0:00 क्या आपने कभी सोचा है कि हम हर काम को बस खत्म करने की जल्दी में क्यों रहते हैं? क्यों हमें सुकून सिर्फ मंजिल में दिखता है? सफर में नहीं। क्या ऐसा नहीं लगता कि हम हर दिन कुछ बड़ा पाने की दौड़ में खुद से अपने ध्यान से अपने शांति से बहुत दूर चले गए हैं? दोस्तों, आज की इस तेज भागती दुनिया में अगर कोई चीज सबसे ज्यादा मिसिंग है, तो वह है ठहराव, मन का स्थिर रहना। हम सब कुछ हासिल करना चाहते हैं। लेकिन वह अब और यहीं में जीना भूल गए हैं। और यही वजह है कि आज मैं आपके लिए लेकर आया हूं एक ऐसी किताब जो आपके सोचने, जीने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देगी। नाम है मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड। एक ऐसी ऑडियो बुक जो हमें सिखाती
0:46 है कि असली सफलता सिर्फ मंजिल पाने में नहीं बल्कि उस सफर में छुपी होती है जिसे हम बार-बार दोहराते हैं जिसे हम अभ्यास कहते हैं। यह सिर्फ एक किताब नहीं है। यह एक माइंडसेट है और आज हम इसी माइंडसेट को गहराई से समझेंगे, महसूस करेंगे और अपनी जिंदगी में उतारेंगे। तो अगर आप भी बार-बार डायवर्ट हो जाते हैं, अपने गोल से भटक जाते हैं और चाहते हैं एक ऐसा फोकस जो ना सिर्फ आपकी परफॉर्मेंस को बल्कि आपकी जिंदगी को भी अंदर से बदल दे तो यह वीडियो आपके लिए है। बने रहिए मेरे साथ अंत तक क्योंकि आगे हम बात करने वाले हैं उस सोच की, उस सिस्टम की और उस प्रैक्टिस की जो आपको एक नया इंसान बना देगी। तो चलिए शुरू करते हैं। एक ऐसी यात्रा जो आपकी अंदर की
1:33 आवाज को फिर से जिंदा कर देगी। मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड की सफर में। क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि आप हर काम को जल्दी-जल्दी खत्म करना चाहते हैं। जैसे बस कोई काम जल्दी निपट जाए ताकि अगला शुरू कर सकें। लेकिन फिर भी दिल के अंदर एक अजीब सी खालीपन रह जाती है। ऐसा लगता है कि बहुत कुछ किया लेकिन कुछ भी पूरा नहीं हुआ। जिंदगी जैसे एक ना खत्म होने वाली दौड़ बन गई है। जहां ना कोई ठहराव है ना ही कोई सुकून का एहसास। हम सब हर वक्त कुछ बड़ा करने की सोच में रहते हैं। बड़ी नौकरी, बड़ा घर, ज्यादा पैसा लेकिन उसी भागदौड़ में हमारा मन कभी शांत नहीं होता। हम काम तो कर रहे होते हैं, लेकिन ध्यान कहीं और भटक रहा होता है। या तो अतीत की
2:19 चिंता में या भविष्य की उलझनों में। ऐसे में हमारे अंदर एक बेचैनी घर कर जाती है। एक थकान जो आराम से नहीं जाती। लेकिन दोस्तों, इसी उलझन भरी जिंदगी में मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड नाम की यह किताब एक उम्मीद की तरह सामने आती है। यह किताब हमें बताती है कि असली खुशी और सफलता किसी मंजिल तक पहुंचने में नहीं बल्कि उस सफर को जीने में है जिसे हम अभ्यास कहते हैं। यानी हर रोज थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ना। बिना जल्दबाजी के, बिना खुद को थकाए। इस किताब को लिखने वाले हैं थॉमस एमस्टर्नर जो खुद एक प्रोफेशनल संगीतकार हैं। उन्होंने अपने जीवन में देखा कि कैसे अनुशासन, धैर्य और एक शांत मन से किया गया अभ्यास ना सिर्फ काम में सुधार लाता है
