0:00 30 मई 2026 इंग्लैंड का ऐतिहासिक शहर कैंब्रिज सदियों पुरानी दीवारों और ज्ञान की महक से सराबोर कैंब्रिज यूनियन के हॉल में एक अजीब सी खामोशी है। यह वो जगह है जहां दुनिया के सबसे तेज दिमाग, सबसे ताकतवर नेता और सबसे बड़े रेवोल्यूशनरी अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। आज उस मंच पर एक भारतीय चेहरा खड़ा है जिसकी आंखों में एक अजीब सी गहराई है और जिसकी मौजूदगी में एक ठहराव है जो होल की बेचैनी को चीर रहा है। दुनिया के बड़े-बड़े बिजनेस लीडर्स एकेडमिक्स और स्टूडेंट्स की निगाहें उस पर टिकी हैं। वो क्लाइमेट चेंज, इनकलिटी और ग्लोबल जिम्मेदारी जैसे भारीभरकम मुद्दों पर बात करने आया है।
0:47 लेकिन उसके हथियार आज के नहीं सदियों पुराने हैं। उपनिषद, गीता और वेदांत। यह सीन अपने आप में एक पहेली है। एक ऐसा इंसान जिसने इंडिया के सबसे मुश्किल एग्जाम्स, आईआईटी, आईआईएम और सिविल सर्विज को एक के बाद एक फतेह किया और फिर सब कुछ छोड़ दिया। एक ऐसा शख्स जो आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए स्पिरिचुअल गाइड है। लेकिन जिसकी बातें किसी मीठी चाशनी की तरह नहीं बल्कि एक तेज धार वाले चाकू की तरह है जो आपके हर यकीन को काट देती है। आखिर कौन है यह इंसान? इस कामयाबी और फिर उसे ठुकरा देने के सफर के पीछे की कहानी क्या है? वो कौन सी आग थी जिसने एक होनहार ब्यूरोक्रेट के भविष्य को जलाकर एक फकीर
1:35 की राख बना दिया। यह कहानी है प्रशांत त्रिपाठी की जिन्हें आज दुनिया आचार्य प्रशांत के नाम से जानती है। तो चलिए सुनते हैं आज की कहानी सिर्फ ऑडियो बुक लेजेंड्स पर। चैप्टर वन द आयरनी ऑफ एनसेेस्ट्री। इतिहास खुद को दोहराता नहीं। वह तो बस अपनी अधूरी कहानी पूरी करता है। आचार्य प्रशांत की कहानी समझने के लिए हमें आज से लगभग 1200 साल पीछे जाना होगा। आठवीं सदी के बिहार के मिथिला इलाके में। लोक कथाओं में वर्णन मिलता है कि यहां एक ऐसा घर था जिसके बाहर पिंजरों में बंद तोते भी वेदों के सूत्रों का उच्चारण करते थे। यह घर था अपने समय के सबसे बड़े दार्शनिकों में से एक मंडन मिश्र का। मंडन
2:22 मिश्र और उनकी पत्नी उभय भारती ज्ञान का एक ऐसा महासागर थे जिसकी था पाना लगभग नामुमकिन था। वह मीमांसा स्कूल के सबसे बड़े समर्थक थे। एक ऐसा दर्शन जो कहता था कि परम सत्य सिर्फ और सिर्फ गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों, यज्ञों और कर्मकांडों को पूरी निष्ठा से निभाकर ही पाया जा सकता है। उनके लिए सन्यास या घर छोड़ देना एक भटकाव था। एक पलायन था। एक दिन उस घर के दरवाजे पर एक युवा सन्यासी आकर खड़ा हुआ। उसकी उम्र कम थी। लेकिन आंखों में एक ऐसी चमक थी मानो ब्रह्मांड के सारे राज उनमें कैद हो। वह थे आदि शंकराचार्य। वह मंडन मिश्र को शास्त्रार्थ यानी एक फिलोसोफिकल डिबेट के लिए चुनौती देने आए थे। उनकी
3:08 फिलॉसोफी मंडन मिश्र से एकदम उल्टी थी। अद्वैत वेदांत यानी यह दुनिया यह कर्मकांड यह रिश्ते सब एक भ्रम है। एक माया है और सत्य केवल एक है। ब्रह्म। उस ऐतिहासिक बहस की जज बनी खुद मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी उभय भारती। कई दिनों तक यह दिमागी लड़ाई चली। तर्क पर तर्क दिए गए। वेदों के गहरे से गहरे सूत्र खंगाले गए। मंडन मिश्र का ज्ञान अथाह था। पर शंकराचार्य के तर्कों में ज्ञान के साथ एक अजीब सी शांति थी। एक ठहराव था। कहते हैं बहस के आखिरी दिन मंडन मिश्र के गले में पड़ी फूलों की माला मुरझाने लगी। जो उनके अंदर की बेचैनी का प्रतीक थी। उभय भारतीय ने अपने पति की हार
3:53 और शंकराचार्य की जीत का ऐलान कर दिया। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। उभय भारती ने शंकराचार्य से कहा आपने मेरे पति को तो हरा दिया लेकिन मैं उनकी अर्धांगिनी हूं। आप जब तक मुझे नहीं हरा देते आपकी जीत अधूरी है। और फिर उन्होंने एक ऐसा सवाल पूछा जिसने उस ब्रह्मचारी सन्यासी को निरुत्तर कर दिया। उन्होंने काम शास्त्र पर यानी सेंसुअल आर्ट्स पर सवाल पूछ लिए जिसका शंकराचार्य को कोई ज्ञान नहीं था। यह कहानी एक अजीब विरोधाभास की नींव रखती है। सोचिए 12 सदियों बाद उसी मंडन मिश्र के खून का एक वंशज प्रशांत त्रिपाठी पैदा होता है जो अपनी पूरी जिंदगी उसी अद्वैत वेदांत को समर्पित कर देता है। जिसने
4:41 इतिहास में उसके पूर्वज को हराया था। वह कर्मकांडों पर रस्मों रिवाजों पर ठीक वैसे ही हमला करता है जैसे कभी शंकराचार्य ने किया था। ऐसा लगता है मानो इतिहास का एक अधूरा सर्किल, एक अधूरी बहस 1200 साल बाद पूरी हो रही थी। प्रशांत के अंदर सिर्फ मंडन मिश्र का तेज दिमाग ही नहीं था। बल्कि शंकराचार्य की विद्रोही चेतना भी थी। लेकिन यह बगावत का बीज सिर्फ इतना पुराना नहीं था। हाल के इतिहास में उनके परदादा रमैया बाबा बनारस के एक अोरी संत थे। वह एक ऐसे फकीर थे जिन्हें समाज के बनाए नियमों की कोई परवाह नहीं थी। उनकी जिंदगी से जुड़ा एक किस्सा उनकी शख्सियत को पूरी तरह बयान कर देता है। एक बार
5:27 बनारस की सबसे मशहूर तवायफ उनके पास आई। अपने पापों का प्रायश्चित करने, खुद को पवित्र करने की इच्छा लेकर किसी भी आम साधु संत की तरह रमैया बाबा ने उसे गंगा नहाने या यज्ञ करने को नहीं कहा। उन्होंने समाज के मुंह पर एक तमाचा मारते हुए उस तवायफ से शादी कर ली। यह एक सिंबॉलिक एक्ट था। यह बताने के लिए कि जिसे समाज पाप कहता है वह असल में सिर्फ एक सामाजिक धारणा है और सच्चाई इन सब धारणाओं से परे है। तो एक तरफ मंडन मिश्र का इंटेलेक्चुअल घराना और दूसरी तरफ रमैया बाबा की सामाजिक बगावत। इन दो ध्रुवों के बीच की टेंशन यही वह जमीन थी जिस पर प्रशांत त्रिपाठी की शख्सियत का वृक्ष उगने वाला था। एक ऐसा
6:14 वृक्ष जिसकी जड़े परंपरा में बहुत गहरी थी। लेकिन जिसकी शाखाएं हर परंपरा को तोड़ने के लिए आसमान की ओर बढ़ रही थी। यह सिर्फ एक लड़के के जन्म की कहानी नहीं थी। यह एक साल पुरानी वैचारिक लड़ाई के अंतिम दौर की शुरुआत थी। जिस घर में तोते भी कर्मकांड पर बहस करते थे, उसी घर का वंशज अब दुनिया को यह बताने वाला था कि असली आध्यात्मिकता किसी भी कर्मकांड की मोहताज नहीं है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले उस लड़के को दुनिया के बनाए रास्तों पर चलना था। उन्हें जीतना था और फिर उन्हें ठोकर भी मारनी थी। उसका बचपन कैसा था? किन हालात ने उसके अंदर के इस दार्शनिक को जगाया यह हम जानेंगे अगले
7:01 अध्याय में। चैप्टर 2 द साइलेंट ऑब्जर्वर 7 मार्च 1978 आगरा शहर में एक सरकारी अफसर अवधेश नारायण त्रिपाठी के घर उनके पहले बेटे का जन्म हुआ। नाम रखा गया प्रशांत। प्रशांत का मतलब होता है शांत स्थिर। लेकिन इस बच्चे के अंदर शांति और तूफान दोनों का एक अजीब संगम बसता था। पिता की सरकारी नौकरी की वजह से बचपन उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों, खासकर लखनऊ और गाजियाबाद में बीता। बाहर से देखने पर प्रशांत दोहरे चरित्र का मालिक था। एक तरफ वो एक बेहद शरारती बच्चा था, जिसकी शरारतों से घरवाले और टीचर्स परेशान रहते। दूसरी तरफ, उसी बच्चे के अंदर एक बहुत गहरा, बहुत बूढ़ा ऑब्जर्वर
