0:04 कर्म को जानो विकर्म को जानो अकर्म को भी जानो और ध्यान दोगे तभी जान पाओगे क्योंकि कर्म की गति गहन है गहना कर्मणो गति है कर्म कर्म विकर्म सकाम कर्म निष्काम कर्म इन पर हम पिछले सत्र में चर्चा कर चुके हैं कुछ सीमा तक उसको आज हम दोहराएंगे भी
0:51 पर जो मूल बात है व्यवहारिक जिससे लाभ है हमें वो उससे संबंधित तो है कि कर्म क्या विकर्म क्या कर्म क्या पर संबंधित होने के बाद भी थोड़ा हटक है आप बिल्कुल जान सकते हो कि कर्म अकर्म विकर्म निष्काम कर्म आदि किसको कहते हैं और ये हम जान ही चुके हैं विस्तार से चर्चा हुई ही थी लेकिन यह जानने के बाद
1:36 भी जो हमारे अपने मूलभूत प्रश्न है जीवन के वह हल नहीं [संगीत] होते जिस व्यक्ति को देखो सवाल उसके सामने यही होता है मैं करूं क्या मैं करूं क्या ऐसी मेरी हालत खराब है मुझे क्या करना चाहिए सबके सामने प्रश्न यही आता है ना इस प्रश्न का उत्तर तब तक नहीं मिलेगा जब तक कर्म के पीछे के कर्ता को हम नहीं पकड़ लेते यह जो मेरा कर्म है यह आ कहां से रहा
2:23 है जब तक यह नहीं जाना तब तक सही कर्म का निर्धारण होगा नहीं और सही कर्म का निर्धारण कर्ता को जानने के बाद करना पड़ता नहीं है हमने बहुत बार कहा है मनुष्य की मूल [संगीत] समस्या कर्म की नहीं ज्ञान की है हमारी समस्या अभिव्यक्त ऐसे होती है कि करूं क्या कौन सा कर्म उचित है मेरे लिए अभिव्यक्ति हम उसको ऐसे देते हैं लेकिन वास्तव में हमारी समस्या यह है कि हम जानते नहीं कि कर्म की प्रेरणा या कर्म के प्रति
3:11 आग्रह या नकार या विरोध आ कहां से रहा है जो कुछ भी हमें अनुभव हो रहा है जो भी कर्म हमसे होने को आतुर है छटपटा रहा है उसका स्रोत क्या है हमारे भीतर हमें यह नहीं पता होता समस्या ज्ञान की है हम नहीं जानते कि हमारे भीतर कौन है जो कर्म को आतुर है या कर्म के विरोध में है हमें नहीं पता होता उसको जानना ही धर्म है और उस धर्म की पूर्ति के बाद कर्म के निर्धारण की कोई आवश्यकता बचती नहीं है
4:00 आत्मज्ञानी के लिए यह प्रश्न बिल्कुल महत्वहीन हो जाता है गौण हो जाता है अप्रासंगिक हो जाता है हास्यास्पद हो जाता है मैं करूं क्या वह करने वाले को ही जान गया वह करने वाले के तामझाम को दंद फंद को निरर्थक को जान गया व क्यों पूछेगा कि मैं करूं क्या उसे क्या करना है तो अगर पूछा नहीं कि करूं क्या तो कर्म होता कैसे है वो बस हो जाता है वह बस हो जाता है वह फिर सीधे आत्मा से उद्भव होता है
4:48 बीच में उसमें कर्ता की जरूरत नहीं पड़ती मध्यस्थ की तरह मिडल मैन की तरह ऐसे कर्म को कहते हैं सहज कर्म बहुत सुंदर शब्द है ना सहज सहज का अर्थ होता है वह जो साथ ही जन्मा हो सह माने साथ ज माने जन्मा माने जिसमें फासला ना हो तुरंत उठा हो किससे आत्मा से सहज कर्म है जो सीधे आत्मा से उद्भव होता है असहज कर्म है जिसमें आत्मा और कर्म के बीच में करता बैठ गया होता है आके व असहज कर्म है माने हर वह कर्म जो अहंकार द्वारा किया जा र अहंकार ही करता है ना अहंकार ही करता है हर वह कर्म जो अहंकार द्वारा करा जा रहा
5:35 है वह असहज होगा फिर उसमें एक तत्क्षण होता नहीं होती है फिर उसमें प्रवाह नहीं होता है उसमें बीच में मध्यस्थ बनकर बैठी होती है आधी चेतना जिसका नाम है विचार सहजता नहीं होती है फिर उसमें फिर हमारा पूरा जीवन ही कर्ता के माध्यम से ही कर्म करने में बीता है तो हमें लगता है कि अगर कर्म करेंगे तब होगा ना नहीं आत्मा अपने आपको आपके भीतर की सच्चाई ज्ञान बोध जो भी कह लो वह स्वयं ही
6:21 कर्म में परिणत हो जाता है बशर्ते काम आत्मा से करा जा रहा हो कर्म स्वयं हो जाता है सहजता इसी को बोलते हैं कर्म स्वयं हो गया मैंने करा नहीं लेकिन ऐसा सिर्फ तब हो सकता है जब कर्ता को आत्म ज्ञान हो करने वाला स्वयं को जान गया जानते ही वो मिट जाएगा वो मिट जाएगा आत्मा और कर्म में सीधा संबंध बैठ जाएगा कर्म हो गया सहज हो गया सहज ही हो गया ना चाहा ना योजना बनाई ना मांगा मजे की बात यह कि तय भी नहीं करा कि यही करना ठीक है थोड़ा सा अब आप चौक को तैयार हो जाइए सहज कर्म में विवेक की भी आवश्यकता नहीं पड़ती विवेक की आवश्यकता भी मात्र करता माने
7:08 अहंकार को है सहज कर्म का सौंदर्य यह कि उसमें विवेक भी नहीं चाहिए आत्मा क्या करेगी विवेक का भाई सहज कर्म कहां से आता है आत्मा से आत्मा विवेक का क्या करेगी आत्मा माने क्या शुद्ध चेतना आत्मा को शुद्ध अहंकार भी बोल सकते हो वो भी भी ठीक यह ना लगे कि आत्मा माने कोई चिड़िया वगैरह विशुद्ध चेतना बोध की गहराई जब शुद्धि हो ही गई तो अब क्या करोगे विवेक का विवेक तो तब चाहिए होता है जब अभी अशुद्धि का खतरा बचा हुआ हो अशुद्धि का खतरा ही मिट गया हमें विवेक की जरूरत है जो कुछ बोला उसका नतीजा यह नहीं होना चाहिए कि हम कहते
7:55 विवेक को कड़ दन में डाल दो हम आत्म लोग नहीं है भाई हम कैसे लोग हैं हम तो सब कर्ता भाव पर ही चलते हैं मारा अहम ही करता है उसी से सारे कर्म होते हैं हमारे हमारे सारे कर्म अहम की कामनाओं और डर से ही आते हैं जब आप कामना और डर को परे रखकर कुछ करने लग जाए तो थोड़ा इशारा मिलेगा कि शायद बात अब आत्मिक हुई अतः सहज हुई हमारा तो ऐसा नहीं है कभी बहुत बड़ी मोटी स्थूल कामना होती है कभी कोई छुपी हुई सूक्ष्म कामना होती है पर होती तो है तो हमारे सारे कर्म कहां से आते हैं आ हम से आते हैं तो हमें तो विवेक की जरूरत
8:41 है विवेक विचार यह हमें तो चाहिए बात समझ में आ रही तो मनुष्य की बड़ी से बड़ी समस्या कर्म की रही है मनुष्य के देखे हर आदमी परेशान है कि जो कहते ना ट र ने मूव टस र नेक्स्ट मूव तुम आगे करने क्या जा रहे हो कोई मिलता है जो पूछे तुम हो [संगीत] कौन कोई बहुत समझदार हुआ तो यह पूछ गा तुम हो कैसे तुम हो कैसे कैसे हो भाई यह तो फिर भी लोग पूछ लेते हैं कोई पूछता है तुम कौन हो आप किसी से मिले बहुत बर्सों बात उससे प्रश्न पूछोगे क्या कौन हो पूछोगे तो