3:06 बल्कि हमारे पूरे जीवन को बदल सकता है। उन्होंने जो कुछ भी खुद सीखा वही इस किताब में बेहद आसान और सच्चे शब्दों में बताया है। ताकि हम सब भी उस सुकून भरी जिंदगी की तरफ लौट सकें। जिसे हमने इस भागती दुनिया में कहीं खो दिया है। जब भी हम प्रैक्टिस शब्द सुनते हैं, हमारे दिमाग में एक ही बात आती है। किसी चीज को बार-बार करना ताकि हम उसमें परफेक्ट हो जाएं। जैसे बार-बार पियानो बजाना, बार-बार क्रिकेट की नेट प्रैक्टिस या फिर बार-बार एक ही चैप्टर पढ़ना। हम सोचते हैं कि जितनी बार करेंगे, उतने अच्छे बनेंगे। लेकिन इस किताब ने मेरी सोच ही बदल दी। इसमें बताया गया है कि प्रैक्टिस सिर्फ दोहराव नहीं है। असली प्रैक्टिस एक सोच है। एक माइंडसेट है। जब आप किसी भी काम को सिर्फ
3:52 इसलिए नहीं करते कि वह करना है या खत्म करना है बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि आपको उस प्रक्रिया में आनंद आने लगा है। तब आप असल में प्रैक्टिसिंग माइंड को जीने लगते हैं। यानी आपका ध्यान अब सिर्फ रिजल्ट पर नहीं रहता बल्कि उस सफर पर रहता है जो आपको उस रिजल्ट तक ले जा रहा है और यहीं से बदलाव शुरू होता है। चाहे आप स्टूडेंट हो, कोई खिलाड़ी, कोई कलाकार या एक आम इंसान। जब आप हर काम को अभी और यहीं की भावना से करना शुरू करते हैं, तो वह काम मुश्किल नहीं लगता, भारी नहीं लगता। वह बोझ नहीं बनता बल्कि एक तरह की मेडिटेशन बन जाता है। थॉमस टर्नर यही कहते हैं जब हम काम करते हुए अपने पूरे ध्यान को उस पल में लगा देते हैं तब वह काम एक
4:37 ध्यान का रूप ले लेता है और यही तो असली ध्यान है जहां आप भविष्य की चिंता और अतीत के पछतावे से आजाद होकर सिर्फ अब में जीते हैं। यही इस किताब की सबसे गहरी सीख है। प्रैक्टिस एक बोझ नहीं है। यह तो एक मौका है खुद से जुड़ने का। हर बार जब हम दोहराते हैं तो हम अपने अंदर की शांति से, ध्यान से और सच्चाई से मिलने का एक मौका पा रहे होते हैं। क्या आपने कभी गौर किया है कि हमारा दिमाग शायद ही कभी अभी में होता है? ज्यादातर समय या तो हम अतीत की गलतियों को सोचते रहते हैं। काश ऐसा ना किया होता। काश वैसा बोल दिया होता या फिर भविष्य की चिंता में डूबे रहते हैं। आगे क्या होगा? जरेनिया सफल हो पाऊंगा या नहीं। हमारा मन हर वक्त भागता रहता है।
5:24 कभी पीछे, कभी आगे। लेकिन शायद ही कभी वह वर्तमान में ठहरता है। और यही वजह है कि हम अंदर से थक जाते हैं। तनाव में आ जाते हैं। इस किताब में थॉमस एमस्टर्नर हमें समझाते हैं कि हमारा मन ऐसा क्यों करता है? क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा है। मन एक जंगल की तरह है। अगर उसे दिशा नहीं दो तो वह खुद ब खुद भटक जाएगा। लेकिन अच्छी खबर यह है कि हम अपने मन को ट्रेन कर सकते हैं। सिखा सकते हैं कि कैसे अब में जिया जाए। लेखक कहते हैं कि मन एक मांसपेशी मसल की तरह है। अगर आप उसे रोज थोड़ा-थोड़ा कंट्रोल करने की प्रैक्टिस करो तो वह दिन-बदिन मजबूत बनता है। ठीक वैसे ही जैसे आप जिम जाकर धीरे-धीरे अपने शरीर को मजबूत करते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है धैर्य