7:48 भी रहता था। वो घंटों तक चुपचाप बैठकर लोगों को देखता। उनके चेहरों के पीछे छिपे झूठ को, उनकी बातों के खोखलेपन को और उनके रिश्तों की मजबूरी को महसूस करता। दोस्तों को कभी समझ नहीं आता था कि प्रशांत मजाक कर रहा है या कोई बहुत गहरी बात कह रहा है। समाज का यह दिखावा, यह फिकनेस उस बच्चे के मन पर एक भारी बोझ डालती थी। उसे बचपन से ही दुनिया जैसी थी। उसे गहरी बेचैनी महसूस होती थी। एक अनकंफर्टेबल फीलिंग कि कुछ तो बहुत गलत है। इस बेचैनी को समझने और सहने की ताकत उसे अपने घर के माहौल से मिली। उसके पिता अवधेश नारायण त्रिपाठी एक बेहद सुलझे हुए और कम बोलने वाले इंसान थे। उनकी खासियत थी
8:34 इंटेलेक्चुअल क्लेरिटी। जिस मुश्किल को सुलझाने में लोगों को 10 मिनट लगते वो उसे 30 सेकंड में बिना किसी फालतू शब्द के सुलझा देते थे। प्रशांत ने अपने पिता से बोलना नहीं। चुप रहना सीखा। उन्होंने सीखा कि बोलना तभी चाहिए जब आपके शब्द आपकी खामोशी से ज्यादा कीमती हो। पिता ने एक ढाल की तरह प्रशांत की जिज्ञासा को समाज के नॉनसेंस से बचाकर रखा। उन्होंने एक ऐसा माहौल दिया जहां सच को खोजने वाले मुश्किल सवालों का स्वागत होता था। अगर पिता ने उसके दिमाग को एक तेज औजार बनाया तो मां ने उसके दिल को एक मजबूत कवच दिया। उन्होंने प्रशांत को भावनात्मक रूप से सहना और टिके रहना सिखाया। बचपन की एक
9:19 छिपी हुई कहानी उसके अंदर की जिम्मेदारी की भावना को दिखाती है। परिवार मध्य प्रदेश के मेहर मंदिर गया था। प्रशांत की छोटी बहन के मुंडन संस्कार के लिए। उस भीड़भाड़ और रस्मो रिवाज के बीच उस छोटे से लड़के को अपने परिवार की जिम्मेदारी का गहरा एहसास हुआ। वह सिर्फ एक बच्चा नहीं था। वो एक प्रोटेक्टर भी था। 5 साल की उम्र तक वह एक लालची रीडर बन चुका था। वो बिना किसी गाइडेंस के जो भी किताब हाथ लगती उसे पढ़ जाता था। उसकी पढ़ने की कोई सीमा नहीं थी। कोई जॉनर नहीं था। वो बस ज्ञान को सोख रहा था। 15 साल की उम्र में परिवार गाजियाबाद शिफ्ट हो गया। इस नए शहर की आपाधापी ने प्रशांत को और अकेला और
10:06 इंट्रोवर्ट बना दिया। उसे सुकून मिलता था रात की खामोशी में। उसे रात में जागने की आदत पड़ गई। वह घंटों तक चुपचाप अंधेरे आसमान को टिमटिमाते तारों को और बदलते चांद को देखता रहता था। ब्रह्मांड की यह विशालता और इंसान की यह छोटी सी जिंदगी इस कंट्रास्ट ने उसके अंदर के कवि को जन्म दिया। उसने कविताएं लिखनी शुरू की। बहुत सेंसिटिव बहुत गहरी कविताएं। उसकी ज्यादातर कविताएं चांद को समर्पित थी और बाद में यह रात और चांद नाम के कलेक्शन में पब्लिश भी हुई। चांद उसकी कविताओं में सिर्फ एक पत्थर का टुकड़ा नहीं था। वह एक सिंबल था। जैसे चांद अंधेरे में रोशनी को रिफ्लेक्ट करता है। वैसे ही उसकी कविताएं
10:52 दुनिया के अज्ञान के अंधेरे में परम सत्य की रोशनी की ओर इशारा करती थी। यह वह साल थे जब प्रशांत की शख्सियत घड़ी जा रही थी। एक तरफ दुनिया को दिखाने के लिए एक शरारती होशियार लड़का था और दूसरी तरफ रात के अंधेरे में ब्रह्मांड के रहस्यों से जूझता एक अकेला कवि वो दुनिया को बहुत करीब से देख रहा था और जितना करीब से देख रहा था उतना ही उससे दूर होता जा रहा था उसे यह समझ आने लगा था कि समाज जिन चीजों के पीछे भाग रहा है पैसा नाम इज्जत वह सब कितनी खोखली है लेकिन इस सिस्टम से लड़ने के लिए या इसे बदलने के लिए पहले सिस्टम के शिखर पर पहुंचना जरूरी था और इंडिया के मिडिल
11:38 क्लास समाज में उस शिखर का रास्ता सिर्फ और सिर्फ एक जगह से होकर गुजरता था। एकेडेमिक एक्सीलेंस प्रशांत के पास यह काबिलियत कुदरती तौर पर थी। वो अपनी क्लास में हमेशा टॉप करता आईसीएस का टॉपर बना और देश का प्रतिष्ठित नेशनल टैलेंट सर्च एग्जामिनेशन स्कॉलरशिप भी जीता। अब उसकी नजरें देश के सबसे बड़े एकेडमिक किले पर थी आईआईटी। लेकिन क्या वह सच में एक इंजीनियर बनना चाहता था? या यह भी उस बड़ी लड़ाई का एक स्ट्रेटेजिक पड़ाव था? इस सवाल का जवाब उसके आने वाले कल में छिपा था। चैप्टर 3 द स्ट्रेटेजिक कॉनकरर। 1990 के दशक का भारत। उधारीकरण की हवा बहनी शुरू हो गई थी।
12:25 लेकिन एक मिडिल क्लास परिवार के लिए कामयाबी का मतलब आज भी एक ही था। एक अच्छी सिक्योर सरकारी नौकरी और उस नौकरी का सबसे ऊंचा शिखर था इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस यानी आईएस। प्रशांत ने बहुत कम उम्र में यह समझ लिया था कि अगर समाज में कोई बड़ा सार्थक बदलाव लाना है तो उसके लिए पावर यानी अधिकार का होना जरूरी है और वह पावर एक आईएएस ऑफिसर की कुर्सी में थी। उसने एक बहुत गहरी स्ट्रेटजी बनाई। उसने नोटिस किया कि उस दौर में सिविल सर्विज एग्जाम के ज्यादातर टॉपर्स आईआईटी के बैकग्राउंड से आते थे। तो उसके लिए आईआईटी इंजीनियरिंग का सपना नहीं था। वो तो बस आईएएस तक पहुंचने की एक सीढ़ी थी। एक
13:11 लांचपैड था। उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और 1995 में देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान इंडियन इंस्टट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी दिल्ली में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के लिए दाखिला ले लिया। गाजियाबाद के एक प्रोटेक्टेड माहौल से निकलकर आईआईटी दिल्ली का आजाद लिबरल और चैलेंजिंग माहौल प्रशांत के लिए एक ताजी हवा के झोंके की तरह था। यहां कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। उसने खुद को सिर्फ किताबों और ग्रेड्स की दौड़ में कैद नहीं किया। बल्कि उसने कॉलेज के जीवन को उसकी पूरी शिद्दत से जिया। उसने स्टूडेंट बॉडी इलेक्शंस में हिस्सा लिया। कॉलेज की पॉलिटिक्स की भूल भुलैया को करीब से देखा और समझा कि पावर
13:58 और इंसानी व्यवहार कैसे काम करते हैं। उसने यूनिवर्सिटी की स्पोर्ट्स फैसिलिटीज का भरपूर इस्तेमाल किया। टेबल टेनिस खेला और ड्रामा, डिबेटिंग और राइटिंग में भी खुद को डुबो दिया। यह साल उसकी फिजिकल ट्रांसफॉर्मेशन के भी साल थे। उसकी एक्टिविटीज का रिटमो इतना तेज था कि जब उसने कॉलेज में एडमिशन लिया था तो वह एक चबी लड़का था। लेकिन कुछ ही समय में उसका वजन इतना कम हो गया कि उसकी सारी जींस को दोबारा सिलवाना पड़ा। उसने एक अच्छे और आज्ञाकारी लड़के की इमेज को भी तोड़ा। वो अक्सर दोस्तों के साथ रात-रात भर बाहर रहता और मूवी थिएटर्स में खूब हंगामा मचाता। लेकिन इस सब मस्ती और बगावत के पीछे उसका दिमाग अपने असली लक्ष्य पर फोकस
