियाकत अली खान और जिन्ना ने ये डिस्कशन किया था कि जिन्ना को वापस इंडिया में आके मुस्लिम लीग ज्वाइन करना चाहिए। और जॉइ करने के बाद एक अलग मुस्लिम देश की डिमांड रखनी चाहिए। जिसको 100% मुस्लिम सपोर्ट मिलेगा। यह एक प्लान लंदन के अंदर डिस्कस हुआ था। ऐसा कहा जाता है। और फिर नेक्स्ट ईयर अप्रैल में यानी के अप्रैल 1934 को जिन्ना इंडिया वापस आके सबसे पहले मुस्लिम लीग ज्वाइन

26:04 करते हैं। उसके प्रेसिडेंट बनते हैं। और इस बार जब जिन्ना इंडिया आए थे। अपनी जो पुरानी आईडियोलॉजी थी उसको बिल्कुल पीछे छोड़ दिया था। एकदम बदले हुए जिन्ना इंडिया वापस आए थे और उनका जो पॉलिटिकल स्टंस था इंडियन पॉलिटिक्स के अंदर उसको पूरी तरीके से चेंज कर दिया था। इन्होंने मुस्लिम लीग जो थी उसको पूरी तरीके से रीऑर्गेनाइज किया। लीडरशिप चेंज की उसकी और बैक टू बैक कांग्रेस के ऊपर निशाना साधा कि कांग्रेस एक हिंदू पार्टी है। मुस्लिम को अलग आइडेंटिटी चाहिए, अलग देश चाहिए होगा जो टू नेशन थ्योरी थी कि हिंदू मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। जिन्ना ने इंडिया के एक-एक मुस्लिम को ये समझाना चालू किया और यूनाइट करना चालू किया। जिन्ना ने मुस्लिम्स को ये समझाया कि ये जो कांग्रेस है ये यूनाइटेड सेकुलर इंडिया के नाम पे मुस्लिम्स को कुछ भी नहीं देगी। सारी जो पावर है वो हिंदुओं के हाथ में रहेगी। अब इसके बाद क्या होता है कि ईयर 1935 आते-आते यह जो अंग्रेज थे,

26:50 रिवोल्यूशनरी एक्टिविटीज़ इतनी ज़्यादा बढ़ गई थी इंडिया के अंदर कि इनके ऊपर भी बहुत ज़्यादा प्रेशर था। और इन्होंने मजबूरी में इस प्रेशर को रिलीज़ करने के लिए ये लोग लेके आते हैं गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935। तो जैसा मैंने आपको अभी थोड़ी देर पहले बताया था कि पहले लिमिटेड लोग ही वोट कर पाते थे। तो इस एक्ट में वैसे तो बहुत सारी चीजें थी। लेकिन जो मेन चीज थी वो ये थी कि इलेक्शन में कौन वोट करेगा? उनके जो नंबर्स हैं आम जनता के जो नंबर्स हैं वो बढ़ा दिए गए थे। अब इस एक्ट के आने के बाद जो इलेक्शन होंगे उसमें करीब 30 35 मिलियन इंडियन वोटर जो थे वो वोट करने के लिए एलिजिबल हो गए थे। जिसमें ये था कि थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा होना चाहिए। टैक्स भरना चाहिए उसको। कुछ लैंड अगर उसके नाम पे हो तो वो वोट कर सकता है। तो कुल मिला के जो गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 आया था इसमें मोटा-मोटी ये था कि पूरे इंडिया के स्टेट्स में इलेक्शन होंगे और इंडियन

27:37 पॉलिटिकल पार्टी जैसे कांग्रेस, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा ये सब इलेक्शन लड़ेंगे और जो जीतेगा वो उस स्टेट के अंदर चलाएगा और उसके साथ-साथ एक अपना ये गवर्नर भी रख देंगे उस स्टेट के अंदर। तो यह प्लान था इनका और इस एक्ट को लाने के बाद नेक्स्ट ईयर 1936 में यह जो अंग्रेज थे यह इलेक्शन करवाते हैं। टोटल 1585 सीट्स पे इलेक्शन होने थे। और इस इलेक्शन में हिंदू महासभा मुस्लिम लीग जो थी इन सबको बुरी तरीके से पीछे करके कांग्रेस जो थी वह 77 सीट्स पे जीत जाती है और मुस्लिम लीग जो थी वो सिर्फ 106 सीटें जीतती है। यहां तक कि हाल यह हो गया था इस इलेक्शन में कि जो सीट्स मुस्लिम्स के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट के साथ रिजर्व थी तो कांग्रेस ने वहां पे भी मुस्लिम कैंडिडेट्स खड़े करके मुस्लिम लीग को हरा दिया था। और इस इलेक्शन के बाद एक चीज साफ हो गई थी कि इंडिया के अंदर सारे

28:24 हिंदू और मुस्लिम पॉपुलेशन के जो रिप्रेजेंटेटिव है वह कांग्रेस है मुस्लिम लीग नहीं है। और ये जो इलेक्शन हुए थे ये मुस्लिम लीग के लिए बहुत बड़ा डिजास्टर थे। मुस्लिम लीग बिल्कुल खुश नहीं थी और यहां से मुस्लिम लीग एक बहुत बड़ा शिफ्ट लेती है। बहुत ही अग्रेसिव तरीके से अपना स्टांस बदलती है मुस्लिम लीग। अब इसके बाद ईयर आता है 1939 और इस ईयर में एक और ऐसी चीज होती है जिसकी वजह से कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोबारा से एकदम अलग रास्ता चुनती हैं। एक्चुअली होता क्या है कि इस साल ब्रिटिशर्स ने बिना इंडिया की लीडरशिप से पूछे अनाउंस कर दिया कि सेकंड वर्ल्ड वॉर में ब्रिटिश एंपायर के साथ इंडिया भी है और इंडिया के जो सोल्जर्स हैं वो भी इस वॉर में पार्टिसिपेट करेंगे। अब ये जो चीज थी इसको सुन के कांग्रेस जो थी वो गुस्सा हो जाती है कि हमसे बिना पूछे आप हमारा और हमारे सोल्जर्स का जो पार्टिसिपेशन है वो वर्ल्ड वॉर में करवा रहे हो। और कांग्रेस