6:10 और लगातार अभ्यास। कई बार हम चाहते हैं कि हमारा दिमाग बस एक दिन में शांत हो जाए। ध्यान में बैठते ही सब कंट्रोल में आ जाए लेकिन यह मुमकिन नहीं। हमें अपने मन के साथ प्रेम से धीरे-धीरे रोज-रोज काम करना पड़ता है। इसी को लेखक कहते हैं कंटीन्यूअस जेंटल एफर्ट यानी एक शांत कोमल। लेकिन लगातार किया गया प्रयास। यही इस किताब की आत्मा है। मन को मारना नहीं, मन से लड़ना नहीं बल्कि उसे धीरे-धीरे समझाना, सिखाना और वापस वर्तमान में लाना। और जब आप यह करना सीख जाते हैं तब आपकी जिंदगी एक अलग ही स्तर पर पहुंच जाती है। जहां ना उतनी चिंता होती है ना उतनी थकान। बस होता है सुकून, शांति और एकदम साफ सोच।
6:57 आजकल हम सभी एक ही चीज के पीछे भाग रहे हैं। मुझे जल्दी अमीर बनना है। मुझे टॉप करना है। मुझे बड़ा नाम कमाना है। मुझे जल्दी सफल होना है। हर कोई अपने-अपने गोल्स को लेकर इतना पागल हो चुका है कि अब जिंदगी एक रेस बन गई है। हर कोई भाग रहा है। लेकिन किसी को यह नहीं पता कि असली रास्ता कौन सा है और क्या वह रास्ता हमें खुशी देगा भी या नहीं। हम दिन रात मेहनत कर रहे हैं। लेकिन उस सफर को जीना भूल गए हैं जो हमें उस मंजिल तक ले जाता है। इस किताब मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड में एक बेहद सच्ची और गहरी बात कही गई है कि अगर हम अपने हर छोटे-छोटे कदम से प्यार करना सीख जाए। अगर हम सिर्फ मंजिल नहीं बल्कि उस रास्ते को भी उतनी ही इज्जत और खुशी से
7:43 अपनाएं तो मंजिल अपने आप मिल जाती है। पर आज के दौर में हम उल्टा कर रहे हैं। हम सिर्फ रिजल्ट पर ध्यान देते हैं। प्रोसेस को बोझ मानते हैं और यहीं हम सबसे बड़ी गलती कर बैठते हैं। लेखक बताते हैं कि जब हम सिर्फ लक्ष्य से जुड़ जाते हैं तो हर दिन हमें अधूरा लगता है। ऐसा लगता है जैसे हम तब तक कुछ नहीं है जब तक वह लक्ष्य पूरा नहीं होता। लेकिन जब हम प्रोसेस से जुड़ जाते हैं यानी रोज की उस मेहनत से, उस अभ्यास से, उस संघर्ष से तब हमारा मन शांत रहने लगता है। हमें काम करने में मजा आने लगता है और जीवन से एक जुड़ाव बनने लगता है। सोचिए अगर आप हर दिन सिर्फ यह सोचकर काम करें कि मैं इस पल में अपना सबसे अच्छा दे रहा हूं तो क्या काम बोझ लगेगा? नहीं बल्कि हर दिन आपको खुद पर
8:30 गर्व होगा। और जब मन में शांति होती है तभी असली सफलता मिलती है। क्योंकि तब आप सिर्फ मंजिल तक नहीं पहुंचते। आप उस सफर को भी जीते हैं। इसलिए इस किताब की यह सीख बहुत जरूरी है कि लक्ष्य जरूरी है लेकिन उनसे भी ज्यादा जरूरी है उस रास्ते को अपनाना। उस यात्रा को महसूस करना जो आपको वहां तक ले जाती है। क्योंकि जब आप प्रोसेस से प्यार करना सीख जाते हैं तो हर दिन हर पल अपने आप में एक जीत बन जाता है। जब हम किसी भी काम की प्रैक्टिस करते हैं चाहे पढ़ाई हो, कोई स्किल हो या कोई छोटी सी आदत ही क्यों ना हो तो हमारा ध्यान बहुत जल्दी भटकने लगता है। हम मन ही मन सोचने लगते हैं। यह कब खत्म होगा? मैं इतनी कोशिश कर रहा हूं। फिर भी रिजल्ट क्यों नहीं मिल रहा? शायद मैं इसमें अच्छा