14:46 था। आईआईटी ने उसे एक हमंबलिंग एक्सपीरियंस दिया। उसने महसूस किया कि स्कूल और शहर के लेवल पर वह सबसे होशियार हो सकता है। लेकिन आईआईटी में उसके जैसे और उससे भी कहीं ज्यादा तेज दिमाग वाले लोग थे। यहां कंपटीशन बहुत टफ था। कुछ लोगों के पास रॉ अनपरेलल्ड टैलेंट था तो कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ अपनी बेहिसब मेहनत के दम पर आगे बढ़ रहे थे। इस माहौल ने उसे सिखाया कि सिर्फ टैलेंट काफी नहीं होता। अपने दूसरे साल तक आते-आते वो पूरी तरह से अपने असली मिशन सिविल सर्विज की तैयारी में जुट गया। वो कॉलेज की लाइब्रेरी का एक परमानेंट मेंबर बन गया। घंटोंघंटों तक वो वहीं बैठा रहता। उसने अखबारों, जर्नल्स और
15:33 दुनिया भर के लिटरेचर का गहरा विश्लेषण करना शुरू कर दिया। यह सिर्फ एग्जाम की तैयारी नहीं थी। यह दुनिया को, समाज को और इंसानी साइकोलॉजी को समझने की एक प्रक्रिया थी। उसका ज्ञान सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं था। वो अपने आसपास की दुनिया से लगातार सीख रहा था। आईआईटी के वह चार साल प्रशांत के लिए एक प्रयोगशाला की तरह थे। यहां उसने दुनिया देखी, दोस्ती निभाई, बगावत की और सबसे बढ़कर खुद को पहचाना। उसने सिस्टम को करीब से देखा और उसे यह भी समझ आने लगा कि इस सिस्टम में कितनी खामियां हैं। उसने देखा कि कैसे देश के सबसे होनहार दिमाग सिर्फ एक अच्छी नौकरी और एक मोटे पैकेज के सपने में कैद होकर रह जाते हैं। उनकी सारी काबिलियत,
16:21 उनकी सारी एनर्जी किसी मल्टीीनेशनल कंपनी के प्रॉफिट को बढ़ाने में खर्च हो जाती है। देश या समाज को बदलने की आग बहुत कम लोगों में दिखाई देती थी। यह ऑब्जरवेशन उसके अंदर की बेचैनी को और बढ़ा रही थी। उसे लग रहा था कि वह सही रास्ते पर है। आईएएस बनकर वह इस सर्च के सिस्टम को बदल सकता है। 1999 में जब वह आईआईटी दिल्ली से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकला तो वह सिर्फ एक इंजीनियर नहीं था। वो एक ऐसा योद्धा था जो अपनी अगली और सबसे बड़ी लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार था। वह लड़ाई थी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन की। वह दरवाजा जिसके पास हिंदुस्तान की तकदीर
17:06 लिखने वाली कुर्सियां रखी थी। लेकिन क्या वह कुर्सी उसे वह सुकून दे पाएगी जिसकी उसे तलाश थी या फिर यह भी एक और खूबसूरत धोखा साबित होगा। चैप्टर फोर द इल्लुजन ऑफ पावर। 2001 का साल प्रशांत की जिंदगी में एक अजीबोगरीब टर्निंग लेकर आया। उसने एक ही साल में दो ऐसे कारनामे कर दिखाए जो ज्यादातर भारतीय स्टूडेंट्स के लिए एक सपना होते हैं। एक तरफ उसने देश की सबसे मुश्किल परीक्षा इंडियन सिविल सर्विज एग्जामिनेशन को पास कर लिया और दूसरी तरफ उसने देश के सबसे बड़े मैनेजमेंट इंस्टट्यूट इंडियन इंस्टट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद में भी एडमिशन हासिल
17:52 कर लिया। यह एक ऐसी एकेडेमिक जीत थी जिसने सबको हैरान कर दिया। लेकिन इस जीत के जश्न में एक कसक छिपी हुई थी। एक निराशा छिपी हुई थी। यूपीएसएससी में उसकी रैंक तो अच्छी आई लेकिन इतनी अच्छी नहीं कि उसे उसका सपना यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस मिल सके। वो इंडियन पुलिस सर्विस से भी सिर्फ कुछ मार्क्स से चूक गया। उसे जो सर्विस अलॉट हुई वह थी इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विस। प्रशांत के लिए यह एक बड़ा झटका था। उसके स्ट्रेटेजिक प्लान के मुताबिक सिर्फ आईएस ही वह सर्विस थी जिसमें समाज में असल बदलाव लाने का अधिकार और औजार दोनों थे। बाकी सर्विसेस उस विशाल सरकारी मशीनरी के छोटे-छोटे पुरजे मात्र
18:39 थे। लेकिन रैंक की इस निराशा से भी कहीं ज्यादा गहरी एक और निराशा थी। एक फिलॉसोफिकल निराशा जो पिछले कुछ सालों की गहन तैयारी के दौरान उसके मन में रूट्स जमा चुकी थी। लाइब्रेरी में बिताई उन अनगिनत रातों में दुनिया भर के पॉलिटिकल सिस्टम्स, सोशियोलॉजी और इतिहास को पढ़ते हुए उसे एक करवी सच्चाई का एहसास हुआ था। उसे समझ आ गया था कि सरकार या कोई भी ब्यूरोक्रेसी असल में बदलाव लाने के लिए नहीं बनी होती। उसका मूल काम होता है स्टेटस को को बनाए रखना। यानी जो जैसा चल रहा है उसे वैसा ही चलाते रहना। ब्यूरोक्रेसी बदलाव की दुश्मन होती है। वह एक ऐसा भारीभरकम जहाज है जिसे मोड़ना लगभग
19:25 नामुमकिन है। वह किसी भी रेडिकल, किसी भी क्रांतिकारी विचार को अपनी फाइलों और नियमों के जाल में फंसाकर मार देती है। इस सच्चाई को जानने के बाद आईएएस की कुर्सी का मोह भी उसके मन में कम होने लगा था। उसे यह दिखने लगा था कि जिस पावर के पीछे वह भाग रहा है, वह असल में एक धोखा है, एक मृग तृष्णा है। आप सिस्टम का हिस्सा बनकर सिस्टम को नहीं बदल सकते। आप बस खुद उस सिस्टम जैसे हो जाते हैं। इस दोहरी निराशा के बीच उसने एक मुश्किल फैसला लिया। उसने एक भारी मन से सरकार से छुट्टी के लिए अर्जी दी ताकि वह आईआईएम अहमदाबाद में अपना एमबीए पूरा कर सके। टेक्निकली वो 2 साल तक सरकारी सर्विस में रहा। लेकिन उसका
20:11 असल काम करने का समय मुश्किल से 8 या 9 दिन का ही था। ऑफिसर ट्रेनिंग के दौरान ही उसने यह पक्का मन बना लिया था कि यह रास्ता उसका नहीं है। उसने अंततः अपनी सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। यह एक बहुत बड़ा कदम था। एक ऐसी नौकरी जिसे पाने के लिए लोग अपनी पूरी जिंदगी लगा देते हैं। उसे प्रशांत ने यह महसूस होते ही छोड़ दिया कि यह उसके जीवन के असली मकसद को पूरा नहीं कर सकती। यह घटना उसके चरित्र की एक खास बात को उजागर करती है। बाहरी अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता यह सब उसके लिए बेईमानी थे। अगर वह इंसान के अंदर के दुख, उसके मन की गुलामी को नहीं मिटा सकते। आईआईएम अहमदाबाद का माहौल
20:57 आईआईटी से भी ज्यादा इंटेंस और कंपेटिटिव था। यहां देश के सबसे तेज कमर्शियल दिमाग इकट्ठे हुए थे। प्रशांत ने यहां भी खुद को साबित किया लेकिन उसके अंदर का ऑब्जर्वर अब और भी ज्यादा सतर्क हो गया था। वो देख रहा था कि कैसे यह सारे ब्रिलियंट माइंड्स भी एक ही चीज के पीछे भाग रहे थे। एक बड़ा पैकेज, एक शानदार कॉर्पोरेट करियर और एक आरामदायक जिंदगी। सत्य, मुक्ति या जीवन के गहरे सवालों की यहां कोई जगह नहीं थी। यहां हर चीज को प्रॉफिट और लॉस के तराजू पर तोला जाता था। उसे साफसाफ दिखने लगा था कि चाहे पब्लिक सेक्टर हो या प्राइवेट सेक्टर दोनों ही इंसान को एक खास तरह की गुलामी में जकड़ते हैं। एक जगह नौकरी की
21:42 सिक्योरिटी है तो वहां काम करने की आजादी नहीं है। दूसरी जगह पैसा है तो वहां आत्मसम्मान नहीं है। दोनों ही रास्ते इंसान की असली क्षमता को उसकी असली अड़ાન को कैद कर लेते हैं। आईआईएम से ग्रेजुएशन करने के बाद उसके सामने एक नई चुनौती थी। उसके ऊपर पढ़ाई का एक बड़ा लोन था। उसे पता था कि उसे कुछ साल कॉरपोरेट दुनिया में काम करना होगा। सिर्फ इसलिए ताकि वह इस कर्ज को चुका सके। यह उसके लिए एक मजबूरी थी। कोई सपना नहीं। वह एक ऐसी दुनिया में कदम रखने जा रहा था जिसे वह पहले ही मन से रिजेक्ट कर चुका था। यह एक ऐसा समझौता था जो उसे अपने मकसद तक पहुंचने के लिए करना पड़ रहा था। लेकिन वह