29:10 ने कहा कि हम एक शर्त पे वर्ल्ड वॉर में आपका साथ देंगे। अगर आप यह प्रॉमिस करो कि वॉर जब खत्म हो जाएगी तो वहां से आने के बाद आप हमें आजादी दे दोगे। लेकिन इस चीज के लिए ब्रिटिशर्स जो थे वो हां नहीं कर रहे थे। तो कांग्रेस ने क्या किया? इसी टाइम पे जितने ये 77 लीडर इनके इलेक्शन में जीत के आए थे कांग्रेस पार्टी के जो स्टेट्स चला रहे थे उन सब से रिजाइन मरवा देती है ताकि काम सारे रुक जाएंगे। ब्रिटिशर्स ने इसमें कई तरीके के ऑफर भी दिए कि कुछ लिमिटेड पावर हम देंगे आपको जिसको अगस्त ऑफर वगैरह भी बोला जाता है। लेकिन कांग्रेस ने कहा कि नहीं हमें पूर्ण स्वराज चाहिए। फुल इंडिपेंडेंस चाहिए। तभी हम साथ देंगे। इसके बाद क्रिप्स कमीशन वगैरह बहुत सारी चीजें आई लेकिन कांग्रेस अपनी बात पे अड़ी रही। कांग्रेस का यह मानना था कि ये एग्जैक्ट सही टाइम है ब्रिटिशर्स के ऊपर प्रेशर बना के आजादी लेने का और इसी टाइम पे कांग्रेस ने अपने आंदोलन जो है वो बहुत तेज कर दिए थे।

29:55 गांधी जी ने क्विट इंडिया मूवमेंट जो था वो शुरू कर दिया था। मुस्लिम लीग की लीडरशिप ने सोचा कि यह एकदम सही टाइम है कि ब्रिटिशर्स का यहां पे सपोर्ट करो। जब उनको सबसे ज्यादा जरूरत है। और जब वॉर खत्म होगी और हम उनको सपोर्ट करेंगे तो वो हमें भी फेवर करेंगे। जैसे वो पाकिस्तान की जो डिमांड कर रहे थे इन सारी चीजों को लेके वो फेवर करेंगे। तो मुस्लिम लीग जिसके बारे में ऑलरेडी कहा जाता था कि ये ब्रिटिशर्स की बहुत ही लॉयल है वो अपना अनकंडीशनल सपोर्ट ब्रिटिशर्स को इस टाइम पे दे देती है। हिंदू महासभा यहां पे कहती है कि अगर मुस्लिम लीग जो है वो अपनी सीट नहीं छोड़ रही है तो हम भी नहीं छोड़ेंगे। तो उन्होंने भी अपनी सीट नहीं छोड़ी और अंग्रेजों को सपोर्ट किया। तो ये वो टाइम था जब कांग्रेस की जितनी भी लीडरशिप थी सब ने रिजाइन कर दिया था और क्विट इंडिया मूवमेंट की वजह से आधे से ज्यादा लीडर्स जो थे वो जेल के अंदर थे। तो इस पर्टिकुलर टाइम पे कांग्रेस थोड़ी सी बैकफुट पे थी और इसी टाइम पे हिंदू महासभा और मुस्लिम

30:42 लीग जो थे वो बहुत ही स्ट्रांग हुए थे और दोनों ग्रुप आपस में खुल के लड़ रहे थे। मुस्लिम लीग का कहना था कि हम मुस्लिम इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करेंगे और उधर हिंदू महासभा का कहना था कि हम हिंदू इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करेंगे। हिंदू महासभा कह रही थी कि हिंदुओं के इंटरेस्ट तब तक प्रोटेक्ट नहीं होंगे, जब तक मुस्लिम्स हमारी बात नहीं मानेंगे। और मुस्लिम लीग कह रही थी कि मुस्लिम्स के इंटरेस्ट तब तक प्रोटेक्ट नहीं होंगे जब तक हिंदू हमारी बात नहीं मानेंगे। और कांग्रेस जो सेकुलरिज्म की बात करती थी उसकी आधी से ज्यादा लीडरशिप पावर से बाहर थी और आधी जेल में थी। तो इस टाइम पे हिंदू मुस्लिम दंगे भी बहुत तेज हो गए थे। और ये जो सिचुएशन थी इसने इंडिया को पार्टीशन की तरफ बहुत तेजी से धकेल दिया था। मुस्लिम्स लीग के लिए अब बहुत ही ज्यादा आसान हो गया था इंडिया के मुस्लिम्स को कन्विंस करना कि मुस्लिम और हिंदू जो हैं वो एक साथ नहीं रह सकते। और इस सारी जद्दोजहद के बाद मुस्लिम लीग का एक सेशन होना था। इस सेशन में इन्होंने अब

31:28 ऑफिशियली एक रेज़ोल्यूशन पास करके अनाउंस कर दिया कि हिंदू मुस्लिम जो है वो एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए इंडिया के जो मेजॉरिटी वाले स्टेट्स हैं जैसे पंजाब, सिंध, एनडब्ल्यूएफपी यानी के नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस, बलूचिस्तान, बंगाल और आसाम ये सबको मिला के हमें एक अलग पाकिस्तान चाहिए। और कांग्रेस तो पहले से ही कहती आ रही थी कि इंडिया का पार्टीशन बिल्कुल भी नहीं होगा। तो दोनों पार्टियां अपनी-अपनी बात पैरी हुई थी और एक डेडलॉक सिचुएशन हो गई थी। अब इसके बाद क्या होता है कि ईयर 1945 आते-आते सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म हो जाती है। यूके बहुत वीक हो चुका था और यूएस और यूएन से भी यूके के ऊपर बहुत ज्यादा प्रेशर आ रहा था कि आपकी जितनी भी कॉलोनीज़ हैं उनको आप छोड़ दो। इनफैक्ट इंडिया के अंदर भी जितने भी फ्रीडम फाइटर्स थे उन्होंने बहुत ज्यादा अंग्रेजों को परेशान कर रखा था। अंग्रेज खुद डरे हुए थे कि ब्रिटिश इंडिया की आर्मी में जो इंडियन सोल्जर्स हैं वो

32:13 उल्टा अंग्रेजों के ऊपर अटैक ना कर दें। तो कहने का मतलब है कि इस पर्टिकुलर ईयर में यानी कि 1945 में यूके की सिचुएशन पूरी तरीके से बदल चुकी थी और यूके का इंडिया से निकलने के अलावा और कोई सॉल्यूशन नहीं बचा था। तो यूके चाहता था कि इससे पहले कि नाम खराब हो या हम पे अटैक करें। हम पे मार के हमें निकालें। इससे बढ़िया खुद ही हमें निकल जाना चाहिए। और सेम टाइम पे ये जो वॉर खत्म हुई थी यूके के अंदर पॉलिटिकल पार्टी भी चेंज हो जाती है। अब लेबर पार्टी जीत के गवर्नमेंट में आती है और क्लेम एंड एटली ये पीएम बनते हैं यूके के और और पीएम बनने के बाद 15th ऑफ मार्च 1945 को एक हिस्टोरिकल अनाउंसमेंट करते हैं कि यूके अब इंडिया के ऊपर अपना कंट्रोल नहीं रखेगा और इंडिया को छोड़ के वापस चला जाएगा। इंडिया को आजादी दे देगा। अब यूके ने यह चीज तो बोल दी थी कि आजादी दे देगा। लेकिन आजादी दे तो दे किसको? दो-दो रिप्रेजेंटेटिव हैं। एक