9:17 नहीं हूं। और फिर धीरे-धीरे वह काम हमें थकाने लगता है, बोर करने लगता है। लेकिन इस किताब में बताया गया है कि असली ध्यान सिर्फ उस चीज में नहीं होता जिसे हम कर रहे हैं। बल्कि उस पल में होता है जिसमें हम हैं। थॉमस एमस्टर्नर कहते हैं कि माइंडफुलनेस यानी हर पल को पूरी जागरूकता के साथ जीना। कोई मुश्किल ध्यान साधना नहीं है ना ही कोई स्पेशल मेडिटेशन टेक्निक। बल्कि यह एक जीने का तरीका है। एक सोचने का नया नजरिया है। माइंडफुलनेस का मतलब है जब आप जो भी कर रहे हो बस पूरे मन से कर रहे हो। सोचिए अगर आप बर्तन धो रहे हैं तो सिर्फ बर्तन धोना नहीं है। पानी की ठंडक महसूस करना, अपने हाथों की हलचल को देखना, हर मूवमेंट को महसूस करना
10:04 यही तो माइंडफुलनेस है। जब आप खाना खा रहे हैं तो सिर्फ भूख मिटाने के लिए नहीं बल्कि हर निवाले को महसूस करना, उसकी महक, उसका स्वाद, उसकी गर्माहट को ध्यान से जीना यही माइंडफुलनेस है। किताब हमें यह समझाने की कोशिश करती है कि माइंडफुलनेस कोई बड़ी बात नहीं है। यह तो हर उस पल में छुपी है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। जब आप किसी इंसान से बात कर रहे हो तो सिर्फ जवाब देने के लिए मत सुनिए। सच में उसकी बातें सुनिए। उसकी आंखों में देखिए। उसके भावों को समझिए। यही तो उस पल को पूरी तरह जीना है और जब हम ऐसा करना सीख जाते हैं तो हम हर बार अपने मन को वर्तमान में लाना शुरू कर देते हैं। तब ना तो अतीत की गलती परेशान करती है ना ही भविष्य की चिंता। हम उस पल में होते हैं
10:50 जहां हम वाकई जिंदा महसूस करते हैं। यही इस किताब की सबसे कीमती सीखों में से एक है कि जब आप अब में जीना सीख जाते हैं तो आपकी जिंदगी बदलने लगती है। आप छोटी-छोटी चीजों में भी खुशी महसूस करने लगते हैं और हर पल एक उपहार जैसा लगने लगता है। यही माइंडफुलनेस है और यही जीवन की असली कला है। क्या आपने कभी खुद से यह सवाल किया है? मैं क्यों इतना पीछे हूं? जरेनिया वो लोग मुझसे आगे कैसे निकल गए? जरेनिया मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? हम में से ज्यादातर लोग हर दिन खुद की तुलना दूसरों से करते रहते हैं। सोशल मीडिया खोलते ही किसी की गाड़ी दिखती है। किसी की सफलता, किसी की लाइफ स्टाइल और हमें लगता है कि हम कहीं ना कहीं कम हैं। हम खुद को दूसरों
11:38 के पैमाने पर मापने लगते हैं और फिर हमारी खुद से दूरी बढ़ने लगती है। लेकिन इस किताब मास्टर दी प्रैक्टिसिंग माइंड में एक बेहद खूबसूरत और सच्ची बात बताई गई है कि असली मुकाबला सिर्फ और सिर्फ खुद से होना चाहिए। आपका असली कंपटीशन वो इंसान है जो आप कल थे। अगर आप हर दिन बस 1% भी बेहतर बनने की कोशिश करते हैं तो 1 साल बाद आप 365% बेहतर इंसान बन सकते हैं। सोचिए कितना बड़ा बदलाव सिर्फ एक छोटे से कदम से शुरू हो सकता है। थॉमस एमस्टर्नर कहते हैं कि बड़ा परिवर्तन कभी भी एक दिन में नहीं आता। वो टीवी शो की तरह नहीं होता कि रातोंरात जिंदगी बदल जाए। असली बदलाव धीरे-धीरे आता है। रोज थोड़ी-थोड़ी