22:28 कितने दिन इस समझौते को निभा पाएगा और कॉरपोरेट दुनिया का अनुभव उसके अंदर के दार्शनिक पर क्या असर डालेगा? यह एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा था और वह जवाब उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला था। जानेंगे अगले अध्याय में। चैप्टर फाइव द गोल्डन केस 2003 का साल। आईआईएम अहमदाबाद से निकला एक चमकदार ग्रेजुएट प्रशांत त्रिपाठी कॉर्पोरेट दुनिया की चकाचौंध में कदम रखता है। उसका रिज्यूुमे किसी सपने जैसा था। आईआईटी दिल्ली सिविल सर्विज और अब आईआईएम अहमदाबाद। कोई भी बड़ी कंपनी उसे अपनी सबसे ऊंची कुर्सी देने को तैयार थी। लेकिन प्रशांत के लिए यह सब एक मजबूरी का सौदा
23:15 था। उसके दिमाग में कोई वोकेशनल कोलिंग यानी काम को लेकर कोई जुनून नहीं था। उसका मकसद बहुत साफ और प्रैक्टिकल था अपने स्टूडेंट लोनस को जल्द से जल्द चुकाना। वह जानता था कि वह इस दुनिया में परमानेंट नहीं रहेगा। यह बस एक ट्रांजिट फेस था। एक वेटिंग रूम जहां उसे तब तक इंतजार करना था जब तक वह अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों से आजाद ना हो जाए। उसने अपने कॉर्पोरेट करियर को भी एक स्ट्रेटेजिक मिशन की तरह लिया। उसका लक्ष्य था कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा सीखना और ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना ताकि वह जल्द से जल्द आजाद हो सके। इसी मकसद से उसने सिर्फ 3 साल के छोटे से समय में तीन अलग-अलग
24:02 कंपनियों में काम किया और तीनों ही कंपनियां बिल्कुल अलग-अलग इंडस्ट्रीज से थी। उसका यह छोटा लेकिन शानदार करियर उसे जी कैपिटल आयशा ट्रैक्टर्स बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड और ईसीएस जैसी बड़ी कंपनियों में ऊंचे पदों तक ले गया। वो हर काम को पूरी लगन से करता लेकिन अंदर से वो पूरी तरह डिटच्ड था। जैसे कोई एक्टर मंच पर अपना किरदार निभा रहा हो। यह जानते हुए कि शो खत्म होते ही उसे यह मुखौटा उतार देना है। बाद में एक इंटरव्यू में उसने मजाक में कहा था कि उसे जी कैपिटल के फाउंडर का नाम तक याद करने में मुश्किल होती थी जो दिखाता है कि वह इस दुनिया से कितना कटा हुआ था। यह तीन साल उसके अंदर
24:49 एक डबल डिसपॉइंटमेंट को और गहरा कर गए। अगर सरकारी नौकरी ब्यूरोक्रेसी के ठहराव में जखरी हुई थी तो प्राइवेट सेक्टर अपने से ऊपर वालों की जी हुजूरी और आंख बंद करके सिर्फ मुनाफा कमाने की संस्कृति में कैद था। उसे इस बात पर बड़ी हैरानी होती थी कि जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियां जिनकी नीव थॉमस एडिसन जैसे महान वैज्ञानिक के शुद्ध ज्ञान और जिज्ञासा पर रखी गई थी। आज सिर्फ पैसा बनाने की विशाल मशीनें बनकर रह गई थी। इन कंपनियों का सत्य या इंसानियत के विकास से कोई लेना देना नहीं था। वह सिर्फ अपने शेयर होल्डर्स के डिविडेंड के लिए काम करती थी। उसने पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर के बीच के फर्क को
25:36 बहुत गहराई से महसूस किया। पब्लिक सेक्टर में नौकरी की सिक्योरिटी थी। ज्यादा से ज्यादा आपका ट्रांसफर हो सकता था। आपको कोई निकाल नहीं सकता था। लेकिन प्राइवेट सेक्टर में हर पल नौकरी जाने का डर एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता था। आपको अपने सुपीरियर्स की हर सही गलत बात माननी पड़ती थी क्योंकि आपके ऊपर टर्मिनेशन की तलवार लटकती रहती थी। यह डर आपको मनोवैज्ञानिक रूप से गुलाम बना देता था। प्रशांत ने इस पूरी व्यवस्था को एनिमल सेंटर से चलने वाली व्यवस्था का नाम दिया। यानी एक ऐसी दुनिया जो सिर्फ निजी लाभ, जल्दी से जल्दी एग्जिट मारने और अपनी पब्लिक इमेज को बचाकर दूसरों से वैलिडेशन
26:23 लेने की जानवर प्रवृत्ति पर चलती है। इसके विपरीत उसने एक ह्यूमन सेंटर या सत्य के सेंटर की कल्पना की। एक ऐसी दुनिया जहां इंसान प्यार से काम करता है। जहां काम उसकी जिंदगी का मकसद होता है। बेचने के लिए कोई चीज नहीं। जब उसे यह साफ हो गया कि ब्यूरोक्रेसी की सीढ़ी हो या कॉर्पोरेट लीडर दोनों ही इंसान की गुलामी के अलग-अलग रूप हैं तो उसने बिना एक पल सोचे इस खेल से बाहर निकलने का फैसला कर लिया। 2006 में जिस दिन उसका आखिरी लोन चुका वो दिन उसकी कॉर्पोरेट जिंदगी का भी आखिरी दिन था। उसने मेरली होप्ड आउट यानी खुशी-खुशी इस सुनहरे पिंजरे से छलांग लगा दी। सालों से उसके अंदर जो एक गहरी अस्तित्व की
27:10 बेचैनी एकिस्टेंशियल ए्जायटी चल रही थी वह उस दिन खत्म हो गई। लेकिन यह अंत एक नई शुरुआत थी। उसने दुनिया के बनाए दोनों सबसे कामयाब रास्तों को चलकर देख लिया था और दोनों को ही खारिज कर दिया था। अब सवाल यह था कि आगे क्या? अब वो कौन सा रास्ता बनाएगा? उसके पास कोई नौकरी नहीं थी। कोई तयशुदा प्लान नहीं था। लेकिन उसके पास एक चीज थी आजादी और इसी आजादी की जमीन पर वह अपने जीवन के असली मिशन का बीज बोने वाला था। एक ऐसा मिशन जो इंडिया के हजारों युवाओं की जिंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला था। चैप्टर सिक्स सोविंग द सीड्स ऑफ विज़डम।
27:55 साल था 2006। प्रशांत त्रिपाठी नाम का एक शख्स जिसने देश के सबसे बड़े इंस्टिटशंस को फतेह किया था। अब सड़कों पर था। उसके पास कोई नौकरी नहीं थी। कोई टाइटल नहीं था। लेकिन उसकी आंखों में एक नया सपना था। उसका ट्रांसफॉर्मेशन किसी वृक्ष के नीचे हुए किसी चमत्कारी ज्ञानोदय से नहीं हुआ। यह एक बहुत धीरे-धीरे बहुत सोच समझकर और इंसानी दुख के लिए गहरी हमदर्दी से पैदा हुआ एक बदलाव था। जब वह कॉर्पोरेट सेक्टर में काम कर ही रहा था, तब भी वह अपने वीकेंड्स बर्बाद नहीं करता था। वह अपने खाली समय में एक खास तरह का लीडरशिप कोर्स डिजाइन कर रहा था। यह कोई आम मैनेजमेंट कोर्स नहीं था। वो दुनिया भर के महान
28:41 दार्शनिकों और संतों की किताबों से मिले ज्ञान को मॉडर्न मैनेजमेंट के कांसेप्ट्स के साथ मिला रहा था। वो वीकेंड्स पर देश भर में ट्रैवल करता और अपने इस नए कांसेप्ट को प्रतिष्ठित इंस्टीटशंस के स्टूडेंट्स को सिखाता। इनमें उसका अपना ऑलमामेटर आईआईटी दिल्ली के साथ-साथ टाटा इंस्टट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस, सिंबायोसिस और इंस्टट्यूट ऑफ मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी जैसे बड़े नाम शामिल थे। 2006 में अपनी नौकरी से इस्तीफा देने के बाद उसने अपने इस काम को एक ऑर्गेनाइजेशनल स्ट्रक्चर देने के लिए अद्वैत लाइफ एजुकेशन की स्थापना की। उसका ऑब्जरवेशन बहुत साफ था। उसने देखा कि इंडिया के प्रीमियम एजुकेशनल