9:27 नाराज होकर भाग जाएगा अग जब पहचानते नहीं तो मेल मुलाकात का क्या मतलब है जबकि यही एकमात्र सार्थक प्रश्न है तुम हो कौन क्योंकि जो तुम बने बैठे होगे उसी के अनुसार तुम्हारी सारी अंदरूनी और बाहरी स्थितियां होंगी तुम हो कौन पूछ लिया तो यह भी पता चल जाएगा कि वह दुख में है कि सुख में यह भी पता चल जाएगा कि उसके संबंधों की गुणवत्ता क्या है एक प्रश्न है एक ही बात है जो पूछे जाने लायक है तुम हो कौन और ये हम किसी कभी नहीं पूछते भाई तेरा क्या चल रहा है तू कहां रहता है क्या खाता पीता है नौकरी बता दे अपनी पैसे बता दे अपने इच्छाएं बता दे अपनी योजनाएं बता दे अपनी यह सब हम खूब पूछ लेते रिश्तेदार बता दे अपनी और बाल बच्चे कैसे
10:15 हैं हमें लगता है यह सब सवाल ज्यादा महत्व के और जिन्होंने जाना है जीवन को कहते हैं एक ही सवाल है तुम हो कौन पर सुनने में ही कितना अटपटा लग रहा है ना कोई है अपना प्यारा स्वजन मित्र उससे आप मिल रहे हो और पूछ रहे हो हां भाई तुम कौन हो व कहेगा बैठ जा आईम सीरियस तुम कौन हो दो तीन बार पूछेंगे व एकदम आग बबूला हो जाएगा थप्पड़ पपड़ मारेगा या अगर ज्यादा शिष्ट आदमी होगा तो कुछ नहीं करेगा कहेगा अरे कुछ काम याद आ गया थोड़ा निपटा के आता हूं चल देगा यही एक मात्र सवाल पूछने लगे क्या
11:03 तुम हो कौन और यह पूछ लिया तो सब पता तो चल गया उसके बारे में और अब कुछ जानना नहीं है यह प्राइमरी की है उसके डेटाबेस की एक यह बात उसकी पता चल जाए तो उसका सब कुछ पता चल गया कुंडली खुल गई पूरी जीवन खुल गया पूरा तुम हो कौन अब क्या पूछना कि तुमने कपड़े कहां से पहने जो तुम हो उसी के अनुसार तुमने कपड़े पहन रखे होंगे अब क्या पूछना कि तुम में करुणा कितनी है व जो बना बैठा उसी अनुसार उसमें करुणा होगी अब क्या पूछना कि तुम्हारी कामनाए क्या है वह जो बना बैठा उसी अनुसार उसकी कामनाए होंगी अब क्या पूछना और भाई घर गृहस्ती रिश्तेदारी अच्छी चल रही है जो बना बैठा होगा उसी के अनुसार उसके संबंध होंगे पूछना क्या
11:51 है जो एक बात पूछने लायक थी व पूछ ली और अब कुछ पूछने की जरूरत है नहीं और बाकी बातें ऐसी है कि उनको कितना भी पूछते रहो अगर केंद्रीय बात नहीं पूछी है तो बाकी बातें किसी लाभ की होती नहीं है और बाकी बातों में कपट भी करा जा सकता है कर्म तो कितने झूठ मूठ के हो सकते हैं ना दूसरों को दिखाने के लिए या स्वयं को ही मूर्ख बनाने के लिए हम कैसी तो कपटी हरकतें करते रहते हैं कई बार तो खुद नहीं पता चलता कि हम स्वयं से ही छल कर रहे हैं लेकिन कर्ता का मामला ऐसा है कि उसमें किसी को भी मूर्ख नहीं बनाया जा
12:37 सकता एक ही चीज है जानने लायक अहम की अभी स्थिति क्या है जीवन में इसके अलावा कोई प्रश्न विचारणीय नहीं अहम की अभी स्थिति क्या है यही है तुम हो कौन या मैं हूं कौन इसके अलावा कोई प्रश्न महत्व का नहीं है आप कहेंगे पर क्या यह महत्व का प्रश्न नहीं है कि मेरी नौकरी लगी कि नहीं लगी शायद है क्या मेरे पास पैसे कितने हैं यह बात जरूरी नहीं है शायद है मैं बीमार चल रहा था मेरे शरीर की दशा क्या है यह बात क्या केंद्रीय नहीं है शायद है इन सब बातों से बहुत-बहुत ज्यादा जरूरी कौन सी बात है तुम हो कौन बीमार
13:25 शरीर चल रहा है बीमार शरीर से आपका रिश्ता कैसा है यह बात निर्धारित होगी इससे कि तुम हो कौन शरीर बीमार चल रहा है एक बात है पर आप अगर शरीर बन गए कहा जाए तुम हो कौन मैं शरीर हूं तो शरीर थोड़ी बीमार चल रहा है आप बीमार चल रहे हो शरीर बीमार चल रहा है शरीर बीमार हो सकता है शरीर तो प्रकृति की कठपुतली है क्या पता कब बीमार पड़ जाए हमें किसी को पता है अभी हम सबका ही यहीं पर टेस्ट करा लिया जाए तो किसी ना किसी के कोई ना कोई छुपी बीमारी निकल आएगी कई लोगों के निकल सकती है किसी का यह है किसी का वह है अपनी पूरी देह का परीक्षण कराएं तो हो
14:13 नहीं सकता उसमें दो चार चीजें चौकाने वाली ना आए किसी कोलेस्ट्रॉल बढ़ा होगा किसी का कुछ घटा होगा किसी का यह है व दो चार चीज तो ऊपर नीचे आएंगी देह की बीमारी हम नहीं रोक सकते पर देह से हमारा रिश्ता तो हमारे हाथ में है ना तुम हो कौन अगर मैं देह हूं और देह बीमार है तो मैं क्या हो गया बीमार तो ज्यादा महत्त्वपूर्ण क्या बात थी कि आपकी बीमारी कैसी चल रही है सर या आप हो कौन बीमारी बहुत खराब चल रही होगी पर अगर मैं देह नहीं हूं तो मैं क्या हूं खराब मैं खराब नहीं हूं फिर पर बीमारी थोड़ी भी है और मैं देह हूं तो मैं भी क्या हो गया बीमार तो महत्त्वपूर्ण यह ज्यादा है कि देह कैसी है या महत्त्वपूर्ण यह ज्यादा है कि मैं कौन हूं
15:01 आ रही बात समझ और यह सवाल ना हमें प्राकृतिक तौर पर उठता है किसी जीव में नहीं उठता और ना हमारी शिक्षा परवरिश परिवेश संस्कार हमें प्रेरित करते हैं कि हम यह सवाल पूछे तुम हो कौन अभी क्या बनकर चल रहे हो क्या अपने आप को नाम दिया है क्या पहचान दी है पहली कक्षा से लेकर के पीएचडी तक कहीं
15:47 भी यह शिक्षा दी जाती है हम कोई मिलता भी है तो कैता अपना नाम बता दो पूछते हैं तुम्हारा नाम क्या है एकदम छोटे थे आप तब भी आपको कहा गया देखो यह तुम्हारा नाम है कोई पूछे तो बता देना और आपकी डॉक्टोरल थीसिस आती है उसमें भी आपका नाम ही लिखा होता है ऊपर सबसे ऊपर छपा होता है आपका नाम आपका नाम क्या है यह तो पूछ लिया जाता है आप है कौन यह कभी नहीं पूछा जाता तो इसलिए आज हमारी यह महा दुर्दशा है और इसलिए आज पृथ्वी महाविनाश पर खड़ी है
16:32 यह बड़ी बात है कि मेरा नाम क्या है जो कि बदली जा सकती है चीज या यह बड़ी बात है कि मैं हूं कौन जो मैं भीतर बना बैठा हूं और ठोस जम गया हूं नाम दो कौड़ी का है नाम में क्या है नाम तो कोई भी बदल देता है किसी को आपसे नफरत हो आपका नाम बदल देगा किसी को आपसे ममता आ जाए वह भी आपका नाम बदल देता है और फिर आपके नाम पर आपका कोई बहुत बस नहीं होता प्रकृति जैसी चीज है नाम बाहर से आती है और बाहर के ही आघा तों से बन बिगड़ जाती है पर आप कौन हो यह एकमात्र चीज है
17:18 जिस पर आपका अधिकार है तो वह मूल प्रश्न हमने ना कभी पूछा ना हमें पूछना सिखाया गया गलत बात हो गई वो एक मात्र चीज है जो हम सचमुच बदल सकते हैं जिसको लेकर हम सचमुच स्वाधीन है पर वो स्वाधीनता हमें कभी पढ़ाई नहीं गई तुम हो कौन क्या बने बैठे हो बाकी सब बातें आपको बता दी गई हां साहब अपना जेंडर बताइएगा अब भाई हम पुरुष हैं तो कोई हमने अर्जी थोड़ी डाली थी कि पुरुष पैदा हो ये क्या पूछ रहे हो हमसे बिना महत्व की बात दो कौड़ी की बात संयोग बात ना किसी ने पुरुष होना तय करा ना किसी ने महिला होना तय करा ना किसी ने अपने जींस