33:00 मुस्लिम लीग, दूसरा कांग्रेस और दोनों एकदम अलग-अलग रास्ते पे हैं। कोई अपनी बात से पीछे हटने को राजी नहीं है। मुस्लिम लीग जैसे आपको पता है कि वो पहले से ही कहती आ रही है कि हम इंडिया के सारे मुस्लिम्स के रिप्रेजेंटेटिव हैं। कांग्रेस कह रही है कि इंडिया के अंदर जितने भी लोग हैं हिंदू मुस्लिम सबके रिप्रेजेंटेटिव हम हैं। तो आजादी का डिस्कशन होना किससे है और किस तरीके से होना है? इसके बारे में कुछ क्लेरिटी नहीं आ रही थी। तो अब इसके लिए ब्रिटिशर्स क्या करते हैं? अगले साल यानी कि 1946 के स्टार्टिंग में ब्रिटिशर्स एक इलेक्शन करवाने की बात करते हैं। और इलेक्शन करवाने के पीछे का जो मेन रीजन था वो यह था कि अंग्रेज चाहते थे इंडिया की जो पॉलिटिकल पार्टीज हैं जैसे मुस्लिम लीग, कांग्रेस ग्राउंड लेवल पे लोगों का सपोर्ट किस तरीके का है? लोग क्या चाहते हैं? और इस इलेक्शन को कराने के पीछे एक और रीज़न था कि यह मुस्लिम लीग जो अलग पाकिस्तान

33:45 बनाने की जो डिमांड कर रही है, लोगों में यह डिमांड कितनी स्ट्रांग है। और कांग्रेस यह जो सेकुलर और यूनाइटेड भारत की बात कर रही है। इसको कितना सपोर्ट मिल रहा है लोगों के बीच में। तो कहने का मतलब है कि इस इलेक्शन से यूके ये समझना चाहता था कि जब वो इंडिया को छोड़ के जाएंगे तो किस तरीके से पावर शेयरिंग होगी। किसको क्या देना होगा? पार्टीशन होगा या नहीं होगा। होगा तो किस तरीके से होगा? इसको लेके क्लेरिटी आएगी। यह जो इलेक्शन होना था यह मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच में एक डायरेक्ट कंपटीशन था। जिसमें कांग्रेस जो थी वो वोट मांग रही थी एक सेकुलर यूनाइटेड इंडिया के नाम पे जहां पे हिंदू और मुस्लिम सब साथ में रहेंगे और मुस्लिम लीग जो है वो वोट मांग रही थी एक अलग मुस्लिम देश बनाने के नाम पे और फिर इलेक्शन करवाए जाते हैं और इलेक्शन के बाद इलेक्शन का रिजल्ट आता है और रिजल्ट बहुत हैरानी वाले थे। कांग्रेस हिंदू मेजॉरिटी वाले एरिया

34:32 में जीत जाती है। 1585 सीट्स में से 923 सीट्स कांग्रेस को मिल जाती हैं। लेकिन इसमें सरप्राइजिंग बात ये थी कि मुस्लिम लीग जो थी जो मुस्लिम रिजर्व एरिया थे उसमें उसको 90% से ज्यादा वोट मिले थे। टोटल 482 सीट्स में से 425 सीट्स मुस्लिम लीग बड़े आराम से जीत गई थी। मतलब कि इस इलेक्शन से साफ हो गया था कि मुस्लिम लीग जो है वही इंडिया के मुस्लिम्स की असली रिप्रेजेंटेटिव है। और इस इलेक्शन के बाद कहीं ना कहीं हर किसी को रियलाइज हो गया था कि अब इंडिया का पार्टीशन हो के रहेगा। ब्रिटिशर्स ने ट्राई किया कि दोनों पार्टी जो हैं कांग्रेस और मुस्लिम लीग इनको मिला के एक इंट्रिम गवर्नमेंट भी बनाई जाए। लेकिन मुस्लिम लीग ने उसमें काम ही नहीं होने दिया। जिन्ना अलग देश की डिमांड पे पूरी तरीके से अड़े हुए थे। और नेहरू जो थे वो भी अपनी बात से पीछे नहीं हट रहे थे। अब सिचुएशन ऐसी थी कि ब्रिटिशर्स को

35:19 जल्दी से जल्दी इंडिया से निकलने था। लेकिन फिर से कोई सशन बन नहीं रहा था। तो यूके ने क्या किया? यूके ने अपने तीन कैबिनेट मिनिस्टर इंडिया भेजे ताकि इंडिया के अंदर एक सॉल्यूशन निकाला जा सके और इसको कैबिनेट कमीशन बोला गया। तो अब 24th ऑफ मार्च 1946 को यूके से ये तीनों कैबिनेट मिनिस्टर जो थे वो इंडिया पहुंच जाते हैं ताकि ये डिसाइड हो सके कि कैसे आगे इंडिया के अंदर सरकारें चलेंगी? पॉलिटिकल पार्टी चाहती क्या है? कॉन्स्टिट्यूशन कैसा होगा? पावर डिस्ट्रीब्यूशन किस तरीके से किया जाए? यह काम इनका था। यह लोग बहुत कोशिश करते हैं। तीन से चार वीक तक मल्टीपल मीटिंग्स करते हैं कांग्रेस के साथ, मुस्लिम लीडर्स के साथ, हर एक लीडर के साथ लेकिन कोई सलूशन नहीं निकलता है। जिन्ना और नेहरू दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए थे। और ब्रिटिशर्स जो थे वो जल्दी से जल्दी इंडिया से निकलना चाह रहे थे। तो कैबिनेट मिशन जो आया था वो इतना ज्यादा फ्रस्ट्रेट

36:04 हो गया था कि इसने 16th ऑफ मई 1946 को खुद से अनाउंस कर दिया कि आप लोग आपसी सहमति नहीं बना पा रहे हो। तो इंडिया को आजादी कैसे मिलेगी? उसका प्लान जो है वो हम खुद से बना के आपको दे रहे हैं। और फिर थोड़े टाइम बाद कैबिनेट मिशन जो था उसने अपना एक प्लान बना के पब्लिश कर दिया। इस प्लान के अंदर सबसे पहली चीज कही गई कि इंडिया का कोई भी पार्टीशन नहीं होगा। दूसरी चीज इसमें इन्होंने कही कि कम्युनल रिप्रेजेंटेशन यानी कि जो सेपरेट इलेक्टोरेट है किसी भी रिलीजन या कम्युनिटी को नहीं दिया जाएगा। और फिर इसके बाद इन्होंने तीन रिकमेंडेशन देके एक प्लान समझाया जिसमें इन्होंने तीन चीजों के ऊपर बात करी जिसमें प्रोविंशियल यानी कि स्टेट्स की ग्रुपिंग थी। दूसरी प्रिंसली स्टेट के बारे में बताया था। तीसरी चीज कॉन्स्टिट्यूशन बनाने के लिए कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली कैसे बनेगी उसके