29:29 इंस्टट्यूट्स स्टूडेंट्स को हर तरह का बाहरी मैनेजमेंट तो सिखा रहे थे। फाइनेंस, मार्केटिंग, इंजीनियरिंग लेकिन खुद का ज्ञान यानी नॉलेज ऑफ द सेल्फ पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। कोई उन्हें यह नहीं सिखा रहा था कि अपने डर, अपनी ए्जायटी, अपने गुस्से और अपने लालच को कैसे मैनेज करें। इसी गैप को भरने के लिए उसने होलिस्टिक इंडिविजुअल डेवलपमेंट प्रोग्राम डिजाइन किया। उसका यह प्रोग्राम मुख्य रूप से अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स पर फोकस्ड था जो उसकी टोटल ऑडियंस का 90% से भी ज्यादा थे। उसका यह इनिशिएटिव किसी रॉकेट की रफ्तार से आगे बढ़ा। सिर्फ 2 साल के अंदर वह लगभग
30:16 100 टीचर्स की एक टीम को मैनेज कर रहा था और 50 से भी ज्यादा इंस्टट्यूट्स में 20,000 से ज्यादा स्टूडेंट्स के साथ एक ही समय पर काम कर रहा था। यह एक बड़ी कामयाबी थी। वह चाहता तो इसे एक बहुत बड़े और सफल बिजनेस में बदल सकता था। लेकिन प्रशांत के मन में कुछ और ही चल रहा था। 2008 तक आते-आते जब वह 30 साल का था, उसे एक गहरा संकट महसूस होने लगा। अद्वैत लाइफ एजुकेशन की बाहरी कामयाबी के बावजूद उसे लग रहा था कि उसका काम बहुत सतही है, बहुत सुपरफिशियल है। उसका एचआईडीपी प्रोग्राम स्टूडेंट्स के बिहेवियर को बदलने में, उनकी पर्सनालिटी को सुधारने में तो कामयाब था। लेकिन यह युवाओं के मन में गहरे बैठे
31:03 अज्ञान, उनके दर्द और उनकी तकलीफ को मूल से मिटाने में नाकामयाब था। वह अपनी ऑर्गेनाइजेशन को सिर्फ एक पैसा कमाने वाली मशीन बनते हुए नहीं देख सकता था। उसने एक क्रांतिकारी फैसला लिया। उसने फैसला किया कि वह इस ऑर्गेनाइजेशन को ही एक हथियार की तरह इस्तेमाल करेगा। मन के अंदर बैठे उस राक्षस से सीधे लड़ने के लिए। उसने आक्रामक तरीके से अपने करिकुलम को कॉर्पोरेट सेल्फ हेल्प से बदलकर शुद्ध अनफिल्टर्ड स्पिरिचुअलिटी की तरफ मोड़ दिया। यह एक बहुत बड़ा रिस्क था। उसने संवाद नाम से बड़े-बड़े डायलेक्टिकल सेमिनार्स शुरू किए। वो इंजीनियरिंग कैंपसेस में ऐसे टेक्स्ट्स लेकर गया जिनके
31:48 बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था। उसने कबीर इन कैंप्स जैसे प्रोग्राम शुरू किए जहां वह संत कबीर के तीखे समाज पर चोट करने वाले भजनों का इस्तेमाल करता था। उसने सो सेट द सेजेस जैसे प्रोग्राम शुरू किए। जहां वो उपनिषदों के गूढ़ रहस्यमय श्लोकों पर बात करता था। सोचिए जिन इंजीनियरिंग कैंपसेस में सिर्फ सर्किट, कोर्ट्स और मशीन की बात होती थी, वहां अब कबीर, उपनिषद और अष्टावक्र गीता की बातें होने लगी थी। यह एक रेडिकल कदम था और इसका रिएक्शन भी उतना ही गहरा हुआ। उसे चारों तरफ से भारी विरोध का सामना करना पड़ा। होस्ट कॉलेज की एडमिनिस्ट्रेशन, फैकल्टी मेंबर्स और सबसे बढ़कर स्टूडेंट्स के
32:35 माता-पिता सब उसके खिलाफ हो गए। यह सभी लोग हायर एजुकेशन को सिर्फ एक ही नजर से देखते थे। एक अच्छी मोटी तनख्वाह वाली कॉर्पोरेट नौकरी पाने का रास्ता। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वेदांत की फिलॉसफी का उनके बच्चों के ग्रेड्स और कैरियर से क्या लेना देना है। इंस्टिटशंस नाराज और असहज होने लगे। उन्हें एक ऐसी टीचिंग से खतरा महसूस होने लगा जो बच्चों को कॉर्पोरेट गुलामी की जगह आंतरिक आजादी को प्राथमिकता देना सिखा रही थी। लेकिन वह इस प्रोग्राम को पूरी तरह से बंद भी नहीं कर पा रहे थे। क्योंकि जो स्टूडेंट्स इन सेशंस में हिस्सा ले रहे थे, उनके अंदर एक साफ पॉजिटिव बदलाव दिखाई दे रहा था। उनकी
33:21 आंखों में एक नई चमक थी। उनके सवालों में एक नई गहराई थी। प्रशांत इस विरोध के बीच भी डटा रहा। उसने उन लोगों पर ध्यान देना बंद कर दिया जो सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे थे और अपना पूरा फोकस उन स्टूडेंट्स पर लगा दिया जिनके अंदर सच जानने की एक असली प्यास दिखाई दे रही थी। यह छटाई की एक प्रक्रिया थी। भीड़ कम हो रही थी। लेकिन जो बच रहे थे वह हीरे थे। लेकिन कैंपस की बंदिशें, सिलेबस का दबाव और एडमिनिस्ट्रेशन का दखल यह सब उसके काम को सीमित कर रहे थे। उसे एक ऐसी जगह की तलाश थी जहां वह बिना किसी रोक-टोक के अपनी पूरी शिद्दत से इस ज्ञान को बांट सके और यह तलाश उसे हिमालय की गोद में ले जाने
34:09 वाली थी। चैप्टर से द हिमालयन क्रूसिबल साल था 2010 प्रशांत 32 साल का हो चुका था। यूनिवर्सिटी कैंपस का माहौल उसे अब घुटन भरा लगने लगा था। वो यूनिवर्सिटी के सिलेबस, पेरेंट्स की दखल अंदाजी और इंस्टट्यूट के टाइम टेबल्स की जंजीरों से पूरी तरह आजाद होना चाहता था। उसे एक ऐसी खुली, शांत और पवित्र जगह चाहिए थी जहां सत्य के खोजी बिना किसी डिस्ट्रक्शन के खुद में गहरे उतर सके। और ऐसी जगह हिमालय से बेहतर और क्या हो सकती थी। इसी सोच के साथ उसने अपने काम को एक नया आयाम दिया। उसने अपना पहला हिमालयन कैंप ल्च किया। वह 20 से 50 सीरियस सीकर्स के छोटे-छोटे
34:54 ग्रुप्स को लेकर हिमालय की दूरदराज शांत वादियों में जाने लगा। यह तीन से सात दिन के इंटेंस स्पिरिचुअल रिट्रीट्स होते थे। इन कैंपस का माहौल किसी पिकनिक जैसा नहीं होता था। यह एक दिमागी और रूहानी भट्टी की तरह थे। दिन रात दुनिया भर के महानतम संतों और दार्शनिकों के ग्रंथों पर गहरी चर्चा होती। उपनिषद गीता कबीर रूमी लाउत्सु ज्ञान की गंगा हर दिशा से बह रही थी यहां कोई लेक्चर नहीं होता था सिर्फ एक गहरा संवाद होता था एक तीखी पूछताछ होती थी प्रशांत हर एक पार्टिसिपेंट को उसके झूठ उसके डर और उसकी कंडीशनिंग का सामना करने के लिए मजबूर कर देता था हिमालय की वो खामोशी वो साफ हवा यह सब मिलकर एक ऐसा
35:42 माहौल बनाते थे जहां इंसान के लिए अपने ही मन के शोर से भागना नामुमकिन हो जाता था। इन्हीं इंटेंस मेडिटेटिव कैंपस के दौरान एक गहरा बदलाव आया। जो साधक अब तक प्रशांत को एक एकेडेमिक टाइटल सर कहकर बुलाते थे, उन्होंने धीरे-धीरे अपने आप उसे आचार्य कहना शुरू कर दिया। आचार्य का मतलब सिर्फ टीचर नहीं होता। आचार्य वह होता है जो सिर्फ सिखाता नहीं बल्कि अपने आचरण से अपने जीवन से उस ज्ञान को जीता भी है। यह कोई दिया गया टाइटल नहीं था। यह उन लोगों के दिलों से निकली एक उपाधि थी जिन्होंने उसके ज्ञान की गहराई और उसकी सच्चाई के प्रति उसकी निष्ठा को बहुत करीब से महसूस किया था। यह वह पल था जब प्रशांत त्रिपाठी
36:30 द कॉरपोरेट एग्जीक्यूटिव की औपचारिक मृत्यु हुई और आचार्य प्रशांत का जन्म हुआ। आचार्य प्रशांत को यह एहसास हो गया था कि फिजिकल कैंपस की अपनी एक सीमा है। वह एक बार में कुछ ही लोगों तक पहुंच सकते थे। लेकिन दुनिया में करोड़ों लोग थे जो इसी तरह के सवालों से जूझ रहे थे। उन तक कैसे पहुंचा जाए? इसका जवाब था टेक्नोलॉजी। उन्होंने अपने डिजिटल प्रेजेंस के बीज बोने शुरू कर दिए। 2011 में उनके प्रवचनों की पहली रिकॉर्डिंग शुरू हुई। शुरू में सिर्फ एक इंग्लिश YouTube चैनल ल्च किया गया। फिर 2014 में एक हिंदी चैनल भी शुरू हुआ। यह शुरुआती साल बहुत शांत थे। वह बस चुपचाप लगातार