18:06 चुने ना किसी ने अपना कद चुना अपनी राष्ट्रीयता भी कहां चुनते हैं हम व तो संयोग की ही बात होती है आप भारत में थे यह भी संयोग की बात थी आप अमेरिका में हो यह भी तो संयोग की ही बात है लेकिन आपसे पूछा जाएगा जरा बता दीजिए अपनी आप नेशनलिटी तो आप वहां पर लिख दोगे मैं चीनी हूं रूसी हूं जो भी जैसे कि वो आपकी कोई आंतरिक बात हो कृष्ण कहते हैं ना पर धर्म से तो मौत भली है हम निधन श्रेय यही पर धर्म है संयोग से मिली हुई पहचान को आत्मा बना लेना ही पर धर्म है जो पहचान बस यूं ही मिल
18:55 गई उसको अपना केंद्र बना लेना ही पर धर्म है पराई चीज क्या है प्रकृति जो कुछ प्रकृति से प्रकृति माने समय समाज संयोग समय समाज संयोग से जो कुछ मिला उसको अपने जीवन का केंद्र बना लेना ही पर धर्म है पर धर्म भयावह होता है गीता कहती है कहते हैं और स्वधर्म की रक्षा में अगर मरना भी पड़े तो कोई बात नहीं स्वधर्म में निधन श्रेय यह सारी बातें कैसे एक तरफ अभिसार
19:43 हो जाती हैं यह दिखाई पड़ रहा है कर्म धर्म कर्तृत्व इनका कन्वर्जेंस समझ में आ रहा है अभिसरण आ रहा है समझ में एक लगता है बात यहां की एक बात यहां की एक बात यहां की एक बात यहां की और ये सारी बातें क्या करती हैं ऐसे जैसे वोह लेंस होता है ना कन्वर्जिंग लेंस ऐसे कर दो सूरज की सारी किरणें वो एक जगह पर केंद्रित फोकस कर देता है और फिर आपको बड़ा मजा आता कागज जलने लग गया ऐसे तो अध्यात्म के क्षेत्र में जितना भी है पूरी उसकी शब्दावली पूरी उसकी भाषा का कोश एनटायर गलसरी
20:29 वह आकर कहां बैठ जाती है बस इस एक बात में कि अहम की हालत क्या है और अहम की हालत को जो जान गया वह मुक्ति की तरफ बढ़ गया उसके बाद मुक्ति के लिए अलग से कोई श्रम या कर्म नहीं करना पड़ता ज्ञान से कर्म स्वतः स्फूर्त उद भूत होता है कर्म कोई विचार का प्रश्न नहीं है अध्यात्म में विचार का अर्थ होता है आत्म विचार यह विचार नहीं कि कि आगे करूं क्या और आम आदमी के लिए विचार की एक ही बात होती है कि भैया अब क्या करना है यह लोक भाषा है भैया अब क्या करना है और अध्यात्म में जब आप पढ़े कभी शब्द विचार तो उसका क्या अर्थ है कबीर साहब
21:16 बोलते हैं ना साधो करो विचार कभी कहते हैं प्राणी करो विचार तो क्या विचार करने को बोल रहे हैं कि भै आप करें क्या यह विचार नहीं कौन सा विचार आत्म विचार आत्म विचार माने यह मेरा चल क्या रहा है कहां से आट जाता है अभी कल मैं उधर जा रहा था इधर जा रहा हूं कौन है जो मेरी दिशाएं बदल देता है यह आत्म विचार है आ रही बात गहना कर्मणो गति कर्म की गति गहन है क्योंकि कर्म में कितने भी गहरे उतर जाओ गति ही गति मिलेगी बाबा ठहराव नहीं मिलेगा ठहराव तो कता में उतरने पर मिलता
22:04 है कर्म क्या महत्वहीन है नहीं कर्म महत्त्वपूर्ण है क्योंकि हमारी आंखें स्थूल कर्म को ज्यादा आसानी से देख सकती हैं तो कर्म का कर्म जो कि मजबूरी है सचमुच लेकिन उसका एक व्यवहारिक लाभ जरूर है क्या है व्यवहारिक लाभ उसका अवलोकन हो सकता है कर्म में स्थूल कर्म आ गया जो यह आपकी कर्मेंद्रियां करती हैं कर्म में वाणी आ गई जो आप बोला करते हैं यह भी कर्म है और कर्म में सूक्ष्म कर्म आ गया जो मन और ज्ञानेंद्रियां करते हैं इधर देख रहे थे और गर्दन मोड़ के इधर देखने लगे यह भी
22:51 कर्म है अब कुछ इससे बदल नहीं गया दुनिया में लेकिन ज्ञानेंद्रियां भी जो कर रही है व कर्म ही है कर्म सिर्फ यही नहीं है कि इसको उठा लिया यह तो है यह कर्म का स्थूल समम रूप है क्या मग उठा लिया इससे सूक्ष्म होता है वाणी क्या बोल दिया और इससे सूक्ष्म होता है क्या देखने लग गए क्या सुनने लग गए और उससे भी सूक्ष्म क्या होता है क्या सोचने लग गए यह सब कर्म ही है लेकिन आपका विचार भी कर्म ही है जिस किसी के भी केंद्र में कर्ता अभी बैठा हुआ है वह कर्म है और जब कर्ता नहीं बैठा है केंद्र में तो जो कर्म आता है विशेष कोटिका उसको कहते हैं निष्काम
23:36 कर्म जिसको हम आमतौर पर कर्म कहते हैं व मात्र सकाम होता है कर्ता जब भी कर्म करेगा वह सकाम कर्म होगा तो कर्म को देख कर के कामना पता चल जाती है और कामना का पता चलते ही जो कामना ग्रस्त है माने अहंकार उसका पता चल जाता है लो अपनी प खबर लग गई कर्म की ये उपयोगिता है फिर से बोल रहा हूं कर्म की उपयोगिता नहीं है कि कर्म कर कर के कहीं पहुंच जाओगे जान लगा दो प्राण भिड़ा दो कुछ हासिल कर लेना है कर्म की यह नहीं उपयोगिता है कर्म की क्या उपयोगिता है कर्म को देखोगे तो कामना दिख जाएगी कामना दिख गई तो जो कामी है वह दिख गया वो कामी हम ही है अपना पता चल जाता है अपने कर्म
24:21 को देख कर के जो बिल्कुल शुरुआती लोग हैं उनके लिए कौन सा कर्म देखना आसान रहेगा ठीक है कितने बजे सोए थे क्या खा रहे हो किससे मिलजुल रहे हो ठीक है कहां नौकरी करने पहुंच गए फिर थोड़ा जब आगे बढ़ते हो तो फिर यह किन शब्दों का चयन कर रहे हो यह भाषा कैसी है तुम्हारी एक ही शब्द के 18 समानार्थी थे तुमने यही शब्द क्यों चुना यह कोई छोटी बात नहीं है आप किसी शब्द का और शैली का क्यों चयन करते हो इससे आपका सब कुछ पता चल जाता
25:09 है जो अपनी भाषा पर गौर करने लगा जो अपने शब्द दूसरों को सुनाने के साथ-साथ स्वयं भी सुनने लग गया वह अपने बारे में बहुत कुछ जान जाएगा आमतौर पर हम बोलते हैं दूसरों को सुनाने के लिए असली वक्ता वह है जो स्वयं को ही सुनने लग जाए सुनो तुम क्या बोल रहे हो सुनो और अगर आप खुद को सुनना बर्दाश्त नहीं कर सकते तो यह उम्मीद क्यों कि दूसरे सुनेंगे आपको खुद को सुनना झंझट की बात होती है ना उसके बाद मुखर होकर के बोल नहीं पाएंगे यह
25:55 क्या सुन लिया और जब और थोड़ा आगे बढ़ने लगो तो अपने विचारों को और भावनाओं को देखना शुरू करो ठीक है वास्तव में भाव को देखना विचार को देखने से भी ज्यादा कठिन और सूक्ष्म बात होती है क्योंकि विचार तो भाव का अनुगामी होता है भाव पहले आता है माने वृत्ति वो पहले आती है विचार उसके पीछे पीछे आ जाता है वृत्ति को तर्क का कवच देने के लिए नहीं तो वृत्ति देखो अकारण होती है वृत्ति के पीछे बस एक ही कारण होता है