36:51 बारे में बताया था। पहला पॉइंट प्रोविंशियल यानी कि स्टेट्स की जो ग्रुपिंग थी कि ये इंडिया के जितने स्टेट्स हैं इनको तीन ग्रुप में डिवाइड कर देंगे। ग्रुप ए, ग्रुप बी और ग्रुप सी। ग्रुप ए में इन्होंने रखे यूनाइटेड प्रोविंस बॉम्बे मद्रास सेंट्रल प्रोविंस, बिहार और उड़ीसा। ग्रुप बी में रखे पंजाब, सिंध, नॉर्थवेस्ट, फ्रंटियर प्रोविंस और बलूचिस्तान। और ग्रुप सी में इन्होंने रखे बंगाल और आसाम। अब अगर ये तीनों ग्रुप को अगर आप ध्यान से देखोगे तो इसमें आप नोटिस करोगे कि ग्रुप ए जो है उसमें हिंदू मेजॉरिटी वाले स्टेट्स हैं और ग्रुप बी और ग्रुप सी में मुस्लिम मेजॉरिटी एरियाज है। इसके साथ-साथ इसमें इन्होंने कहा कि जितने भी हमने स्टेट्स डिवाइड किए हैं यानी कि प्रोविंस डिवाइड किए हैं ये अपना खुद का एक कॉन्स्टिट्यूशन बनाएंगे। फिर सब मिलके पूरे देश का कॉन्स्टिट्यूशन बनाएंगे। तो बेसिकली इसमें

37:36 जो पूरा अनडिवाइडेड इंडिया था इसको सिर्फ और सिर्फ एक सेंट्रल गवर्नमेंट के अंडर में ना रख के थ्री टियर सिस्टम बना दिया था। सबसे पहले सेंट्रल गवर्नमेंट उसके बाद ग्रुप्स होंगे और उसके बाद स्टेट्स होंगे। सेंट्रल गवर्नमेंट के हाथ में सिर्फ फाइनेंस, फॉरेन अफेयर और कम्युनिकेशन होगा। बाकी जितनी भी चीजें होंगी वो सारी की सारी स्टेट जो है वो खुद डिसाइड कर लेगा। और ये जो पूरा सिस्टम बना के अंग्रेजों ने भेजा था इस पूरे सिस्टम में सेंट्रल गवर्नमेंट जो थी वो बहुत वीक हो गई थी। स्टेट्स के पास ज्यादा पावर आ गई और इसके बाद इसमें एक चीज और इन्होंने कह दी थी कि 5 साल जब हो जाएंगे तो कोई भी स्टेट चाहे तो अपनी मर्जी के हिसाब से ग्रुप को छोड़ के दूसरे ग्रुप में जा सकता है। और ये जो बाकी बचे हुए प्रिंसली स्टेट हैं ये चाहे तो इंडिपेंडेंट रह सकते हैं या फिर इंडिया के साथ मिल जाए। और तीसरी चीज कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली जो कॉन्स्टिट्यूशन बनाएगी इंडिया का उसमें कौन-कौन होगा? उसमें इन्होंने ये कहा कि

38:22 जिस कम्युनिटी की जितनी पॉपुलेशन होगी उसकी परसेंटेज के हिसाब से कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली में भी उस कम्युनिटी के उतने ही मेंबर आएंगे। ताकि हर कम्युनिटी का रिप्रेजेंटेशन हो सके कॉन्स्टिट्यूशन बनाने में। अब इसमें पाकिस्तान बनाने की जो डिमांड थी वो तो पूरी तरीके से हट गई थी। लेकिन उसके बाद भी जिन्ना जो थे वो इस प्लान के लिए एग्री कर गए थे। और वो इसलिए कर गए क्योंकि जो पाकिस्तान वो डिमांड कर रहे थे उनको उससे भी बड़ा पाकिस्तान फ्यूचर के अंदर बनता हुआ दिख रहा था। इसमें रूल था कि 5 साल बाद जो ग्रुप जो चाहेगा जहां से जहां मूव करना चाहेगा कर सकता है। तो जिन्ना ने सोचा कि आगे चलके सेंटर के हाथ में तो ज्यादा पावर है नहीं। तो अपना और बड़ा पाकिस्तान बनाने में आसानी होगी। थोड़ा टाइम लगेगा लेकिन जो वो चाह रहे हैं वो अचीव कर लेंगे। लेकिन कांग्रेस ने इस चीज को पकड़ लिया था। कांग्रेस ने कहा कि चलो

39:08 बाकी सारी चीजें तो इसमें सही हैं कि आप इंडिया को डिवाइड नहीं कर रहे हो। तीन ग्रुप में आपने बना दिया है। बस इसमें एक-दो चीजें चेंज करनी होंगी। एक तो ये जो आपने ग्रुप बनाए हैं यानी के जो तीन ग्रुप बनाए हैं आपने स्टेट्स को डिवाइड किया है। इसमें किसी भी स्टेट के लिए कंपलसरी नहीं होना चाहिए कि वो किस ग्रुप में रहेगा। ये चीज बोली कांग्रेस ने। कांग्रेस के हिसाब से यह होना चाहिए कि यह जो आपने तीन ग्रुप बनाए हैं, कोई स्टेट किसी भी ग्रुप में जाना चाहे, तो वह कर सके। इसको मैंडेटरी नहीं होना चाहिए। अब यह चीज़ अगर हो जाती, तो इससे जिन्ना का जो सपना था वो टूटता हुआ दिख रहा था। और इसके साथ-साथ कांग्रेस ने कहा कि यह जो आपने सेंटर के हाथ में पावर दी है, बहुत ही कम दी है, इसको और स्ट्रांग करना चाहिए सेंटर को। क्योंकि अभी भले ही आप यूनाइटेड इंडिया बना दे रहे हो, लेकिन अगर सेंटर के हाथ में पावर नहीं हुई तो आगे चलके देश टूटेगा क्योंकि स्टेट जो है वो अपनी मनमानी करेंगी। अब कांग्रेस की ये जो दो डिमांड थी इसको लेके ब्रिटिशर्स काफी हद तक एग्री हो गए थे।