12:23 कोशिशों से, छोटे अभ्यासों से और खुद के साथ धैर्य रखने से। आप रोज अगर थोड़ा सा ध्यान, थोड़ा सा अनुशासन और थोड़ा सा धीरज दिखाएं तो आप खुद को उस इंसान में बदल सकते हैं जिसकी आप कल्पना करते हैं। इस किताब की सबसे बड़ी सीख है धीरे चलो लेकिन रुको मत। यानी आपको दुनिया से तेज भागने की जरूरत नहीं है। आपको सिर्फ अपनी ही रफ्तार से रोज आगे बढ़ते रहना है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरा कितना तेज भाग रहा है। असली बात यह है कि क्या आप आज खुद से थोड़ा बेहतर हैं। क्या आपने आज खुद से कोई वादा निभाया है? अगर हां, तो आप सही रास्ते पर हैं। जब आप इस नजरिए से जीना शुरू करते हैं तो आपकी जिंदगी में एक गहरी शांति आने लगती है। तब ना आपको जलन होती
13:09 है ना हीन भावना। आप खुद से प्यार करना शुरू कर देते हैं और यही आत्मविश्वास की असली जड़ होती है। हम में से बहुत से लोग हर काम में परफेक्ट होने की कोशिश में लगे रहते हैं। हमें लगता है कि अगर हमने कोई गलती कर दी, कोई चीज अधूरी रह गई या कोई रिजल्ट वैसा नहीं आया जैसा सोचा था तो सब बेकार हो गया। हम परफेक्शन को एक ऐसी मंजिल मान लेते हैं जहां पहुंचना जरूरी है। नहीं तो हम फेल हैं। और इसी सोच में हम खुद पर इतना दबाव डाल लेते हैं कि काम करना भी बोझ लगने लगता है। लेकिन इस किताब में थॉमस एमस्टर्नर हमें एक बहुत खूबसूरत और सच्ची बात सिखाते हैं कि परफेक्शन एक भ्रम है। परफेक्शन कोई फिक्स रिजल्ट नहीं होता। कोई सब कुछ सही होना चाहिए वाला नियम नहीं है। असली परफेक्शन तो तब होता
13:56 है जब आप जो कर रहे हैं उसे पूरे दिल से पूरे ध्यान से बिना किसी डर या जल्दबाजी के कर रहे होते हैं। चाहे वह छोटा सा काम हो। जैसे कमरे की सफाई करना, एक गाना गुनगुनाना या सिर्फ किसी को दिल से धन्यवाद कहना। अगर आप उस काम में पूरी तरह मौजूद हैं तो वही परफेक्शन है। थॉमस कहते हैं कि जब आप किसी काम को इस सोच के साथ करते हैं कि मैं इस पल में अपना सबसे अच्छा देने की कोशिश कर रहा हूं तो आप पहले से ही सफल हैं। आपको परफेक्ट बनने के लिए दूसरों के मानकों पर खरा उतरने की जरूरत नहीं है। आपको सिर्फ खुद से सच्चे होने की जरूरत है। और जब आप इस सोच से काम करते हैं तो हर काम में एक सुंदरता आ जाती है। एक शांति, एक गहराई जो बाहर से नहीं बल्कि अंदर से आती है। जिंदगी का मतलब यह
14:44 नहीं कि हर चीज बिना गलती हो बल्कि यह है कि हम हर काम में अपनी पूरी उपस्थिति, अपनी पूरी ऊर्जा और अपने पूरे दिल से शामिल रहें। और जब हम ऐसा करते हैं तो ना सिर्फ काम अच्छा होता है बल्कि हम खुद को भी बेहतर महसूस करने लगते हैं। इसलिए अब से हर काम करते वक्त यह मत सोचिए कि क्या यह परफेक्ट है? बल्कि यह सोचिए कि क्या मैंने इसमें अपना दिल लगाया है? क्योंकि जब दिल से किया गया काम सामने आता है तो उसकी चमक तकनीकी परफेक्शन से कहीं ज्यादा होती है और यही है वह असली सुंदरता जो जीवन को जादुई बनाती है। इस किताब की एक और बहुत ही गहरी और जरूरी बात है। सिर्फ बड़े-बड़े लक्ष्य बनाना ही काफी नहीं होता। असली जादू होता है एक मजबूत और सादा