26:41 मम्मी प्रकृति कोई पूछे वृत्ति का कारण क्या है कुछ नहीं कारण है वृत्ति का कारण बस यही है कि तुम हो मैं ही वृत्ति का कारण है तो मैं को फिर मूल वृत्ति भी बोलते हैं अहम वृत्ति वो मूल वृत्ति है तो वृत्ति का कोई कारण होता लेकिन विचार का कारण होता है विचार का कारण वृत्ति होती है आप क्या सोचते हो कि आपका विचार मौलिक होता है नहीं विचार मौलिक नहीं होता आपको भूख लग रही है या आपको कोई पसंद नहीं है तो आगे क्या करना इस बारे में विचार आ जाएंगे पहले क्या चीज आई भूख और ना पसंदगी या विचार पर हम वृत्ति को लेकर बेखबर रहते
27:28 हैं तो हमें लगता है मैंने विचार किया नहीं आपने विचार नहीं करा वृत्ति उठी और उसने आपसे विचार करवा दिया विचार में कोई दम नहीं है जब कोई बोला आई वाज थिंकिंग इसका मतलब यह है कि वो थिंकिंग से पहले कुछ हो चुका है उसके भीतर जिसके फल स्वरूप अब वो विचार कर रहा है थिंक कर रहा है ऐसे ही कोई थॉट नहीं आ जाता उस थॉट के पीछे एक टेंडेंसी होती है हम वह खाना रखा है मुझे भूख लगी है अब मैं विचार करूंगा कि क्या बहाना बनाऊं कि मैं वहां जाकर उसको उठा लू वहां वह लड़की बैठी हुई है मैं पुरुष हूं वृत्ति उठ रही है भीतर से वही आदिम
28:14 पुरानी प्राकृतिक तो विचार आ जाएगा कि इससे किस प्रकार बात शुरू करनी है विचार आ गया व विचार थोड़ी शुरुआत है शुरुआती चीज वो विचार नहीं है ना शुरुआती चीज क्या है हां वो पुरुष की उस पुरुष की वृत्ति के पीछे भी माता जी वाली वृत्ति बैठी है जो कह रही है कि बने रहो बने रहो मैं कायम रहे मैं कायम रहे उसके लिए देह कायम रहे और देह किसकी मिली है पुरुष की पुरुष की देह कायम इसके लिए स्त्री की देह आवश्यक है व दिख गई स्त्री की देह तो बहुत हो सकता है आप एक स्मार्ट थिंकर हो और बहुत आप तर्कपूर्ण तरीके से जाकर बात कर ले लेकिन आपने कितनी भी कुशलता से कितने भी तर्क से बात करी हो
28:59 बात यह है कि आपने बात तो वृत्ति से ही करी है बस वो वृत्ति दिखाई नहीं पड़ती क्योंकि अतिशय सूक्ष्म होती है विचार भी नहीं दिखाई पड़ता हमने कहा शुरुआती चीज तो यही है कि यही देख लो कि हाथ पांव किधर को चला रहे हो उतना भी देख लो तो अच्छी शुरुआत हो जाती है क्या पकड़ने को दौड़ रहे हो कहां पाए जाते हो कहां जमे रहते हो कहां अड्डा लगाते हो यह बातें भी देख लो तो अपने बारे में बहुत कुछ पता चल जाता है बात आ रही समझ में गहना कर्मणो गते कर्म में कितना भी घुसते जाओ जब तक कर्ता तक नहीं पहुंचते कर्म का मुद्दा ही व्यर्थ जाना है इसने ऐसा करा
29:47 उसने ऐसा करा सब बात गोल गोल घूम जाएगी कहीं पहुंच नहीं पाएगी अगर देख ही रहे हो कि किसने क्या करा तो यह देखो कि जिसने जो करा उसके पीछे करने वाला कौन है करने वाला कौन है इतना कह देने से बात नहीं बनता देखिए अध्यात्म रहस्य का क्षेत्र नहीं है कि जितनी भी बड़ी-बड़ी बातें अरे उन्हें जान कौन सकता है हमने कहा ना दो तरह की गलतियां होती हैं एक तो गलती यह होती है कि हम अंधविश्वास में रह जाते हैं और जो बातें जानी जा सकती है उनको भी नहीं जानते क्या बोल कर के कि अरे यह बात तो मनुष्य की सोच और पहुंच के बाहर की है और दूसरी बात यह होती है कि जो सचमुच सोच के
30:33 बाहर का होना चाहिए उसको लेकर हम किस्से और कथाएं बना लेते हैं तो यह बात कि कर्म का क्या पता कौन क्या कर रहा है क्यों कर रहा है यह बात पहले किस्म की गलती हो गई हमें यह कह के नहीं रह जाना है कि अरे श्री कृष्ण बोल गए गहना कर्मण गति तो अरे कर्म का किसको क्या पता नहीं इसका अर्थ यह है कि कर्म में कितना भी तुम अनुसंधान कर लो अगर वह तुम्हें कर्ता तक नहीं पहुंचा रहा तो तुम्हारा सारा अनुसंधान अंधा है कर्म उपयोगी है किस दृष्टि से इस दृष्टि से नहीं कि कर कर के कुछ पा लोगे कर करके कोई कुछ नहीं पा
31:19 लेता अध्यात्म में वेदांत में करा नहीं जाता ठहरा जाता है करने से ठहरा जाता है कर तो सभी रहे ठहरा जाता और ठहरा कैसे जाता है ब्रेक लगा के नहीं जान के जो हो रहा है उसको ही जान लो जो हो रहा है वह अक्सर ठहर जाता है य गजब चीज है विधांत कहता है पहली बात तो कुछ तुम्हें समाधान नहीं चाहिए तुम समस्या को ही ठीक से पता कर लो और फिर कहता है समस्या तुम्हें ठीक से पता चलेगी नहीं
32:05 जब तक उसे समस्या बोल रहे हो तो उसे स्थिति बोलो बस बहुत दूर है वेदांत आम आदमी की सोच से आम आदमी समाधान की तलाश में जीता है मैं क्या करूं समाधान इसी भाषा में मांगते हैं ना मैं क्या करूं विधांत कहता है समाधान नहीं समस्या और समस्या नहीं स्थिति समाधान नहीं समस्या समस्या है तभी तो समाधान के लिए रो रहे पहले समस्या तो बताओ और समस्या पता ही नहीं मांगने क्या निकले समाधान बेकार की बात मत करो यह बताओ पहले साफसाफ कि तकलीफ क्या है समस्या क्या है और जब कोई समस्या जानने निकलेगा तो उससे क्या कहा जाएगा जब तक इसको समस्या मान रहे हो तब तक निष्पक्ष होक के इसको देख ही नहीं पाओगे तो जरा सा
32:52 पीछे हट जाओ अनासक्त होकर के समस्या को देखना समस्या को सिर्फ एक स्थिति बना देता है अब जाना जा सकता है जब तक कोई भी स्थिति आपके लिए समस्या है उसको जान पाना असंभव रहेगा क्योंकि समस्या शब्द के साथ कामना जुड़ी हुई है जब काम भरा हो आंख में तब सच नजर नहीं आता है आग दह के पर धुए से प्रकाश ढक सा जाता है समस्या के साथ कामना जुड़ी हुई है ना मेरी कामना है मुझे यह पीना है खुल नहीं रहा अब समस्या हो गई कामना ना हो तो समस्या हो सकती
33:39 है कामना ना हो तो समस्या हो सकती है पर क्या हमने कभी यह सोचा कि हमारे जीवन में जो इतनी समस्याए है दर्जनों उनके पीछे कामना क्या है हम तो पहला कदम ही नहीं लेते हमें बस समस्या पता चलती है समस्या किस कामना से उठ रही है नहीं पता चलता और कामना ना हो तो समस्या हो नहीं सकती बात यह नहीं है कि हमें कामना से परहेज करना है बात यह है कि कामना के द्वारा जो हम पाना चाहते हैं वह कामना से कभी हासिल हो नहीं सकता कामना पूरी हो जाती है हम कभी पूरे नहीं होते कितनी ही तो आपकी कामनाएं हैं जो पूरी हो चुकी उससे आप पूरे हुए क्या तो कामना निष्प्रभावी होती है