39:55 लेकिन जिन्ना जो थे उनका प्लान जो था वो पूरी तरीके से फेल हो रहा था इन चीजों को करने से। तो जिन्ना जो थे जो इन्होंने पहले हां कर दिया था वो इस कैबिनेट मिशन से ये जो पूरा प्लान था इससे बैकआउट कर देते हैं। अब मुस्लिम लीग अगर बैकआउट कर देती है और कांग्रेस भी नहीं मान रही थी तो ब्रिटिशर्स कहते हैं कि कोई बात नहीं आप इसको आके ज्वाइन करिए। कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली का पार्ट बनिए। कॉन्स्टिट्यूशन बनाना शुरू करिए। बाकी चीजों पे डिस्कशन हो जाएगा। तो कांग्रेस तो ब्रिटिशर्स की बात मान के कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली वगैरह में काम करना स्टार्ट कर देती है। लेकिन मुस्लिम लीग जो थी वो अब एक एकदम अलग रास्ते पे निकल जाती है। जिन्ना जो थे वो गुस्सा होके 29th ऑफ जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग की वर्किंग कमेटी की एक इंपॉर्टेंट मीटिंग रखते हैं। इसमें ये कहते हैं कि ये जो इंडियन नेशनल कांग्रेस है ये मुस्लिम्स की जो जेन्युइन डिमांड्स हैं उनको नजरअंदाज कर रहे हैं और अपनी

40:40 मनमानी कर रहे हैं। और अगर इन लोगों ने हमारी बात नहीं मानी तो 16th ऑफ अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन के रास्ते हम अपना हक लेंगे। अभी डायरेक्ट एक्शन का मतलब क्या था? उस पर्टिकुलर टाइम पे तो नहीं समझ में आया था। वो आगे चल के अभी समझ में आएगा। लेकिन इतना समझ में आ रहा था कि 16 अगस्त को सारे मुस्लिमों को वो रोड पर उतरने को कह रहे थे। उस टाइम पे बंगाल के अंदर मुस्लिम लीग जो थी वो पावर में थी। हुसैन शहीद यह बंगाल को हेड कर रहे थे और मुस्लिम लीग के मेंबर भी थे। तो इन्होंने क्या किया था? एक स्टार ऑफ इंडिया नाम से न्यूज़पेपर था इन्हीं के एमएलए का था। तो इन्होंने 16th ऑफ अगस्त 1946 को जो डायरेक्ट एक्शन डे का प्लान था कि क्या-क्या होगा और वो सारी चीजें लोगों तक पहुंचाने के लिए इसी अखबार में पूरा का पूरा प्लान पब्लिश कर देते हैं ताकि मुस्लिम लीग के जो सपोर्टर हैं वो इकट्ठा हो जाए। अब इसके बाद 16th ऑफ अगस्त की जब

41:27 डेट आती है इस दिन बंगाल के अंदर हुसैन शहीद जो कि हेड कर रहे थे वो पुलिस को हटा देते हैं। पुलिस उस टाइम पे होती नहीं है। अब इसमें बोला तो ये गया था कि पीसफुल प्रोटेस्ट होगा लेकिन इस प्रोटेस्ट में दंगे होते हैं। इस चीज को द ग्रेट कोलकाता किलिंग भी कहते हैं। हजारों लोगों की जान गई। फिर धीरे-धीरे करके इंडिया के बाकी जगह पे हिंदू मुस्लिम एक दूसरे की जान के प्यासे हो गए। पूरे इंडिया के अंदर लोग एक दूसरे को निकाल निकाल के काट रहे थे। और यह दंगे सिर्फ वह एक दिन की बात नहीं थी। यह दंगे कंटीन्यूअसली चलते रहते हैं। अगले एक साल तक चलते रहते हैं और डेली 200 से 300 लोगों के मरने की खबर आती थी। शुरू में कांग्रेस ने जिन्ना के इस डायरेक्ट एक्शन डे को बहुत ज्यादा सीरियस नहीं लिया था। लेकिन ये जो डायरेक्ट एक्शन डे जिन्ना ने कराया था इसकी वजह से कांग्रेस के हाथ से

42:14 सारी चीजें निकल चुकी थी। लोग रोड पर आ गए थे। अब कांग्रेस कुछ नहीं कर पा रही और कांग्रेस के पास दिक्कत यह थी कि दंगे रोकने के लिए वह खुद तो पावर में थी नहीं। अंग्रेज जो थे वह जल्दी से जल्दी इस पे डिसीजन ले के भागना चाहते थे और दंगे तभी रुकेंगे जब इंडिया का पार्टीशन होगा। जिन्ना अपनी बात पे अड़े हुए थे कि वो पूरी मुस्लिम कौम के रिप्रेजेंटेटिव हैं और उनको एक अलग पाकिस्तान चाहिए। जिन्ना जब कहते थे कि मैं इंडिया के सारे मुस्लिम्स का रिप्रेजेंटेटिव हूं तो कांग्रेस में कई सारे मुस्लिम लीडर्स थे जैसे मौलाना अबुल कलाम। तो ये लोग कहते थे कि जिन्ना ये मजाक वाली बातें कर रहे हैं क्योंकि हम लोग क्या करें फिर? हम लोग घरों में जाके बैठ जाए। अब देखिए हो ये रहा था कि डेली लोग मर रहे थे। इंडिया में हर तरफ कम्युनल टेंशन फैल चुकी थी। अब इससे निपटने के लिए एक ही सॉल्यूशन था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग एक एग्रीमेंट में आए लेकिन दोनों अपनी-अपनी बातों पर अड़े हुए थे। तो ये दोनों जल्दी से कोई डिसीजन लें। इससे निपटने के लिए यूके के जो पीएम

43:02 थे क्लेममेंट एटली इन्होंने 20th ऑफ फरवरी 1947 को ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन में एक अनाउंसमेंट की कि बहुत हो गया। चाहे अब इंडिया के जो पॉलिटिशियंस हैं ये एग्रीमेंट में आए चाहे ना आए। 30th ऑफ जून 1948 को हम लोग पावर ट्रांसफर करके इंडिया से चले जाएंगे। फिर उसके बाद इंडिया के अंदर कुछ भी हो उसके जिम्मेदार हम नहीं होंगे। इन्होंने उस समय कह दिया था कि इंडिया के जितने भी स्टेट्स हैं हम सबको इंडिपेंडेंट करके चले जाएंगे। इसको बेलकन प्लान भी बोलते हैं। इससे नेहरू जी और जिन्ना दोनों परेशान हो गए। नेहरू जी कह रहे थे कि कहां हम दो देश बांटने को रेडी नहीं है। आप इतने सारे टुकड़े करने की बात कर रहे हो। जिन्ना जो थे वो भी छह प्रोविंस को मिला के एक पाकिस्तान बनाना चाहते थे। और ऐसे में पाकिस्तान के भी टुकड़े हो जाएंगे और हर स्टेट का जो लीडर होगा वो छोटे-छोटे स्टेट का हेड बन जाएगा।