37:16 बिना किसी तुरंत वायरल होने की उम्मीद के अपना काम करते रहे। हजारों वीडियो रिकॉर्ड किए गए जिनमें जिंदगी के हर छोटे बड़े सवाल का जवाब वेदांत की रोशनी में दिया गया था। उन्हें यह भी समझ आ गया था कि अगर उन्हें अपनी बात बिना किसी मिलावट के सीधे आम जनता तक पहुंचानी है तो उन्हें हर तरह के बिचोलियों यानी एकेडेमिक और कॉर्पोरेट इंस्टीटशंस को बायपास करना होगा। इसी मकसद से 2015 में उन्होंने औपचारिक रूप से प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन को एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन के तौर पर रजिस्टर करवाया। यह फाउंडेशन सिर्फ एक संस्था नहीं थी। यह स्पिरिचुअलिटी को देखने का एक नया
38:02 नजरिया था। पारंपरिक आश्रमों की तरह यहां सूखा रंगहीन वैराग्य नहीं था। यहां जिंदगी को उसकी पूरी शिद्दत के साथ सेलिब्रेट किया जाता था। बोधमई होली जैसे इवेंट्स होते जहां साधक नाचते, भजन गाते और रंगों की जगह अपनी ट्रांसफॉर्मेशन की कहानियां एक दूसरे से शेयर करते। यह रंग थे उनके संघर्ष के, उनके आंसुओं के और उनकी जीत के। यह आचार्य प्रशांत के उस फलसफे का प्रतीक था कि जो आग से होकर गुजरता है वही चमक सकता है। फाउंडेशन ने बड़े पैमाने पर ऑनलाइन कोर्सेज भी ल्च किए ताकि दुनिया के किसी भी कोने में बैठा इंसान सीधे उपनिषदों और गीता का अध्ययन कर सके। यह वह
38:48 दौर था जब मिशन ने अपनी असली शक्ल लेना शुरू कर दिया था। हिमालय की गोद में जो बीज बोया गया था वह अब डिजिटल दुनिया में एक विशाल वृक्ष बनने की तैयारी कर रहा था। एक ऐसा वृक्ष जिसकी छांव में करोड़ों बेचैन मन सुकून पाने वाले थे। लेकिन इस वृक्ष की रूट्स किस दर्शन में थी? आचार्य प्रशांत की फिलॉसफी का मूल सार क्या था? वह कौन से क्रांतिकारी विचार थे जो करोड़ों लोगों को अपनी तरफ खींच रहे थे और साथ ही साथ एक बड़े विवाद को भी जन्म दे रहे थे। यह हम समझेंगे अगले अध्याय में। चैप्टर एट द आर्किटेक्चर ऑफ लिबरेशन। आचार्य प्रशांत की फिलॉसफी या दर्शन को समझना एक तेज धार वाली तलवार पर चलने जैसा
39:36 है। यह आरामदायक नहीं है। यह तसल्ली नहीं देती। यह आपके हर विश्वास की नींव को हिला देती है। उनका पूरा दर्शन क्लासिकल अद्वैत वेदांत की चट्टान पर खड़ा है। लेकिन उन्होंने इसे सदियों की धूल, अंधविश्वास और पौराणिक कथाओं के बोझ से पूरी तरह आजाद कर दिया है। वह स्पिरिचुअलिटी को कुछ मानने या यकीन करने की चीज की तरह पेश नहीं करते। बल्कि एक सर्जिकल साइंटिफिक प्रोसेस की तरह पेश करते हैं। जिसका एकमात्र मकसद मन पर चढ़ी झूठी कंडीशनिंग की परतों को एक-एक करके काट कर हटा देना है। उनके दर्शन का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है कर्मकांड और परंपरा का अंधाधुंध विरोध। वह कहते हैं कि आज हम
40:22 जिसे धर्म समझकर कर रहे हैं। वह ज्यादातर सिर्फ खाली रस्में हैं जो वेदांत के असली सत्य पर एक पर्दे की तरह काम करती हैं। पारंपरिक हिंदू संप्रदाय शोष संस्कार, मूर्ति पूजा और मंदिरों के बड़े-बड़े आयोजनों पर बहुत जोर देते हैं। आचार्य प्रशांत इन सभी प्रैक्टिसेस को बहुत तर्क के साथ डीकंस्ट्रक्ट करते हैं। वह सीधे भगवत गीता के दूसरे अध्याय के 45 वे श्लोक का हवाला देते हैं। जहां श्री कृष्ण खुद अर्जुन से कहते हैं कि वह वेदों के कर्मकांड वाले हिस्से से ऊपर उठ जाए। वह कहते हैं कि यह सारे कर्मकांड प्रकृति के तीन गुणों से जड़े हैं और यह इंसान के अहंकार की एक ही भूख को शांत करने के लिए
41:09 है। दुनियावी चीजों को पाने की भूख उनके मुताबिक इंसान अपने अंदर की इच्छाओं को बाहर प्रोजेक्ट करता है। वह ऐसे देवी देवताओं की कल्पना करता है जो उसकी इच्छाएं पूरी कर सकें और फिर उन देवी देवताओं के चारों ओर खोखले रीति रिवाजों का एक जाल बुन लेता है। जब कोई रस्म लालच की नींव पर खड़ी होती है तो वह अहंकार को मिटाने की जगह उसे और मजबूत करती है। असली मुक्ति या लिबरेशन के लिए इन सतह परफॉर्मेंस पर सवाल उठाने का साहस चाहिए और अपने अंदर की सच्चाई का सामना करना पड़ता है। उनका दूसरा क्रांतिकारी विचार कर्म और पुनर्जन्म की पारंपरिक धारणा को तोड़ता है। आम धारणा में कर्म को अच्छे और
41:54 बुरे कामों का एक कॉस्मिक हिसाब किताब माना जाता है। जिसका फल हमें भविष्य में मिलता है। लेकिन आचार्य प्रशांत अपनी बेस्ट सेलिंग किताब कर्मा में विश्लेषण का लेंस पूरी तरह से कर्म से हटाकर कर्ता पर ले आते हैं। वो साधक से लगातार एक ही सवाल पूछते हैं। यह काम करने वाला कौन है और वह इस काम से क्या चाहता है? वह जोर देकर कहते हैं कि हमारे काम तो बस एक बहाना है, एक जरिया है अपने ही छिपे हुए मन की कंडीशनिंग, अपनी पहचान और अपने असली इरादों को समझने का। इसी तरह पुनर्जन्म पर उनका नजरिया व्यक्तिगत अम्रता के आरामदायक भ्रम को चखनाचूर कर देता है। वह साफ-साफ कहते हैं कि व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं
42:41 होता। किसी इंसान का मरने के बाद फिर से उसी रूप में पैदा हो जाना एक बहुत बड़ा मिथक है जिसने समाज में बहुत आलस, अन्याय और चीजों को टालने की प्रवृत्ति को जन्म दिया है। उनके अनुसार जो चीज पुनर्जन्म लेती है वह है अहम वृत्ति यानी मैं होने का जो बेसिक भाव है जो मदर टेंडेंसी है। यह एक जेनेरिक टेंडेंसी है जो लगातार नए-नए रूप लेती रहती है। भ्रम की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में भटकती रहती है। लेकिन आपकी व्यक्तिगत पर्सनालिटी आपकी यादें आपके रिश्ते वह सब मौत के साथ ही पूरी तरह खत्म हो जाते हैं। यह व्याख्या साधक को अगले जन्म के भरोसे बैठने की जगह इसी जन्म में अभी और इसी पल में मुक्ति
43:27 पाने के लिए मजबूर करती है। उनके दर्शन का तीसरा और सबसे विवादास्पद हिस्सा है नैतिकता। खासकर विगनिज्म और महिलाओं की आजादी। आचार्य प्रशांत विग्निज्म के दुनिया के सबसे मुखर और ताकतवर पैरोकारों में से एक हैं। वह जानवरों के प्रति होने वाली क्रूरता को सीधे-सीधे आध्यात्मिक पतन से जोड़ते हैं। उनका तर्क तीन स्तरों पर काम करता है। पहला साइंटिफिक। वह इस मिथक को तोड़ते हैं कि इंसान हमेशा से मांसाहारी रहा है। वह बताते हैं कि आज जो मांस खाने का चलन है वह मुश्किल से 200 साल पुराना है और इसका कारण सिर्फ इंडस्ट्रियलाइजेशन और बड़े-बड़े बिजनेस के हित है। दूसरा एनवायरमेंटल।
44:13 वह बताते हैं कि पशुपालन क्लाइमेट चेंज का सबसे बड़ा कारण है जो फॉसिल फ्यूल से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है। और तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण स्पिरिचुअल वो एक सीधा सवाल पूछते हैं जो मन किसी बेजुबान जानवर को तड़पाने और मारने के लिए पैसे दे सकता है। क्या वह मन कभी सत्य प्रेम और अहिंसा को उपलब्ध हो सकता है? उनके लिए यह दोनों चीजें एक साथ संभव नहीं है। इसी तरह वह शादी की संस्था पर भी एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक हमला करते हैं। वह कहते हैं कि ज्यादातर शादियां प्यार से नहीं बल्कि डर से होती है। अकेले रह जाने का डर, समाज क्या कहेगा इसका डर और फिजिकल और