34:28 कामना का प्रभाव अधिक से अधिक सीमित होता है इनफेक्टिव होती है कामना अहम कामना करता है स्वयं को पूर्णता देने के लिए लेकिन कोई भी कामना हो वह खुद पूरी हो सकती है आपको पूरापलका को नहीं सुलझाओ पहली बात तो समस्या सुलझे कीी कि नहीं सुलझे कीी ये बात काफी हद तक संयोग होती है दूसरी बात समस्या सुलझ भी गई तो इससे आशय बस यही है ना कि कामना पूरी हो गई जब आप बोलते हो कि फलानी समस्या थी मेरी वो सुलझ गई है तो यही कहना चाह रहे हो ना कि कामना पूरी हो गई कामना हो भी गई पूरी तुम्हें क्या
35:15 मिला अभ ये मुझे क्या मिला यह जानने के लिए भी पहले पता होना चाहिए कि मैं कौन हूं तब दिखाई देगा ना कामना का गुलाम था मैं कामना मालकिन थी मालकिन को हो सकता है कुछ मिल गया हो मैं तो नौकर में भूखा का भूखा ही रह गया कामना पूरी हो गई मैं भूखा रह गया गलत हो गया चलिए अब थोड़ा सा पीछे जाकर के जो पिछली बार बात करी थी उसको दोहराते हैं और उसमें से आज के विमर्श के प्रकाश में एक नया मुद्दा निकलेगा आप बताएंगे ठीक है जब चेतना एकदम शून्य हो उस स्थिति को क्या
36:01 बोलते हैं खोल लीजिए पुराने नोट्स हो तो उनको स्थिति जड़ता की है और जड़ता में क्या होता है अकर्म होता है ठीक है अकर्म में अहंकार की क्या स्थिति होती है अनु अनुपस्थित होता है अहंकार का क्या काम होता है करना या दावा करना फिर बताइए अहंकार करता है या दावा करता है दावा तो अकर्म का मतलब यह है कि अहंकार ने किया नहीं या यह कि दावा किया नहीं क्योंकि अगर यह कह दोगे ना कि अकर्म
36:47 तब है जब अहंकार नहीं करता तो कहोगे कि कर्म माने जब अहंकार सच तो यह बात है जो कि अगले श्लोक में कहेंगे 18वें श्लोक में कहेंगे कृष्ण आगे अगले सत्र में होगा कि जहां तुम नहीं करते बेटा वहां तो तुम नहीं करते जहां तुम्हें लग रहा है कि तुम करते हो तुम वहां भी नहीं करते तो इसलिए यह बात याद रखनी बहुत जरूरी है अकर्म की परिभाषा यह नहीं है कि उसे अहम ने किया नहीं अकर्म की परिभाषा यह है कि इतनी कुंजा इतनी राहत छोड़ दी अहंकार ने कि वह वहां पहुंच कर के नहीं ठोक रहा वो अकर्म है अकर्म के उदाहरण
37:34 दीजिए जब भी कुछ ऐसा हो रहा है जिसमें अहम मर्सी फुली कृपा करके मौजूद नहीं है दावा करने को तो उसको हम अकर्म बोल देते हैं उसमें जो बाहर की दुनिया में घटनाएं घट रही है वह तो ठीक ही है शरीर की भी बहुत सारी घटनाए जिनमें कोई भी तर्क लगा कर के कोई भी बहाना लगा कर के अहंकार करता का श्रेय नहीं ले सकता उसे अकर्म बोलते हैं सोते समय सपना आ रहा है यह अकर्म है यह अकर्म सोते समय सांस चल रही है यह अकर्म है आप यहां बैठे हुए हैं आप नहा के आए थे
38:19 आप सुन रहे हो बाल अपने आप धीरे-धीरे सूख रहे हैं य कर्म ठीक है आपको पता भी नहीं है बाल सूख रहे ना आप ये कहोगे कि आप यहां बाल सुखाने को बैठे हो कितने लोग हैं जो बाल सुखाने आया करते हैं जब बाल तो सूख रहे होंगे बाल तो सूख रहे होंगे ना बालों का काम है सूखना कितने लोग है जो यहां आते हैं खाना पचाने के लिए पर अगर अभी आपने खाना खाया है तो आप बैठे हो खाना तो पच रहा होगा आपने इतनी दया दिखा दी कि आपने दावा नहीं करा कि मैं बैठ के खाना पचा रहा हूं अभी तो वो अकर्म है ठीक है जड़ता की स्थिति चेतना व है नहीं उसके ऊपर क्या आता है सब विकर्म क्या होता है तामसिक
39:08 कर्म तामसिक कर्म माने चेतना अपनी सबसे क्षीण हालत में है दुर्बल हालत में है वह इतनी क्षीण है कि उसे अपने कष्ट का भी पता बल्कि उसे कष्ट कब हो जाता है जब उसे जगाने जाओ उसे जगाने जाओ तो वह प्रतिक्रिया करेगी यह विकर्म है चेतना की तामसिक अवस्था या अहम की तामसिक अवस्था उसके ऊपर क्या था राजसिक क्या होता है तो
39:55 फिर जितना भी सात्विक कर्म होता है वो निष्काम होता होगा अरे क्या उल्टा पुल्टा बोल रहे हैं आप नहीं सतोगुण तो सबसे ऊंचा होता है ना तो उसी में होता होगा निष्काम कर्म अरे सबसे ऊंचा सतोगुण नहीं होता नहीं होता माने सतोगुण में भी कामना होती है देखा अभी मना कर दिया नहीं होती है सतोगुण कोई बोलोगे कि तू भी कामी है नहीं बोल पाओगे ना देखा नहीं बोल पाएंगे ना देखा जबरदस्ती आप ही समझदार बनते रहते हो
40:43 सतोगुण में कामना नहीं होती ना लेकिन बोल नहीं सकते क्यों नहीं बोल सकते ज्ञानी है श्रप दे देगा क्या समस्या आ गई सतोगुण में कौन सी कामना होती है वो क्या इकट्ठा करता रहता है और वह ज्ञान क्या ऐसा होता है कि उसको खत्म करे मिटाए वह ज्ञान बस वह संदूक में भर के रखता है और ज्ञानी बन जाता है पहचान मिटाता नहीं एक और दंभ पूर्ण पहचान बना लेता है दुनिया की सबसे ऊंची पहचान कहता तुम राजा हो गए तो हो गए हम क्या है हम ज्ञानी है स गुण में यह आखिरी बंधन शेष रह
41:29 जाता है सतोगुण का बंधन ज्ञान स्वयं है ज्ञान महा बंधन है शिव सूत्र याद है पहला ही सूत्र क्या है उसमें ज्ञान बंधन है वहां इसी की बात हो रही है रजोगुण का बंधन क्या है वो क्या भोगता है वो इंद्रियों से भोगता है हा तो मैं मेहनत कर रहा हूं मेहनत कर रहा हूं क्यों साहब क्यों मेहनत कर र पैसा जमा कर रहा हूं क्या करोगे घर खरीदूंगा और क्या करोगे यूरोप घूमने जाऊंगा महीने भर को यह इंद्रिय भोग है तो यह भी राजसिक है वह भी राजसिक है यह भी माने जो यहां से भोग रहा है व भी राजसिक है जो
42:15 यहां से भोग रहा है वह भी जो यहां से भोग रहा है वह भी और निष्काम कौन होता है गुनातीत माने किसके अतीत तीनों गु के प्रकृति मात्र के अतीत प्रकृति मात्र के अतीत अविद्या से मुक्त विद्या से ठीक अहम किसके क्षेत्र का है आत्मा के या प्रकृति के तो गुनातीत होने का मतलब अभी सवाल है मेरा गुनातीत मने का मतलब हु प्रकृति की अतीत चला गया अतीत जाना माने आगे चले जाना उल्लंघन कर जाना यह है प्रकृति का क्षेत्र