43:47 एक्चुअल में तो कहीं ना कहीं इनकी पीएम बनने की भी एस्पिरेशन थी। और अंग्रेज ने ये जो डेट दी थी 30th ऑफ जून 1948 की अगर जिन्ना और नेहरू अड़े रहते मानते नहीं और अंग्रेज यहां से चले जाते तो इंडिया की जो इंटरनल सिचुएशन है वो आउट ऑफ कंट्रोल हो जाती। जगह-जगह पे दंगे ऑलरेडी हो रहे थे। कॉन्स्टिट्यूशन बना नहीं था। जिन्ना की जिन एरिया में पकड़ती वहां पे क्या होता? कितनी मारकाट होती? क्या सिचुएशन होती यह इमेजिन भी नहीं किया जा सकता था। तो जब अंग्रेजों ने यह एक स्पेसिफिक डेट दे दी कि हम चले जाएंगे तो नेहरू जी और जिन्ना दोनों सेम पेज पे आने की कोशिश करना स्टार्ट करते हैं। और अब यहां से कांग्रेस जो थी वो भी अब पार्टीशन के ऑप्शन के बारे में डिस्कशन स्टार्ट कर देती है। तो एक तरह से जिन्ना का ये जो प्लान था डायरेक्ट एक्शन डे का यह काम किया और

44:34 कांग्रेस को झुकना पड़ा क्योंकि दंगे जो थे वो डे बाय डे बढ़ रहे थे। उस टाइम के कांग्रेस के प्रेसिडेंट कृपलानी जी ने कहा कि रेदर देन हैव अ बैटल वी शुड लेट देम हैव देयर पाकिस्तान। और 19th ऑफ़ मार्च 1947 को नेहरू जी ने भी ये चीज बोल दी कि पार्टीशन करना पड़ेगा। अब ये जो अनाउंसमेंट की थी अंग्रेजों ने कि ये लोग 30th ऑफ़ जून 1948 को चले जाएंगे। उसी अनाउंसमेंट के अगले दिन ये एक काम और करते हैं। वेव्स जो उस टाइम का इंडिया का वॉइस था। यूके ने इनको भी हटा दिया कि इतने टाइम से इनको काम दिया गया था कि इंडिया के लीडरों से बात करके कुछ सलूशन निकाला जाए और इन्होंने बहुत टाइम खराब कर दिया था और अंग्रेज जो थे वो बहुत जल्दी निकलना चाह रहे थे। तो वेवल्स को हटा के लॉर्ड माउंटबेटन को इंडिया का वॉइस रॉय बना के तुरंत भेजा जाता इस काम को निपटाने के लिए। अब जब पाकिस्तान के डिस्कशन देश के अंदर स्टार्ट होना चालू हुए तो पंजाब के

45:21 सिख और बंगाल के हिंदू परेशान हो गए। इन्होंने कहा कि अगर पार्टीशन में पंजाब और बंगाल पूरे पाकिस्तान को चला जाएगा तो हम तो फंस जाएंगे। हम तो बिना कुछ किए ही माइनॉरिटी बन जाएंगे पाकिस्तान के अंदर जाके। तो ये लोग साफ मना कर रहे थे कि इनको पाकिस्तान के साथ नहीं जाना है। और जिन्ना जो थे इनको आराम से समझा के पंजाब और बंगाल जो था वो पूरा लेने की डिमांड कर रहे थे। उनका कहना था कि ये जो पंजाब और बंगाल के सिख और हिंदू हैं ये पाकिस्तान में आराम से रह सकते हैं। माइनॉरिटी बनके कोई दिक्कत नहीं आएगी। और इसको लेके जिन्ना को क्रिटिसाइज भी किया गया क्योंकि जिन्ना का कहना था कि हिंदू मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। इसलिए इंडिया का बंटवारा करना होगा। लेकिन जब पंजाब और बंगाल की बात आ रही है तो वहां पे ये हिंदू और सिख को अपने पाकिस्तान में रखने के लिए आराम से तैयार हैं। तो इसी चीज पे कहा गया कि जिन्ना को सिर्फ पावर से मतलब है और ये बंटवारा भी किसी के राइट्स के लिए नहीं कर रहे हैं बल्कि पाकिस्तान के

46:07 हेड बनने के लिए कर रहे हैं। और अब इसके बाद डेट आती है थर्ड ऑफ जून 1947। तो बहुत ही डिटेल डिस्कशन के बाद माउंटबेटन क्या करते हैं? इस डेट को इंडिया और पाकिस्तान को दो अलग देश बनाने का एक प्लान पब्लिक करते हैं। इसे माउंटबेटन प्लान भी बोला जाता है। इसमें माउंटबेटन ने इंडिया और पाकिस्तान दो अलग देश बना के दोनों देशों को डोमिनियन स्टेटस दिया। मतलब कि देश को आजादी तो मिल जाएगी। इंटरनल मैटर एडमिनिस्ट्रेशन जितनी भी गवर्नेंस होगी सब खुद से करी जाएगी। लेकिन इंडिया और पाकिस्तान दोनों ब्रिटिश क्राउन के अंडर रहेंगे। ये चीज इसलिए की गई थी क्योंकि माहौल बहुत ज्यादा खराब था उस टाइम पे। दंगे बहुत ज्यादा हो रहे थे। चीजें आउट ऑफ कंट्रोल हो सकती थी और कॉन्स्टिट्यूशन वगैरह भी बना नहीं था। तो सारा एडमिनिस्ट्रेशन जो था उसको सेटअप करने में भी टाइम लगता। तो इसलिए यह डिसाइड हुआ कि जब तक दोनों कंट्रीज का कॉन्स्टिट्यूशन नहीं बनता तब तक उन्हें एक डोमिनियन