15:29 सिस्टम बनाने में। हम अक्सर सोचते हैं कि अगर हमने कोई बड़ा टारगेट सेट कर लिया जैसे कि 6 महीने में 10 किलो वजन कम करना, एक साल में लाखों कमाना, एक महीने में किताब पूरी पढ़ लेना तो हम कामयाब हो जाएंगे। लेकिन सिर्फ लक्ष्य बना लेना हमें वहां तक नहीं ले जाता। जब तक हमारे पास रोज का एक सिस्टम नहीं होगा, एक प्रॉपर तरीका नहीं होगा, तब तक वह लक्ष्य सिर्फ एक सपना बना रहेगा। थॉमस मैस्टर्न इस किताब में हमें यह समझाते हैं कि अगर हम अपने रोज के छोटे-छोटे कामों पर ध्यान देना शुरू करें जैसे रोज एक तय समय पर उठना, थोड़ी देर ध्यान करना, अभ्यास करना, खुद को रिव्यू करना तो यही छोटे-छोटे स्टेप्स मिलकर एक बड़ी सफलता का रास्ता बनाते हैं। और सबसे खास बात यह है कि जब
16:17 आप सिस्टम पर ध्यान देते हैं तो आप हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके आगे बढ़ते हैं और वह छोटा सा रोजाना बढ़ाया गया कदम एक दिन इतना बड़ा बन जाता है कि आप खुद हैरान रह जाते हैं। सोचिए अगर कोई बच्चा हर दिन सिर्फ 15 मिनट पियानो बजाता है तो एक साल में वो 90 घंटे से भी ज्यादा अभ्यास कर चुका होता है। और यही 90 घंटे उसे उस मुकाम तक पहुंचाते हैं जहां शायद वह खुद भी नहीं सोचता था। यही सिस्टम की ताकत है। यह बिना शोर के, बिना भारी दबाव के आपको धीरे-धीरे ऊपर उठाता है। इसलिए लेखक कहते हैं, सिर्फ मैं यह बनना चाहता हूं कहने से कुछ नहीं होगा। आपको खुद से पूछना पड़ेगा। मैं रोज इसके लिए क्या कर रहा हूं? अगर आपका फोकस सिस्टम पर है, यानी उस रोज की छोटी-छोटी प्रैक्टिस पर, तो लक्ष्य अपने
17:04 आप आपके पीछे-पीछे चलने लगेगा। वो मंजिल तब सिर्फ एक पॉइंट नहीं होगी बल्कि सफर का एक हिस्सा बन जाएगी। मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड हमें यही सोचने का तरीका सिखाती है कि टारगेट्स बनाने से ज्यादा जरूरी है ऐसी आदतें बनाना जो रोज आपको थोड़ा और निखारें क्योंकि जब आप सिस्टम को मास्टर कर लेते हैं तो फिर कोई भी लक्ष्य दूर नहीं होता वो तो बस रास्ते में एक पड़ाव बन जाता है। थॉमस एम स्टर्नर इस किताब में एक बहुत ही प्यारी और जिंदगी बदल देने वाली बात बताते हैं कि प्रैक्टिस सिर्फ किसी खास स्किल के लिए नहीं होती जैसे पियानो बजाना या क्रिकेट खेलना। असल में तो पूरा जीवन ही एक अभ्यास है। हां, आपने सही सुना। हर दिन, हर मोड़, हर
17:49 स्थिति, सब कुछ एक प्रैक्टिस है। जब आप किसी अपने से बात कर रहे होते हैं, जब आप रिश्तों को समझने और निभाने की कोशिश कर रहे होते हैं। वह भी एक अभ्यास है। जब आप गुस्से में होते हैं और फिर खुद को शांत रखने की कोशिश करते हैं। वह भी प्रैक्टिस है। जब आप ट्रैफिक में फंसे होते हैं, लेकिन फिर भी धैर्य बनाए रखते हैं। तब आप सिर्फ गाड़ी नहीं चला रहे होते, आप धैर्य का अभ्यास कर रहे होते हैं। यहां तक कि जब आप कोई गलती करते हैं और फिर उसे स्वीकार करते हैं, उससे कुछ सीखते हैं और खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं तो वह भी अभ्यास ही है। हम सोचते हैं कि प्रैक्टिस का मतलब है बार-बार किसी खास काम को करना। लेकिन इस किताब के नजरिए से देखें तो हर अनुभव, हर भावना, हर प्रतिक्रिया, सब कुछ