43:00 ये मेज यह सतह टुप निकल गया अहम भी कहां था यही डोलता रहता है कभी जाके इससे रिश्ता बनाता है कभी इससे कभी पासा से एक रिश्ता बनाता है जो कुछ भी करता है हम करता तो यहीं पे है ना यह क्या है यह मम्मी का गार्डन है प्रकृति और वो बबुआ यहीं पे इधर-उधर कहीं डोलता रहता है कभी इस झूले पर बैठा कभी उस डाल पर कूदा कभी सेब खा लिया हां कभी लौट गया कभी यही सब उसका काम है लेकिन व जितना भी काम करता है यही करता है और उसके कामों के सारे विषय भी कहां होते हैं यही यही य य यह विषय पकड़ा व विषय अब उधर भग गया अगर गुनातीत निकल गए तो अ तो सिर्फ यही हो सकता है उधर अ हम तो है नहीं हम कह
43:46 रहे निष्काम कर्म गुणा तीत के साथ है यही बोला आपने अभी तो करा किसने वो फिर हम तो यहां था सवाल समझ में आया कि नहीं यह प्रकृति का क्षेत्र है करने वाला यही था करने वाला यहां था निष्काम कर्म गुनातीत होता है माने इससे तो उधर निकल गए तो उधर करने वाला तो कोई है ही नहीं तो यह निष्काम कर्म करा किसने हां
44:37 हम कोई उससे पूछे वो कहां से आया तो उसका जवाब वैसे तो देना नहीं चाहिए पर देना हो तो कहिए जहां से आत्मा आई वहीं से आया इसीलिए उसे बोलते हैं सहज सह माने साथ जहां से आत्मा आती है वहीं से मेरा कर्म आता है अगर आत्मा का कोई कारण या स्रोत हो तो मेरे कर्म का भी स्रोत वही है आत्मा कोई स्रोत है उसको क्या बोलते हैं जात बोलते हैं उसको अज है ना वो अजात तो जैसे आत्मा अजात है मेरा कर्म सहज
45:24 है तो मेरा कर्म भी क्या हो गया आजा तो अज को ही सहज बोलते हैं अज ही सहज है जिसका कोई कारण बताया नहीं जा सकता वही सहज कर्म है वही निष्काम कर्म है सारी बातें एक हो जानी है अलग-अलग दिशाओं से पकड़ो कहीं से पकड़ो बात सब एक जिसका कोई कारण नहीं हो सकता कार्य कारण सब किस क्षेत्र में होते हैं प्रकृति के क्षेत्र में होते हैं कर्म करता सब किस क्षेत्र में होते हैं तो जिसका कोई कारण हो नहीं सकता जो प्रकृति से बाहर का है उसी को सहज कर्म या निष्काम कर्म कहते हैं आपके कामों के पीछे अगर कारण है तो आपके कामों के पीछे कामना है कामना ही कारण होती है ये लिख
46:09 लीजिए और अगर कामना है कारण है तो निष्काम कहां से हो गए भाई ये हो सकते हो काम होते हुए भी निष्काम हो जाओगे तो जहां कारण है वहां कामना है जहां कामना है वहां कारण है यह पूरी दुनिया कार्य कारण पर चल रही है माने इस पूरी दुनिया का धन और इंजन कामना है और जहां कामना है वह नरक है इसलिए नहीं कि कामना में कोई बुराई है इसलिए क्योंकि कामना आती है आत्म अज्ञान से नरक कामना में नहीं है नरक अज्ञान में है अगर आपकी कामना ज्ञान से आ सके तो मजा आ जाए लेकिन ज्ञान से जो कामना आती है उसी को निष्काम बोलते हैं जो है नहीं उसकी कामना को निष्काम
46:55 बोलते हैं जब कामना तो हो कामना करने वाला कोई ना हो उसको निष्काम बोलते हैं जब कामना करी जाए पर अपने लिए ना करी जाए उसको निष्काम बोलते हैं लो निष्कर्ष आ गया खत्म बात कामना है पर किसके लिए इधर कोई है ही नहीं इधर कोई है ही नहीं खाना मंगाया है वो आ गया डिलीवरी देने और खाने वाला कोई नहीं है तो क्या होगा उस खाने का शायद बटेगा क्योंकि जिस घर में मंगाया गया है वहां तो खाने वाला कोई है ही
47:41 नहीं यह कामना निष्काम है हो सकता है खाना ट्रक भर के आया हो लोग कहेंगे बड़ा पेटू आदमी बैठा बहुत खाएगा वहां जाकर खोजा तलाशा सन्नाटा कोई है ही नहीं वहां य बा ऐसे अजूबे को निष्काम ना बोलते और दूसरी और मूंगफली के दो दाने आए हैं सिर्फ दो दाने मूंगफली के आए हैं और खाने के लिए एक बैठा है लार बहाता पर यह दो दाने भी कामना के दाने हैं
48:27 खाने से भरा हुआ एक ट्रक भी निष्काम हो सकता है और दो दाने मूंगफली के भी कामना के बीज हो सकते हैं बात इसकी नहीं है कि वहां दरवाजे के बाहर कौन है या दरवाजे के बाहर कितना है बात इसकी है कि दरवाजे के भीतर कोई है कि नहीं जिंदगी ऐसी ही जियो दरवाजे के बाहर प्रकृति का पूरा खेल चलता रहे भीतर मात्र शून्यता यहां कोई नहीं है बाबा यहां कोई नहीं है हम तब तक देखो अपने आप को जब तक दिखने वाला देखने वाला दोनों समाप्त ना
49:13 हो जाए उब जाओ बोलो कितना देखें देखने के लिए अंदर कोई है ही नहीं जब देखने के लिए अंदर कोई नहीं तो जो देख रहा होता है वो भी ऊप के भग जाता है अब ना कुछ दिखने की जो वस्तु है भीतर और ना कोई देखने के लिए उपस्थित है देखने वाला भी क्या करेगा वो बेरोजगार हो गया भीतर कुछ है ही नहीं देखने को झांके पड़ा इधर कुछ दिखे अहंकार इधर कहीं छुपा होगा कुछ तो कर रहा होगा कैसे तलाशते हैं उसको कामना को तलाश के हां साहब कोई इच्छा ख्वाहिश बची है देखो दे
49:58 इच्छाओं से भी नहीं तलाशा जाता भोग की इच्छा इच्छा तो यह हो सकती है कि वहां बाहर आए दो टन रसद खाने पीने की भोग की इच्छा है कि नहीं भोक्ता भाव की अनुपस्थिति ही अहंकार की अनुपस्थिति है भोगने के लिए यहां भीतर कोई नहीं है हां खाना मंगाने के लिए शायद कोई था ऑर्डर देने वाला तो कोई था पर उस ऑर्डर को खाने वाला कोई नहीं है यह निष्काम है जगत से हमारा रिश्ता तो है पर खाने और
50:45 भोगने का नहीं यह निष्काम है गाड़ी मस्त चल रही है चलाने वाला कोई नहीं चलाने वाले की पहचान क्या होती है इससे के अंदर कोई बैठा है कि नहीं इससे कि अगर कोई बैठा भी है तो उसमें मंजिल को भोगने की चाहत है या नहीं है बात आ रही है समझ में आत्मज्ञान की निष्पत्ति होती है यह जानने में कि यह सब कुछ जो मुझे चाहिए मुझे नहीं
51:34 चाहिए मेरी संरचना का खेल है मेरी इच्छाएं और मेरी संरचना में वह वातावरण भी आ जाता है जो मुझे संरक्षित करता है संरचना वातावरण सेही आई है ना वातावरण कोई आपको एक बार थोड़ी बना देता वातावरण आपको बनाता रहता है हम लगातार बनने की प्रक्रिया में होते हैं हम एक वर्क इन प्रोसेस है ऐसा नहीं कि आप बन गए हो आपको आपका माहौल लगातार बना रहा है तो जब हम कहे मैं मेरी इच्छा तो उसमें आपका शरीर
52:19 आपका तन मन और आपका वातावरण सब आ जाते हैं सारी इच्छाएं इन्हीं से आती है वातावरण और तन मन वातावरण तन मन तन मन भी क्यों कह रहा हूं तन कहना काफी है सूक्ष्म हो जाता है तन तो हम कहने लग देते हैं मन वरना मन कुछ नहीं होता मन हमें ऐसा लगता है जैसे कोई कहीं छुपा हुआ कोई संसार है संसार के विषयों को ही तो मन बोलते हैं अहम संसार के जिन विषयों से रिश्ता बना लेता है उनको ही तो मन बोलते हैं ना तो सूक्ष्म क्या है उसमें फिर तन ही मन है तन माने जो स्थूल है जिन जिन स्थूल बातों से