44:58 फाइनेंशियल सिक्योरिटी की जरूरत। वह खासतौर पर महिलाओं की कंडीशनिंग पर चोट करते हैं। जिन्हें बचपन से सिखाया जाता है कि शादी और घर गृहस्ती ही उनकी जिंदगी का अंतिम लक्ष्य है। यह कंडीशनिंग महिलाओं की चेतना को सिकोड़ देती है। अक्सर उनके आलोचक उनके खुद के अविवाहित होने को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट पर आचार्य प्रशांत वाइफ एक टॉप सर्च क्वेरी है। यह दिखाता है कि जब किसी की बातें हमारे आराम देह विश्वासों को तोड़ती हैं, तो हम बात को गलत साबित करने की जगह उस इंसान को ही गलत साबित करने में लग जाते हैं। यह ईगो का एक डिफेंस मैकेनिज्म है। आचार्य प्रशांत का पूरा दर्शन इसी ईगो
45:45 के खेल को बेनकाब करने के लिए है। वह कोई नई फिलॉसफी नहीं दे रहे हैं। वह तो बस सदियों पुरानी सच्चाई के ऊपर पड़ी धूल को साफ कर रहे हैं। और इस प्रक्रिया में वह किसी की भावनाओं की परवाह नहीं करते। उनकी आवाज एक आईने की तरह है और आईना वही दिखाता है जो सच है। चाहे वह कितना भी कड़वा क्यों ना हो। चैप्टर नाइन द डिजिटल सुनामी। 2015 के बाद का दौर आचार्य प्रशांत के मिशन के लिए एक एक्सप्लोसिव ग्रोथ का दौर था। उन्होंने समझ लिया था कि 21वीं सदी की लड़ाई 21वीं सदी के हथियारों से ही लड़ी जाएगी। और सबसे बड़ा हथियार था इंटरनेट। उन्होंने मॉडर्न डिजिटल आर्किटेक्चर का इस्तेमाल प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान को
46:32 दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए किया और वह भी एक ऐसे स्केल पर जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 2026 तक आते-आते आचार्य प्रशांत ने इंटरनेट पर आध्यात्मिक ज्ञान का दुनिया का सबसे बड़ा खजाना तैयार कर दिया था। उनका मुख्य YouTube चैनल 60 मिलियन यानी 6 करोड़ सब्सक्राइबर्स के आंकड़े को पार कर चुका था। उनके वीडियोस पर टोटल व्यूज 5.6 बिलियन यानी 560 करोड़ से भी ज्यादा थे। अगर Facebook, Instagram, Twitter और थ्रेड्स जैसे सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मिला दिया जाए तो उनकी एक्टिव ऑडियंस 70 से 80 मिलियन यानी 7 से 8 करोड़ लोगों की थी। हर रोज लाखों मिनट
47:20 उनके वीडियोस देखे जाते थे। यह आंकड़े किसी भी स्पिरिचुअल टीचर के लिए अनसुने थे। उन्होंने स्पिरिचुअलिटी को आश्रमों और गुफाओं से निकालकर हर किसी के मोबाइल फोन तक पहुंचा दिया था। प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के जरिए उन्होंने एक बहुत बड़ा औरत्वाकांक्षी गीता मिशन लांच किया। यह भगवत गीता और वेदांत पर आधारित एक बहुत प्रशंसित ऑनलाइन टीचिंग प्रोग्राम था। इस मिशन ने डेढ़ से दो लाख एक्टिव पार्टिसिपेंट्स का एक कम्युनिटी बनाया जो हर महीने 15 से ज्यादा लाइव सेशंस और ऑनलाइन एग्जाम्स में हिस्सा लेते थे। हाल ही में इस मिशन ने दुनिया का सबसे बड़ा ऑनलाइन गीता आधारित स्पिरिचुअल एग्जाम आयोजित करने का रिकॉर्ड भी बनाया। यह
48:07 सिर्फ ज्ञान का प्रसार नहीं था। यह एक आंदोलन था। एक ऐसा आंदोलन जो युवाओं को यह बता रहा था कि गीता सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है बल्कि जीवन जीने की एक प्रैक्टिकल हैंडबुक है जो उनकी रोजमर्रा की समस्याओं जैसे स्ट्रेस, कंफ्यूजन और रिलेशनशिप के मुद्दों को सुलझाने में मदद कर सकती है। डिजिटल दुनिया के साथ-साथ उन्होंने लेखन के माध्यम से भी अपनी बात को लोगों तक पहुंचाया। वह एक प्रोलिफिक लेखक हैं। जिन्होंने 160 से भी ज्यादा किताबें प्रकाशित की हैं। जिनमें 20 से ज्यादा नेशनल बेस्ट सेलर्स शामिल हैं। उनकी किताबें एक पुल की तरह काम करती हैं। वो प्राचीन शास्त्रों के बहुत मुश्किल
48:53 फिलॉसोफिकल कांसेप्ट्स को आज की भाषा में बहुत सरल और प्रैक्टिकल तरीके से समझाती हैं। उनकी किताब कर्मा व्हाई एवरीथिंग यू नो अबाउट इट इज रोंग। ने कर्म की पूरी धारणा को ही बदल दिया। उन्होंने लोगों को सिखाया कि एक्शन से ज्यादा महत्वपूर्ण एक्शन करने वाले की नियत होती है। उनकी किताब आनंदा हैप्पीनेस विदाउट रीजन ने आज के सेल्फ हेल्प गुरुओं द्वारा बेचे जा रहे लिव इन द प्रेजेंट जैसे खोखले नारों की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने क्षणिक बाहरी खुशी और बिना किसी कारण के होने वाले आंतरिक आनंद के बीच का फर्क समझाया। उनकी किताब माया आई गो टू दी यू कैन नॉट बी ओवरकम ने माया के कांसेप्ट को किसी
49:41 रहस्यमई जादू की तरह नहीं बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में चलने वाले मनोवैज्ञानिक खेल और आत्म धोखे के रूप में समझाया। यह डिजिटल सुनामी सिर्फ कंटेंट का फैलाव नहीं था। यह चेतना का विस्तार था। आचार्य प्रशांत ने टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लोगों को बेहोश करने या उनका ध्यान भटकाने के लिए नहीं किया। जैसा कि आज ज्यादातर सोशल मीडिया कर रहा है। उन्होंने उसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लोगों को जगाने के लिए, उन्हें खुद से सवाल पूछने के लिए और उन्हें अपनी जिंदगी की बागडोर अपने हाथों में लेने के लिए प्रेरित करने के लिए किया। उन्होंने दिखा दिया कि अगर इरादा नेक हो तो इंटरनेट एक वरदान साबित हो सकता है। लेकिन जब कोई आवाज इतनी बुलंद हो जाए,
50:29 जब कोई शख्सियत इतनी बड़ी हो जाए तो उसका विरोध होना भी लाजमी है। एक तरफ करोड़ों लोग थे जो उन्हें एक मसीहा की तरह देख रहे थे तो दूसरी तरफ एक बहुत बड़ा तबका था जो उन्हें एक खतरे की तरह देख रहा था। एक ऐसा खतरा जो उनकी सदियों पुरानी मान्यताओं, उनकी दुकानों और उनके सिंहासनों को हिला रहा था। यह टकराव अब खुलकर सामने आने वाला था। आचार्य प्रशांत को अब ना सिर्फ बाहरी दुनिया से बल्कि धर्म और अध्यात्म की दुनिया के अंदर से भी एक बड़ी लड़ाई लड़नी थी। चैप्टर 10 द इनविटेबल कॉन्फ्लिक्ट। कोई भी दर्शन जो समाज के धार्मिक और सांस्कृतिक स्टेटस को ऊपर इतनी बेरहमी से हमला करता है वह संघर्ष को जन्म देगा ही।
51:18 आचार्य प्रशांत के तर्क के चाकू ने जब धर्म के नाम पर चल रहे अंधविश्वासों पर चलना शुरू किया तो उन्हें एक तरफ तो अपार भक्ति मिली और दूसरी तरफ उतना ही तीखा संगठित विरोध। यह लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ी जा रही थी। सबसे बड़ा मोर्चा था पारंपरिक हिंदू संप्रदायों और स्मार्थ अनुयायियों का। यह लोग आचार्य प्रशांत पर सनातन धर्म को भ्रष्ट करने का आरोप लगाते थे। आलोचकों का तर्क था कि उनका पुराणों, इतिहास, मंदिर के कर्मकांडों और शोष संस्कारों को पूरी तरह से खारिज कर देना एक अधूरे ज्ञान का प्रतीक है। वह कहते थे कि यह आधा अधूरा अद्वैत है जिसमें अब्राहमिक मूल्य मिले हुए हैं। विरोधियों