46:52 स्टेटस दिया जाएगा। तो इसी वजह से जब ईयर 1950 में इंडिया का और 1956 में पाकिस्तान का कॉन्स्टिट्यूशन बना। तब जाके दोनों देशों को पूरी तरीके से ब्रिटिश क्राउन के अंडर से हटाया गया। और इसके बाद ये जो माउंटबेटन प्लान था इसमें कहा गया कि पंजाब और बंगाल के केस में वोटिंग हो जाएगी। मुस्लिम हिंदू और सिख के जो रिप्रेजेंटेटिव हैं। ये अलग-अलग वोटिंग कर लेंगे कि अगर हिंदू और सिख भी चाहते हैं पाकिस्तान के साथ जाना तो पंजाब और बंगाल को भी दो पार्ट में बांट दिया जाएगा। लेकिन जब वोटिंग हुई तो हिंदू और सिख जो थे उन्होंने पाकिस्तान की बजाय इंडिया के साथ रहना प्रेफर किया। तो इस केस में पंजाब और बंगाल को ईस्ट और वेस्ट पार्ट में डिवाइड करके इंडिया और पाकिस्तान में बांट दिया गया। तो कहने का मतलब है कि यह सारी चीजें होने के बाद फाइनली जो पाकिस्तान था उसके अंडर में सिंध, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर आज का जो खैबर पख्तून है

47:39 वो बलूचिस्तान, सिलेलेट, वेस्ट पंजाब और ईस्ट बंगाल। बाकी जितना बचा वो सब इंडिया के पास गया। और जो प्रिंसली स्टेट थे, उसमें माउंटबेटन प्लान में यह था कि जो पुराने अंग्रेजों के साथ प्रिंसली स्टेट के जो एग्रीमेंट हुए हैं, वह सब रद्द हो जाएंगे। और प्रिंसली स्टेट अगर चाहते हैं पाकिस्तान के साथ जुड़ना या इंडिया के साथ जुड़ना या इंडिपेंडेंट रहना यह पूरी तरीके से उनकी मर्जी है। और जब यह पार्टीशन हुआ तो जिस रेजीमेंट के अंदर मुस्लिम सोल्जर्स जो थे वो ज्यादा थे वो रेजीमेंट पाकिस्तान को दे दी गई। जैसे सिंध रेजीमेंट, बलूच रेजीमेंट, फ्रंटियर फोर्स रेजीमेंट ये सारी रेजीमेंट जो थी वो पाकिस्तान के पास गई। बाकी इंडियन रेलवे, सिविल सर्विसेज, फाइनेंसियल एसेट्स और जो ब्रिटिशर्स का लोन था वो भी इंडिया और पाकिस्तान में बराबर-बराबर बांट दिया गया। यहां तक कि जो ऑफिस की टेबल, चेयर, टाइप राइटर थी, उनको

48:26 भी आधा-आधा बांटा गया। और माउंटबेटन प्लान जब पब्लिक किया गया था, तो उसमें एक चीज और कही गई थी कि पहले जो डेट दी गई थी 30th ऑफ जून 1948 की, इसको चेंज करके अब 15th ऑफ अगस्त 1947 को दोनों देशों को आजादी मिलेगी। ये डेट इसलिए रखी थी क्योंकि जापान ने इस डेट को अलाइड फोर्सेस के सामने सरेंडर किया था। और माउंटबेटन जो थे उस टाइम साउथ ईस्ट एशिया में सुप्रीम कमांडर थे। तो ये डेट जो थी वो यादगार बनाना चाहते थे और बहुत क्लोज थी उनके। तो इसीलिए उन्होंने ये डेट फिक्स करी थी। इसके बाद माउंटबेटन प्लान में ये कहा गया था कि एक कमेटी बनाई जाएगी जिसके जो चेयरमैन है वो रेडक्लिफ होंगे और इंडिया और पाकिस्तान का बॉर्डर कहां से जाएगा और किस-किस जगह से जाएगा यह कमेटी वो चीज फिक्स करेगी। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के मेंबर राजा जी ने कहा था कि अच्छा हुआ कि आजादी की जो डेट है वो 30th ऑफ जून 1948

49:13 से चेंज कर दी गई थी। क्योंकि अगर अंग्रेज अगले साल तक के लिए रुकते तो कोई पावर बचती ही नहीं जिसको ट्रांसफर किया जा सकता। इस पूरे माउंटबेटन प्लान को जब कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने एक्सेप्ट कर लिया तो इसको फोर्थ ऑफ जुलाई 1947 को इंडियन इंडिपेंडेंस बिल के नाम से बहुत ही जल्दबाजी में ब्रिटिश पार्लियामेंट में लेके जाया गया और फिर जल्दी-जल्दी डिस्कशन करके इस बिल को यूके के पार्लियामेंट हाउस ऑफ कॉमन हाउस ऑफ लॉर्ड में पास करके और फिर अगले दिन यूके के जो किंग थे उनसे साइन करा के ये जो बिल था अब ये एक्ट बन जाता है जिसका नाम होता है इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 इसी एक्ट के थ्रू हमें आजादी मिली थी। अब इसके तुरंत बाद जो इंडिया पाकिस्तान का जो बॉर्डर बनने के लिए कमीशन बना था उसके चेयरमैन रेडक्लिफ इनको कहा जाता है कि जल्दी से जल्दी इंडिया पाकिस्तान का बॉर्डर बनाओ और इसके लिए

50:00 इनको सिर्फ तीन वीक का टाइम दिया गया। यह जो रेडक्लिफ थे जिनको बॉर्डर बनाने का काम दिया गया था इनको इंडिया के बारे में कुछ भी नहीं पता था। ना तो कभी इससे पहले ये इंडिया आए थे और यहां तक इनको पंजाब एक्चुअल में पढ़ता कहां पे है ये तक नहीं पता था। तो इनको इंडिया का जो कल्चर है, इंडिया की जियोग्राफी है, उसके बारे में कुछ भी आईडिया नहीं था। लेकिन इन्होंने क्या किया? इंडिया के मैप को एक पेपर पर मंगवाया और जहां बॉर्डर बनाना था वहां की डिस्ट्रिक्ट का हिंदू मुस्लिम पापुलेशन का सारा डाटा मंगवाया। फिर ये एक-एक डिस्ट्रिक्ट उठा के इन्होंने हिंदू मुस्लिम मेजॉरिटी वाले एरिया के हिसाब से बॉर्डर बनाते चले गए। और ऐसे करके इन्होंने एक पेपर पे इंडिया के दो टुकड़े कर दिए। अब इसके बाद डेट आती है 14th ऑफ अगस्त 1947। लेकिन अभी तक बॉर्डर कहां पे बनाया जाएगा? ये चीज रेडक्लिफ ने ऑफिशियली