53:05 आपने रिश्ता बना लिया वह मन कहला जाती है तो उसको सूक्ष्म भी काहे को बोले हालांकि पारंपरिक तौर पर मन को सूक्ष्म बोला गया है पर उसकी सूक्ष्मता बस इस अर्थ में है कि व दिखाई नहीं देता आंखों से मन दिखाई नहीं देता इतनी ही सूक्ष्मता है वरना अगर सोचो कि मन में विषय क्या है तो सारे स्थूल विषय हैं तो मन भी तन ही है स्थूल मेरी सारी इच्छाएं तन की और वातावरण की है अब मूर्खता लगती है इन इच्छाओं का पीछा करना
53:53 भग नहीं होता फिर चाहो तो भी नहीं होता होता चाहो तो भी नहीं होगा अच्छा एक बात बताइए चलिए आपके सामने एक स्थिति रख रहा हूं आंसू आपकी कमजोरी है किसी के आंसू देख के आप पिघल जाते हो ठीक आंसू आपकी कमजोरी है किसी के आंसू देखकर आप पिघल जाते हो आप किसी से मिलने गए उसने रोना शुरू कर दिया आप पिघलने लगे उधर उसके आंसू गिरे इधर आप पिघल पिघल के गिरे तभी कोई आता है आपसे बोलता है इधर
54:40 आना कुछ है उसका नाम मान लो उसका कुछ नाम है ऋषि बोलता एक बात बताए वो जो रो रहा है ना उसे लाखों साल से पता था तुम्हारे बारे में वो तुम्हें तुमसे ज्यादा अच्छे तर कैसे जानता है और उसको पता है कि तुम्हारी कमजोरी है आंसू तुम्हारी पूरी जांच पड़ताल शोध रिसर्च करके उसने पता लगाया है कि तुम्हारी कमजोरी है आंसू और यह सब पता लगाने के बाद बड़े सुनियोजित ढंग से अब वह रो रहा है तुम्हारे आगे व आपको बता दे अब आप फिर गए हो रोए जा रहा है आपके पिघलने का क्या होगा अब पिघल ग
55:26 अब पिलो ग क्या यह आत्मज्ञान है आत्मज्ञान के बाद जो हो रहा होता है वह होना बंद हो जाता है हो तो वही रहा है लेकिन आप जान गए हो कि वह जो हो रहा है वह क्या है अब आप पर उसका प्रभाव नहीं होगा अब आपका जो पिघलना है वह प्रतिक्रिया स्वरूप उठेगा ही नहीं समझ में आ रही बात यह आत्मज्ञान है यहां हमने दो लोगों का उदाहरण लिया आत्मज्ञान में जो दूसरा व्यक्ति है वह हमारे ही भीतर का छुपा रूप है वह हमारे साथ खेल खेलता है यहां वह रो रहा था वह आंसू बहा रहा था हमारे भीतर वाला हार्मोन बहाता
56:13 है हमने अभी उदाहरण में लिया कि सामने वाला आंसू बहा रहा था और असली जिंदगी में जो भीतर वाला है व आंसू नहीं बहाता वो क्या बहाता है हार्मोन वहां उसने आंसू बहा हम पिघल गए थे और जिंदगी में जब वह भीतर से हार्मोन बहाता है तो हम पिघल जाते हैं लेकिन अगर आप जान जाओ कि यह तो आपको फसाने की साजिश ही करी जा रही है हार्मोन बहा बहा के तो आप पिघल क्या जैसे आप जान गए थे किय आंसू बहा कर के साजिश करी जा रही है आपको पिघलाने की वैसे ही आप जान जाओ कि आपके भीतर भी एक बैठा हुआ है आपका ही हमशक्ल आपके ही नाम वाला लेकिन वो साजिश कर बहुत खेलता है आपके साथ तो वो हार्मोन बहा ही इसी ले रहा है कि आप पिघल जाओ अब आप पिघल ग हो सकता
57:00 है अभी पिघल जाओ पर पिघलने की तीव्रता कम हो जाएगी कम होगी कि नहीं होगी अब चाहोगे पीपी पिघलना तो याद आएगा ये मेरे साथ खेल खेला जा रहा है यह हार्मोन बहाए जा रहे हैं जानबूझ के बहाए जा रहे हैं यह हार्मोन में 6 साल का था तब क्यों नहीं बहाए गए ऐसा क्यों हुआ मान लीजिए मैं सेक्स हार्मोन की बात करूं ऐसा क्यों हुआ कि जब मैं 15 का हुआ तभी इनका बहना शुरू हुआ ये जानबूझ के कुछ करा जा रहा है मेरे साथ यह मुझे फसाया जा रहा है अब आप नहीं पिग होगे अब जो प्रक्रिया है भीतर वो चलती रहेगी आप पिघल नहीं और जब कोई आंसू बहार हो आपके सामने आप पिघल नहीं तो वह क्या करता है फिर वह दो काम करता है या तो उग्र हो जाता है और और जोर से बहाता है क्रोधित हो
57:48 जाएगा गाली गलौज करेगा कहेगा कैसे तुम पत्थर दिल आदमी हो हम रो रहे हैं तुम या ऊब करके भग जाएगा देगा आंसू बहाने से कुछ होता तो है नहीं तो भग लेते हैं तो कहता है इनके यहां बेकार है रोना इनके सामने छोड़ो जो भीतर बैठा है उसका भी यही होता है उसकी सब प्रक्रियाओं पर और चेष्टा उं पर आप प्रतिक्रिया करना छोड़ दे तो वह जो कुछ कर रहा होता है वह होना भी मंद शिथिल पड़ जाता है ठीक वैसे जैसे कोई आपके सामने रो रहा हो और आप उसके रोने पर ध्यान दे देना बंद कर दे तो उसका रोना भी क्या होता है प्रकृति यह सब सिखा के भेजती है छोटे
58:33 बच्चे होते हैं दो साल के एक साल के उनको सब पता होता है आप काम करती होंगी कहीं आप घर आ जाए बच्चा ज्यादा रोता है आपको लगता है अ दिन भर रो रहा था घर में बेचारी जो मेड होगी आप उसको डांट लगा देंगी वो कहेगी सची बताती हूं 10 घंटे आप बाहर थी 10 घंटे में इसने एक बार कोई भी नहीं करा और आपका मुंह देखा नहीं कि पाए पाई इसने रोना शुरू कर दिया वह आंसू भी तभी बहाता है जब उसको पता है कि सामने वाला पिघले उसका आंसू बहाना बे मकसद नहीं है वह चाल है वह चाल छ महीने का बच्चा भी जानता है डांट बेचारी आया को पड़ जाती
59:20 है और रो ही नहीं रहा था दिन भर उने कहा आ गई यही बच्चे जब बड़े हो जाते तब भी चालाकियां भूलते कहां है कहां भूलते हैं यही तो हम करते हैं जिसको प्रभावित करना तो उसके सामने हम बहना शुरू कर देते हैं आप कहे नहीं जानबूझ के नहीं करते तो हो जाता है वह तुम्हें पता नहीं है कि क्यों हो रहा है वह तुम्हें पता नहीं है कि तुमने जानबूझ के ही करा है लेकिन सिर्फ इसलिए कि तुम्हें पता नहीं है कि तुमने जानबूझ के करा है इससे यह नहीं सिद्ध हो जाता कि तुमने नहीं करा है करा तुही ने और है उसके पीछे प्रयोजन भले ही तुम स्वयं उस प्रयोजन से अनभिज्ञ हो क देखा आप बहुत तनाव में थे और तभी कोई
1:00:07 तथाकथित अपना मिल गया और कैसे फूट पड़ते उसके आगे हु है पूरा दिन तनाव में बीता बीता ऐसा वैसा वैसा कोई अपना मिल गया हॉस्टल में थे रैगिंग का समय था मना करा गया था मां बाप वगैरह को मत आना इन दिनों हॉस्टल वैसे वो लड़का अपना घूम रहा होगा इधर उधर मस्त खुद कूद कूद के कह रहा होगा मेरी रैगिंग करो ये करो अब मां-बाप आए नहीं कि वो फूट पड़ता था होता है कि नहीं होता है वैसे सब ठीक था किसी स्वजन को देखा और बहने लगे क्योंकि पता है कि प्रतिक्रिया मिलेगी आत्मज्ञान का अर्थ होता है