18:38 एक प्रैक्टिस का हिस्सा है। जब आप इस सोच के साथ जीना शुरू करते हैं तो आपकी पूरी जिंदगी बदलने लगती है। तब आप खुद पर नाराज नहीं होते कि मैं सही क्यों नहीं कर पाया बल्कि आप सोचते हैं, मैं सीख रहा हूं। मैं अभ्यास कर रहा हूं। तब आप दूसरों से कम तुलना करने लगते हैं और खुद को एक विद्यार्थी की तरह देखने लगते हैं। जो हर दिन सीख रहा है जो हर गलती को सुधारने का मौका मानता है। इस सोच से जीने से आपके अंदर एक गहरा संतुलन आता है। आप जिंदगी से लड़ना छोड़ देते हैं और उसे अपनाना शुरू कर देते हैं। आप हर परिस्थिति में कुछ ना कुछ नया सीखते हैं और यही आपको एक शांत, समझदार और भीतर से जुड़ा हुआ इंसान बनाता है। मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड। हमें
19:23 यही सिखाती है कि जीवन कोई एक फाइनल टेस्ट नहीं है। यह एक निरंतर चलने वाला अभ्यास है। और जब आप इस अभ्यास को अपनाते हैं तो जिंदगी सिर्फ आसान नहीं होती। वह गहराई से भरी, सुंदर और सुकून देने वाली हो जाती है। दोस्तों, मास्टर द प्रैक्टिसिंग माइंड को सुनना या पढ़ना किसी किताब को खत्म करना नहीं है। यह एक साधना की तरह है। एक आत्मिक अनुभव की तरह है। यह किताब आपको कोई जादुई तरीका नहीं बताती ना ही बड़े-बड़े वादे करती है। यह आपको कुछ बहुत ही सादा लेकिन बेहद गहरा सिखाती है कि सच्ची सफलता कोई मंजिल नहीं है बल्कि वह तरीका है जिससे आप हर दिन जीते हैं। जब आप हर पल को पूरी जागरूकता के साथ जीना सीख जाते हैं। जब आप अपनी हर कोशिश में
20:08 उपस्थिति लाते हैं। चाहे वह एक छोटी सी बात हो या बड़ा फैसला तो आप सिर्फ बाहरी रूप से सफल नहीं होते। आप अंदर से शांत खुश और पूर्ण महसूस करने लगते हैं। और यही तो हर इंसान चाहता है सिर्फ पैसा या शोहरत नहीं बल्कि दिल से सुकून। इस तेज रफ्तार शोरगुल भरी जिंदगी में हम सब एक गहरी शांति की तलाश में हैं। हम सब चाहते हैं कि कोई हमें रोके, थामे और कहे सब ठीक है। बस अब तुम इस पल को जियो और यही आवाज बनकर यह किताब हमारे जीवन में आती है। अगर आप भी उस ठहराव को पाना चाहते हैं जहां आपकी सोच साफ हो, दिल हल्का हो और जिंदगी का हर पल एक मायने रखें तो यह किताब आपके लिए है। मास्टर्ड प्रैक्टिसिंग माइंड सिर्फ एक
20:54 किताब नहीं है। यह एक जीवन पद्धति है। एक सोचने और जीने का तरीका है जो आपको अंदर से बदल सकता है। यह किताब आपको सिखाती है कि बदलाव का जादू किसी बाहर की चीज में नहीं बल्कि आपकी रोज की छोटी-छोटी कोशिशों में छुपा है। तो अगर आप इस यात्रा पर निकलना चाहते हैं, अपने अंदर की शांति को फिर से पाना चाहते हैं, हर दिन को संपूर्णता से जीना चाहते हैं, तो इस किताब को जरूर सुनिए और इसे सिर्फ समझिए नहीं अपनी जिंदगी में अपनाइए। क्योंकि जब आप प्रैक्टिसिंग माइंड को जीना शुरू कर देंगे तो आप पाएंगे कि जिंदगी में सफलता से कहीं ज्यादा खूबसूरत चीज है।