50:45 अनाउंस नहीं की थी। तो किसी को भी नहीं पता था कि इंडिया पाकिस्तान का बॉर्डर होगा कहां पे। अब नेक्स्ट डे 15th ऑफ अगस्त 1947 यानी के टेक्निकली 14th ऑफ अगस्त 1947 की रात को 12:00 बजे के बाद इंडिया और पाकिस्तान की आजादी डिक्लेअर होनी थी। लेकिन पाकिस्तान अपनी इंडिपेंडेंस इंडिया के साथ नहीं मनाना चाहता था। वो अपनी आइडेंटिटी इंडिया से अलग रखना चाहता था। और इसके साथ-साथ माउंटबेटन जो इंडिया के वॉइस थे उनके लिए भी 15th ऑफ अगस्त को कराची और दिल्ली में एक साथ आजादी की जो सेरेमनी थी उसको अटेंड करना एक चैलेंज था। तो पाकिस्तान ने 14th ऑफ अगस्त को ही अपनी इंडिपेंडेंस अनाउंस कर दी। और जब ये चीज कर दी गई तो ब्रिटिश अथॉरिटी जो थी उसने भी 14th ऑफ अगस्त को ही पाकिस्तान की जो इंडिपेंडेंस थी उसको अपने रिकॉर्ड में रखा और नेक्स्ट डे 15th

51:31 ऑफ अगस्त को इंडिया को इंडिपेंडेंस मिल जाती है। Samsung वाइट एंड ग्रीन ट्राई कलर आफ्टर [संगीत] द इंडिपेंडेंट इंडिया के जो पहले गवर्नर थे वो माउंटबेटन को ही बनाया गया था। ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि अभी भी काफी सारे एसेट्स बचे थे। उनका डिवीजन होना था और इंडिया और पाकिस्तान के बीच में स्मूथली पावर ट्रांसफर होने में भी बहुत सारी चीजें थी। तो इन सारी चीजों के लिए एक न्यूट्रल आर्मी चाहिए था। तो ये सारी चीजों को देख के इंडिया ने फैसला लिया था कि आजाद भारत के जो गवर्नर जनरल बनेंगे वो लॉर्ड माउंटबेटन ही बनेंगे। लेकिन पाकिस्तान की तरफ जिन्ना ने खुद को बनाया था गवर्नर जनरल। अब आजादी के दो दिन बाद यानी कि 17th ऑफ अगस्त 1947 को इंडिया

52:18 पाकिस्तान का जो एक्चुअल बॉर्डर था रेडक्लिफ उसको अनाउंस कर देते हैं। अब उस टाइम पे इंफॉर्मेशन इतनी आसानी से नहीं पहुंचती थी। तो कई-कई जगह पे तो ऐसा हुआ कि लोग अपना काम कर रहे थे। तो कोई आके जाकर बताता था कि यहां से अब घर छोड़ के चलना पड़ेगा। अब ये इंडिया नहीं रहा। अब यह पाकिस्तान हो गया है। यह जो इस टाइम पे हर किसी को पावर लेने की जल्दी थी। किसी को पावर छोड़ के जाने की जल्दी थी। इसकी वजह से जो मिसमनेजमेंट हुआ उसकी वजह से बहुत लोगों की जान गई। जैसे ही अनाउंसमेंट होती है बॉर्डर की तो बांग्लादेश के अंदर ये जो यहां पे रहने वाले हिंदू थे वो माइग्रेट हो के यहां जाना चालू कर देते हैं और यहां के रहने वाले मुस्लिम जो थे वो माइग्रेट हो के यहां जाना चालू कर देते हैं। ऐसे ही पंजाब की बात करें तो इस साइड लाखों सिख इधर माइग्रेट होना चालू कर देते हैं। ऐसे ही मुस्लिम जो थे वो इधर माइग्रेट होना चालू कर देते हैं। और इन दोनों एरिया में सबसे ज्यादा कम्युनल टेंशन थी पहले। तो इस पूरे माइग्रेशन में

53:05 बहुत ज्यादा मारकाट हुई। कई जगहों पे लाइन लगी होती थी। एक दूसरे को लोग कहते थे कि मेरा घर मैं वहां पे छोड़ के आ रहा हूं। तुम वहां पर जाकर रह लेना। इस तरीके के हालात हो गए थे। अब ये माइग्रेशन ऐसा नहीं था कि गाड़ियां आई सबको बैठा के ले गई। इस माइग्रेशन में बहुत ही ज्यादा बड़े स्केल पर दंगे स्टार्ट होते हैं। औरतों के कपड़े फाड़े जाते हैं। जबरदस्ती होती है। लोग एक दूसरे को काटना शुरू कर देते हैं। ट्रेनों में लाशें भर के भेजी जाती थी। रातोंरात लोगों को अपना घर छोड़ के भागना था और अपनी जान बचानी थी। और इसके बाद भी अपने अच्छे खासे घर छोड़ के उनको रिफ्यूजी कैंप में जाना था। लोगों में आपस में नफरत किस लेवल की कि इसका अंदाजा आप इस तरीके से लगा सकते हो कि पार्टीशन हो चुका था। सॉल्यूशन हो चुका था। अब किसी भी बात का कोई भी मतभेद नहीं था। उसके बाद भी 10 से 20 लाख लोग पार्टीशन होने के बाद सॉल्यूशन मिलने के बाद भी काट दिए गए। आज भी अगर

53:51 आपके आसपास कोई ऐसा परिवार होगा या आपके जानने में कोई ऐसा होगा जो पार्टीशन के टाइम पे जो लोगों के बच्चे होंगे अभी अगर आप उनसे बात करोगे तो वो बताएंगे कि कितना खतरनाक था। कई कई ऐसे केस भी थे जहां 2020 साल होने के बाद भी लोग रोते थे कि मुझे मेरे घर बॉर्डर के उस पार भेज दो। मुझे घर वापस जाना है। और सबसे बड़ी बात जिन्ना जो इस बंटवारे के लिए अड़े हुए थे, यह सब होने के बाद अगले ही साल उनको टीबी हो जाता है और उससे उनकी डेथ हो जाती है। और फिर इसके बाद 26 ऑफ़ जनवरी 1950 को जब इंडिया का कॉन्स्टिट्यूशन बनता है तब इंडिया का जो डोमिनियन स्टेटस था वो हट जाता है और इंडिया को पूरी तरीके से आजादी मिल जाती है। पाकिस्तान का जो डोमिनियन स्टेटस था वो 23 ऑफ़ मार्च 1956 को हटा था और फिर पाकिस्तान भी पूरी तरीके से आजाद हो गया था। लेकिन आज की डेट तक लोग इस बंटवारे को भूले नहीं है। आज भी उनके दिल

54:38 में जो उस टाइम पर हुआ था वो सारी चीजें रहती हैं। लास्ट में एक बार फिर से आपको बता दूं सोवरन अपने नए यूज़र्स को 45 डेज का फ्री ट्रायल देता है। इसमें आप फेमस इन्वेस्टर आदित्य जोशी से इन्वेस्टिंग सीख सकते हो बिल्कुल फ्री। तो आज ही सोवरन ऐप डाउनलोड करें। लिंक इज इन द डिस्क्रिप्शन। थैंक यू। [संगीत]

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