1:00:52 प्रतिक्रिया मकता का अभाव नाउ आई एम न मोर रिएक्टिव आई कैन नॉट रिएक्ट मुझे पता चल गया यह खेल क्या है मैं प्रतिक्रिया दूं कैसे मैं चाहूं तो भी नहीं हो रहा सोचो किसी का आपके सामने भांडा फूट गया भेद खुल गया आप जान गए हो कि वह जान के रोता है और उसके बाद वो रो रहा है हा हा हा घड़ो पानी बहा रहा है आप उसको कैसे देखोगे कैसे देखोगे चाहोगे तो भी भीतर से कोई संवेदना उठेगी क्या बल्कि और गौर से देखोगे उसको कि कितना चालू
1:01:39 है वह यही चाह रहा है कि आप गौर से ना देखो य जो गौर से देखना है आत्म अवलोकन ध्यान यह सब कुछ है गौर से देख लो सब खुल जाएगा समझ आ रही है बात आत्मज्ञान प्रकृति को प्रकृति प्रक्रिया को प्रक्रिया बना देता है जब प्रकृति प्रकृति बन जाती है प्रक्रिया प्रक्रिया बन जाता है तो अब अहंकार क्या करे जो कर रही है वह प्रकृति अपनी प्रक्रियाओं से कर रही है अहंकार ऐसे हाथ उठा के खड़ा हुआ मैंने किया मैंने किया तुम कहते वो कर रही है तू काहे को आगे
1:02:25 श्रे तो उसके पास अब कुछ बचता नहीं तो आत्मज्ञान मुक्ति का मार्ग है मुक्ति और कुछ नहीं होती अहम खोखला है अहम झूठा है अहम है ही नहीं यह जान लेना ही मुक्ति है कुछ कर दिखाना मुक्ति नहीं होता किसी विशेष कर्म आदि से मुक्ति का कोई संबंध नहीं है स्पष्ट हो रही है बात जाने बिना कितनी भी कोशिश कर लो कुछ होगा नहीं मैं जानता ही नहीं मेरे सारे भाव सारी प्रेरणा एं मेरी आतुरता एं मेरी
1:03:12 आकांक्षाएं कहां से आती हैं और मैं कहूं मुझे निष्काम कर्म योगी बनना है तो अपने देखे मैं कर रहा हूं निष्काम कर्म और वो आ कहां से रहा होगा कामना से और मैं बिल्कुल मद में फूला रहूंगा कि मैं तो निष्काम कर्मयोगी हूं मुझे हो सकता है मेरे देखे सचमुच लग रहा हो कि मैं तो निष्काम हूं पर वह बात इतनी सी है कि मैं स्वयं से अनजान हूं मुझे पता ही नहीं है कि मैं जिस चीज को निष्काम कर्म समझ रहा हूं वह भीतर किसी गहरी कामना से ही आ रहा है मुझे बात पता ही नहीं है बिना आत्मज्ञान के कुछ कुछ भी अच्छा नहीं हो सकता जिंदगी
1:03:59 में आप जिस भी तरह की अच्छाई गुडनेस चाहते हो चाहे वह अच्छाई वह शुभता वह गुडनेस किसी भी रूप में किसी भी नाम से आप चाहते हो उसका साधन बस एक है आत्मज्ञान कुछ और नहीं आप प्रेम आत्मज्ञान से सरलता आत्मज्ञान से मुक्ति आत्म ज्ञान से सहजता आत्मज्ञान से निष्काम आत्मज्ञान से और बोलो जो भी सब पर्याय हैं शुभता के वो सब बस एक जगह से प्रस्फुटित होते हैं आत्मज्ञान बिना उसके सब बेकार की बात बाहरी
1:04:49 बात अच्छा एक बात और है आप लोग जब श्लोक लिखते हैं तो श्लोक का वही अर्थ लिख देते हैं जो इसमें आपकी रीडिंग में है ठीक है ना अब इसमें एक चीज है संस्था की ओर से ही उसको हम सुधार देना चाहिए पर आपको मैं आगाह करे देता हूं जो काव्यात्मक अर्थ है वह मैं देता हूं श्लोक श्री कृष्ण ने दिया है बीच का जो कुछ है उसकी मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है श्लोक श्री कृष्ण का है काव्या अर्थ मेरा है क्योंकि जो अर्थ यहां पर आपके सामने है वह किसी पुस्तक से आ रहा है उसम लिखा है कि कर्म माने शास्त्र विहित
1:05:35 कर्म जहां से भी आ रहा है उनको मेरा नमस्कार है सम्मान है सब कुछ है उनकी पुस्तक थी तभी हम आसानी से श्लोक ले पाए लेकिन यह अर्थ गलत है तो यह मत किया करिए कि अपने रिफ्लेक्शंस में जो यहां पर लिखा हुआ है वही आप जाकर के लिख दें मैंने घंटे भर अगर समझाया है तो उससे कुछ समझ में आया होगा ना वो लिखिए और अगर जो मैंने बताया उससे कुछ समझ में आया तो आप जान गए होंगे कि कर्म से यहां पर आशय शास्त्र विहित कर्म नहीं है यह जो बात है यह यह पुरोहित वर्ग को बड़ी प्रिय लगती है कि जहां कहीं भी कुछ ऊंचा दिखाई दे तो उसको बोल दो कि इसका अर्थ है कि वो
1:06:24 जिसको शास्त्र अनुमोदित करता और शास्त्र किस कर्म को अनुमोदित करता है जानते हैं आगे जाकर के यही लोग क्या बोलेंगे बोलेंगे कर्म तो आता है वर्णाश्रम धर्म से श्री कृष्ण ने कहा कर्म ठीक अनुवादक ने बोल दिया कर्म माने शास्त्र भद कर्म और शास्त्र अक्सर कौन सा बन जाता है शास्त्र जितने थे तो वहां पर फिर कर्म की क्या परिभाषा हो जाती है जो आपके वर्णाश्रम धर्म से आ रहा हो वही आपका कर्म उदाहरण के लिए आप वर्ण से शूद्र
1:07:10 है और आश्रम से गृहस्थ है तो आपका क्या धर्म है कि आप सब ऊंचे वर्णों की सेवा करें और अगर आप को काम दिया गया लोहा पीटने का तो आप लोहा पीटे जो भी कुछ आपको आपके वर्ण के अनुसार काम दिया गया है वो आप करिए तो उनके लिए कर्म की ये परिभाषा हो जाती है भाई बचो हम कुछ और बात कर हम बहुत बहुत बहुत अलग बात कर रहे हैं यहां कर्म लिखा है आप स्त्री है ठीक है वर्णाश्रम धर्म मात्र वर्णाश्रम नहीं होता उसमें वर्ण और आश्रम के अलावा सबसे बड़ा जो काम होता लिंग का होता है तो वर्णाश्रम धर्म माने क्या अच्छा आप स्त्री हैं अच्छा आप 30 सा
1:07:56 तो आपका आश्रम क्या हो गया गृहस्थ आश्रम वर्ण से आप क्या है आप कुछ भी हो सकती है वर्ण से क्या फर्क पड़ता है आपका वर्ण वास्तव में एक ही है आप महिला है तो अभी आपका फिर कर्म क्या है उनके अनुसार वो कहेंगे आपका एक ही सही कर्म है बच्चे पैदा करो बहुत सारे और पालो यही कर्म है अब कहां श्री कृष्ण आपको निष्काम कर्म की ओर ले जाना चाहते हैं और कहां यह लोग आपको बताना चाहते हैं कि तुम्हारा सही कर्म वो है जो तुम्हारे वर्णाश्रम द्वारा निर्धारित हो या लिंग द्वारा निर्धारित हो तो जमीन आसमान का अंतर है जो बात मैं आपसे कह रहा हूं और जो बात आपको गीता के प्रचलित अनुवाद में मिलेगी जमीन आसमान का अंतर है तो बचा करिए मुझे ठेस सी लगती है जब मैं पाता हूं कि वही सब कुछ आके आपने वहां कम्युनिटी पर भी चिपका दिया हालांकि गलती
1:08:43 उसम संस्था की भी है यह अनुवाद आप तक पहुंचना ही नहीं चाहिए था जिन्होंने अनुवाद आपको दिया है मैं नमस्कार करता हूं उनकी बुद्धि को कुछ किया कुछ हो गया मैं कौन हूं मैं करूं क्या उत्तर ये कि बस जान लो करता कौन है कर्म है क्या कुछ किया कुछ हो गया मैं कौन हूं मैं करूं क्या उत्तर ये कि बस जान लो करता कौन है
1:09:30 कर्म है क्या कुछ किया कुछ हो गया मैं कौन हूं मैं करूं क्या उत्तर यह कि बस जान लो करता कौन है कर्म है क्या [संगीत]