52:03 का दावा था कि सिर्फ बौद्धिक आत्म जागरूकता और दार्शनिक डीकंस्ट्रक्शन पर जोर देकर वह भक्ति और उन विशेष साधनाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं, जिन्होंने हजारों सालों से इस धर्म को जीवित रखा है। उनका तर्क था कि पुराणों में वर्णित ईश्वर के पांच रूपों का उपयोग किए बिना सच्चे अद्वैत को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। लेकिन उनके समर्थक और निष्पक्ष समाजशास्त्री इसके जवाब में कहते थे कि भारत में संगठित धर्म काफी हद तक गहरे अंधविश्वास, व्यवसायकरण और अंधी आस्था में उलझ गया है। उनका तर्क था कि प्रशांत का यह मूर्ति भंजक यानी आइकोनोप्लास्टिक दृष्टिकोण उस जनता में साइंटिफिक टरामेंट, इमोशनल इंटेलिजेंस और क्रिटिकल थिंकिंग
52:50 पैदा करने के लिए बहुत जरूरी है जो हटधर्मिता के बोझ तले दबी हुई है। आचार्य प्रशांत खुद राजनीतिक गुठों द्वारा सनातन धर्म की रक्षा के नाम पर किए जाने वाले शोर को सत ही मानते थे। उनका कहना था कि यह लोग सिर्फ लेबल्स पर लड़ रहे हैं और उस असली बीमारी को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहे हैं जिसे सच्चा धर्म ठीक करना चाहता है। यानी इंसान के मन में बैठा डर, लालच और गुलामी। विवाद का एक दूसरा केंद्र था। उनका दूसरे समकालीन आध्यात्मिक गुरुओं की तरफ उनका आलोचनात्मक रवैया खासकर सद्गुरु के प्रति आचार्य प्रशांत जिसे गढ़ व्यवसायकरण कहते हैं। उसके प्रति अपनी अवमानना को बिना छिपाए उन्होंने सार्वजनिक
53:37 रूप से और व्यवस्थित तरीके से दूसरे गुरुओं द्वारा प्रचारित कई कांसेप्ट्स को खारिज कर दिया। उन्होंने रुद्राक्ष की माला में किसी भी तरह की रहस्यमय शक्ति होने से इंकार किया। ब्रह्म मुहूर्त [गला साफ़ करने की आवाज़] में कोई भी आध्यात्मिक विशिष्टता होने से इंकार किया और इस दावे को कि किसी भौतिक स्थान को प्रतिष्ठित करके उसमें से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार किया जा सकता है। जनता को मूर्ख बनाने का एक तरीका बताया। इसका परिणाम यह हुआ कि दोनों गुरुओं के अनुयायियों के बीच लगातार डिजिटल लड़ाईयां चलती रहती हैं। आलोचक आचार्य प्रशांत को अभिमानी, कटु, असहिष्णु और हमेशा गुस्से में रहने वाला बताते हैं। फिर भी एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से देखें तो उनका
54:25 गुस्सा एक जानबूझकर इस्तेमाल किया गया शैक्षणिक उपकरण लगता है। एक शॉक टेक्टिक जो सुनने वाले को उसकी बौद्धिक शालीनता और आराम से बाहर निकालने के लिए डिजाइन किया गया है। जहां सद्गुरु जैसे गुरु आरामदायक रहस्यमय स्पष्टीकरण और गढ़ समाधान प्रदान करते हैं। वहीं आचार्य प्रशांत कठोर मनोवैज्ञानिक डीकंस्ट्रक्शन प्रदान करते हैं। जो स्वाभाविक रूप से उन लोगों को आकर्षित करता है जो आध्यात्मिक बाजार के मीठे झूठ से थक चुके हैं। यह संघर्ष दिखाता है कि सत्य का मार्ग कभी भी आसान नहीं होता। जब भी कोई पुरानी आरामदायक धारणाओं को चुनौती देता है तो उसे विरोध का सामना करना ही पड़ता है। आचार्य
55:11 प्रशांत की लड़ाई किसी व्यक्ति या किसी संस्था से नहीं थी। उनकी लड़ाई अज्ञान से थी और अज्ञान हर उस इंसान के अंदर बैठा है जो बिना सवाल किए किसी भी बात को मान लेता है। जैसे-जैसे उनका प्रभाव भारत की सीमाओं को लांघ कर दुनिया भर में फैल रहा था। यह स्पष्ट होता जा रहा था कि वह सिर्फ एक आध्यात्मिक गुरु नहीं है। वह एक ग्लोबल पब्लिक इंटेलेक्चुअल, एक सामाजिक सुधारक और एक दार्शनिक योद्धा के रूप में उभर रहे थे। दुनिया के सबसे बड़े मंच अब उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे और उनकी आवाज अब उन गलियारों में गूंजने वाली थी जहां दुनिया का भविष्य तय होता है। अब आखिर में कंक्लूजन तो यह थी कहानी प्रशांत त्रिपाठी
55:58 की जो आचार्य प्रशांत बने। एक लड़के की कहानी जो गाजियाबाद की रातों में चांद को देखकर कविताएं लिखता था। एक ब्यूरोक्रेट एस्पिरेंट की कहानी जिसने पावर की सीमाओं को समझा और अंत में एक ग्लोबल स्पिरिचुअल रिफॉर्मर की कहानी उनकी पूरी जिंदगी एक अथक कभी ना खत्म होने वाली अस्तित्व की खोज का एक मास्टर क्लास है। उनकी कहानी की परिभाषा व्यवस्था द्वारा दिए गए सम्मान को इकट्ठा करने में नहीं है। क्योंकि उन्होंने आईआईटी, आईआईएम और सिविल सर्विसेज जैसी सबसे प्रतिष्ठित उपलब्धियों को एक-एक करके जीता और फिर उन्हें कचरे की तरह फेंक दिया। उनकी कहानी की परिभाषा उस साहस में है जिसने उन्हें समाज द्वारा
56:43 बनाई गई सफलता के हर भ्रम को बेरहमी से तोड़ने की हिम्मत दी। आचार्य प्रशांत से हम क्या सीख सकते हैं? पहली और सबसे बड़ी सीख है सवाल पूछने की हिम्मत। उस हर चीज पर सवाल उठाओ जिसे तुम्हें बचपन से मानना सिखाया गया है। अपने धर्म पर, अपनी परंपराओं पर, अपने समाज पर और सबसे बढ़कर अपने खुद के मन पर। क्योंकि बिना सवाल के मिली हर चीज गुलामी है। दूसरी सीख है असली और नकली सफलता के बीच फर्क करना। समाज जिसे सफलता कहता है, एक बड़ी नौकरी, एक बड़ा घर, एक महंगी गाड़ी। क्या वह सच में आपको खुशी देती है? या वह सिर्फ आपके डर को ढकने का एक तरीका है। आचार्य प्रशांत का जीवन हमें दिखाता है कि असली सफलता
57:29 बाहरी उपलब्धियों में नहीं बल्कि आंतरिक आजादी में है। उस डर से मुक्ति में है जो हमें पूरी जिंदगी दोहराता रहता है। उन्होंने अद्वैत वेदांत को उसके पौराणिक बोझ, कर्मकांडों के भार और व्यवसाईकरण के मैल से साफ करके उसे आज के युग के लिए एक प्रैक्टिकल अर्जेंट साइकोलॉजिकल टूल में बदल दिया। उन्होंने प्राचीन ज्ञान को आज की पीढ़ी के लिए लोकतांत्रिक बना दिया। चाहे वह ग्लोबल एनिमल एग्रीकल्चर इंडस्ट्री को चुनौती दे रहे हो या शादी की संस्था के पीछे छिपे सामाजिक आर्थिक दबावों को उजागर कर रहे हो या फिर रूढ़िवादी धार्मिक परंपरावादियों का सामना कर रहे हो उनका पूरा काम एक ही मूल आधार पर काम करता है। इंसान का सारा दुख उसकी
58:18 सारी वृक्षा उसके अपने ही झूठे अनएग्जामिड मैं के साथ आइडेंटिफिकेशन में निहित है। आज जब उनका डिजिटल फुटप्रिंट अरबों व्यूज को पार कर चुका है और उनकी शिक्षाएं दुनिया के सबसे बड़े एकेडमिक इंस्टिट्यूशन में प्रवेश कर रही हैं। आचार्य प्रशांत आधुनिक दार्शनिक सुधार के एक महत्वपूर्ण वास्तुकार के रूप में खड़े हैं। वह एक अथक ना झुकने वाले आईने की तरह काम कर रहे हैं। जो इस गहरी विचलित दुनिया को अपनी ही अनेक जामिन परछाई का सामना करने के लिए मजबूर कर रहा है। इस ऐतिहासिक यात्रा में हमारे साथ शामिल होने के लिए आपका धन्यवाद। अगर आपको यह कहानी पसंद आई और इसने आपको सोचने पर मजबूर किया तो इस
59:05 वीडियो को लाइक करें। कमेंट्स में अपने विचार हमारे साथ शेयर करें और ऑडियो बुक लेजेंड्स चैनल को सब्सक्राइब करना ना भूलें ताकि हम ऐसी कहानियों को जीवित रख सकें।